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अहमदाबाद का नाम कर्णावती करने की माँग फिर हुई तेज: आशावल से कर्णदेव सोलंकी की कर्णावती फिर अहमद शाह पर नामकरण, जानें- इस शहर का पूरा इतिहास

भारत के किसी भी इलाके या शहर का इतिहास आमतौर पर वैदिक काल से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन वैदिक काल में उस जगह का कोई खास उल्लेख नहीं मिलता, जहाँ आज अहमदाबाद बसा हुआ है।

गुजरात की आर्थिक राजधानी और सबसे बड़ा शहर अहमदाबाद का नाम बदलकर उसके पुराने नाम ‘कर्णावती’ रखने की माँग एक बार फिर तेज हो गई है। पहले भी कई बार इस मुद्दे पर चर्चा हो चुकी है और अलग-अलग समय पर इसके लिए अभियान भी चलाए गए हैं। कई हिंदू संगठन लगातार इस माँग को उठाते रहे हैं कि शहर का नाम कर्णावती किया जाए। अब फिर से यह मुद्दा सामने आया है।

गुजरात विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने राज्य सरकार और केंद्र सरकार से अहमदाबाद का नाम जल्द से जल्द कर्णावती करने की अपील की है। गुजरात इकाई के नेता अशोक रावल ने शनिवार (4 अप्रैल 2026) को एक वीडियो बयान जारी करके यह माँग रखी।

VHP के कर्णावती महानगर के फेसबुक पेज पर शेयर किए गए इस वीडियो में उन्होंने कहा कि “कर्णावती नाम हमारे गौरवशाली इतिहास और संस्कृति से जुड़ा हुआ है। यह सिर्फ एक नाम नहीं है, बल्कि हमारे पूर्वजों की पहचान और परंपरा का प्रतीक है। आज का अहमदाबाद शहर सदियों से कर्णावती के नाम से जाना जाता रहा है। हम भारत सरकार और गुजरात सरकार से निवेदन करते हैं कि करोड़ों लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए शहर का नाम तुरंत बदलकर ‘कर्णावती’ किया जाए।”

स्थानीय चुनावों की घोषणा होते ही यह बयान सामने आया है और इसके साथ ही हिंदू संगठनों की माँग भी तेज हो गई है। ऐसे में इस शहर के नाम का इतिहास जानना जरूरी हो जाता है। क्योंकि इस शहर को अलग-अलग समय में आशावल, कर्णावती और राजनगर के नाम से जाना जाता रहा है। इनमें इसका आखिरी नाम कर्णावती था, जबकि कई जैन ग्रंथों में इसे ‘राजनगर’ के नाम से भी बताया गया है।

लेकिन 14वीं शताब्दी के बाद धीरे-धीरे यह हिंदुओं का गौरवशाली शहर इस्लामी प्रभाव में आने लगा और आखिरकार कर्णावती का नाम बदलकर ‘अहमदाबाद‘ हो गया। अब आइए इसके इतिहास पर एक नजर डालते हैं।

आशावल से कर्णावती नगरी तक

भारत के किसी भी इलाके या शहर का इतिहास आमतौर पर वैदिक काल से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन वैदिक काल में उस जगह का कोई खास उल्लेख नहीं मिलता, जहाँ आज अहमदाबाद बसा हुआ है।

इसका मतलब यह है कि उस समय वहाँ किसी बड़े शहर या बस्ती के होने के प्रमाण नहीं मिलते। हालाँकि, उस पूरे क्षेत्र को ‘अनर्त क्षेत्र’ कहा जाता था, जिसमें कच्छ और उत्तर गुजरात के कई हिस्से शामिल थे।

साबरमती नदी का जिक्र भी पुराणों में बाद में मिलता है और वहाँ इसका नाम ‘श्वभ्रवती’ बताया गया है। यानि पुराणों के समय तक भी इस इलाके में किसी विकसित शहर या कस्बे के होने के ठोस सबूत नहीं मिलते।

