Monday, May 16, 2022
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होली पर महादेव की काशी से कृष्ण की नगरी तक छाया है उल्लास: होलिका, होलाका, धुलेंडी, धुरड्डी, धुरखेल, धूलिवंदन… हर नाम में छिपा है कुछ बहुत खास

वैदिक काल में इस पर्व को ‘नवात्रैष्टि यज्ञ’ कहा जाता था। उस समय खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान करके प्रसाद लेने का विधान समाज में था। अन्न को होला कहते हैं, इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा।

देश में इन दिनों होली (Holi) की धूम है। जहाँ काशी सहित देश के कई राज्यों में इस साल होलिका (Holika) दहन- गुरुवार, 17 मार्च, 2022 को मनाई जा रही है। वहीं 18 मार्च, शुक्रवार के दिन रंग-गुलाल के साथ जमकर होली खेली जाएगी तो कुछ जगहों पर इस बार होली 19 मार्च को भी मनाई जा रही है। ऐसा तिथियों में हेर-फेर के कारण है।

यूपी और बिहार में तो खासतौर से इस बार ‘कपड़ा-फाड़’ होली होने वाली है। क्योंकि पिछले दो साल से कोरोना की वजह से लोग ऐतिहात के साथ होली खेल रहे थे। वहीं कृष्ण की नगरी मथुरा, वृन्दावन, गोकुल, नंदगाँव और राधा के बरसाने में होली कई दिन पहले से ही खेली जाती है। तो बनारस में होली रंगभरी एकादशी से शुरू होकर बुढ़वा मंगल तक चलती है।

पर्व-त्योहारों की इस कड़ी में आज होलिका दहन है। इसकी कहानी, धार्मिक और आध्यात्मिक पक्ष पर हम आगे चर्चा करेंगे। उससे पहले आपको बता दें कि होलिका दहन फाल्गुन माह की पूर्णिमा के दिन रंगों की होली से एक दिन पहले किया जाता है। इस त्यौहार का सम्बन्ध भी बुराई पर अच्छाई की जीत से है।

होलिका के पास वरदान होने के बावजूद भी उसका अग्नि में जल जाना इस बात का प्रमाण है कि बुराई चाहे कितनी भी कोशिश कर ले पर उसका अंत निश्चित है।

कब है होली और होलिका दहन का शुभ मुहूर्त

BHU के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान के छात्र ज्योतिषाचार्य पंडित प्रकाश शास्त्री बताते है कि फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा 17 मार्च को दोपहर 1:03 बजे लग रही है, जो 18 मार्च को दोपहर 12:52 बजे तक है। चूँकि, तिथि प्रारंभ होने के साथ ही भद्रा काल भी प्रारंभ हो रही है जो रात्रि 12:57 तक रहेगी। ऐसे में भद्रा समाप्ति के पश्चात् ही होलिका दहन करना शुभ है। विधान के अनुसार, होलिका दहन के बाद सूर्योदय व्यापिनी चैत्र प्रतिपदा में ही रंगोत्सव मनाना चाहिए। इस बार प्रतिपदा 18 मार्च को 12:53 बजे लग रही है जो 19 मार्च को 12:15 तक है।

होली के रंगो से सराबोर (तस्वीर-मनोज कर)

इस वर्ष लोगों में प्रश्न यह उठ रहा है कि काशी में 18 मार्च को होली और देश के कई दूसरे जगह 19 को क्यों? तो जानकारी के लिए बता दें कि काशी की रंग-गुलाल वाली होली चतु:षष्ठी यात्रा से जुड़ी है। जो प्राचीन काल से ही होलिका दहन की अगली सुबह होती आ रही है। इसलिए प्राचीन परंपरा होने के कारण काशी के लिए होली, होलिका दहन के अगले दिन ही उपयुक्त किया गया है। अतः काशी एवं कई जगहों पर 18 मार्च को एवं काशी से अलग कई दूसरे स्थानों पर शास्त्रीय विधान के अनुसार 19 मार्च को उदया तिथि में चैत्र कृष्ण प्रतिपदा मिलने पर रंगोत्सव का त्यौहार होली मनाया जाएगा।

