Monday, October 26, 2020
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भगत सिंह को उनके दादाजी ने जनेऊ संस्कार के समय ही दान कर दिया था… वो ऐलान, जिसे ‘शहीद’ ने जिंदगी भर निभाया

"उम्मीद है आप मुझे माफ़ कर देंगे। मैं उस समय की उनकी (दादाजी की) प्रतिज्ञा पूरी कर रहा हूँ। आपको याद होगा कि जब मैं बहुत छोटा था, तो बापू जी (दादाजी) ने मेरे जनेऊ संस्कार के समय ऐलान किया था कि मुझे दान कर दिया गया है ताकि..."

क्रांतिकारी शब्द का अपना स्वभाव होता है। इस शब्द के न तो आगे कुछ और न ही पीछे, जो है बस है। इस बात की सबसे शानदार नज़ीर हैं भगत सिंह और शायद इसलिए इस नाम के जितनी गाढ़ी लकीर किसी दूसरे नाम की नहीं। ऐसे नाम खोजने पर भी नज़र नहीं आते, जो फाँसी के तख़्त पर चढ़ने के पहले मुस्कराते हों। जिनके लिए ज़मीन, घर, परिवार और अपना पिंड छोड़ने के लिए इतनी वजह ही काफी थी कि देश उनकी ओर उम्मीद भरी निगाहों से एक टक निहार रहा था।

23 मार्च 1931 को जब भगत की फाँसी का वक्त आया, तब जितने भी लोग उन्हें देख पाए, सब के सब हैरान थे। भरे हुए गाल, कसा हुआ शरीर और वजन बढ़ा हुआ था। लोग कारावास में रह कर निराश होते थे लेकिन उनके साथ ठीक विपरीत हुआ। भगत सिंह इस बात से उत्साहित थे कि उन्हें देश के लिए शहीद होने के मौक़ा मिल रहा है।

फाँसी के वक्त मौके पर तमाम फिरंगी अधिकारी मौजूद थे, कुछ यूरोप के तो कुछ ब्रिटिश। भगत सिंह ने उन सभी की तरफ देख कर मुस्कराते हुए कहा, “मिस्टर मजिस्ट्रेट, आप बेहद भाग्यशाली हैं कि आपको यह देखने के लिए मिल रहा है। भारत के क्रांतिकारी किस तरह अपने आदर्शों के लिए फाँसी पर भी झूल जाते हैं।”    

भगत सिंह की ज़िंदगी में बेहद कम उम्र के दौरान ही बहुत कुछ तय हो गया था और सब कुछ स्वतः हुआ। भगत सिंह उस वक्त सिर्फ 8 साल के थे, जब उनके सामने नौजवान क्रांतिकारी ‘करतार सिंह सराभा’ फाँसी के तख़्त पर चढ़ गए।

चेहरे पर न कोई शिकन और न कोई परवाह, मुल्क की बात थी तो फाँसी से कैसा भय! आखिर ऐसी मृत्यु सामान्य भी नहीं है, लोग इस सूरत की मौतों को ‘शहीद’ पुकारते हैं। भगत सिंह अपनी जवानी में जो बने, उसके लिए इस घटना का नज़ारा बहुत था। भगत सिंह ने समझने में देरी नहीं कि ‘जो होना है, उसके लिए जवानी ही है और जवानी कब ढल जाए, इसका कोई अनुमान नहीं।’

भगत सिंह 15-16 साल के थे। नेशनल कॉलेज लाहौर से पढ़ाई कर रहे थे। उनकी हिन्दी, पंजाबी और उर्दू तीनों भाषाओं पर बराबर पकड़ थी। उन दिनों कम उम्र में विवाह का चलन था। लिहाज़ा उनके पिता चाहते थे कि भगत सिंह विवाह कर लें लेकिन भगत सिंह ने टाल दिया। दबाव बढ़ा तब भगत सिंह ने अपने पिता को चिट्ठी लिख कर घर छोड़ दिया। वह अपनी चिट्ठी में लिखते हैं, 

