Thursday, April 15, 2021
Home विविध विषय मनोरंजन शिकारा: कश्मीरी पंडितों की कहानी के वो हिस्से जो अब तक छुपाए गए हैं!

शिकारा: कश्मीरी पंडितों की कहानी के वो हिस्से जो अब तक छुपाए गए हैं!

वाकई हर दिन उंगली पर गिना जाएगा अब तो। पहली बार किसी मूवी को पहले ही दिन देखना है। नोट किया जाए, 7 फरवरी, 2020 को 'शिकारा' रिलीज़ हो रही है।

पहली बार ऐसा है, जब एक महीने का इंतज़ार काफी लंबा लग रहा है। पहली बार लग रहा है कि हर एक दिन गिनना पड़ेगा शायद, या दिन मुश्किल से कटे। वो भी किसलिए? एक मूवी के लिए। मूवी, एक ऐसे सब्जेक्ट पर है जिस पर कभी किसी ने मुँह खोला तो आस-पास से सबने होंठों पर उंगलियाँ रखवाईं। ऐसा सब्जेक्ट जिस पर देश की सरकारों ने अपना मुँह तो सिला ही साथ ही उस समय की मीडिया ने भी मुँह सिल लिया था और तथाकथित सेक्युलरों, बुद्धिजीवियों ने तो हमेशा ही इस विषय को लेकर गाँधी जी के तीन बंदरों की तरह आँख, कान और मुँह ढँक लिया। बस उनका संदेश उन बंदरों से अलग था।

उन तथाकथित सेक्युलरों, बुद्धिजीवियों का संदेश था कि, देश में अगर कहीं बहुसंख्यकों पर अत्याचार हो रहा है तो चुप रहो, उधर मत देखो, उनकी मत सुनो फिर भले ही वो दर्द से चीख-चिल्ला रहे हों; उनका सब लुट चुका हो, वो अपने ही मकानों से उजाड़े जा रहे हों; कोई उनके ही घर में घुस कर उनके घरों को जला दे, उनकी बहु-बेटियों का बलात्कार करे लेकिन उधर मत देखो, इस पर मत बोलो, उनकी चीखें मत सुनो। 

आखिर क्यों? क्योंकि इस देश में वो बहुसंख्यक हैं। इनके लिए बोलने पर देश की धर्मनिरपेक्षता खतरे में आ जाएगी, इनका साथ दे देने पर ‘बुद्धिजीवी’ नाम का तमगा हाथ से छीन जाएगा। क्योंकि ये कभी न तो बुद्धिजीवी रहे न ही धर्मनिरपेक्ष। क्यों इस देश में धर्मनिरपेक्ष होने का मतलब सिर्फ ’एंटी मेजोरिटी’ बन कर रह गया? ये सवाल उन तथाकथित सेक्युलरों और बुद्धिजीवियों के तबके के मुँह पर ऐसा सवाल है, जिसका जवाब शायद उन्हें कहीं और कभी नहीं मिलेगा।

लेकिन आज उस घटना के 29 सालों के बाद कुछ लोगों ने हिम्मत जुटाई है। जब जनता इन तथाकथित सेक्युलरों और बुद्धिजीवियों के साज़िश से निकल रही है। आज इनका घिनौना सच सामने आ रहा है क्योंकि आज जनता के सामने सोशल मीडिया से लेकर कई तरह के अन्य साधन हैं, जहाँ से वो सटीक जानकारियों तक पहुँच सकते हैं। आज जनता को सूचनाओं के लिए बिके हुए मीडिया संस्थान के आसरे नहीं रहना पड़ रहा है।

आज जब ऐसी सरकार है, जो वाकई धर्मनिरपेक्षता को धर्मनिरपेक्षता के रूप में ही देखती है न कि बहुसंख्यकों के बेवज़ह विरोध को या मुस्लिमों के तुष्टिकरण को धर्मनिरपेक्षता कहती है, तब किसी ने इस विषय को छुआ है और इस पर एक फिल्म बनाई है। वो फिल्म है ‘शिकारा’ और इसका विषय है वर्ष 1990 में कश्मीर से निकाले गए कश्मीरी पंडित।

जनवरी 1990 में अलगाववादियों और आतंकियों ने मिलकर कश्मीर से कश्मीरी पंडितों को उन्हीं के घर से उन्हें निकाल दिया, उन्हीं की ज़मीन से उन्हें बेदखल किया, कश्मीरी पंडितों की औरतों से नृशंसतापूर्वक बलात्कार किया, उनकी हत्याएँ की। ऐसा न केवल साधारण कश्मीरी पंडित बल्कि, ऐसे कश्मीरी पंडितों के भी साथ हुआ, जो सरकारी ओहदे पर थे। उन दिनों में चरमपंथी, अलगाववादी इश्तिहारों, पोस्टरों के ज़रिए कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ने के लिए धमकाते थे, फिर सामने आकर लोग डराने लगे तब भी उन्हें आशा थी कि ये 7-8 लाख लोगों का मामला है, सरकार जल्द ही कुछ करेगी।