आधुनिक समय से पहले इसी क्षेत्र में ‘आशावल’ नाम का एक नगर बसाया गया। आज का अहमदाबाद, जिसे एक बड़े औद्योगिक और सांस्कृतिक शहर के रूप में जाना जाता है, उसकी जड़ें उसी समय से जुड़ी हैं जब इसे ‘आशावल’ या ‘आशापल्ली’ कहा जाता था।

यह सिर्फ एक नाम नहीं था, बल्कि उस समय की सामाजिक व्यवस्था, स्थानीय शासन और भौगोलिक स्थिति को भी दर्शाता था। साबरमती नदी के किनारे बसी यह जगह व्यापारिक रास्तों और पानी की उपलब्धता के कारण धीरे-धीरे एक महत्वपूर्ण बस्ती बन गई।

इतिहासकारों के मुताबिक, आशावल क्षेत्र में भील समुदाय का दबदबा था और यहाँ राजा आशा का शासन बताया जाता है। यह जानकारी सिर्फ कहानियों तक सीमित नहीं है, बल्कि कई ऐतिहासिक स्रोतों और क्षेत्रीय इतिहास में भी इसका जिक्र मिलता है। कई किताबों में बताया गया है कि आशावल, साबरमती नदी के किनारे बसी एक शुरुआती बस्ती थी, जो आगे चलकर बड़े राजनीतिक बदलावों का आधार बनी।

11वीं शताब्दी में अल-बिरूनी ने अपने ग्रंथ ‘अल-हिंद’ में आशावल का उल्लेख किया है। उस समय यह पाटन (अन्हिलवाड़) से खंभात तक जाने वाले व्यापार मार्ग पर एक अहम केंद्र था।

यह इलाका उस दौर में भील राजाओं के अधीन था और गुजरात के शुरुआती शहरों में गिना जाता था। वहीं, 14वीं शताब्दी के जैन विद्वान आचार्य मेरुतुंगा ने अपनी रचना ‘प्रबंधचिंतामणि’ में आशावल को एक गाँव के रूप में बताया है, जो सोलंकी राजाओं के आने से पहले का है।

इस बस्ती का नाम ‘आशापल्ली’ से पड़ा, जो आशा भील के नाम पर रखा गया था। उस समय यह कोई बड़ा शहर नहीं था, लेकिन व्यापार और स्थानीय आदिवासी हिंदू संस्कृति का एक महत्वपूर्ण केंद्र जरूर था।

यह समझना जरूरी है कि आशावल को सिर्फ एक छोटी बस्ती मानना ठीक नहीं होगा। यह वह समय था जब गुजरात के इस हिस्से में स्थानीय लोगों ने अपनी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को मजबूत किया।

नदी के किनारे होने के कारण यहाँ खेती, पशुपालन और छोटे स्तर का व्यापार अच्छे से विकसित हुआ, जिससे इस क्षेत्र में स्थिरता आई। यही स्थिरता आगे चलकर इसे आने वाले शासकों के लिए एक महत्वपूर्ण और रणनीतिक केंद्र बनाने में मददगार बनी।

सत्ता परिवर्तन और कर्णदेव का आगमन

गुजरात के इतिहास में एक बड़ा बदलाव 11वीं शताब्दी के आखिरी दौर में आया, जब चालुक्य यानी सोलंकी वंश के राजा कर्णदेव सोलंकी ने इस क्षेत्र में कदम रखा। उस समय तक सोलंकी वंश गुजरात की राजनीति में एक मजबूत ताकत बन चुका था और उनकी राजधानी अन्हिलवाड़ (पाटन) थी। कर्णदेव का शासन सिर्फ विस्तार तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने प्रशासन को मजबूत करने और संस्कृति को आगे बढ़ाने पर भी ध्यान दिया।

इतिहास के अनुसार, कर्णदेव ने आशावल क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित किया और यहाँ एक नए और व्यवस्थित शहर की स्थापना की, जिसका नाम ‘कर्णावती’ रखा गया। यह सिर्फ नाम बदलने भर की बात नहीं थी, बल्कि एक नए राजनीतिक दौर की शुरुआत का संकेत था। उस समय के सोलंकी काल के साहित्य से भी यह पता चलता है कि कर्णदेव ने अपने शासन में नए इलाकों को विकसित किया और उन्हें बेहतर तरीके से संगठित किया।

