Tuesday, March 9, 2021
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पेशवा की ‘छबीली’: चीते का शिकार करने वाली वो वीरांगना जिसकी तलवारों से फिरंगी भी कॉंपे

1954 के मार्च महीने में अंग्रेजी हुकूमत ने रानी को महल छोड़ने का आदेश दिया। लेकिन रानी ने दृढनिश्चय किया कि वे अपने राज्य को नहीं छोड़ेंगी। इसी समय रानी लक्ष्मीबाई ने प्रण लिया कि वे अपने राज्य को फिरंगियों की हुकूमत से आजाद करवाकर दम लेंगी।

ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ लड़ते-लड़ते अपनी वीरगाथा को अमर कर जाने वाली झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का आज जन्मदिवस हैं। वैसे तो लक्ष्मीबाई के विवाह के बाद उनके जीवन का हर पल एक क्रांति का विस्फोट करता है। लेकिन उनके जीवन से जुड़े कुछ अन्य पहलू भी हैं, जो बताते हैं कि 1857 में अंग्रेजों को धूल चटाने वाली लक्ष्मीबाई की वीरता परिस्थितियों का फलितार्थ नहीं थी। अच्छे-अच्छे जाँबाजों को रणभूमि में धूल चटाना उनका जन्मजात कौशल था। वह पितृसत्ता द्वारा गढ़ी गई हर भ्रांतियों को तोड़कर आगे बढ़ीं और खुद को इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज करवा गईं।

19 नवंबर 1828 को बनारस में एक मराठा ब्राह्मण के घर में जन्मीं रानी लक्ष्मीबाई का नाम पहले मणिकर्णिका था। घरवाले दुलार में ‘मनु’ बुलाते थे। पेशवा ने उनके स्वभाव के कारण ‘छबीली’ नाम दिया था। रानी, बचपन से ही शस्त्रों के ज्ञान में धनी थी। घुड़सवारी से लकर तलवारबाजी उनके प्रिय खेल थे। 4 साल की उम्र में माँ भागीरथीबाई का साया खोने के बाद पिता मोरोपंत ने उनकी परवरिश की। पिता बिठूर के राजदरबार में थे इसलिए मनु का भी अधिकतर समय वहीं बीतता था। उम्र बढ़ने के साथ उनके भीतर अलग-अलग कौशल विकसित होने लगे, जैसे कोई योद्धा युद्धभूमि के लिए तैयार हो रहा हो। वे रंग रूप से जितनी आकर्षक थीं, उनके हाव-भाव भी उतने ही मन को लुभाने वाले थे।

बताया जाता है मनु का विवाह झाँसी के राजा गंगाधर से सिर्फ़ इसलिए हुआ था, क्योंकि झाँसी के महाराज शिवराव भाऊ उनकी बहादुरी से स्तब्ध रह गए थे। दरअसल, उन्होंने मनु को चीते का शिकार करते देखा था, जिसके बाद वह मनु का तेज भूल नहीं पाए। कुछ दिन बाद वह पेशवा के महाराज से मिले और अपने बेटे गंगाधर राव के लिए मनु का हाथ माँगा। झाँसी के महाराज के मन में मनु को अपनी पुत्रवधु बनाने की इच्छा इतनी प्रबल थी पेशवा के आगे कई बार इस संबंध में निवेदन किया। 1842 में 14 साल की उम्र में मनु का विवाह गंगाधर राव से हुआ।

लक्ष्मीबाई, रानी ऑफ झॉंसी का अंश

शादी के बाद गंगाधर राव को एहसास हो गया कि उनका विवाह किसी साधारण महिला से नहीं हुआ है। रानी के युद्ध कौशल, बुद्धि, विवेक को परखते हुए उन्होंने मणिकर्णिका का नाम लक्ष्मीबाई रखा। अपने जीवन काल में राजा ने उन्हें केवल असीम प्रेम ही नहीं किया, बल्कि उनकी इच्छाओं और पसंद-नापसंद का ख्याल रखते हुए शस्त्र संचालन, पुस्तकें, प्रशासन में हिस्सेदारी की व्यवस्था भी सुनिश्चित की। कहा जाता है कि रानी के ससुराल वाले चाहते थे कि वे महल के भीतर रसोई आदि का काम सँभाले, लेकिन वह व्यवस्था में सुधार लाने में जुटी रहती थी। इसके कारण उनके दुश्मन बढ़ते ही जा रहे थे।

समय बीतने के साथ-साथ रानी लक्ष्मीबाई ने एक बच्चे को जन्म दिया, लेकिन दुर्भाग्यवश वह केवल 4 महीने जीवित रह पाया। यह वाकया राजा-रानी दोनों के जीवन में निराशा भर गया और राजा पुत्रवियोग में बीमार रहने लगे। लेकिन, जब उन्हें राज्य पर अंग्रेजों की कुदृष्टि का अंदाजा हुआ तो उन्होंने अपने चचेरे भाई का बच्चा गोद ले लिया, ताकि उनके बाद झाँसी के सिंहासन का उत्तराधिकारी सुनिश्चित हो सके। बच्चे को दामोदार राव नाम दिया गया। लेकिन महाराज की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने उसे उनका उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया और झाँसी को ब्रितानी राज्य में मिलाने का षड्यंत्र रचने लगे।

उस वक्त भारत में लॉर्ड डलहौजी वायसराय‍ था। जब रानी को पता लगा तो उन्होंने एक वकील की मदद से लंदन की अदालत में मुकदमा दायर किया, लेकिन ब्रितानियों ने रानी की याचिका खारिज कर दी। सन् 1954 के मार्च माह में अंग्रेजी हुकूमत ने रानी को महल छोड़ने का आदेश दिया, लेकिन रानी ने दृढनिश्चय किया कि वे अपने राज्य को नहीं छोड़ेंगी। यही वो समय था जब रानी लक्ष्मीबाई ने प्रण लिया कि वे अपने राज्य को फिरंगियों की हुकूमत से आजाद करवाकर दम लेंगी।

रानी लक्ष्मीबाई का साहस देखकर अंग्रेजों ने कई बार उनके प्रयासों को विफल करने का प्रयास किया। झाँसी के पड़ोसी राज्य ओरछा व दतिया भी झाँसी पर हमला करने लगे, लेकिन रानी ने उनके इरादों को नाकामयाब कर दिया। किंतु 1858 में ब्रिटिश सरकार ने झाँसी पर हमला कर उसको घेर लिया व उस पर कब्जा कर लिया, लेकिन रानी अपने प्रण पर अटल थीं। उन्होंने 14,000 बागियों की सेना तैयार की। योद्धा की भाँति पोशाक धारण की। पुत्र दामोदर को पीठ पर बाँधा और दोनों हाथों में तलवार लेकर युद्ध मैदान में आ उतरीं। घोड़े की लगाम को मुँह से पकड़े वे अपने सहयोगियों के साथ तात्या तोपे से मिलीं और ग्वालियर के लिए कूच किया।

देश के गद्दारों के कारण रानी को राह में फिर शत्रुओं का सामना करना पड़ा और फिर 23 साल की महानायिका ने अपने अदम्य साहस का परिचय दिया। 18 जून 1858 को युद्ध मैदान में अंग्रेजों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गईं। आज उनके जीवन गाथा को शब्दों में सॅंजोए सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली थी’ हर बच्चे की जुबान पर है।

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