The Tashkent Files: विवेक अग्निहोत्री-पल्लवी जोशी के सुलगते सवाल जो आपको सोचने पर विवश कर देंगे

आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर विदेश या रक्षा मंत्रालय तक शास्त्री जी की मृत्यु से जुड़ा कोई दस्तावेज नहीं है।

पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री पर बनी फ़िल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ का ट्रेलर रिलीज हो चुका है। ट्रेलर लॉन्च के दौरान निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने ऑपइंडिया से कई मुद्दों पर बीतचीत की। हमने आपको बताया कि कैसे शास्त्री जी के बेटे सुनील शास्त्री अपने पिता और पीएम मोदी में समानताएँ देखते हैं। इसके अलावा हमने दिवंगत पीएम शास्त्री जी के नाती संजय नाथ सिंह का भी संस्मरण बताया, जिसमें उन्होंने तत्कालीन केंद्रीय मंत्रियों द्वारा शास्त्री जी की मृत्यु को लेकर बोले गए झूठ को बेनक़ाब किया।

लेकिन, प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान निर्देशक विवेक अग्निहोत्री और अभिनेत्री पल्लवी जोशी ने कुछ ऐसी बातें कहीं, कुछ ऐसे सवाल दागे, जिसे आपको सुनना चाहिए। ऐसे सवाल, जो कमर्शियल फ़िल्मों को लेकर पागलों की तरह रिपोर्टिंग करने वाले कई मेनस्ट्रीम मीडिया शायद आपको नहीं बताएँगे। यहाँ हम दोनों के द्वारा कही गई बातों को व्यवस्थित ढंग से आपके सामने रख रहे हैं। पढ़िए और मनन कीजिए।

पल्लवी जोशी द्वारा कही गई महत्वपूर्ण बातें:

शास्त्री जी का निधन हुए 50 वर्षों से भी अधिक हो गए लेकिन उनके बेटे सुनील शास्त्री को आज तक ये पता नहीं चल पाया है कि उनके पिता की मृत्यु कैसे हुई। सोचिए एक बेटे के रूप में उन पर क्या बीत रही होगी। एक बेटे को ये पता नहीं कि उसके पिता की मृत्यु की असली वजह क्या थी। मैंने सोचा कि सच्चाई बाहर आनी चाहिए। शास्त्री जी का परिवार लम्बे समय से यह लड़ाई लड़ रहा है। ठीक है, भारत के एक नागरिक होने के नाते मेरा या आपका अधिकार है कि हमें अपने पूर्व प्रधानमंत्री की मृत्यु के असली कारणों का पता चले। लेकिन, ज़रा सोचिए कि क्या उनके परिवार का पहला हक़ नहीं बनता कि उन्हें शास्त्री जी की मृत्यु की वजह बताई जाए।

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संजय नाथ सिंह का अधिकार है कि उन्हें पता चले कि उनके नानाजी के साथ आख़िर हुआ क्या था? मैं पूछती हूँ, कौन सी ऐसी ताक़त है दुनिया में जो उन्हें इस बात से वंचित रख रही है? सुनील जी नहीं जान पाए कि उनके पिता के साथ क्या हुआ? संजय जी आज तक नहीं जान पाए कि उनके नानाजी के साथ क्या हुआ? यह सही नहीं है। इसीलिए हमने ‘द ताशकंद फाइल्स’ बनाने का निर्णय लिया। मैंने विवेक से कहा कि हमलोग ख़ुद इस फ़िल्म को प्रोड्यूस करेंगे क्योंकि इसे ईमानदारी से बनाना ज़रूरी है।

आपको बता दूँ कि मैं एक माँ के तौर पर इस फिल्म का हिस्सा बनी। मैंने इस बात पर गौर किया कि उस 17 वर्ष के बच्चे पर क्या बीती होगी, जिसके पिता की मृत्यु हो गई और उसे उस मृत्यु का कारण ही नहीं बताया गया। कुछ फ़िल्में ऐसी होती हैं, जिनकी शुरुआत अच्छी होती है। हो सकता है कि शास्त्री जी का इसमें कोई हाथ हो, जिस से फ़िल्म अच्छी बन गई है। लेकिन, मैं आपको बताना चाहती हूँ कि इस फ़िल्म में ऐसे धुरंधर एक्टर्स हैं, जिन्हें डायरेक्ट करना इतना आसान नहीं था।

मैं 1991 में आई सुपरहिट फ़िल्म सौदागर का हिस्सा थी। उस दौरान मैंने देखा कि निर्देशक सुभाष घई साहब को राज कुमार और दिलीप कुमार को सँभालने में कितनी दिक्कतें आ रही थीं। हमें लगा था कि मिथुन चक्रवर्ती और नसीरुद्दीन शाह के रहते हमें भी परेशानियाँ आएँगी लेकिन मैं आपको बता नहीं सकती कि ये फ़िल्म कितने प्यार से बन कर तैयार हो गई। एक भी ईगो प्रॉब्लम नहीं, एक भी Conflict नहीं, किसी ने अपने मेक-अप और लंच तक के लिए भी कभी कोई शिकायत नहीं की। एक प्रोड्यूसर को ये सारी समस्याएँ झेलनी पड़ती हैं लेकिन ‘द ताशकंद फाइल्स’ के निर्माण के दौरान सब कुछ हँसते-खेलते पूरा हो गया।

