Wednesday, May 22, 2024
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स्वतंत्रता सेनानियों के गुप्त प्रवास की एक गाथा, कैसे जुटाए अर्थ और अस्त्र : क्यों पढ़नी चाहिए ‘क्रांतिदूत’ की झाँसी फाइल्स

'क्रांतिदूत' की इस श्रृंखला में मुख्य रूप से आज़ाद के झाँसी में गुप्त रूप से प्रवास और इस दौरान अपने मातृभूमि को स्वतंत्र कराने की योजनाओं पर प्रकाश डाला गया है। वहाँ उनके लिए संसाधन और गुप्त ठिकानों को उपलब्ध कराने की ज़िम्मेदारी मास्टर रुद्रनारायण जी ने सँभाली।

प्रारंभिक ‘शिक्षा सरस्वती शिशु मंदिर’ (RSS द्वारा संचालित) विद्यालय में होने के कारण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी क्रांतिदूतों के बारे में अच्छी खासी जानकारी प्राप्त हो गई थी। घर में पिताजी किताबों और संगीत के शौक़ीन थे तो शायद पढ़ना और संगीत सुनना विरासत में मिला। क्रांतिकारियों में मुख्यतः आज़ाद से संबंधित अनेक वाक़ये पिताजी सुनाते थे। शायद स्कूल और घर के इस माहौल ने ही देश के प्रति और आज़ादी की बलिवेदी पर प्राणों की आहुति देने वाले इन सेनानियों के प्रति मन को अगाध श्रद्धा से भर दिया।

आज इस भीड़भाड़ और भागमभाग भरी जिंदगी में कई सालों बाद लेखक मनीष श्रीवास्तव की किताब ‘क्रांतिदूत’ ने पुनः उसी दौर को मन के दरवाजे पर ला खड़ा किया। वास्तव में मनीष श्रीवास्तव से जुड़ने और उनके द्वारा लिखित ‘क्रांतिदूत’ पढ़ने का सौभाग्य मेरे लिए ‘बिनु हरि कृपा मिलहि नहीं संता’ को चरितार्थ करने जैसा है।

झाँसी स्वतंत्रता संग्राम का प्रारंभिक और मुख्य केंद्र रहा है। लेखक ने अपनी ‘क्रांतिदूत’ श्रृंखला के ‘झाँसी फाइल्स’ में इसी को सामने लाने का प्रयास किया है। व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए सबसे सौभाग्य की बात यह है कि मैं ऐसे व्यक्ति को पढ़ रही हूँ जिनके नाना मास्टर रुद्रनारायण सिंह जी ही झाँसी में आज़ाद, भगवान दास, सदाशिव, बलवंत (भगत सिंह), शचीन्द्रनाथ जैसे महान क्रांतिकारियों के गतिविधियों के नियंत्रक रहे थे।

‘झाँसी फाइल्स’ की शुरुआत चंद्रशेखर आज़ाद, अशफ़ाक़ उल्लाह खान, रामप्रसाद बिस्मिल और राजगुरु की बातचीत से शुरू होती है। ये अपने संगठन के लिए अर्थ और अस्त्र जुटाने के लिए चिंतित होते हैं क्योंकि इन दोनों के बिना संगठन के उद्देश्यों की पूर्ति होना कठिन था। बातों-बातों में ही इनके क्रांतिकारी दिमाग में एक क्रांतिकारी योजना का जन्म हुआ जो इतिहास में ‘काकोरी कांड’ के नाम से जाना गया।

‘क्रांतिदूत’ की इस श्रृंखला में मुख्य रूप से आज़ाद के झाँसी में गुप्त रूप से प्रवास और इस दौरान अपने मातृभूमि को स्वतंत्र कराने की योजनाओं पर प्रकाश डाला गया है। वहाँ उनके लिए संसाधन और गुप्त ठिकानों को उपलब्ध कराने की ज़िम्मेदारी मास्टर रुद्रनारायण जी ने सँभाली। क्योंकि, उन्हें पता था कि काकोरी कांड के बाद जिस तरह अंग्रेजी पुलिस क्रांतिकारियों की तलाश में कुत्तों की तरह घूम रही है। ऐसे में इनका सुरक्षित और गुप्त रहना बेहद ज़रूरी था। क्रांति की इन मशालों को हवाओं से बचाना था। इस संघर्ष में ऐसे अनगिनत नाम हैं जिन्होंने परोक्ष रूप में आज़ादी में अपनी महती भूमिका निभाई। लेखक ने ऐसे ही गुमनाम नामों को परिचित कराने का सफल प्रयास किया है ‘क्रांतिदूत’ में।

‘झाँसी फाइल्स’ में आज़ाद के कई अनछुए पहलुओं और रुद्रनारायण और मुन्नी भाभी (लेखक के नाना और नानी जी ) से पारिवारिक संबंध को भी बहुत ही स्नेहिल अंदाज में बताया गया है। यह विवरण सोचने के लिए मजबूर कर देता है कि ऊपर से इतने कठोर दिखने वाले इन युवा क्रांतिदूतों के अंदर भी चुहल व हँसी-मजाक और प्रेम जैसी संवेदनशील भावना बसती थीं, जो पारिवारिक माहौल मिलने पर स्वाभाविक रूप ने स्वतः ही उजागर हो उठती थी। ख़ैर इन क्रांतिदूतों ने तो पूरे भारतवर्ष को ही अपना परिवार मान लिया था और परिवार को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने की शपथ उठा रखी थी।

किताब में कई जगह आज़ाद से जुड़े बहुत ही रोचक प्रसंग का चित्रण किया गया है जो अनायास ही होठों पर मुस्कुराहट और हृदय में उत्कंठा उत्पन्न करता है कि अब क्या होगा ! क्या आज़ाद और उनसे जुड़े लोगों का भेद खुल जायेगा!

ऐसा ही एक प्रसंग है ‘दम्बूक’ शीर्षक में। हालांकि हम सबको पता है कि आज़ाद आजीवन आज़ाद ही रहे। अंग्रेजी हुकूमत की किसी गोली में इतनी हिम्मत न थी  कि आज़ाद को छू भी पाती। लेकिन, ये लेखक के कलम का ही जादू है कि ऐसे कई प्रसंगों में मन आशंका से भर उठता है।

‘क्रांतिदूत’ श्रृंखला ऐसे समय में आई है जब युवा पीढ़ी आज़ादी की बलिवेदी पर स्वयं को न्योछावर कर देने वाले इन क्रांतिवीरों के इतिहास के ज्ञान से लगभग अनभिज्ञ है। ऐसे समय पर ऐसी ज्ञानवर्धक किताबों की श्रृंखला प्रस्तुत करके मनीष जी ने समाज, खासकर युवा वर्ग के लिए पथ प्रदर्शक की भूमिका निभाई है। पाठ्यक्रम में शामिल करने योग्य ‘क्रांतिदूत’ सीरीज की अन्य पुस्तकें भी रोचक और ज्ञानवर्धक होंगी – ऐसा विश्वास है।

किताब में प्रिंट और कहीं कहीं वाक्यों के समायोजन संबधी त्रुटियाँ अवश्य हैं, लेकिन विषयवस्तु के आगे वे गौण हो जाती हैं। अंत में ‘क्रांतिदूत’ श्रृंखला की सभी किताबों को हर भारतीय को अवश्य पढ़ना चाहिए। आशा है कि इस पुस्तक को लोग हाथोंहाथ लेंगे।

(इस लेख को वंदना कपिल ने लिखा है)

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