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जब ‘रजस्वला’ होती हैं माँ कामाख्या: 3 दिन रुक जाती है पूजा, खुलते हैं सृजन, शक्ति और साधना के रहस्य; पढ़ें- अंबुबाची मेले की अनोखी कथा

अंबुबाची मेले का महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। इससे जुड़ा एक गहरा प्राकृतिक और सांस्कृतिक संदेश भी माना जाता है। लोकमान्यता के अनुसार, जैसे एक स्त्री मासिक धर्म के दौरान विश्राम करती है, उसी तरह इस अवधि में धरती भी विश्राम करती है।

भारत की धार्मिक परंपराएँ केवल पूजा-पाठ या आस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनमें प्रकृति, जीवन, स्त्री शक्ति और सृजन का गहरा दर्शन भी छिपा हुआ है। देश में कई ऐसे पर्व मनाए जाते हैं जो मनुष्य और प्रकृति के संबंध को समझाते हैं। इन्हीं में से एक है अंबुबाची मेला, जो हर साल असम के गुवाहाटी स्थित माँ कामाख्या मंदिर में आयोजित किया जाता है।

यह मेला अपने स्वरूप, मान्यताओं और धार्मिक रहस्य के कारण बाकी मेलों से बिल्कुल अलग माना जाता है। यहाँ न तो केवल दर्शन का महत्व है और न ही केवल अनुष्ठानों का, बल्कि यह आयोजन उस समय से जुड़ा माना जाता है जब देवी स्वयं विश्राम करती हैं।

मान्यता है कि इन दिनों माँ कामाख्या वार्षिक रजस्वला अवस्था (मासिक धर्म) में रहती हैं और इसी वजह से मंदिर के कपाट कुछ दिनों के लिए बंद कर दिए जाते हैं।

पूर्वोत्तर भारत का यह सबसे बड़ा धार्मिक समागम माना जाता है, जहाँ लाखों श्रद्धालु, साधु-संत, तांत्रिक साधक और देश-विदेश से आने वाले पर्यटक जुटते हैं। इन दिनों पूरा क्षेत्र भक्ति, साधना, रहस्य और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बन जाता है।

क्या है अंबुबाची मेला और इसकी मान्यता क्यों है अलग?

अंबुबाची मेला देवी शक्ति की उपासना से जुड़ा एक वार्षिक धार्मिक आयोजन है। इसकी सबसे विशेष मान्यता यह है कि इस अवधि में माँ कामाख्या को रजस्वला माना जाता है। इस कारण देवी को विश्राम दिया जाता है और मंदिर में सामान्य पूजा-पाठ रोक दिया जाता है।

यह परंपरा स्त्री शरीर और सृजन प्रक्रिया के सम्मान का प्रतीक भी मानी जाती है। जहाँ कई संस्कृतियों में मासिक चक्र को अलग नजर से देखा गया, वहीं इस परंपरा में इसे सृजन शक्ति और जीवन के स्रोत के रूप में सम्मान दिया गया है। अंबुबाची शब्द को भी कई लोग जल, उर्वरता और सृजन से जोड़कर देखते हैं।

यही वजह है कि यह मेला केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक और दार्शनिक महत्व भी रखता है। तंत्र साधना से जुड़े लोगों के लिए भी यह समय अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि इस अवधि में साधना और मंत्र सिद्धि का विशेष महत्व होता है, इसलिए बड़ी संख्या में साधक यहाँ पहुँचते हैं।

कामाख्या मंदिर अंबूबाची मेला
कामाख्या मंदिर के अंबूबाची मेले में हर साल लाखों श्रद्धालुओं की लगती है भीड़ (फोटो साभार: AI)

अंबुबाची मेला 2026: कब शुरू होगा और क्या रहेगा कार्यक्रम?

साल 2026 में अंबुबाची मेले की शुरुआत 22 जून की रात से होगी। इसी दिन रात लगभग 9 बजकर 8 मिनट पर मंदिर के गर्भगृह के कपाट बंद कर दिए जाएँगे। इसके बाद 23 जून, 24 जून और 25 जून तक मंदिर का गर्भगृह पूरी तरह बंद रहेगा। इस दौरान किसी भी श्रद्धालु को देवी के प्रत्यक्ष दर्शन की अनुमति नहीं होती।

मंदिर परिसर में भी सामान्य धार्मिक गतिविधियों को सीमित रखा जाता है। चार दिवसीय इस आयोजन का समापन 26 जून की सुबह विशेष अनुष्ठानों और शुद्धिकरण प्रक्रिया के बाद होगा। इसके बाद श्रद्धालुओं के लिए दर्शन दोबारा शुरू किए जाएँगे। हर साल यहाँ आने वाले लोगों की संख्या लाखों में होती है।