कर्णावती की स्थापना एक बड़ी प्रक्रिया का हिस्सा थी, जिसमें उस समय भारत के अलग-अलग हिस्सों में राजवंश अपने क्षेत्रों को मजबूत करने के लिए नए शहर बसाते थे। इसमें सिर्फ किले या सरकारी इमारतें बनाना ही शामिल नहीं था, बल्कि पूरी सामाजिक व्यवस्था को भी नए सिरे से व्यवस्थित किया जाता था। कर्णावती भी ऐसा ही एक शहर था, जहाँ शासन, धर्म, व्यापार और संस्कृति सभी का एक साथ विकास हुआ।

सोलंकी युग का उदय और कर्णावती की भूमिका

सोलंकी काल को गुजरात के इतिहास का स्वर्ण युग माना जाता है और कर्णावती इस दौर का एक अहम हिस्सा था। इस समय गुजरात में वास्तुकला अपने चरम पर थी। मंदिरों का निर्माण, बावड़ियों (सीढ़ीदार कुओं) का विकास और शहरों की बेहतर योजना, इन सबमें काफी प्रगति हुई। उस समय राज्य सिर्फ राजनीतिक व्यवस्था तक सीमित नहीं था, बल्कि यह सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों का भी बड़ा केंद्र बन चुका था।

चालुक्य काल के ग्रंथों से पता चलता है कि सोलंकी शासन के दौरान गुजरात में व्यापक सांस्कृतिक विकास हुआ। कर्णावती ऐसा स्थान था, जहाँ यह विकास साफ दिखाई देता है। ‘प्रबंधचिंतामणि’ में मेरुतुंगा ने लिखा है कि कर्णदेव ने आशावल में कर्ण सागर झील बनवाई और कर्णेश्वर देव (शिव मंदिर) का निर्माण कराया।

इसके अलावा जयंती माता मंदिर और अन्य संरचनाएँ भी बनवाई गईं। धीरे-धीरे कर्णावती गुजरात का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया और पाटन (अन्हिलवाड़ पाटन) के बाद राजधानी के रूप में उभरकर सामने आया।

कर्णावती के विकास में सोलंकी शासकों ने मंदिरों, झीलों और व्यापार मार्गों को विकसित किया। उस समय यह शहर गुजरात की संस्कृति और अर्थव्यवस्था का प्रमुख केंद्र था। प्रसिद्ध इतिहासकार रत्नमणि राव भीमराव जोते, हरिप्रसाद शास्त्री और केशवराम काशीराम शास्त्री जैसे विद्वानों ने भी इन तथ्यों का समर्थन किया है।

आज कर्णावती के भौतिक प्रमाण पाटन या मोढेरा की तरह साफ तौर पर नहीं दिखते, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इसका महत्व कम था। इतिहास में कई ऐसे शहर रहे हैं, जिनका रूप समय के साथ बदल गया, लेकिन उनका जिक्र और उनकी पहचान इतिहास में बनी रही।

कर्णावती भी ऐसा ही एक शहर है, जो अपने समय में महत्वपूर्ण था और जिसने आगे आने वाले शहरों की नींव रखी। कर्णावती को लेकर इतिहासकारों के बीच एक दिलचस्प बहस भी है। कुछ इसे एक पूरी तरह विकसित शहर मानते हैं, तो कुछ इसे एक प्रशासनिक या क्षेत्रीय केंद्र के रूप में देखते हैं।

लेकिन इस मतभेद के बावजूद एक बात साफ है कि ‘कर्णावती’ नाम सोलंकी काल से जुड़ा हुआ है और इस क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा रहा है। स्थानीय परंपराओं और साहित्य में इस नाम का लगातार जिक्र मिलता है, जिससे यह समझ आता है कि यह सिर्फ शासक का दिया हुआ नाम नहीं था, बल्कि समाज में भी इसे स्वीकार किया गया था।

