Tuesday, June 22, 2021
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पार्टी जान कहती है – कोई भी स्कैम छोटा नहीं होता… और स्कैम से बड़ा कोई धर्म नहीं होता

सरकार से काम हो या न हो, पार्टी के पास पावर रहे या न रहे, पार्टी के पास प्रेजिडेंट रहें या न रहें, आरोप लगे या न लगे, विरोध हो या न हो, महामारी आए या जाए, पर स्कैम होते रहने चाहिए - स्कैम करने की प्रैक्टिस नहीं रोको।

किट से कॉन्ग्रेस पार्टी खुद को अलग नहीं रख पा रही है। आए दिन किसी न किसी किट से जुड़ी हुई मिलती है। अभी टूलकिट की चर्चा ख़त्म हो रही थी कि कोविड किट की चर्चा शुरू हो गई। खबर है कि पंजाब की कॉन्ग्रेस सरकार पर कोविड किट स्कैम का आरोप लगा है। दूसरा नाम देना चाहें तो इसे महामारी स्कैम भी कह सकते हैं।

दस बरस भी नहीं हुआ, जब जमाना अच्छा था और मोदी प्रधानमंत्री नहीं थे तब पार्टी स्कैम की महामारी के लिए जानी जाती थी। अब जमाना खराब है तो उसे महामारी स्कैम करना पड़ रहा है। स्कैम कितने का है, ये गिनती अभी चल रही है। चूँकि शुरुआती दिन हैं तो गिनती केवल आठ-दस करोड़ तक ही पहुँची है।

यह बात कई कॉन्ग्रेसियों के लिए निश्चित रूप से चिंताजनक होगी कि जिस पार्टी पर एक समय लाखों करोड़ के स्कैम के आरोप लगते थे, वह अब आठ-दस करोड़ पर आ गई है। वैसे कुछ कॉन्ग्रेसी यह सोचते हुए खुश होंगे कि; कुछ बुरा नहीं है, आठ-दस करोड़ का ही सही, स्कैम कर तो ले रहे हैं। इसका मतलब यह है कि स्कैम करने का पार्टी का टैलेंट अभी भी बना हुआ है। प्रैक्टिस बनी रही और भविष्य में मौका मिला तो पार्टी एक्सपेंशन कर लेगी।

जिनका इस बात में विश्वास है कि देश पर शासन कैसे करना है, यह केवल कॉन्ग्रेस को पता है, वे इस नए स्कैम के बाद यह मुहावरा याद करके खुश हो रहे होंगे कि; मरा हुआ हाथी भी सवा लाख का होता है। जिन्हें इस बात की चिंता सताए जा रही थी कि पार्टी धीरे-धीरे सिमटती जा रही है, वे यह सोचकर खुश होंगे कि कठिन समय में भी पार्टी की अपनी निपुणता में कोई कमी नहीं आई है। अवसर रहे तो उत्तम और न रहे तो अति उत्तम, क्योंकि तब अवसर का निर्माण कर स्कैम करने से पार्टी की निपुणता में और निखार आता है।

पार्टी पावर से दूर भले चली जाए, पर स्कैम से दूर नहीं जा सकती। यही पार्टी का दर्शन है और यही उसका सम्पूर्ण प्रदर्शन है। कभी-कभी तो लगता है जैसे पार्टी अगर अपने इस दर्शन से भटकने की कोशिश भी करती होगी तो कोई अदृश्य शक्ति उसे स्कैम के सामने धकेल देती होगी, यह कहते हुए कि; अपने दर्शन और अपने कर्म से दूर रह कर ग्रैंड ओल्ड पार्टी को खुद का अपमान करने का अधिकार नहीं है।

कभी-कभी यह भी लगता है जैसे पार्टी का कोई अलिखित नियम है, जिसके तहत हर कॉन्ग्रेसी को हिदायत होगी कि उसे पार्टी का प्रमुख सिद्धांत भूलने का अधिकार नहीं है और सिद्धांत यह है कि सूखा, बाढ़, तूफान, महामारी, आपदाएँ वगैरह अवसर लेकर आते हैं। ऐसे में अवसर की तलाश और उसका फायदा न उठाना पार्टी के खिलाफ बगावत मानी जाएगी। इसलिए हर कॉन्ग्रेसी को निष्ठा, संस्कृति, कर्त्तव्य और आदत के अनुसार अपने-अपने अवसर खोज लेने हैं।

