Sunday, March 7, 2021
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जिससे बच्चे दीवाली की खुशियाँ मनाना न भूलें: 2021 की दीवाली को अद्भुत बनाने के लिए ऑपइंडिया का रोडमैप

हम चाहते हैं कि बच्चे ठीक वैसे ही दीवाली मनाएँ जैसे हमने अपने बचपन में दीवाली मनाई है। हम चाहते हैं कि बच्चे हमारे पूर्वजों की परम्पराओं को आगे लेकर जाएँ। यही असल मायनों में विरासत कही जाती है, जिसे आगे लेकर जाने के लिए हम बच्चों से उम्मीद करते हैं।

इस साल की दीवाली हम में से ज्यादा के जीवनकाल की सबसे असामान्य दीवाली थी। कोरोना महामारी और पटाखों पर प्रतिबंध के कारण इसके खामोशी से बीत जाने की उम्मीद की जा रही थी। अधिकांश लोगों की तरह हम (ऑपइंडिया) भी इस बात से निराश थे, इसलिए हमने साल 2021 में धमाकेदार और दीप्तिमान दीवाली के अभियान का ऐलान किया। 

हमारा ऐलान जितना वैचारिक प्रतिबद्धता से प्रेरित था, लगभग उतना ही भावनात्मक उतार-चढ़ाव से भी। इस तरह की तमाम ख़बरें मौजूद हैं जिनमें त्योहार के वक्त आजीविका बुरी तरह प्रभावित हुई है। लेकिन इस बात पर बहुत कम प्रतिक्रियाएँ सामने आई कि ऐसा कुछ आने वाले समय में नहीं हो। हम में से काफी लोग उस तस्वीर से प्रेरित थे जिसमें एक बच्ची पुलिस की गाड़ी के दरवाज़े पर अपना सिर लगा कर रो रही थी, क्योंकि पुलिस ने उसके पिता को पटाखे बेचने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था। 

दीवाली के मौके पर किसी भी बच्चे की मुस्कुराहट इस तरह नहीं छीनी जानी चाहिए, सिर्फ इसलिए क्योंकि उसके पिता पटाखे बेच रहे थे। यह भयावह, अमानवीय और नैतिक रूप से निंदनीय है। ठीक इसी तरह हमने उस वक्त भी लाचार महसूस किया था जब पटाखा कारोबार से जुड़े लोगों में इस साल हुए नुकसान की वजह से काफी ज्यादा निराशा थी। इन बातों को समझते हुआ हमें ऐसा महसूस हुआ कि इस संबंध में कुछ पहल तो करनी ही पड़ेगी। हमारी घोषणा में नज़र आने वाले शब्द हमारे प्राथमिक विचार हैं, लेकिन अभी तक कोई ठोस नीति तैयार नहीं हुई है। 

समय के साथ योजना में बदलाव होते रहेंगे और इसके अलावा हम सुझावों के लिए अपने शुभचिंतकों पर भी निर्भर रहेंगे। फ़िलहाल हमारे पास कुछ आइडिया है कि हम कैसे आगे बढ़ेंगे और हमें किन क्षेत्रों में आगे बढ़ने की ज़रूरत है। इस अभियान को सफल बनाने के लिए लोगों और सहयोग की ज़रूरत पड़ेगी। यहाँ हम उन क्षेत्रों का उल्लेख कर रहे हैं जिन पर हमें ध्यान देने की ज़रूरत है। 

विद्यालय 

बड़े पैमाने पर होने वालों कार्यों को लेकर प्रोपेगेंडा और ब्रेनवाशिंग विद्यालयों में ही शुरू हो जाती है। बीते कुछ सालों से पटाखे नहीं फोड़ने के लिए बच्चों का ब्रेनवाश किया जा रहा है और यही बच्चे आने वाले समय में नियम-कायदे बनाने में अहम भूमिका निभाएँगे। इसलिए यह बेहद ज़रूरी हो जाता है कि हम विद्यालय प्रशासन और वहाँ पढ़ने वाले बच्चों से पटाखों के मुद्दे पर सीधा संपर्क करें। 

इतनी सी दुनिया में हमें परम्पराओं का अस्तित्व बनाए रखने के लिए बहुत लंबी दूरी तय करने की ज़रूरत नहीं है,  लेकिन हम इतनी सी दुनिया में रह भी नहीं रहे हैं। इसलिए हम विद्यालय प्रशासन से संवाद करने के लिए प्रयास जारी रखेंगे जिससे यह सुनिश्चित हो कि पटाखों और हिन्दू परम्पराओं के विरुद्ध इस तरह का दुष्प्रचार नहीं किया जा सके। इसी दौरान यह भी देखना होगा कि विद्यालय के साथ साथ माता-पिता भी इस बात का ध्यान रखें कि उनका बच्चा किसी दूषित विचारधारा से प्रभावित नहीं हो। 

व्यापारियों के साथ संबंध 

हम पटाखा निर्माताओं, उत्पादकों और व्यापारियों से भी बात करने का प्रयास करेंगे जिससे हम इस प्रक्रिया को बेहतर तरीके से समझ पाएँ। इसके अलावा जिस तरह पटाखों को प्रदूषण से जोड़ा जाता है, उसके लिए भी शोध और अनुसंधान के माध्यम से बेहतर विकल्प पर काम किया जा सके। जहाँ तक हमारी जानकारी है इस तरह का कोई भी शोध उपलब्ध नहीं है, जिसके आधार पर ऐसा कहा जा सके कि देश के अनेक शहरों में हवा की गुणवत्ता खराब होने के लिए पटाखे ही जिम्मेदार हैं।  

