मकर संक्रांति: जीवन की गतिशीलता का विज्ञान, चरम बोध और अप्रतिम आनंद का उत्सव

साल भर में 12 संक्रान्तियाँ होती हैं। पर इनमें से दो संक्रातियों का विशेष महत्व है। पहली मकर संक्रांति और दूसरी, इससे बिल्कुल उलट, जून महीने में होने वाली मेष संक्रांति। संक्रांति शब्द का मतलब हमें पृथ्वी की गतिशीलता के बारे में याद दिलाना है, और यह एहसास कराना है कि हमारा जीवन इसी गतिशीलता की देन है और इसी से पोषित और संवर्धित भी।

‘मकर संक्रांति’ का त्यौहार वैसे तो दही-चूड़ा, लाई, गुड़ और तिल की मिठाइयों और पतंगबाजी के भक्काटे, अगर आप गुजरात निकल गए हैं तो ‘काए पो छे’ के शोर के लिए मशहूर है। हो सकता है, आप खो भी गए हों कि आख़िरी बार कब आपने लम्बे नख से किसी की पतंग काटी थी। बनारस में कटी पतंग के साथ ‘भक्काटे’ का शोर बच्चों के लिए तो महादेव की डमरू से गूँजा अनहद नाद ही है। वहाँ तो हर शरारत को महादेव से जोड़कर बच निकलने का चलन है। बड़े कितना भी डांटे लेकिन मकर संक्रांति जिसे बनारस में खिचड़ी भी कहते हैं बच्चों के लिए ‘पतंग उत्सव’ ही हो जाता है। गुजरात में तो पतंगबाजी पूरे परिवार के लिए प्रेम का उत्सव भी हो जाता है।

भारत की सांस्कृतिक विरासत यूँ ही इतनी विविधताओं से आच्छादित नहीं है। इन सबके पीछे छिपा है जीवन का सनातन सिद्धांत। भारत की इस अति प्राचीन धरा पर हर कार्य से पहले उसके सफलतापूर्वक सम्पन्न होने की मंगल कामना का विधान है। और, पूरा होने के बाद उत्सवों का दौर अर्थात जीवन के अप्रतिम आनन्द का भोग, तत्पश्चात ही अगले कार्य की तैयारी। मेहनत पहले और आनंद बाद में, भागवत गीता के शब्दों में कहा जाए तो कर्म पहले और फल बाद में, इस तरह आनंद/मंगल/ख़ुशहाली और कर्म का चक्र निरंतर चलता रहता है।

आम तौर पर उत्तर भारत में 14 जनवरी को मकर संक्रांति और उसके एक दिन पहले लोहड़ी मनाया जाता है। लेकिन ज्योतिषीय गणना के अनुसार भारतीय त्योहारों के पीछे एक विज्ञान है। उसी के अनुसार हर त्यौहार की तिथि एक लम्बी-चौड़ी गड़ना के उपरांत ही तय होती है। तो इस बार मकर संक्रांति के लिए कौन सी तिथि तय है और क्यों? इसे जान लेते हैं। शास्त्रों में सूर्य के गोचर को संक्रांति कहा जाता है। कहते हैं, मकर संक्रांति से अग्नि तत्त्व की शुरुआत होती है और कर्क संक्रांति से जल तत्त्व की। इस दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तराय़ण में प्रवेश करते हैं। सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं। और इस वर्ष ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, सूर्य, मकर राशि में 14 जनवरी 2020 की रात 02:07 बजे प्रवेश करेगा। फलस्वरूप, मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाई जाएगी।

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आज जब वामपंथी प्रकोप से हमारे सभी पर्व त्यौहार उनके विषवमन का शिकार होते जा रहे हैं। ऐसे में अपनी भावी पीढ़ियों को हर त्यौहार की न सिर्फ ऐतिहासिकता बल्कि परंपरा और उसके पीछे की गूढ़ वैज्ञानिकता को भी समझाना ज़रूरी हो जाता है ताकि विषैले वामपंथ की हर विषबेल को काटा जा सके।