भारतीय संस्कृति में घुले हैं जीवन के हर रंग

विविधताओं से भरी भारतीय जीवन शैली अपने आप में इतना समृद्ध है कि उसमें जीवन का हर रंग समाहित है। बात जीवन के रंगों की हो, उत्सव की हो, आनंद की हो तो होली से ख़ास क्या होगा? होली कितनी प्राचीन है आज इसके इतिहास में भी उतरेंगे, तलाशेंगे उसमें जीवन के विविध रंग, इसकी पौराणिक मान्यताएँ और सबसे बड़ी बात कितनी गहराई से गुथी है जीवन के उस दर्शन से जो युगों से मानवमात्र को आनंदमय जीवन जीने की प्रेरणा दे रही है।

वृन्दावन और बरसाना की लट्ठमार होली (तस्वीर-आनंद निकेतन)

भारत में लोग आपसी वैरभाव, मतभेद भुलाकर लोग होली खेलते हैं। रंगों का उत्सव होली, शरद ऋतु के समापन और वसंत ऋतु के आगमन का भी संकेत है। ब्रजभूमि मथुरा, वृंदावन, नंदगाँव, गोकुल और बरसाना के साथ ही काशी में होली का हुड़दंग हो, रंगभरी एकादशी या चिता-भस्म की होली केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनियाभर में मशहूर है।

होली एक, नाम अनेक

अब होली पर बात करते हुए कुछ गहरे आयाम पर भी ले चलता हूँ, अब यह तो आपको पता ही है कि होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है- लेकिन इसके और भी कई नाम है यह नाम ही अपने आप में भारतीय सनातन संस्कृति की तमाम विविधताओं को समेटे हुए हैं। जैसे होली, होलिका या होलाका नाम से वसंत ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव और काम-महोत्सव के नाम से भी जाना जाता है।

प्रेम, ताजगी, ऊर्जा के साथ ही रंगों का त्यौहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन होलिका जलाई जाती है। दूसरे दिन, जिसे प्रमुखतः धुलेंडी व धुरड्डी, धुरखेल या धूलिवंदन इसके अन्य नाम हैं, लोग एक दूसरे को रंग, अबीर-गुलाल से सराबोर कर देते हैं।

ढोलक और अन्य वाद्य यंत्रों की ताल पर होली के गीत, कबीरा या जोगीरा गाए जाते हैं और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाने के साथ ही होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भुला कर प्यार से गले मिल जाते हैं- वो कहते हैं ना- ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं, दुश्मन भी गले मिल जाते हैं।’ कहने का मतलब यह है कि यह समरसता, सौहार्द और भाई-चारे का प्रतीक भी है।

कुछ खास है यूपी-बिहार की होली में

बात होली की हो और उसमें भी यूपी की न हो यह कैसे हो सकता है। यूपी-बिहार में होली अलग ही लेवल पर होती है लेकिन बाकी राज्य भी कम नहीं है, उनका भी होली मनाने का अपना अलहदा अंदाज है। यह बात आप जानते हैं फिर भी मैं होली में आपको बनारस ले चलता हूँ क्योंकि मेरी होली में बनारस केंद्र में है आप अपने राज्य में मनाए जाने वाले होली के विशेष अंदाज के बारे में भी चर्चा कर सकते हैं।

बनारस की होली- चिताभस्म और रंगो की होली (तस्वीर-मनोज कर)

खैर, बनारस में होली की शुरूआत रंगभरी एकादशी से ही हो जाती है। रंगभरी एकादशी पर भूतभावन बाबा भोलेनाथ के गौना के दूसरे दिन काशी में उनके गणों के द्वारा चिताभस्म की होली खेली जाती है। रंगभरी एकादशी के मौके पर गौरा को विदा कराकर कैलाश ले जाने के साथ ही भगवान भोलेनाथ काशी में अपने भक्‍तों को होली खेलने और हुडदंग की अनुमति प्रदान करते हैं। इसके बाद ही काशी होलियाने मूड में आती है। फिर तो अस्सी से लेकर राजघाट तक, क्या गली-क्या घाट चारो तरफ बस बनारसी मस्ती छा जाती है।