यह निरंतरता इस बात को मजबूत करती है कि कर्णावती कोई अस्थायी नाम नहीं था, बल्कि एक स्थायी ऐतिहासिक पहचान थी, जिसे समय के साथ दबा दिया गया, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सका।

आशावल एक ऐसी बस्ती थी जो स्थानीय लोगों, जनजातीय समाज और प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित थी, जबकि कर्णावती एक संगठित, राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से विकसित शहर के रूप में सामने आया।

यह बदलाव सिर्फ बाहरी नहीं था, बल्कि इसने क्षेत्र की सामाजिक व्यवस्था, आर्थिक गतिविधियों और सांस्कृतिक रूप को भी बदल दिया। हालाँकि, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि कर्णदेव का उद्देश्य पुराने नाम को पूरी तरह खत्म करना नहीं था, क्योंकि सोलंकी काल के साहित्य में आशावल और कर्णावती दोनों नाम साथ-साथ मिलते हैं।

आशावल और कर्णावती का इतिहास यह दिखाता है कि अहमदाबाद की पहचान 15वीं शताब्दी से शुरू नहीं होती, बल्कि उससे कई सदियों पहले से बन रही थी। कर्णावती उस ऐतिहासिक प्रक्रिया का अहम चरण था, जब यह क्षेत्र अपने चरम पर था और आगे आने वाले समय की नींव रख रहा था।

यह कहानी सिर्फ एक शहर की नहीं है, बल्कि इतिहास में बनी रहने वाली निरंतरता की है। नाम बदलते हैं, सत्ता बदलती है, लेकिन पहचान पूरी तरह खत्म नहीं होती। कर्णावती उसी निरंतरता का प्रतीक है, जो आज भी इतिहास के पन्नों में जीवित है और समय-समय पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराती रहती है।

कर्णावती से अहमदाबाद

14वीं और 15वीं शताब्दी का समय भारतीय उपमहाद्वीप में बड़े राजनीतिक बदलावों का दौर था। दिल्ली सल्तनत के कमजोर पड़ने के बाद अलग-अलग क्षेत्रों में नई सल्तनतें उभरने लगीं, जिनमें गुजरात सल्तनत एक मजबूत शक्ति के रूप में सामने आई। इस बदलाव का असर सिर्फ शासन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शहरों की बनावट, प्रशासनिक ढाँचे और सांस्कृतिक पहचान पर भी पड़ा।

15वीं शताब्दी की शुरुआत में मुजफ्फर वंश ने गुजरात में सत्ता संभाली। इस वंश के संस्थापक मुजफ्फर शाह प्रथम के बाद उनके पोते अहमद शाह प्रथम ने राजधानी को पाटन से कहीं और ले जाने का फैसला किया।

26 फरवरी 1411 को साबरमती नदी के किनारे मानेक बुर्ज पर अहमदाबाद की नींव रखने की बात कही जाती है। यह वही इलाका था, जिसे पहले कर्णावती या आशावल के नाम से जाना जाता था, लेकिन इतिहास में यह दर्ज है कि अहमद शाह ने यहीं अपना नया केंद्र बनाया।

इसी पृष्ठभूमि में अहमद शाह प्रथम का उदय हुआ, जिन्होंने 1411 ईस्वी में गुजरात सल्तनत की राजधानी को कर्णावती में स्थानांतरित किया। यह सिर्फ प्रशासनिक फैसला नहीं था, बल्कि सत्ता को मजबूत करने और एक नई पहचान बनाने की कोशिश भी थी।

‘अहमदाबाद स्थापना इतिहास 1411’ के अनुसार, अहमद शाह ने साबरमती नदी के किनारे एक नए शहर की नींव रखी, जिसे आगे चलकर ‘अहमदाबाद’ कहा गया। हालाँकि, इस कहानी में कुछ बातें अधूरी भी मानी जाती हैं, क्योंकि यह जगह पहले से ही ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण थी।