ऐसे में यह समझना ज़रूरी है कि लेख के शुरुआत में मकर संक्रांति का जो सामान्य परिचय दिया गया है तो क्या मकर संक्रांति का मतलब इतना ही है? चलिए इसी बहाने मकर संक्रांति के पीछे छिपे गहरे रहस्यों पर भी प्रकाश डालता हूँ। किस तरह मकर संक्रांति का पर्व ब्रह्मांडीय और मानव ज्यामिति की एक गहरी समझ पर आधारित है। मकर संक्रांति फ़सल कटाई के उपरांत आनंद का उत्सव भी है। मकर संक्रांति को फ़सलों से जुड़े त्यौहार या पर्व के रूप में भी बहुतायत कृषक परिवारों में जाना व पहचाना जाता है।

लोकपर्व मकर संक्रांति

दरअसल, यही वह समय है, जब फ़सल तैयार हो चुकी है और कृषि प्रधान देश का कृषक समाज उसी की ख़ुशी व उत्सव मना रहे होते हैं। इस दिन हम हर उस चीज के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं, जिसने खेती करने व फ़सल उगाने में मदद की है। कृषि से जुड़े संसाधनों व पशुओं का भी जिनका खेती में बड़ा योगदान होता है। इन सबसे भी परे, इस त्यौहार का खगोलीय और आध्यात्मिक महत्व ज़्यादा है।

‘मकर’ का अर्थ है शीतकालीन समय अर्थात ऐसा समय जब सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे नीचे होता है। और ‘संक्रांति’ का अर्थ है गति। मकर संक्रांति के दिन राशिचक्र में एक बड़ा बदलाव आता है। इस खगोलीय परिवर्तन से जो नए बदलाव होते हैं उन्हें हम धरती पर देख और महसूस कर सकते हैं। ये समय आध्यात्मिक साधना के लिए भी महत्वपूर्ण है। तमाम योगी, साधक एवं श्रद्धालु इस अवसर का उपयोग अपनी आत्मिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए करते हैं। सनातन परंपरा में महाकुम्भ, कुम्भ, अर्ध कुम्भ और मकर संक्रांति के स्नान का भी बड़ा महात्म्य है।इसलिए मकर संक्रांति पर खासतौर से गंगा स्नान करने को श्रद्धालु माँ गंगा के पावन तट पर उमड़ पड़ते हैं फिर चाहे वो हरिद्वार हो, संगम तट प्रयागराज या मोक्षदायिनी काशी सभी जगह भक्तों की भीड़ देखी जा सकती है।

वैसे तो साल भर में 12 संक्रान्तियाँ होती हैं। पर इनमें से दो संक्रातियों का विशेष महत्व है। पहली मकर संक्रांति और दूसरी, इससे बिल्कुल उलट, जून महीने में होने वाली मेष संक्रांति। इन दोनों के बीच में कई और संक्रान्तियाँ होती हैं। हर बार जब-जब राशि चक्र बदलता है तो उसे संक्रांति कहते हैं।

संक्रांति शब्द का मतलब हमें पृथ्वी की गतिशीलता के बारे में याद दिलाना है, और यह एहसास कराना है कि हमारा जीवन इसी गतिशीलता की देन है और इसी से पोषित और संवर्धित भी। कभी सोचा है आपने अगर यह गति रुक जाए तो क्या होगा? अगर ऐसा हुआ तो जीवन संचालन से जुड़ा हर आयाम ठहर जाएगा।

हर 22 दिसंबर को अयनांत (Solstice) होता है। सूर्य के संदर्भ में अगर कहूँ तो इस दिन पृथ्वी का झुकाव सूर्य की तरफ़ सबसे ज़्यादा होता है। फिर इस दिन के बाद से गति उत्तर की ओर बढ़ने लगती है। फलस्वरूप, धरती पर भौगोलिक परिवर्तन बढ़ जाता है। हर चीज़ बदलनी शुरू हो जाती है। यही गतिशीलता ही है, जो जीवन का आधार बनी। जीवन की प्रक्रिया, आदि और अंत भी इसी गतिशीलता की उपज है।

जब बात इस गतिशीलता के पीछे के कारणों को जानने की आएगी तो आदिदेव महादेव शिव ‘शंकर’ की विराटता और अनश्वरता की बात आएगी। शिवोहम की बात आएगी। इस चराचर ब्रह्माण्ड के पीछे जो है, वह है शिव। शिव अर्थात वह जो नहीं है। जो नहीं है, वही पूर्ण अचल है। कहा जाता है निश्चलता ही गति का आधार और मूल भी है। बात पहेली सी लग सकती है, इसे आम भाषा में समझाता हूँ।

