Wednesday, December 2, 2020
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हिन्दूफ़ोबिक द वायर, मंदिर में पूजा-पाठ और यज्ञ-हवन ही होते हैं

पूजा-पाठ करने से ‘क्या’ होता है इसका जवाब क्रिस्लामोकॉमी गिरोह को देना जरूरी नहीं। हर किसी को अपनी आस्था मानने का पूरा हक़ होना चाहिए, चाहे और किसी के कितना भी समझ में न आए। किसी को समझाने का ठेका नहीं लिया हिन्दुओं ने। और जो हिन्दू नहीं है, उसे यह सब जानने में इतनी दिलचस्पी क्यों?

‘लोग हिन्दू होना बंद कर दें’ ही पत्रकारिता के समुदाय विशेष का ‘Endgame’ था, और अब इन असुरों ने अपने पत्ते खोलने भी शुरू कर दिए हैं। ‘क्यों बने भई राम का मंदिर? घर में ही पूजा कर लो’ से शुरू हुआ प्रोजेक्ट ‘सबरीमाला मंदिर में हमारे हिसाब से पूजा होगी (नहीं तो नहीं होगी), ‘शिवरात्रि का दूध शिवलिंग पर मत चढ़ाओ’ से होता हुआ ‘मंदिर में भी हवन-पूजा-यज्ञ क्यों होना चाहिए? यह अन्धविश्वास है, असंवैधानिक है’ के अवश्यम्भावी उपसंहार पर आ गया है। पत्रकार से प्रपोगंडाकार बने सिद्धार्थ वरदराजन के हिन्दूफोबिक पोर्टल ‘द वायर’ में आज छपा लेख सीधे-सीधे मंदिरों में भी पूजा-पाठ, हवन-यज्ञ किए जाने का विरोध करता है।

हुआ यह कि तमिलनाडु के भारी अकाल को लेकर वहाँ की अन्नाद्रमुक सरकार ने अपने हड़पे गए, अपने चंगुल में फँसे 4000 मंदिरों को सर्कुलर दिया कि वह शास्त्रों में वर्णित वह यज्ञ-हवन आदि करें जिससे शास्त्रों में बारिश होने की बात कही गई है। उसी को पकड़ कर वायर उगलता है मंदिरों में पूजा-पाठ कराए जाने का आदेश ‘असंवैधानिक’ है, ‘संविधान में वर्णित ‘साइंटिफिक टेम्पर’ लोगों में लाने के आदेश के खिलाफ है’, ‘ये (दुष्ट) भाजपा करवा रही है यह सब’ वगैरह का विशुद्ध जहर।

सबसे पहले तो मंदिर का काम ही है पूजा-पाठ करना। वो अर्बन नक्सलियों का दिल्ली प्रेस क्लब या जेएनयू नहीं होता। वहाँ लोग भी हवन-यज्ञ के लिए ही जाते हैं और इसीलिए वहाँ पुजारी भी होते हैं। इसलिए वहाँ किसी भी प्रकार का कर्म-कांड होना गलत नहीं, सही है। गलत अगर कुछ है तो वायर की सोच, जो हर चीज इनके अब्राहमी, क्रिस्लामोकॉमी (ईसाई, मुस्लिम और कम्युनिस्ट विचारधारा के घालमेल से बने लेंस से) मानदंडों पर देखती है, और जो न समझ आए उसे नष्ट कर देने पर उतारू हो जाती है।

अब दूसरी बात यह कि पूजा-पाठ करने से ‘क्या’ होता है इसका जवाब क्रिस्लामोकॉमी गिरोह को देना जरूरी नहीं। हर किसी को अपनी आस्था मानने का पूरा हक़ होना चाहिए, चाहे और किसी के कितना भी समझ में न आए। किसी को समझाने का ठेका नहीं लिया हिन्दुओं ने। और जो हिन्दू नहीं है, उसे यह सब जानने में इतनी दिलचस्पी क्यों? हिन्दुओं को अपने योग-आध्यात्म-धर्म के गुरुओं से पता चल जाता है कि शिवलिंग पर दूध क्यों, मंदिर में हवन क्यों।

तीसरी बात ‘साइंटफिक टेम्पर’ की तो, जाओ नहीं करते वह डेवलेप। क्या कर लोगे? आप आए हैं उन्हें ‘साइंटिफिक टेम्पर’ सिखाने जो अपनी धार्मिक सभ्यता के ही चरम पर शून्य, धातुशोधन (metallurgy), चिकित्सा से लेकर स्थापत्य कला के सिरमौर थे। किस चीज में ‘साइंटिफिक’ होना है किसमें नहीं, हमें यह सिखाने वाले पहले खुद में हिन्दुओं के धर्म, आस्था, परंपरा के लिए थोड़ी ‘सहिष्णुता’ विकसित कर लें।

अब तुम्हारे आखिरी सवाल की बात, कि राज्य सरकार ऐसा सर्कुलर क्यों दे रही है तो वह इसलिए आदमपिशाचों कि तुम्हारी ‘सेक्युलर’ सरकारें HR&CE जैसे विभाग बनाकर हमारे मंदिर खा जातीं हैं, हमारे मंदिरों की तिजोरी से अरबों की दान दक्षिणा पर सरकारी डाका डालने और गैर-सरकारी गबन करने के बाद भी हमारे पुजारियों को 19 रुपए, 215 रुपए जैसी नीच तनख्वाहें देतीं हैं। अब जब मंदिर अपने कब्जे में रखा है सरकार ने, सारा चढ़ावा खुद डकार रही है तो पूजा का सर्कुलर सऊदी या वैटिकन से आएगा क्या?

मंदिर किसी के बाप की जागीर नहीं है

हिन्दुओं के मंदिरों में सरकारी हस्तक्षेप से आज वही हो रहा है जिसकी हमेशा से आशंका जताई जा रही थी। इसकी आशंका हमेशा से हिन्दू गुरु जताते थे, पर सेक्युलरिज्म के नशे में अंधी सरकारों के कान पर जूँ नहीं रेंगी। सरकार के हाथों में चले जाने से कोई भी चीज ‘पब्लिक प्रॉपर्टी’ हो ही जाती है- इसी लॉजिक से सबरीमाला को ‘पब्लिक प्लेस है, सबको घुसने मिलना चाहिए’ का हवाला देकर मंदिर की पवित्रता भंग की गई, इसी (कु)तर्क से मदिर टूरिस्ट प्लेस बन रहे हैं और इसी लॉजिक से सरकारें मंदिरों की मलाई काटने की तो हक़दार हैं पर उनसे उम्मीद यह की जाती है कि वे पुजारियों को ज्यादा पैसा न दें (क्योंकि पूजा का काम ‘प्रोडक्टिव’ नहीं है) और पूजा-पाठ में तो सीधा-सीधा विघ्न उत्पन्न करें।

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