इतिहास गवाह है कि ऐसा समय काम करने वालों के लिए कुछ नया करने का, काम न करने वालों के लिए कुछ नया न करने का और कॉन्ग्रेस के लिए स्कैम करने का होता है और वही इतिहास इस बात का भी गवाह है कि पार्टी के इस अलिखित नियम का पार्टी वालों ने सदा पालन किया है।

कोरोना के टीके को ही ले लीजिए। कॉन्ग्रेसी और उनके समर्थक पूछ रहे थे कि ऐसे कठिन समय में टीका निर्माता प्रॉफिट क्यों कमाना चाहते हैं? वे टीका मुफ्त में क्यों नहीं देते। उनकी इस बात को किसी ने कान नहीं दिया तो ये पूछने लगे कि केंद्र सरकार को राज्य सरकार से कम दाम में क्यों मिल रहा है? निर्माता सरकार से प्रॉफिट क्यों कमाना चाहते हैं? इन्हीं कॉन्ग्रेसियों की कैप्टन सरकार ने खुद यही टीके बेच कर वही प्रॉफिट कमा लिया, जो वह दूसरों को कमाते हुए नहीं देखना चाहती थी।

इसे कहते हैं कॉन्ग्रेसी-पना। दशकों का आजमाया फॉर्मूला। जब चाहे जहाँ चाहे, दूसरों पर आरोप लगा लो और खुद स्कैम कर डालो। जिस समय खुद कोई घोटाला कर रहे हो, उसी समय किसी और के ऊपर वैसे ही किसी घोटाले का आरोप लगा डालो, सामने वाला सफाई देना शुरू करे तो वही काम कर डालो, जिसका आरोप दूसरों पर लगा रहे थे।

पता नहीं राज्य सरकार की क्या मज़बूरी थी कि विपक्ष के शोर मचाने के बाद उन्होंने बिके हुए टीके वापस ले लिए। प्रेशर शायद आने वाले चुनाव का है। सरकार को शायद डर होगा कि इस स्कैम का विपक्षी दल इस्तेमाल करें या न करें, पार्टी का ही ओये गुरु, ठोको ताली ग्रुप तो पक्का कर लेगा। किए जा रहे स्कैम से पीछे हटना वैसे तो पार्टी की परंपरा और अनुशासन के खिलाफ है पर यदि पीछे हटने से पार्टी का फायदा हो तो ऐसा करना ही राजनीतिक और पारिवारिक इंटरेस्ट-सम्मत है। यही पार्टी के लिए सिद्धांत-सम्मत है।

यही सिद्धांत पार्टी को गाइड करते हुए बताते हैं कि; सरकार से काम हो या न हो, पार्टी के पास पावर रहे या न रहे, पार्टी के पास प्रेजिडेंट रहें या न रहें, आरोप लगे या न लगे, विरोध हो या न हो, महामारी आए या जाए, पर स्कैम होते रहने चाहिए। दशकों की मेहनत से पार्टी ने यह एक्सपर्टीज हासिल की है, ऐसे में उसका इस्तेमाल न करना उसकी राजनीति के मूल सिद्धांत और दर्शन के विरुद्ध है।

रैंडम स्कैम करो, योजनाबद्ध तरीके से करो या टूलकिट बनाकर करो, पर स्कैम करो क्योंकि स्कैम ही राजनीति है और राजनीति ही स्कैम है। लोग ताना दें या गाली, स्कैम नहीं रुकना चाहिए। कल रेल, खेल, ट्रांसपोर्ट, एयरपोर्ट, आकाश, पाताल, कोयला, हीरा, हवा बतास में करते थे, तो आज केवल यह सोचकर मत रुको कि ये विभाग तुम्हारे पास नहीं हैं। यह सोचकर भी मत रुको कि जो विभाग आज पास में हैं, उनमें केवल छोटा स्कैम किया जा सकता है। आज जो विभाग है, उसी में कर लो। कोई स्कैम छोटे या बड़े नहीं होते, स्कैम बस स्कैम होते हैं। यह लोकतंत्र है, ऐसे में आज जो विभाग पास नहीं हैं, वे कल पास होंगे और तब यही छोटे स्कैम करने की प्रैक्टिस ही काम आएगी।

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