जब कोई इंसान अपने भीतर की स्थिरता से संबंध बना लेता है, तभी वह गतिशीलता का आनंद ले सकता है। अन्यथा इंसान, जीवन की गतिशीलता से डर जाता है। मनुष्य के जीवन में आने वाला हर बदलाव या किसी भी तरह का परिवर्तन उसके लिए अक्सर दुःख या पीड़ा का कारण हो जाता है।

आज इस भागती-दौड़ती दुनिया का तथाकथित आधुनिक जीवन ही ऐसा हो चुका है। जिसके हर बदलाव में पीड़ा निहित है। आज जब भी बचपन एक तनाव बन चुका है, किशोरावस्था या युवावस्था उससे भी बड़ा दुख। प्रौढ़ावस्था असहनीय है। बुढ़ापा डरा और सकुचा-सहमा हुआ और मृत्यु या जीवन का अंत किसी घोर आतंक या ख़ौफ़ से कम नहीं है। आज पैदा होने से लेकर मृत्यु पर्यन्त जीवन के हर स्तर या चरण पर कुछ न कुछ समस्या है।

लोकपर्व मकर संक्रांति

वह इसलिए है, क्योंकि इंसान को हर बदलाव से दिक्कत है। ऐसा इसलिए है कि, इन्सान यह स्वीकार करने को ही तैयार नहीं कि जीवन की असली प्रकृति ही बदलाव है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। सदगुरु जग्गी वासुदेव कहते हैं, “आप गतिशीलता का तभी आनंद ले पाएँगे या उत्सव मना पाएँगे, जब आपका एक पैर स्थिरता में दृढ़ता से जमा होगा। और दूसरा गतिशील।” मकर संक्रांति का पर्व इस बात का भी उद्घोष है कि गतिशीलता का उत्सव मनाना तभी संभव है, जब आपको अपने भीतर स्थिरता का एहसास हो।

मकर संक्रांति के बाद से सर्दी धीरे-धारे कम होने लगती है। इस तथ्य से तो आप परिचित ही हैं कि हम सभी सौर ऊर्जा से संचालित हैं। तो मकर संक्रांति का महत्व ये समझने में भी है कि हमारे जीवन का स्रोत कहाँ है? इस ग्रह पर व्याप्त हर एक पौधा, पेड़, कीट, पतंगा, कीड़ा, जानवर, पशु-पक्षी, पुरुष, महिला, बच्चा, हर प्राणी सौर ऊर्जा से संचालित होता है। सौर ऊर्जा कोई नई तकनीक नहीं है। हम सभी सौर ऊर्जा से ही संचालित हैं, सौर ऊर्जा धरती पर जीवन के आरम्भ और उत्कर्ष का आधार भी है।

सदगुरु जग्गी वासुदेव का मकर संक्रांति को लेकर कहना है कि भारतीय संस्कृति में हम साल के इस नए पड़ाव का, जब हमारे पास सर्वाधिक सौर ऊर्जा होती है, हम इसे ‘मकर संक्रांति’ के रूप में मनाते हैं। इसलिए हम सूरज का स्वागत करते हैं। जैसे-जैसे हम हिमालय से दूर जाते हैं। उन जगहों पर आज से ही सूर्य की प्रचंडता बढ़ने लगती है। लोग ग्रीष्म ऋतु के आगमन की आहट पा परेशान होने लगते हैं। उनकी बढ़ती परेशानी की वज़ह ग्लोबल वार्मिंग भी है। आने वाली पीढ़ियों के लिए ज़रूरत है एक ऐसा माहौल बनाने की, जहाँ हम अपने जीवन के स्रोत का अधिकतम लाभ उठा सकें। ये त्यौहार हमें ये भी याद दिलाते हैं कि हमें अपने वर्तमान और भविष्य को पूरी चैतन्यता और जागरूकता के साथ गढ़ने की ज़रूरत है।

यदि आप चाहते हैं कि इस देश की भावी पीढ़ियाँ आने वाली गर्मी का स्वागत करने एवं आनंद लेने के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम हो, तो यह तभी संभव है जब हम प्रकृति के साथ एक अनुकूलन पैदा करें। धरती, वनस्पतियों, जल संसाधनों से समृद्ध और मिट्टी में पानी को सोखने में सक्षम हो। तभी हम सही मायने में मकर संक्रांति का जश्न मना सकते हैं।

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