‘राम मंदिर की स्थापना तक नहीं पहनूँगा चप्पल’ – 18 साल से ‘तपस्या’ कर रहे बिहार के राम भक्त की कहानी

"जब मैंने अयोध्या में भगवान राम को बिना चप्पल के देखा तो मैंने भी चप्पल नहीं पहनने का संकल्प लिया। शुरुआती दौर में नंगे पाँव चलना विशेष रूप से गर्मी के मौसम में बहुत मुश्किल था, लेकिन भगवान राम ने मुझे अपना संकल्प पूरा करने का साहस दिया।"

सदियों से चले आ रहे अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार (9 नवंबर) को ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए विवादित भूमि राम लला के हक़ में दिया। इस फ़ैसले पर वर्षों से राम भक्तों की नज़र टिकी हुई थी। सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने देश के कई राम भक्तों को सुकून पहुँचाने का काम किया। बिहार के किशनगंज में ऐसे ही एक राम भक्त हैं, जिन्होंने 18 साल पहले यह प्रण लिया था कि जब तक अयोध्या में राम मंदिर नहीं बन जाता तब तक वो नंगे पाँव रहेंगे।

समाचार एजेंसी ANI की एक रिपोर्ट के अनुसार, देव दास ने कहा,

“जब मैंने अयोध्या में भगवान राम को बिना चप्पल के देखा तो मैंने भी चप्पल नहीं पहनने का संकल्प लिया। शुरुआती दौर में नंगे पाँव चलना विशेष रूप से गर्मी के मौसम में बहुत मुश्किल था, लेकिन भगवान राम ने मुझे अपना संकल्प पूरा करने का साहस दिया।”

दिलचस्प बात यह है कि दास किशनगंज में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के ज़िला कार्यकारी होने के साथ ही एक किराने की दुकान भी चलाते हैं।

छात्रों को संबोधित करते राम भक्त देव दास (तस्वीर सौजन्य: न्यूज़-18)
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दास ने कहा, “भगवान राम में मेरी असीम आस्था के कारण, सड़कों पर पड़े काँच के एक भी टुकड़े या कंकड़-पत्थर ने मुझे कभी चोट नहीं पहुँचाई। मेरा संकल्प तब पूरा होगा जब अयोध्या में राम मंदिर की स्थापना होगी। मैं ऐसा करने के बाद ही चप्पल पहनूँगा।”

एक अन्य निवासी, अमितेश कुमार साह ने ANI को बताया, “हम उन्हें बचपन के दिनों से देख रहे हैं। वह मेरे शिक्षक थे। हमें पता चला कि उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर बनने तक चप्पल नहीं पहनने का संकल्प लिया था। वह बहुत अच्छे इंसान हैं।”

इतना ही नहीं देव दास अब तक 1800 से अधिक लोगों के दाह-संस्कार में शामिल हो कर ख़ुद काम करते हैं। शहर हो या गाँव उन्हें जब भी किसी की मृत्यु की ख़बर मिलती है तो वो ख़ुद उनके घर पहुँच जाते हैं और अंतिम संस्कार में लग जाते हैं। केवल इतना ही नहीं, ज़िले में किसी अज्ञात शव मिलने पर वे उनके दाह संस्कार कर रीति-रिवाज़ के साथ उनके अंतिम संस्कार की क्रिया भी ख़ुद ही सम्पन्न करवाते हैं। किशनगंज ज़िला मुख्यालय से लेकर सातों प्रखंड के एक-एक गाँव में बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक देव दास उर्फ़ देबू को देबु दा के नाम से जानते हैं।

ख़बर के अनुसार, देबु दा की का पूरे इलाक़े में लोग काफ़ी सम्मान करते हैं। लोगों को रक्तदान के प्रति जागरूरता करने के साथ-साथ वो ख़ुद भी रक्तदान करते हैं। उन्हें जिस परिवार से शादी-विवाह, जन्मदिन आदि का न्योता मिलता है, वो उस परिवार के सदस्यों से कम से कम पाँच पौधे लगवाने का प्रयास करते हैं। इसके अलावा वो अनाथाश्रम में बच्चों को योग आदि भी सिखाते हैं।

छात्रों के साथ देव दास उर्फ़ देबु दा (तस्वीर सौजन्य: upvartanews.com)

समाज सेवा को अपना धर्म मानने वाले 36 वर्षीय देव दास ब्रह्मचारी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। साल 2001 में इंटर की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने संकल्प लिया था कि जब तक राम मंदिर का कार्य प्रशस्त नहीं हो जाता, जब तक वे चप्पल नहीं पहनेंगे। सुप्रीम कोर्ट द्वारा राम लला के हक़ में फ़ैसला सुनाए जाने से उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं है, अपनी इसी ख़ुशी को बयाँ करते हुए उन्होंने कहा कि अब उनका संकल्प पूरा हो गया है।

ग़ौरतलब है कि CJI रंजन गोगोई की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने अयोध्या की जिस जमीन को लेकर विवाद था, वहॉं मंदिर निर्माण का आदेश दिया है। साथ ही मस्जिद निर्माण के लिए सरकार को सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ ज़मीन देने के निर्देश दिए हैं। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से 3 महीने के भीतर इसके लिए एक योजना तैयार करने को कहा है।

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