यहाँ आशावल और कर्णावती जैसे पुराने केंद्र पहले से मौजूद थे। सरल शब्दों में कहें तो अहमद शाह ने पूरी तरह नया शहर नहीं बसाया, बल्कि पहले से विकसित इलाके को अपने नाम से जोड़ दिया। बाद में इस शहर में ऐसी इमारतें भी बनाई गईं, जो इस्लामी शासन की पहचान को दर्शाती हैं।

यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि अहमदाबाद बिल्कुल नए स्थान पर बसाया गया था। असल में यह उसी जमीन पर विकसित हुआ, जहाँ पहले से आशावल और कर्णावती जैसी बस्तियाँ थीं। यानी अहमद शाह ने नया क्षेत्र नहीं बनाया, बल्कि पहले से बसे और विकसित इलाके को नई पहचान देने का काम किया।

इस प्रक्रिया में पुराने नाम और पहचान धीरे-धीरे पीछे छूटते गए और एक नई पहचान सामने आई। भारतीय इतिहास में ऐसा कई बार हुआ है, जब नए शासकों ने अपनी सत्ता को मजबूत दिखाने के लिए शहरों के नाम बदले और वहाँ अपनी शैली की इमारतें बनवाईं। प्रयागराज का इलाहाबाद नाम भी इसी तरह पड़ा था।

‘मिरात-ए-अहमदी’ जैसे फारसी ग्रंथों में भी यह बताया गया है कि अहमदाबाद का निर्माण एक योजनाबद्ध शाही परियोजना के रूप में हुआ था, जिसमें किले, प्रशासनिक इमारतें और धार्मिक ढाँचे शामिल थे।

नामकरण की कहानियों का प्रसार

‘अहमदाबाद’ नाम के पीछे एक ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक मतलब भी बताया जाता है। समय-समय पर यह बात कही जाती रही है कि इस शहर का नाम सुल्तान अहमद शाह के नाम पर रखा गया।

वहीं कुछ कहानियों में यह भी कहा जाता है कि इस नाम का संबंध चार ‘अहमद’ नाम के सूफी फकीरों या व्यक्तियों से था। कई किताबों में इस विषय पर जानकारी मिलती है और बताया गया है कि शहर का नया नामकरण सत्ता और धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों के मेल का नतीजा था।

यह नामकरण सिर्फ एक औपचारिक बदलाव नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक साफ राजनीतिक संदेश भी था कि अब यह शहर एक नई सत्ता के अधीन है और उसकी पहचान भी उसी के अनुसार बदली जाएगी।

इसी प्रक्रिया में ‘कर्णावती’ नाम को धीरे-धीरे और योजनाबद्ध तरीके से सरकारी कामकाज और आम इस्तेमाल से हटाया गया, ताकि ‘अहमदाबाद’ नाम पूरी तरह स्थापित हो जाए। समय के साथ यह नाम इतना प्रचलित हो गया कि लोगों की बोलचाल और साहित्य में भी गहराई से बस गया, और नाम बदलने के बाद भी यह लंबे समय तक बना रहा।

कर्णावती का इस्लामीकरण

इस्लामी शासक यह समझता था कि सिर्फ कर्णावती का नाम बदल देना ही काफी नहीं होगा। इसलिए उसने पूरे शहर के स्वरूप को बदलने पर जोर दिया। बड़े-बड़े इस्लामी स्मारक बनवाए गए, जिससे समय के साथ पुराने नाम और पहचान को पीछे छोड़ना आसान हो जाए और नई पहचान मजबूत बन सके।

अहमद शाह की धार्मिक सोच उसकी बनवाई गई इमारतों में साफ नजर आती है। कहा जाता है कि उसने पुराने मंदिरों को तोड़कर उनके पत्थरों का इस्तेमाल नई इमारतों में किया। भद्रकाली मंदिर के स्थान पर मस्जिद बनने का जिक्र भी कई स्रोतों में मिलता है।

उस मस्जिद के स्तंभों पर आज भी कुछ पारंपरिक नक्काशी जैसे कमल, आकृतियाँ और अन्य डिजाइन दिखाई देते हैं, जिन्हें पुराने स्थापत्य से जोड़ा जाता है। भद्रा किले का नाम भी इसी क्षेत्र से जुड़ा माना जाता है।