देश की तमाम सरकारों के लिए प्रदूषण पर कोई ठोस कदम उठाने की जगह पटाखे पर पाबंदी लगाना आसान हो गया है। यह सरकारों के लिए राष्ट्रीय अनुष्ठान जैसा बन गया है कि वह पटाखों पर पाबंदी लगा कर यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि वह प्रदूषण के मुद्दे पर कितने सक्रिय हैं। जबकि प्रदूषण के मूल कारणों को ख़त्म करने के लिए कोई प्रयास नहीं हो रहे हैं। पटाखों पर लगी पाबंदी की वजह से इस क्षेत्र से जुड़े तमाम लोग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं, उनकी आजीविका खतरे में है। हम उनसे भी लगातार संपर्क में रहेंगे जिससे 2021 में इस तरह की स्थिति दोबारा नहीं पैदा हो। 

कानूनी दांवपेंच 

इस मुद्दे का सबसे अहम सन्दर्भ है कानूनी पक्ष। हम उन लोगों के साझेदारी करते हुए आगे आएँगे जो इस मुद्दे पर पहले से ही काम कर रहे हैं। इसके अलावा ध्यान रखेंगे कि कैसे हम उस अभियान में अपना सहयोग दे सकते हैं। दीवाली को सुरक्षित रखने की लड़ाई अदालत में लड़ी जाएगी और अदालत में लड़ी जानी चाहिए, इसके अलावा हम सुनिश्चित करेंगे कि हिन्दू समुदाय इस लड़ाई में अपने हिस्से की जिम्मेदारी पूरी करे। भले बहुत कुछ हमारे पक्ष में नहीं हो, लेकिन प्रयास तो किसी भी सूरत में जारी रखने होंगे। 

हमारा मानना है कि पटाखों पर पाबंदी अन्याय है और हम ऐसा अब तक किए गए शोध की दलीलों के आधार पर कह रहे हैं। हमारा प्रयास रहेगा कि सरकार द्वारा पटाखों (इंडस्ट्री) पर लिया गया निर्णय किसी भी तरह बदला जा सके। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने दीवाली के मौके पर देश के तमाम शहरों में प्रदूषण को रोकने के लिए पटाखों पर पाबंदी लगाई थी, तमाम राज्य सरकारों ने भी यही किया था। कुछ राज्यों में न्यायपालिका ने यह निर्णय लिया था, इसलिए हमें एकजुट होकर प्रयास करना होगा कि इस निर्णय को पलटा जा सके। 

हम पूरी तरह आप पर निर्भर हैं आत्मीय पाठकों

ऑपइंडिया पाठकों के मामले में बेहद भाग्यशाली रहा है जो हर तरह के हालात में हमारे साथ खड़े होते हैं। तमाम उतार-चढ़ावों के बीच पाठकों ने हमें प्रेरित किया, मज़बूत किया और संवेदनशील मौकों पर समर्थन भी किया, जिसकी वजह से ऑपइंडिया सफल हो पाया। इस रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए हमें सुझावों की सख्त ज़रूरत है और यह ई मेल के माध्यम से हमें भेजे जा सकते हैं। इसके अलावा लोगों की ज़रूरत होगी और इस मुद्दे पर मिलने वाला सहयोग भी सराहनीय होगा। 

हम क्यों लड़ रहे हैं? 

पटाखों पर इस तरह पाबंदी लगाना सांस्कृतिक संवेदनाओं का अपमान है। बतौर नागरिक हम सरकार से इस बात उम्मीद करते हैं कि वह रोज़गार के नए अवसर बनाए न कि उन्हें ख़त्म करे। हम सरकार से यह भी उम्मीद करते हैं कि वह प्रदूषण के मुद्दे पर अर्थपूर्ण कदम उठाए न कि पटाखों पर पाबंदी जैसे तात्कालिक कदम उठाए, जिससे प्रदूषण पर कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता है। हम नहीं चाहते कि त्योहार मनाते समय हिन्दुओं के मन में इस बात का भय हो कि उन्हें जेल में डाल दिया जाएगा। 

हम नहीं चाहते कि इतने बड़े पर्व के मौके पर पुलिस हिन्दुओं को प्रताड़ित करे। हम नहीं चाहते कि पुलिस पटाखे बेचने वालों को अपराधी साबित करे। हम नहीं चाहते कि कोई छोटी बच्ची पुलिस की गाड़ी से इसलिए अपना सिर लड़ाए, क्योंकि उसके पिता को पटाखे बेचने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया है। हम नहीं चाहते कि हिन्दुओं को पटाखे बेचने के लिए अपराधियों की तरह देखा जाए। हम नहीं चाहते हैं कि रौशनी के महापर्व के मौके पर अँधेरा हावी हो जाए। 

हम सिर्फ इतना चाहते कि सरकार बहुसंख्यक समाज के रीति-रिवाजों के विरुद्ध अपनी लड़ाई बंद कर दे। हम चाहते कि सरकार अपने ही नागरिकों (बहुसंख्यक) के विरुद्ध जारी लड़ाई बंद कर दे। हम चाहते हैं कि बच्चे ठीक वैसे ही दीवाली मनाएँ जैसे हमने अपने बचपन में दीवाली मनाई है। हम चाहते हैं कि बच्चे हमारे पूर्वजों की परम्पराओं को आगे लेकर जाएँ। यही असल मायनों में विरासत कही जाती है, जिसे आगे लेकर जाने के लिए हम बच्चों से उम्मीद करते हैं। इसलिए हमें प्रतिकार करना होगा। अभी तक हमारे पास कोई तय योजना नहीं है, लेकिन बहुत जल्द वह भी होगा। हमारी पूरी कोशिश होगी कि 2021 की दीवाली सबसे अद्भुत और दिव्य हो।        

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Nupur J Sharma
Editor, OpIndia.com since October 2017

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