कितनी ऐतिहासिक है होली

राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है। राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही पर इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है। फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। वैसे भारत में कई जगहों पर होली का त्यौहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। प्राचीन काल में इसी दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। खेतों में सरसों खिल उठती है। बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा नजर आने लगती है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से भर जाते हैं।

होली के पर्व की तरह इसकी परंपराएँ भी अत्यंत प्राचीन हैं। हालाँकि, इसका स्वरूप और उद्देश्य समय के साथ बदलता रहा है। प्राचीन काल में यह विवाहित महिलाओं द्वारा परिवार की सुख समृद्धि के लिए मनाया जाता था और पूर्णिमा के दिन मनाए जाने के कारण पूर्ण चंद्र की पूजा करने की परंपरा थी।

वैदिक काल में इस पर्व को ‘नवात्रैष्टि यज्ञ’ कहा जाता था। उस समय खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान करके प्रसाद लेने का विधान समाज में था। अन्न को होला कहते हैं, इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा।

भारतीय ज्योतिष के अनुसार चैत्र शुदी प्रतिपदा के दिन से नववर्ष का भी आरंभ माना जाता है। इस उत्सव के बाद ही चैत्र महीने का आरंभ होता है। अतः यह पर्व नवसंवत का आरंभ तथा वसंतागमन का प्रतीक भी है। कहते हैं, इसी दिन प्रथम पुरुष मनु का जन्म हुआ था, इस कारण इसे ‘मन्वादितिथि’ कहते हैं।

होली और होलिका से जुड़ी पौराणिक कथाएँ

होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है प्रह्लाद की। भागवत पुराण के अनुसार- प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। जो आज के मुल्तान (पाकिस्तान) पर शासन करता था। ब्रह्मा ने उसकी कई वर्षों की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे ऐसा वरदान दिया था जिसने उसे एक प्रकार से अमर बना दिया था। अपने बल के घमंड में मदमस्त वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था।

होलिका की पौराणिक कथा

यहाँ तक कि उसने अपने राज्य में भगवान विष्णु का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद नारायण भक्त था। प्रह्लाद की विष्णु भक्ति से क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने नारायण की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती।

हिरण्यकश्यप ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। ऐसे में भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होलिका जलाई जाती है। इस कथा से लगभग सभी परिचित होंगे। लेकिन यहाँ इस कथा का मेरे जिक्र करने का उद्देश्य इसमें छिपी एक गूढ़ बात को समझाना भी है।

क्या है प्रह्लाद की कथा का गूढ़ अर्थ

सनातन परंपरा में ऐसी कहानियों का बहुत गूढ़ अर्थ है। प्रतीक रूप से ऐसा माना जाता है कि प्रह्लाद का अर्थ ‘आनन्द’ होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है।

होली से जुड़ी है राक्षसी ढूँढ़ी, राधा-कृष्ण का रास और कामदेव का पुनर्जन्म

प्रह्लाद की कथा के अतिरिक्त होली का यह पर्व राक्षसी ढूँढ़ी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं। वहीं कुछ का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी खु़शी में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की और रंग खेला था।

होलिका दहन के साथ ही शुरू होता है होली का हुड़दंग

होलिका दहन का पहला काम झंडा या डंडा (रेड़ का पेड़) गाड़ना होता है। पर्व का पहला दिन होलिका-दहन का दिन कहलाता है। इस दिन चौराहों पर व जहाँ कहीं अग्नि के लिए लकड़ी एकत्र की गई होती है, वहाँ होलिका जलाई जाती है। इसमें लकड़ियाँ और उपले प्रमुख रूप से होते हैं। कई स्थलों पर होलिका में भरभोलिए जलाने की भी परंपरा है। भरभोलिए गाय के गोबर से बने ऐसे उपले होते हैं जिनके बीच में छेद होता है। इस छेद में मूँज की रस्सी डाल कर माला बनाई जाती है। एक माला में सात भरभोलिए होते हैं।

