Article 15: यादवों द्वारा किए रेप में ब्राह्मणों को बताया बलात्कारी क्योंकि वही बिकता है

आरोपितों के नाम पप्पू यादव, अवधेश यादव, उर्वेश यादव, छत्रपाल यादव और सर्वेश यादव था। छत्रपाल और सर्वेश पुलिसकर्मी थे। पुलिस विभाग पर आरोप लगाया गया था कि वो समाजवादी पार्टी के राजनीतिक दबाव में काम कर रहा है, जो यादवों का पक्ष ले रहा था।

हाल ही में, आयुष्मान खुराना स्टारर फ़िल्म ‘आर्टिकल 15’ का ट्रेलर रिलीज़ किया गया। इस फ़िल्म के निर्माता अनुभव सिन्हा हैं, जिन्हें फ़िल्म ‘मुल्क’ और ‘रा-वन’ से प्रसिद्धि मिली थी। यह फ़िल्म सच्ची घटनाओं पर आधारित होने का दावा करती है। ट्रेलर को देखने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि इस फ़िल्म की कहानी यूपी में बदायूँ के गाँव में दो युवा लड़कियों की हत्या कर उन्हें पेड़ से लटका देने वाली घटना पर आधारित है।

एक ख़बर में, फ़िल्म के एक कलाकार मनोज पाहवा के हवाले से लिखा गया है, “यह फ़िल्म बदायूँ में हुए जघन्य अपराध पर पूरी तरह से आधारित नहीं है, जहाँ दो लड़कियों के साथ बलात्कार किया गया और उन्हें फाँसी दे दी गई। हम कह सकते हैं कि यह फ़िल्म उस घटना से प्रेरित है और हमने इसमें कुछ अंश शामिल किए हैं।”

ट्रेलर की शुरुआत भारतीय संविधान के आर्टिकल 15 के संदर्भ से होती है जो सभी को समानता का अधिकार देता है। ऐसा लगता है जैसे यह फ़िल्म इस तथ्य से प्रेरित है कि घरों में ‘समानता’ का अर्थ ब्राह्मणों को खलनायक के रूप में दिखाने से है।

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फ़िल्म के ट्रेलर में एक गाँव की दो युवा लड़कियों को बेरहमी से बलात्कार और हत्या करते दिखाया गया, उनके शव एक पेड़ से लटके हुए दिखाए गए। यह उस लड़की को दिखाता है, जिसका परिवार हाशिए पर है और उन्हें दिहाड़ी मज़दूर के रूप में काम करने के लिए मजबूर किया जाता है, उन्हें इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि उन्होंने अपने दैनिक वेतन में 3 रुपए की बढ़ोतरी की माँग की थी और यह दर्शाता है कि क्षेत्र में जातिगत समीकरण कैसे प्रचलित हैं। ट्रेलर में यह भी दिखाया गया कि अपराध ‘महंत जी के लड़के’ द्वारा किया गया था। महंत जी को सर्वोच्च श्रेणी का ब्राह्मण बताया गया।

ट्रेलर के दृश्य यह भी बताते हैं कि कैसे क्षेत्र के लोगों को लगता है कि दलितों को मजदूरी में बढ़ोतरी की माँग करने का कोई अधिकार नहीं है, और उनकी स्थिति यह है कि ‘उच्च जाति’ के लोगों को जो उपयुक्त लगता है, वो उन्हें (दलितों) वही दर्जा देते हैं।

बदायूँ मामले से ‘प्रेरित’ होने के अपने प्रयास में, फ़िल्म ने तथ्यों के साथ व्यापक स्तर पर छेड़छाड़ की। यूपी की तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार के लिए शर्म की बात है कि इस मामले को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में व्यापक रूप से देखा गया, क्योंकि इसे दलितों के खिलाफ उच्च जाति के अत्याचार के रूप में उजागर किया गया था।

आरोपितों के नाम पप्पू यादव, अवधेश यादव, उर्वेश यादव, छत्रपाल यादव और सर्वेश यादव था। छत्रपाल और सर्वेश पुलिसकर्मी थे। पुलिस विभाग पर आरोप लगाया गया था कि वो समाजवादी पार्टी के राजनीतिक दबाव में काम कर रहा है, जो यादवों का पक्ष ले रहा था। यहाँ तक ​​कि पुलिस जाँच की भी कड़ी आलोचना हुई थी और लोगों ने सीबीआई जाँच की माँग की थी।

बाद में सीबीआई ने कहा था कि उन्होंने अपनी जाँच में पाया कि 14 और 15 साल की दो लड़कियों ने आत्महत्या की थी, उनका न तो बलात्कार हुआ था और न ही उनकी हत्या हुई थी। इसके बाद पाँचों आरोपियों को क्लीन चिट दे दी गई।

अनुभव सिन्हा, वही व्यक्ति है जो स्वयं के धन को लूटने के प्रयास में उजागर हो चुका है। इसके अलावा उसने पाकिस्तानियों से अपनी ‘मुल्क’ फ़िल्म को अवैध रूप से देखने का अनुरोध किया था। सिन्हा ने अपनी फ़िल्म में व्यापक रूप से सार्वजनिक अपराध करने और इसे जातिवाद के रंगों में रंगने का ख़ूब प्रयास किया है। अदृश्य ‘महंत जी’ (संभावित रूप से योगी आदित्यनाथ) जो एक ब्राह्मण हैं उन्हें फ़िल्म में बुराई के रूप में चित्रित किया गया। साथ ही इस फ़िल्म का मुख्य विषय उच्च जातियों और ब्राह्मणों के अत्याचारों पर केंद्रित है।

एक जघन्य अपराध को दिखाने के लिए बदायूँ घटना को ब्राह्मण-विरोधी, उच्च-जातिवाद के रंगों में रंगने का प्रयास अनुचित है। जबकि सच्चाई यह है कि बदायूँ मामले में कोई ब्राह्मण एंगल नहीं था। इस अपराध की जातीयता और पहचान को बदलना केवल संकीर्ण राजनीतिक एजेंडा है, जो ख़तरनाक होने के साथ-साथ और विभाजनकारी भी हो सकता है।

हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनावों में, उत्तर प्रदेश ने दिखा दिया कि उसने जाति और समुदाय के अपने पुराने राजनीतिक साधनों को अब त्याग दिया है। सपा-बसपा का गठबंधन जिसकी पूरी राजनीति जातिगत विभाजन और विरोध पर आधारित है, जनता ने उसे ख़ारिज कर दिया और भाजपा ने विकास और राष्ट्रवाद के मुद्दों पर चुनाव लड़ा था उसे (भाजपा) जनता ने भारी जनादेश के साथ चुना। ऐसे समय में जब लोग अपनी ग़लती को सुधारने के लिए तैयार हैं और आगे की तरफ बढ़ रहे हैं, इस तरह की फ़िल्में जातिगत पहचान के पुराने ढकोसले को अपने गले से नीचे उतारने का एक बेशर्म प्रयास है, जिसकी जितनी निंदा की जाए वो कम है।

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