सरकार जल्द ही कोई भरोसेमंद कदम उठाएगी, बुद्धिजीवी कुछ तो बोलेंगे, मीडिया लोगों तक उनकी बात पहुँचाएगी। यह सोचकर वो कश्मीरी पंडित कश्मीर में रुके रहे किंतु कहीं से कोई मदद नहीं आई और अंततः 19 जनवरी 1990 की रात को लाखों कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से भागना पड़ा।

जाइए जम्मू के जगती कैंप में और देखिए अपने ही देश में अपने ही घर, अपनी जमीन से भगा दिए गए लोग कैसे रह रहे हैं! जाइए दिल्ली के मजनू का टीला और देखिए वहाँ के कश्मीरी पंडितों के कुछ परिवारों की हालत। देखिए उनकी महिलाएँ क्या काम करने को मजबूर हैं! इनके लिए संविधान क्या कहता था 1990 में? इनके लिए संविधान अब क्या कहता है? इसके लिए न्यायपालिका क्या कह रही थी 1990 में? इनके लिए न्यायपालिका अब क्या कह रही है? इनको फिर से बसाने के लिए क्या किया जा रहा है?

ऐसा नहीं कि विस्थापित कश्मीरी पंडित अपने-अपने घरों को नहीं लौटना चाहते, लेकिन उनका सवाल है और जायज सवाल है, “हमारी सुरक्षा की गारंटी कौन देगा और वापस लौटकर हम अपनी रोज़ी रोटी कैसे कमाएँगे? वो लोग इस समय कहीं नहीं हैं, उनका अपना कुछ नहीं है। उनका रेजिडेंस प्रूफ रोज बदलता है, जिनके अपने ढेर सारे कमरों वाला मकान था।

कहाँ हैं वो धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी? कहाँ है वो प्रगतिशील मुस्लिमों का झुंड, जो तब तो हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई की माला जपने लगते हैं जब कम संख्या में होते हैं और संख्या में बढ़ते ही उस जगह को हिन्दुओं या अन्य धर्म के लोगों के लिए नरक बना देते हैं? क्यों नहीं उस वक़्त उन्होंने वो एकता दिखाई? क्यों नहीं वो सड़कों पर आए? आखिर क्यों?

आखिर क्यों हर बार इस देश में बहुसंख्यकों से ही उम्मीद कि जाती है कि वही चुप रहे? क्यों बहुसंख्यक, बहुसंख्यक होने की कीमत चुका रहा? क्यों बहुसंख्यक को कहा जाता है कि वो अपनी रोटी का हिस्सा मुस्लिमों को दे जबकि वही मुस्लिम जैसे ही किसी जगह पर बहुसंख्यक की स्थिति में आते हैं, वैसे ही हिन्दुओं के हिस्से की रोटी तो छीन कर खा ही जाते हैं, साथ में उनकी बहू-बेटियों को भी नहीं बख्शते हैं।

आज भी उन सबके मुँह सिले हुए हैं, जिनके मुँह आज से 29 साल पहले सिले हुए थे। लेकिन आज एक सरकार है, जो अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण करने के लिए बहुसंख्यकों को सताती नहीं है कम से कम। मेजॉरिटी को मेजॉरिटी होने की कीमत चुकानी नहीं पड़ती है कम से कम। इसलिए किसी ने कोशिश की है इस विषय पर मूवी बनाने की और वाकई हर दिन उंगली पर गिना जाएगा अब तो। पहली बार किसी मूवी को पहले ही दिन देखना है। नोट किया जाए, 7 फरवरी, 2020 को ‘शिकारा’ रिलीज़ हो रही है।

शवयात्रा में भी नहीं थी राम नाम लेने की इजाजत, Tanhaji ने बताया औरंगज़ेब कितना ‘महान’

Chhapaak में करनी होगी एडिटिंग, तब होगी रिलीज: कोर्ट ने डायरेक्टर को दिया आदेश

नहीं रिलीज़ होगी Chhapaak? जिस लड़की पर बनी फिल्म, उसी की वकील ने दायर की याचिका

  सहयोग करें  

एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

‘बेड दीजिए, नहीं तो इंजेक्शन देकर उन्हें मार डालिए’: महाराष्ट्र में कोरोना+ पिता को लेकर 3 दिन से भटक रहा बेटा

किशोर 13 अप्रैल की दोपहर से ही अपने कोरोना पॉजिटिव पिता का इलाज कराने के लिए भटक रहे हैं।

बाबा बैद्यनाथ मंदिर में ‘गौमांस’ वाले कॉन्ग्रेसी MLA इरफान अंसारी ने की पूजा, BJP सांसद ने उठाई गिरफ्तारी की माँग

"जिस तरह काबा में गैर मुस्लिम नहीं जा सकते, उसी तरह द्वादश ज्योतिर्लिंग बाबा बैद्यनाथ मंदिर में गैर हिंदू का प्रवेश नहीं। इरफान अंसारी ने..."