एक और ख़ास बात है, जो मैं आपको बताना चाहूँगी। हर एक्टर को स्क्रिप्ट के अलावा उस दिन शूट किए जाने वाले दृश्यों के बारे में एक प्रिंट आउट निकाल कर दिया जाता है, जिसे हम साइट्स कहते हैं। इस फ़िल्म के निर्माण के दौरान हमें साइट्स प्रिंट करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। सभी को सेट पर पहुँचने से पहले ही सारी चीजें याद रहती थीं। ऐसा बहुत कम ही होता है जब सारे के सारे एक्टर्स किसी फ़िल्म में इतने मशगूल हो जाएँ।

विवेक अग्निहोत्री द्वारा कही गई महत्वपूर्ण बातें:

सभी फ़िल्म निर्माता का कोई ड्रीम प्रोजेक्ट होता है। वो उसके लिए संघर्ष करते हैं। उसे बनाने के लिए बहुत कुछ करते हैं। लेकिन मैं आपको बता दूँ कि ये फ़िल्म बस हो गई, बस मेरे से बन गई। हो सकता है कि इस विषय को जनता के बीच पहुँचने के लिए किसी माध्यम की ज़रूरत थी। आज से तीन-चार वर्ष पहले जब मैं 2 अक्टूबर के समाचार पत्र खोला करता था तो सभी जगहों पर सिर्फ़ गाँधीजी ही गाँधीजी दिखते थे। मेरा बेटा छोटा था। यकीन मानिए, मुंबई के सबसे अच्छे स्कूलों में से एक में पढ़ने वाले उस बच्चे को ये पता ही नहीं था कि लाल बहादुर शास्त्री कौन थे? ये कैसी शिक्षा प्रणाली है?

हमें याद रखना चाहिए कि 2 अक्टूबर को गाँधी जी के साथ-साथ लाल बहादुर शास्त्री का भी जन्मदिवस होता है। आज के युवा वर्ग को उनके बारे में कैसे पता चलेगा, जब हमारी शिक्षा व्यवस्था ही ऐसी है। शास्त्री जी ज़मीन से जुड़े एक ऐसे नेता थे, जिन्हें सभी प्यार करते थे। स्वतंत्र भारत का पहला युद्ध जिताने वाले पीएम के बारे में किसी को नहीं पता। लोगों ने मुझे सोशल मीडिया पर लिखना शुरू किया ताकि सच को बाहर निकाला जा सके। मैं Conspiracy Theories में विश्वास नहीं रखता लेकिन जहाँ हज़ारों लोग ऐसा लिख रहे हों, वहाँ रिसर्च एक ज़रूरत बन जाती है।

रिसर्च के दौरान मुझे कई ऐसी चीजें मिलीं, जो इस पूरी कहानी में झोल-मोल की तरह थी। कई ऐसी चीजें थीं, जिन पर विश्वास करना मुश्किल हो रहा था। अगर कोई चीज कही जा रही है तो उसे साबित करने के लिए आपके पास डॉक्यूमेंट्स भी होने चाहिए। इसके बाद शास्त्री जी के परिवार के लोगों से मेरी बात हुई। उन लोगों ने भी मुझे यही कहा कि उन्हें शास्त्री जी की ज़िंदगी के अंतिम पन्ने पर सच्चाई चाहिए, कवर-अप नहीं। सबसे अव्वल तो यह कि इस सच्चाई को पता करने की आज तक किसी ने कोशिश ही नहीं की।

तभी मैंने निर्णय ले लिया कि मुझे इस पर काम करना है। इसके लिए पुख्ता जानकारियाँ होनी चाहिए। इसके बाद मैं और मेरे लोगों ने इस पर काम शुरू किया। हम आरटीआई फाइल कर-कर के जानकारियाँ जुटाने लगे। आपको बता दूँ कि हम सब वस्तुतः Whistle Blowers बन गए थे। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर विदेश या रक्षा मंत्रालय तक शास्त्री जी की मृत्यु से जुड़ा कोई दस्तावेज नहीं है। न पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट है, न उच्चायोग के पास कुछ है। क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का पीएम, एक बड़ा युद्ध जीतने के बाद ताशकंद जाता है, उसकी मृत्यु हो जाती है, और सरकार के पास कोई रिकॉर्ड्स नहीं है!

मैंने ये फ़िल्म नहीं बनाई है। मैंने इसके लिए कोई मेहनत नहीं की है। चीजें बस होती गईं और फ़िल्म बनती चली गई। अपने-आप सब कुछ सही होता चला गया और आपने अभी ट्रेलर भी देखा। ये लाल बहादुर शास्त्री जी को हमारी श्रद्धांजलि है।

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