द वायर वालो, जनेऊ के लिए इतना जहर उगलने से पहले पता किया था जनेऊ क्या है?

एक पूरे जनसांख्यिकीय समूह को, उनकी अस्मिता और उनकी पवित्र परंपराओं को अवैध घोषित कर देने के लिए लेखिका सहारा लेती है इंटरनेट के किसी अँधेरे कोने में बैठे किसी तमिल ब्राह्मणों के लिए बनी वेबसाइट के चैट थ्रेड का।

वायर ने हिन्दुओं के खिलाफ फिर झूठ और जहर से बुझा हुआ लेख छापा है- “आधुनिक ब्राह्मण ‘उत्पीड़न’ के इस प्रतीक को क्यों इठला कर दिखाते फिर रहे हैं?” बताया गया है कि जनेऊ ब्राह्मणों द्वारा दूसरी जातियों, खासकर कि अनुसूचित जातियों के, उत्पीड़न का, ब्राह्मण-प्रभुतावाद का प्रतीक है, और जनेऊ पहनने वालों को कंधे पर नफरत का, दूसरों को नीचा देखने का ‘बोझ’ महसूस होना चाहिए।

‘फर्जी’ ऑनलाइन फोरम का सहारा

एक पूरे जनसांख्यिकीय समूह को, उनकी अस्मिता और उनकी पवित्र परंपराओं को अवैध घोषित कर देने के लिए लेखिका सहारा लेती है इंटरनेट के किसी अँधेरे कोने में बैठे किसी तमिल ब्राह्मणों के लिए बनी वेबसाइट के चैट थ्रेड का। उसमें कोई एक-आधा आदमी लिख देता है कि मुझे ऐसा लगता है कि मेरी बुद्धि ब्राह्मण-कुल में पैदा होने के कारण अधिक तीक्ष्ण है, कोई बता देता है कि मैं ‘सेक्युलर’ (धार्मिक कर्मकांडों को ढकोसला मानने वाला) ब्राह्मण हूँ और उसके बावजूद मुझे ख़ुशी होती है कि मेरे बच्चे जाति के बाहर शादी नहीं कर रहे, और बस इतने भर से मेघाली मित्रा न केवल सभी ब्राह्मणों को सभी अनुसूचित जाति वालों के उत्पीड़न का दोषी बना देतीं हैं, सभी ब्राह्मणों से स्थायी क्षमा-याचना मुद्रा में जीने की उम्मीद करने लगतीं हैं। जबकि उस वेबसाइट पर जो लिख रहा है, वह सही में तमिल ब्राह्मण है भी या नहीं, इसका भी कोई सबूत नहीं है, और इसके आधार पर वह सभी ब्राह्मणों से अपना जनेऊ उतार फेंकने की अपेक्षा करतीं हैं।

यहाँ पहली बात तो यह कि ब्राह्मण (या कोई भी जाति/वर्ण) जन्म से ज्यादा कर्म पर आधारित होता है, अतः जिसे धार्मिक कर्मकांडों को ढकोसला मानना है, वह काहे का हिन्दू, काहे का ब्राह्मण? उसके विचारों का बोझ हिन्दू क्यों उठाए? उसके विचारों के आधार पर ब्राह्मणों को क्यों निशाना बनाया जा रहा है, जो हिन्दू ही नहीं है?

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लेखिका यह भी कहती है कि क्या ऐसी चीज जिसने ऐतिहासिक रूप से बड़ी तादाद में लोगों को तुम्हें मिलने वाली सुरक्षा को लेकर ईर्ष्यालु बनाया हो, सच में क्षतिविहीन (harmless) हो सकती है? तो पहली बात तो हाँ, बिलकुल। किसी की ईर्ष्या ब्राह्मण का ठेका नहीं है। और जिसे लगता है ब्राह्मण होना आसान है, उसे यह पता होना चाहिए कि जो स्मृतियाँ ब्राह्मणों को वेद-पाठ का विशेषाधिकार देतीं हैं, सैद्धांतिक रूप से ‘सर्वोच्च’ बनातीं हैं, वही स्मृतियाँ ब्राह्मणों को भीख माँगने और यजमान अथवा छात्र के दान-दक्षिणा पर निर्भर रहने का भी आदेश देतीं हैं। सुदामा और द्रोण ऐसे ही प्रतिभासम्पन्न, ज्ञान-सम्पन्न होने के बावजूद कँगले थे।

जनेऊ का इतिहास हिन्दुओं से पूछो

जनेऊ के इतिहास शीर्षक वाले खंड में पहली बात तो जनेऊ की उत्पत्ति और इतिहास की बात ही नहीं है, सिवाय आखिर में एक-आधे वाक्य के अलावा। बाकी के खंड में लेखिका खुद ही यह मानती है कि अन्य जातियाँ भी ‘ब्राह्मणों-जैसा’ बनने के लिए जनेऊ पहनने के लिए स्वतंत्र थीं, और उन्होंने ब्राह्मणों जैसा आचरण करने (जनेऊ पहनने, माँस-मदिरा का त्याग करने, आदि) का प्रयास किया भी। तो इसमें फिर भेदभाव बचा ही कहाँ?