पिछले वर्षों में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुँचने के बाद प्रशासन और मंदिर समिति विशेष व्यवस्था करती रही है। इस बार भी सुरक्षा, सफाई, पेयजल, चिकित्सा और श्रद्धालुओं की आवाजाही को लेकर व्यापक तैयारियाँ की जा रही हैं।

प्रवृत्ति और निवृत्ति: मेले के दो आध्यात्मिक चरण

अंबुबाची मेले की पूरी प्रक्रिया दो प्रमुख चरणों में पूरी होती है- प्रवृत्ति और निवृत्ति। प्रवृत्ति चरण देवी के रजस्वला काल की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। इस समय मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और देवी को विश्राम दिया जाता है। इन दिनों पूजा, आरती और नियमित धार्मिक गतिविधियां नहीं होतीं।

इसके बाद आता है निवृत्ति चरण। इसे देवी के विश्राम काल की समाप्ति और पुनः ऊर्जा के साथ दर्शन देने की अवस्था माना जाता है। विशेष शुद्धिकरण और वैदिक अनुष्ठानों के बाद मंदिर खोला जाता है। यही वह समय होता है जब सबसे ज्यादा श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुँचते हैं और मंदिर परिसर में विशेष धार्मिक वातावरण देखने को मिलता है।

धरती माँ के विश्राम और स्त्री शक्ति का संदेश

अंबुबाची मेले का महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। इससे जुड़ा एक गहरा प्राकृतिक और सांस्कृतिक संदेश भी माना जाता है। लोकमान्यता के अनुसार, जैसे एक स्त्री मासिक धर्म के दौरान विश्राम करती है, उसी तरह इस अवधि में धरती भी विश्राम करती है।

यह समय सामान्य रूप से मानसून के आगमन और भूमि की नई उर्वरता से भी जोड़ा जाता है। इसी सोच के कारण आज भी कई परिवार इन दिनों खेती-बाड़ी, भूमि की खुदाई या कुछ शुभ कार्यों को टालते हैं। इसका उद्देश्य किसी भय से नहीं बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और सृजन प्रक्रिया को समझने से जुड़ा माना जाता है।

यह मान्यता बताती है कि धरती केवल संसाधन नहीं बल्कि जीवन देने वाली शक्ति है, जिसे समय-समय पर विश्राम और सम्मान की आवश्यकता होती है।

अंगोदक, अंगवस्त्र और मेले से जुड़ी विशेष परंपराएँ

अंबुबाची मेले की एक महत्वपूर्ण पहचान है यहाँ मिलने वाला विशेष प्रसाद। परंपरा के अनुसार, मंदिर बंद करने से पहले गर्भगृह में विशेष वस्त्र रखे जाते हैं। कपाट खुलने के बाद श्रद्धालुओं को अंगोदक और अंगवस्त्र प्रदान किया जाता है। अंगोदक पवित्र जल को कहा जाता है जबकि अंगवस्त्र लाल वस्त्र के छोटे भाग को माना जाता है।

श्रद्धालु इसे देवी की कृपा और शक्ति का प्रतीक मानकर अपने साथ ले जाते हैं। इन दिनों मंदिर परिसर में देशभर से आए साधु-संतों और तांत्रिक परंपरा से जुड़े लोगों का भी विशेष जमावड़ा देखने को मिलता है, जिससे मेले का आध्यात्मिक स्वरूप और अधिक विशिष्ट हो जाता है।

माँ कामाख्या मंदिर: जहाँ मूर्ति नहीं, शक्ति के प्रतीक की होती है पूजा

अंबुबाची मेले की आत्मा माँ कामाख्या मंदिर ही है। असम के गुवाहाटी शहर की नीलाचल पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में गिना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, देवी सती के शरीर के विभिन्न अंग जहाँ-जहाँ गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए। कामाख्या को उस स्थान से जोड़ा जाता है जहाँ देवी का योनि भाग गिरा माना जाता है।

इसी कारण यह मंदिर शक्ति, सृजन और देवी उपासना का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि यहाँ देवी की पारंपरिक मूर्ति नहीं है। गर्भगृह में प्राकृतिक शिला स्वरूप की पूजा की जाती है, जो हमेशा जलधारा से सिक्त रहती है। यही स्वरूप इस मंदिर को बाकी शक्तिपीठों से अलग बनाता है।

मुख्य मंदिर के आसपास देवी के विभिन्न स्वरूपों और भगवान शिव को समर्पित कई मंदिर भी स्थित हैं, जो पूरे नीलाचल क्षेत्र को एक विशाल आध्यात्मिक परिसर का रूप देते हैं। इसी वजह से अंबुबाची मेला केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि आस्था, स्त्री शक्ति, प्रकृति, सृजन और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत उत्सव माना जाता है।

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सौम्या सिंह
सौम्या सिंह
ख़ुद को तराशने में मसरूफ़

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