फारसी ग्रंथ ‘मिरात-ए-अहमदी‘ जैसे स्रोतों में इन घटनाओं का उल्लेख मिलता है। साथ ही, यह भी कहा जाता है कि अहमद शाह ने 1413-14 के आसपास आशा भील के वंशजों को हराकर पुराने क्षेत्र पर अपना नियंत्रण मजबूत किया।

यह बदलाव केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि उस समय की सत्ता और संस्कृति को स्थापित करने की एक प्रक्रिया भी था। पुराने ढाँचे में बदलाव करके एक नई पहचान बनाई गई। आज भी अहमदाबाद के पुराने हिस्सों में इस इतिहास के निशान देखे जाते हैं।

2017 में यूनेस्को द्वारा शहर को विश्व धरोहर का दर्जा भी दिया गया, जो इसके ऐतिहासिक महत्व को दिखाता है, हालाँकि इसके अलग-अलग पहलुओं पर आज भी चर्चा होती रहती है।

अहमद शाह के समय में शहर में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य हुए। किले, मस्जिदें और अन्य इमारतें बनाई गईं, जिससे शहर एक प्रशासनिक के साथ-साथ धार्मिक केंद्र के रूप में भी विकसित हुआ।

भद्रा किला, जामा मस्जिद और अन्य संरचनाएँ इसी दौर की पहचान हैं। इससे शहर का स्वरूप काफी बदल गया जहाँ पहले स्थानीय शैली की बस्तियाँ थीं, वहीं अब नई स्थापत्य शैली सामने आई, जो उस समय की सल्तनत के प्रभाव को दिखाती थी।

यह बदलाव सिर्फ इमारतों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके साथ एक नई प्रशासनिक और सांस्कृतिक व्यवस्था भी आई। शहर का नया नाम, नई इमारतें और नई व्यवस्था इन सबने मिलकर एक नई पहचान बनाई, जिससे पुरानी पहचान धीरे-धीरे कम होती चली गई। अहमदाबाद के मामले में भी ऐसा ही देखने को मिलता है।

गुजरात सल्तनत के बाद मुगल सम्राट अकबर ने 1573 में अहमदाबाद पर कब्जा कर लिया। इसके बाद यह शहर मुगल साम्राज्य के गुजरात सूबे का एक अहम केंद्र बन गया। अकबर, जहांगीर और शाहजहाँ के समय में यहाँ व्यापार, कला और वास्तुकला का काफी विकास हुआ।

इसी दौर में अहमदाबाद को कपास और वस्त्र व्यापार का बड़ा केंद्र बनने की दिशा मिली, जिससे इसे आगे चलकर ‘भारत का मैनचेस्टर’ कहा जाने लगा। इस दौरान बनी इमारतों में भी अलग-अलग स्थापत्य शैलियों का मेल देखने को मिलता है, जैसे जामा मस्जिद में कुछ पारंपरिक नक्काशी के तत्व आज भी दिखाई देते हैं।

अली मुहम्मद खान ने अपनी किताब ‘मिरात-ए-अहमदी’ में मुगल काल के अहमदाबाद को एक समृद्ध व्यापारिक शहर बताया है। 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य कमजोर होने लगा, जिससे अहमदाबाद में भी अस्थिरता बढ़ी।

इसके बावजूद शहर का नाम अहमदाबाद ही बना रहा, क्योंकि बाद के शासकों ने उसी पहचान को जारी रखा। इस दौरान कर्णावती से जुड़े कुछ पुराने स्थल, जैसे कर्णसागर झील और कर्णेश्वर मंदिर, इतिहास के पन्नों में सीमित होकर रह गए।

क्या कर्णावती पूरी तरह खत्म हो चुका है?

