देवी की साड़ियों पर अर्चक का अधिकार, फिर भी पुलिस ने किया झूठे आरोप में गिरफ्तार

रंगराजन ने अपने लेख में यह स्पष्ट किया कि मंदिरों के धार्मिक प्रमुखों के तौर पर अर्चकों का ऐसा अपमान बिलकुल अस्वीकार्य है। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत क्षमता और चिलकुर बालाजी मंदिर के अर्चक की हैसियत के अलावा अपनी अध्यक्षता वाले Temples Protection Movement के तौर पर भी.....

हैदराबाद से सटे सिकंदराबाद स्थित संतोषीमाता मंदिर के अर्चक श्री बी रामशर्मा के पक्ष में राज्य के जाने-माने चिलकुर बालाजी मंदिर के अर्चक सीएस रंगराजन उतर आए हैं। रामशर्मा को देवी की साड़ियाँ ‘चुराने’ के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। रंगराजन ने पोर्टल PGurus पर लिखे अपने लेख में यह स्पष्ट किया कि न केवल मंदिर की धार्मिक परम्पराओं के अनुसार स्वर्ण-रजत (सोने-चाँदी) के अलावा बाकी चढ़ावे पर अंतिम अधिकार अर्चक का होता है, बल्कि इस परम्परा को Endowments Act का भी समर्थन है, जिसके अंतर्गत मंदिर की व्यवस्थाओं का संचालन होता है।

सहायक को “पकड़ा” था 42 साड़ियों के साथ

स्थानीय मीडिया के अनुसार रामशर्मा के सहायक बाबूराव को सावन के महीने में माता को चढ़ी 42 साड़ियाँ रामशर्मा के घर ले जाते हुए मंदिर के पूर्व अध्यक्ष राय वेंकटेश और ट्रस्टी राम मोहन ने “पकड़ा” था। उन्होंने गोपालपुरम थाने की पुलिस को बुला कर बाबूराव को उनके हवाले कर दिया था। साथ ही कुछ मीडिया पोर्टलों ने रिपोर्टिंग के सभी मानकों और मूल्यों का हनन करते हुए “आरोपित”, “accused” आदि का प्रयोग किए बगैर सीधे-सीधे रामशर्मा को “चोर” घोषित करते हुए शीर्षक से खबर चला दी थी।

Endowments Act, Section 144 के संशोधन को क्यों नहीं किया गया है लागू?

मामले में पुलिस और सरकार की ओर से अनियमितताओं की पूरी फेहरिस्त गिनाते हुए चिलकुर बालाजी मंदिर के अर्चक सीएस रंगराजन ने हमला बोले है। उन्होंने जानकारी दी कि Endowments Act के Section 144 को बाकायदा संशोधित किया गया था, ताकि सोने-चाँदी के अतिरिक्त अन्य चढ़ावे पर अर्चक के धार्मिक अधिकार को विधिवत अमली जामा पहनाया जा सके। उन्होंने साथ में जोड़ा कि संशोधन में इसे हर मंदिर में लागू करने के तरीके को इस संशोधन के अनुमोदन के समय तय होना था, लेकिन कभी इस संशोधन को अमल में लाया ही नहीं गया। इसी से यह भ्रामक स्थिति उत्पन्न हुई है कि अर्चक को चढ़ावे की साड़ियों पर अधिकार तो है (कानूनी भी, और धार्मिक रूप से भी), लेकिन इस अधिकार के लिए विधिवत तरीका स्थापित नहीं है।

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रंगराजन ने अर्चक पर झूठे आरोप को दुर्भाग्यपूर्ण और पुलिस के अधिकार-क्षेत्र के बाहर बताते हुए पुलिस पर उन्हें प्रताड़ित करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने राज्य के Endowments विभाग से दो सवाल भी पूछे:

1) अगर कानून यह कहता है कि देवी को चढ़ाई गई साड़ियों पर अर्चक का अधिकार है तो क्या उन साड़ियों की चोरी का मुकदमा विभाग अर्चक रामशर्मा के खिलाफ करेगा?

2) क्या विभाग कम-से-कम अब जाकर मंदिरों के धार्मिक प्रमुखों यानि अर्चकों की सेवा शर्तों पर स्थिति स्पष्ट करेगा?

रंगराजन ने अपने लेख में यह स्पष्ट किया कि मंदिरों के धार्मिक प्रमुखों के तौर पर अर्चकों का ऐसा अपमान बिलकुल अस्वीकार्य है। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत क्षमता और चिलकुर बालाजी मंदिर के अर्चक की हैसियत के अलावा अपनी अध्यक्षता वाले Temples Protection Movement के तौर पर भी श्री बी रामशर्मा का निलंबन समाप्त करने और उनको उनके पद पर दोबारा ससम्मान स्थापित किए जाने की माँग की। साथ ही उन्होंने अर्चक को उनके द्वारा उठाई गई परेशानी के लिए मुआवजा दिए जाने की भी माँग की।

इसीलिए ज़रूरी है मंदिरों को सरकारी चंगुल से मुक्त करना

Endowments Act में हुए संशोधन को सरकारी तंत्र द्वारा अब तक न लागू करना ही इस स्थिति का कारण है, जहाँ एक बेगुनाह अर्चक को अपने कानूनी और धार्मिक अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए न केवल अपमानित होना पड़ रहा है, बल्कि जेल की हवा भी खानी पड़ रही है। यह मामला इस बात को और ज़्यादा रेखांकित करता है कि मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करना क्यों ज़रूरी है।

गौरतलब है कि हिन्दू समाज 1954 में शिरूर मठ के जबरन अधिग्रहण के समय से इस बात को लेकर आंदोलनरत है कि हिन्दू मंदिरों में सरकारी हस्तक्षेप न हो; उन्हें वैसे ही स्थानीय और श्रद्धालु-संचालन के लिए दिया जाए जैसे ईसाईयों, मुसलमानों आदि को यह आज़ादी है। इसी प्रकार की सरकारी उदासीनता के चलते होता यह है कि एक ओर मंदिरों की आय लाखों-करोड़ों (यहाँ तक कि कई बार अरबों) में होती है, और दूसरी ओर मंदिरों के पुजारी/अर्चक और अन्य स्टाफ को कई बार ₹750, ₹1000 से लेकर ₹10,000 जैसी नाकाफी ही नहीं बल्कि अपमानजनक राशियाँ वेतन के रूप में मिलतीं हैं।

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