“पूज्य पिता जी,
नमस्ते!
मेरी ज़िंदगी भारत की आज़ादी के महान संकल्प के लिए दान कर दी गई है। इसलिए मेरी ज़िंदगी में आराम और सांसारिक सुखों का कोई आकर्षण नहीं है। आपको याद होगा कि जब मैं बहुत छोटा था, तो बापू जी (दादाजी) ने मेरे जनेऊ संस्कार के समय ऐलान किया था कि मुझे वतन की सेवा के लिए वक़्फ़ (दान) कर दिया गया है। लिहाज़ा मैं उस समय की उनकी प्रतिज्ञा पूरी कर रहा हूँ। उम्मीद है आप मुझे माफ़ कर देंगे।
आपका ताबेदार
भगतसिंह

यह जानकारी आज तक सीमित है कि भगत सिंह घर छोड़ कर सीधे कानपुर पहुँचे, गणेश शंकर विद्यार्थी के पास। गणेश शंकर विद्यार्थी के लिए हैरान कर देने वाली बात यह थी कि एक लड़का जिसके जवान होने में वक्त है, उसकी कलम में इतनी धार आई कैसे?

भगत सिंह बहुत कम समय में गणेश शंकर के प्रिय बन गए थे। सबसे मज़े की बात यह है कि भगत सिंह के लेख उनके नाम से छपते भी नहीं थे। उनके सारे लेख ‘बलवंत सिंह’, विद्रोही या अन्य छद्म नामों से प्रकाशित होते थे।

16 मई 1925 को कोलकाता से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक ‘मतवाला’ में उनका एक लेख प्रकाशित हुआ – भगत सिंह के नाम से नहीं ‘बलवंत सिंह’ के नाम से। उस अद्भुत लेख का एक हिस्सा कुछ इस प्रकार है: 

“अगर रक़्त की भेंट चाहिए तो सिवा युवक के कौन देगा? अगर तुम बलिदान चाहते हो तो तुम्हें युवक की ओर देखना होगा। प्रत्येक जाति के भाग्य विधाता युवक ही होते हैं। …सच्चा देशभक्त युवक बिना झिझक मौत का आलिंगन करता है, संगीनों के सामने छाती खोलकर डट जाता है, तोप के मुँह पर बैठकर मुस्कुराता है, बेड़ियों की झनकार पर राष्ट्रीय गान गाता है और फाँसी के तख्ते पर हँसते-हँसते चढ़ जाता है। अमेरिकी युवा पैट्रिक हेनरी ने कहा था – जेल की दीवारों के बाहर ज़िंदगी बड़ी महँगी है।”

“पर, जेल की काल कोठरियों की ज़िंदगी और भी महँगी है क्योंकि वहाँ यह स्वतंत्रता संग्राम के मूल्य रूप में चुकाई जाती है। ऐ भारतीय युवक! तू क्यों गफ़लत की नींद में पड़ा बेखबर सो रहा है। उठ! अब अधिक मत सो। सोना हो तो अनंत निद्रा की गोद में जाकर सो रह… धिक्कार है तेरी निर्जीवता पर। तेरे पूर्वज भी नतमस्तक हैं इस नपुंसत्व पर। यदि अब भी तेरे किसी अंग में कुछ हया बाकी हो तो उठ कर माता के दूध की लाज रख, उसके उद्धार का बीड़ा उठा, उसके आंँसुओं की एक-एक बूंद की सौगंध ले, उसका बेड़ा पार कर और मुक्त कंठ से बोल- वंदे मातरम!”

इस लेख का हर शब्द इस बात का जीवंत प्रमाण है कि बहुतों ने बहुत कुछ लिखा लेकिन इतनी कम उम्र में ऐसा कुछ किसी ने नहीं लिखा। जनता को इस बात की भनक तक नहीं थी कि बलवंत सिंह हैं कौन? खुद गणेश शंकर विद्यार्थी तक नहीं जानते थे कि शब्दों की इतनी गाढ़ी लकीर भगत सिंह की खींची हुई है।

भगत सिंह के एक नहीं बल्कि अनेक ऐसे लेख हैं, जो खुद में आज़ादी के सबसे कीमती दस्तावेज़ हैं। पंजाबी पत्रिका ‘किरती’ में भी उनके कई लेख छपे, जिसके चर्चा पूरे मुल्क में हुई। यहाँ वह विद्रोही नाम से लिखते थे। 