अब आते हैं मूल मुद्दे यानि कि जनेऊ/यज्ञोपवीत के असली अर्थ/महत्व पर (जोकि द वायर के लेखकों जैसे असुर-प्रकृति के लोगों को पता ही नहीं होगा)। तो यज्ञोपवीत मात्र एक ‘प्रतीक’ नहीं है- यह एक कवच होता है, जोकि योग करते समय शक्ति के शरीर में संचालन को नियंत्रित करता है। योग के अनुसार शरीर में विभिन्न चक्र होते हैं, और यज्ञोपवीत गले के विशुद्धि चक्र से लेकर जननांग के स्वाधिष्ठान चक्र तक की रक्षा करता है। यहाँ तक कि कई गणपति मूर्तियों में उन्हें भी सर्प को यज्ञोपवीत की तरह धारण किए हुए दिखाया जाता है। इसके अलावा यज्ञोपवीत पहली बात तो यज्ञ करने का अधिकारी होने का सूचक होता है (जोकि न हर कोई होता है, न ही अपने आप, बिना गुरु की अनुमति के बना जा सकता है), और दूसरी चीज यज्ञोपवीत कपड़ों के अंदर पहना जाता है, बाहर पहन कर कोई भी इठलाते हुए नहीं घूमता।

जिन्हें यज्ञ करने की योग्यता, योग में निहित शक्ति जैसी चीजों में विश्वास नहीं (जैसे द वायर, या फिर मेघाली मित्रा), उनके लिए यह विषय है ही नहीं- अतः वह किसी भी तरह से इस विषय की चर्चा का हिस्सा ही नहीं हैं। और जिन्हें इस विषय पर अधिक जानकारी चाहिए, वे या तो अपने-अपने गुरु से सम्पर्क करें, या फिर 18वीं-19वीं सदी के योगी त्रैलंग स्वामी की उमाचरण मुखोपाध्याय द्वारा लिखित किताब खंगाल सकते हैं।

यही ‘प्रतीक से भय’ का नाटक मुसलमानों के साथ हो, तो वायर वालों कैंसर होने लगेगा

और जिस चूँकि-जनेऊ-‘उत्पीड़न’-का-प्रतीक-है-अतः-इसे-हटा-देना-चाहिए के तर्क का इस्तेमाल पत्रकारिता के समुदाय विशेष वालों के पसंदीदा मज़हब इस्लाम पर किया जाए, तो इन्हें कैंसर होने लगता है। हजारों-लाखों जानें बिना मूंछों की दाढ़ी वाले पंथिक नफरत से भरे इस्लामी हमलावरों ने ले लीं हैं केवल आधुनिक युग में ही (600 ईस्वी से शुरू करने पर तो यह आँकड़ा करोड़ पार कर शायद अरब में पहुँच जाए), लेकिन अगर मैं कहूँ कि इसी तर्क के इस्तेमाल से बिना मूँछों की दाढ़ी मेरे लिए पंथिक हिंसा का प्रतीक है, मुसलमान इसे त्याग दें तो मुसलमानों से पहले वायर फतवे जारी करेगा। क्या मैं यह कहता फिरूँ कि मुसलमान लोगों को दाढ़ी हटा लेनी चाहिए? ऐसा मानना सर्वथा अनुचित है, इसलिए यह तर्क हर तरह के विषय पर लागू होना चाहिए न कि सिर्फ हिन्दू प्रतीकों पर।

अंग्रेजों ने 190 साल भारत को अपने बूटों तले रौंदा लेकिन अगर मैं विक्टोरिया मेमोरियल या किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज का नाम बदलना चाहूँ तो यही वायर शायद इन्हीं मेघाली मित्रा से लिखवाएगा कि भला उससे क्या होगा; मासूम-सा लगने वाला हिन्दूफोबिक तर्क होगा कि सताने वाले और सताए जाने वाले, दोनों मर चुके हैं।

असल बात यही है कि मेघाली मित्रा और वायर दोनों की ही दिक्कत यज्ञोपवीत नहीं, उसका हिन्दू उद्गम है, और उन्हें ‘भारी मन से’ यह सूचित करना चाहूँगा की उनकी इस ‘दिक्कत’ का कोई इलाज नहीं हो सकता…

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