अब सवाल यह उठता है कि क्या ‘कर्णावती’ नाम पूरी तरह खत्म हो गया था या किसी न किसी रूप में बना रहा था। इतिहास के अनुसार, सरकारी और प्रशासनिक स्तर पर ‘अहमदाबाद’ नाम पूरी तरह स्थापित हो गया था, लेकिन स्थानीय परंपराओं और ऐतिहासिक संदर्भों में ‘कर्णावती’ का नाम पूरी तरह गायब नहीं हुआ।

भारत के कई शहरों में ऐसा देखने को मिलता है, जहाँ आधिकारिक नाम बदल जाने के बाद भी पुराना नाम लोगों की यादों और परंपराओं में बना रहता है। कर्णावती का नाम भी इसी तरह इतिहास और संस्कृति में जीवित रहा, भले ही इसका सरकारी इस्तेमाल बंद हो गया।

समय के साथ अहमदाबाद एक बड़ा शहर बन गया, जिसने मुगल काल, मराठा काल और फिर ब्रिटिश शासन के दौरान भी अपनी पहचान बनाए रखी। इन सभी दौर में ‘अहमदाबाद’ नाम लगातार इस्तेमाल होता रहा, जिससे यह नाम स्थायी हो गया।

हालाँकि, ‘कर्णावती’ का ऐतिहासिक महत्व पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। आज के समय में जब इतिहास, पहचान और सांस्कृतिक विरासत पर चर्चा होती है, तो यह नाम फिर से सामने आता है।

कर्णावती नाम को वापस लाने की माँग भी कोई नई बात नहीं है। 1990 में भाजपा के नियंत्रण वाली अहमदाबाद नगर निगम ने इस संबंध में एक प्रस्ताव पास किया था। 2018 में उस समय के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने इस विषय पर कानूनी और अन्य पहलुओं की जाँच की बात कही थी।

2023 में ABVP और बजरंग दल ने इसके लिए अभियान चलाया और अप्रैल 2026 में विश्व हिंदू परिषद के अशोक रावल ने एक वीडियो बयान के जरिए AMC चुनाव से पहले भाजपा के घोषणापत्र में इस माँग को शामिल करने की अपील की।

इस माँग को कुछ लोग सभ्यतागत सुधार के रूप में देखते हैं, जैसे इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज और औरंगाबाद का नाम संभाजीनगर किया गया। एक दृष्टिकोण के अनुसार, ‘अहमदाबाद’ नाम सुल्तान अहमद शाह के दौर की याद दिलाता है, जबकि ‘कर्णावती’ नाम सोलंकी राजा कर्णदेव से जुड़ी ऐतिहासिक पहचान को सामने लाता है। ‘प्रबंध चिंतामणि‘ और अन्य जैन-हिंदू ग्रंथों में भी इस विरासत का जिक्र मिलता है।

कुछ लोग यूनेस्को या अन्य पक्षों की चिंताओं से सहमत नहीं होते और मानते हैं कि इतिहास को सही रूप में सामने लाना जरूरी है। आज जब भारत आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक पहचान को लेकर आगे बढ़ रहा है, तब अहमदाबाद का नाम कर्णावती करने की माँग को कुछ लोग गौरव से जोड़कर देखते हैं।

उनका मानना है कि नाम सिर्फ शब्द नहीं होता, बल्कि पहचान का प्रतीक होता है। आशावल और कर्णावती का इतिहास एक पुराने दौर की कहानी बताता है, जबकि अहमदाबाद एक अलग ऐतिहासिक चरण को दिखाता है।

यह विवाद सिर्फ नाम बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे यह सवाल भी जुड़ा है कि किसी शहर की पहचान उसके मूल इतिहास से कितनी जुड़ी होनी चाहिए और उसे किस हद तक वापस लाया जा सकता है।

अहमद शाह के नाम पर बना अहमदाबाद आज एक आधुनिक शहर है, लेकिन इसके भीतर आशावल और कर्णावती की ऐतिहासिक परतें आज भी मौजूद हैं। ये परतें हमें यह समझाती हैं कि इतिहास कभी खत्म नहीं होता, बल्कि समय के साथ अपना रूप बदलता रहता है और जरूरत पड़ने पर फिर सामने आ जाता है।

संदर्भ :

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)






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ભાર્ગવ રાજ્યગુરુ
ભાર્ગવ રાજ્યગુરુ
Being learner, Spiritual, Reader

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