‘मुहर्रम के कारण दुर्गा विसर्जन को रोका’ – कॉन्ग्रेस के साथी मौलाना सिद्दीकी का ममता पर आरोप

भाईचारे का राग अलाप रहे मौलाना फुरफुरा शरीफ के वही पीरजादा हैं, जिन्होंने अप्रैल 2020 में वायरस से 50 करोड़ हिंदुओं के मरने की दुआ माँगी थी।

‘जब गैर मजहबी मरते हैं तो खुशी…’ – नाइजीरिया का मंत्री, जिसके अलकायदा-तालिबान समर्थन को लेकर विदेशी मीडिया में बवाल

“यह जिहाद हर एक आस्तिक के लिए एक दायित्व है, विशेष रूप से नाइजीरिया में... या अल्लाह, तालिबान और अलकायदा को जीत दिलाओ।”

मजनू का टीला: पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थियों की इस तरह से मदद कर रहा ‘सेवा भारती’, केजरीवाल सरकार ने छोड़ा बेसहारा

धर्मवीर ने कहा कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने उनकी नहीं सुनी, न कोई सुध ली। वो 5-6 साल पहले यहाँ आए थे। इसके बाद नहीं आए। उन्होंने बिजली लगाने का वादा किया था, लेकिन कुछ भी नहीं किया। RSS ने हमारी मदद की है

मथुरा की अदालत में फिर उठी मस्जिद की सीढ़ियों से भगवान श्रीकृष्ण की मूर्तियाँ निकलवाने की माँग: 10 मई को अगली सुनवाई

मथुरा की अदालत में एक बार फिर से सन् 1670 में ध्वस्त किए गए श्रीकृष्ण मंदिर की मूर्तियों को आगरा फोर्ट की मस्जिद से निकलवाने की माँग की गई है।

प्रचलित ख़बरें

छबड़ा में मुस्लिम भीड़ के सामने पुलिस भी थी बेबस: अब चारों ओर तबाही का मंजर, बिजली-पानी भी ठप

हिन्दुओं की दुकानों को निशाना बनाया गया। आँसू गैस के गोले दागे जाने पर हिंसक भीड़ ने पुलिस को ही दौड़ा-दौड़ा कर पीटा।

‘कल के कायर आज के मुस्लिम’: यति नरसिंहानंद को गाली देती भीड़ को हिन्दुओं ने ऐसे दिया जवाब

यमुनानगर में माइक लेकर भड़काऊ बयानबाजी करती भीड़ को पीछे हटना पड़ा। जानिए हिन्दू कार्यकर्ताओं ने कैसे किया प्रतिकार?

थूको और उसी को चाटो… बिहार में दलित के साथ सवर्ण का अत्याचार: NDTV पत्रकार और साक्षी जोशी ने ऐसे फैलाई फेक न्यूज

सोशल मीडिया पर इस वीडियो के बारे में कहा जा रहा है कि बिहार में नीतीश कुमार के राज में एक दलित के साथ सवर्ण अत्याचार कर रहे।

जानी-मानी सिंगर की नाबालिग बेटी का 8 सालों तक यौन उत्पीड़न, 4 आरोपितों में से एक पादरी

हैदराबाद की एक नामी प्लेबैक सिंगर ने अपनी बेटी के यौन उत्पीड़न को लेकर चेन्नई में शिकायत दर्ज कराई है। चार आरोपितों में एक पादरी है।

पहले कमल के साथ चाकूबाजी, अगले दिन मुस्लिम इलाके में एक और हिंदू पर हमला: छबड़ा में गुर्जर थे निशाने पर

राजस्थान के छबड़ा में हिंसा क्यों? कमल के साथ फरीद, आबिद और समीर की चाकूबाजी के अगले दिन क्या हुआ? बैंसला ने ऑपइंडिया को सब कुछ बताया।

छबड़ा में कर्फ्यू जारी, इंटरनेट पर पाबंदी बढ़ी: व्यापारियों का ऐलान- दोषियों की गिरफ्तारी तक नहीं खुलेंगी दुकानें

राजस्थान के बाराँ स्थित छबड़ा में आबिद, फरीद और समीर की चाकूबाजी के अगले दिन भड़की हिंसा में मुस्लिम भीड़ ने 6 दर्जन के करीब दुकानें जला डाली थी।
- विज्ञापन -

 

हमसे जुड़ें

292,985FansLike
82,215FollowersFollow
394,000SubscribersSubscribe