होलिका में भरभोलिया जलाती महिलाएँ एवं होलिका दहन

होली में आग लगाने से पहले इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घूमा कर फेंक दिया जाता है। रात को होलिका दहन के समय यह माला होलिका के साथ जला दी जाती है। इसका यह आशय है कि होली के साथ भाइयों पर लगी बुरी नज़र भी जल जाए।

लकड़ियों व उपलों से बनी इस होलिका का दोपहर से ही विधिवत पूजन आरंभ हो जाता है। घरों में बने पकवानों का यहाँ भोग लगाया जाता है। दिन ढलने पर ज्योतिषियों द्वारा निकाले मुहूर्त पर होलिका का दहन किया जाता है। इस आग में नई फसल की गेहूँ की बालियों और चने के होले को भी भूना जाता है।

“होलिका का दहन समाज की समस्त बुराइयों के अंत का प्रतीक है। यह बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय का सूचक है। गाँवों में लोग देर रात तक होली के गीत गाते हैं तथा संगीत की लय में नृत्य में डूब जाते हैं।”

होलिका दहन का मतलब अपने जीवन की सभी गैरजरूरी चीजों को जला देना भी है। इस दिन लोग सभी पुराने कपड़े और आस-पड़ोस के बच्चों के खिलौने और जिन चीजों की जरूरत न हो, उन्हें इकट्ठा करके सड़क पर ढेर लगाते हैं और उसे जलाते हैं। वहीं अब चलन के रूप में होलिका दहन के लिए होलिका और प्रह्लाद की मूर्ति भी आने लगी है। जिसे कस्बाई या शहरी इलाकों में देखा जा सकता है।

आध्यात्मिक पक्ष

आध्यात्मिक रूप से होलिका दहन का मकसद पुराने कपड़ों या वस्तुओं को जलाना ही नहीं है, बल्कि पिछले एक साल की यादों को जलाना है ताकि आज से आप एक नए और आनंदमय जीवन की शुरुआत कर सकें।

होली: रंग बरसे, उमंग बरसे

बुराई पर अच्छाई के जीत का प्रतीक होलिका दहन का अगला दिन प्रेम और सौहार्द का प्रतीक होली के रूप में मनाई जाती है। यह कुछ जगहों पर धूलिवंदन भी कहलाता है। इस दिन लोग रंगों से खेलते हैं। सुबह होते ही सब अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने निकल पड़ते हैं। गुलाल और रंगों से सबका स्वागत किया जाता है। लोग अपनी ईर्ष्या-द्वेष की भावना भुलाकर प्रेमपूर्वक गले मिलते हैं तथा एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। इस दिन जगह-जगह टोलियाँ रंग-बिरंगे कपड़े पहने नाचती-गाती दिखाई पड़ती हैं। बच्चे पिचकारियों से रंग छोड़कर अपना मनोरंजन करते हैं।

बुढ़वा मंगल

होली बनारस और बिहार के गया में बुढ़वा मंगल तक चलता है। होली के बाद आने वाले मंगलवार को काशीवासी बुढ़वा मंगल या वृद्ध अंगारक पर्व भी कहते हैं।

बनारस में तुलसीघाट पर बुढ़वा मंगल मनाते काशीवासी

होली युवाओं के जोश का त्यौहार है लेकिन बुढ़वा मंगल में बुजुर्गों का उत्साह भी दिखाई पड़ता है। बनारस में बुढ़वा मंगल के अवसर पर गीत-संगीत की महफ़िलों के साथ मेला भी लगता है।

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रवि अग्रहरि
रवि अग्रहरि
अपने बारे में का बताएँ गुरु, बस बनारसी हूँ, इसी में महादेव की कृपा है! बाकी राजनीति, कला, इतिहास, संस्कृति, फ़िल्म, मनोविज्ञान से लेकर ज्ञान-विज्ञान की किसी भी नामचीन परम्परा का विशेषज्ञ नहीं हूँ!

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