जनवरी 1928 में उनका एक लेख ‘किरती’ में प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने काकोरी कांड के क्रांतिकारियों को अपने शब्दों से श्रद्धांजलि दी। भगत सिंह लिखते हैं, हम लोग आह भरकर समझ लेते हैं कि हमारा फ़र्ज पूरा हो गया। हमें आग नहीं लगती। हम तड़प नहीं उठते। हम इतने मुर्दा हो गए हैं। आज वे भूख हड़ताल कर रहे हैं। तड़प रहे हैं। हम चुपचाप तमाशा देख रहे हैं। ईश्वर उन्हें बल और शक्ति दे कि वे वीरता से अपने दिन पूरे करें और उन वीरों के बलिदान रंग लाएँ।” 

‘किरती’ में ही भगत सिंह ने बलिदान देने वाले सेनानियों पर आधारित एक श्रृंखला लिखी थी, जिसका शीर्षक था ‘आज़ादी की भेंट शहादतें’। इसमें वह मदन लाल ढिंगरा के लिए लिखते हैं, “फाँसी के तख़्ते पर खड़े मदन से पूछा जाता है- कुछ कहना चाहते हो? उत्तर मिलता है- वन्दे मातरम! माँ! भारत माँ तुम्हें नमस्कार और वह वीर फाँसी पर लटक गया। उसकी लाश जेल में ही दफ़ना दी गई। हम हिन्दुस्तानियों को दाह क्रिया तक नहीं करने दी गई। धन्य था वो वीर। धन्य है उसकी याद। मुर्दा देश के इस अनमोल हीरे को बार-बार प्रणाम।” 

भगत सिंह के लेखों में दो बातें हमेशा नज़र आती थीं। पहला कि नई पीढ़ी के लिए क्रांति शब्द के क्या मायने हैं और दूसरा असल क्रांतिकारियों की तासीर होती क्या है? भगत सिंह का मानना था कि कि देश के लिए मिटने वालों में एक बात समान होती है – ‘वह साधू होते हैं।’ ऐसे साधू जिसे संसार का कोई मोह नहीं है, सिवाय एक चीज़ ‘देश’ के। हालाँकि साधुओं में भी परमात्मा का मोह होता है, ठीक वैसे ही शहीद होने वालों को मुल्क का मोह होता है, मुल्क की मिट्टी और आवाम का मोह होता है। 

8 अप्रैल 1929 को दिल्ली असेम्बली में भगत सिंह द्वारा फेंके गए बम में एक कागज़ का टुकड़ा लगा हुआ था। उसमें जितनी बातें लिखी थीं, वह भगत सिंह के मूल स्वभाव और व्यक्तित्व को समझने के लिए पर्याप्त हैं। भगत सिंह ने कागज़ के टुकड़े में लिखा था कि ‘इंसान मारे जा सकते हैं लेकिन विचार नहीं।’ उनका कहना था कि वह चाहते हैं कि लोगों में इस बात का भरोसा बना रहे कि व्यक्ति मिट सकता है पर उसका व्यक्तित्व नहीं। 

किसी कवि ने शायद इसलिए ही लिखा है, “कुछ नहीं रह जाता है बस लिखा पढ़ा रह जाता है।”

क्रांतिकारियों की किताब के पन्ने ऐसे ही होते हैं। उनमें क्रांति की स्याही बराबर नज़र आती है। उनकी किताबों के पन्ने पलटने पर जितनी तस्वीरें नज़र आती हैं, उनका रंग लाल ही होता है, सुर्ख लाल। आखिर क्रांति और शहादत जैसे कालजयी शब्द सभी के भाग्य में होते भी नहीं, जिनके भाग्य में है, उनकी हस्ती अमर है।

भगत सिंह ने देश को जितना कुछ दिया उसका मोल न तो शब्दों में और न ही जज़्बातों में, न ही बातों में और न ही विचारों में। देश और दुनिया में जो बातें हर सीमाओं से बाहर होती हैं, भगत सिंह की बात उसमें से ही है।   

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