सनातन हिन्दू धर्म को ईसाई या इस्लामी चश्मे से देखना अनुचित: नितिन श्रीधर की ऑपइंडिया से बात

विशेष धर्म, नितिन श्रीधर के मुताबिक, व्यक्ति की पहचान, कार्य और स्थिति पर निर्भर करता है। सामान्य धर्म और विशेष धर्म को मिलाकर बनता है स्वधर्म।

लेखक, indiafacts.org और अद्वैत एकेडमी के सम्पादक व धर्मशास्त्रों के जाने-माने टिप्पणीकार नितिन श्रीधर ने ऑपइंडिया से हाल ही में बात की। इस बातचीत में उन्होंने धर्म से जुड़े कई पक्षों पर बात की, जिसमें राजनीति, लोकतंत्र के बारे में दृष्टिकोण, हाल ही में आए सबरीमाला और राम मंदिर के फैसले, धर्म की व्यवहारिक परिभाषा आदि शामिल थे। पेश है इस साक्षात्कार के मुख्य हिस्सों का सारांश:

धारयति इति धर्मः

धर्म की परिभाषा पर नितिन का कहना है कि इसकी न ही कोई एक लकीर के फकीर वाली परिभाषा है, और न ही संस्कृत के अलावा किसी और भाषा में इसका सटीक अनुवाद हो सकता है या समानार्थी शब्द मिल सकता है। उनके अनुसार ‘धारयति इति धर्मः’ यानि ‘वह, जो पूरी दुनिया को ही धारण करता है’ यही धर्म की परिभाषा है। साथ ही कुछ हिन्दू धर्मशास्त्रों में यह कहा गया है कि धर्म वह है जो सबको ‘अभ्युदय’ (आध्यात्मिक वृद्धि) और ‘निःश्रेयस’ (भौतिक सुख) देता है।

इतने गूढ़ दर्शन से इसे आम जीवन के यथार्थ में लाएँ तो मोटा-मोटी समझ सकते हैं (हालाँकि यह कोई अंतिम, अकाट्य परिभाषा नहीं है) कि धर्म वह है जो अव्यवस्था कम करे, प्राकृतिक/नैसर्गिक व्यवस्था को स्थिरता दे और सबके लिए लाभकारी हो। और जो अव्यवस्था फैलाए, कृत्रिमता बढ़ाए और नुकसानदेह हो, उसे आम तौर पर अधर्म मान सकते हैं।

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नितिन ने धर्म को कर्म ले सिद्धांत पर आधारित भी बताया। साथ ही एक महत्वपूर्ण बात पर ज़ोर दिया कि ऐसा नहीं धर्म के सिद्धांत में सभी कुछ जबरिया सबके लिए करना ज़रूरी है (जो कि अब्राहमी पंथों, विशेषतः ईसाईयत और इस्लाम, से काफ़ी अलग है)। ऐसी चीज़ों में वह यज्ञ-हवन आदि का उदाहरण देते हैं- इन्हें करने के अलग-अलग फायदे अलग-अलग शास्त्रों में हैं, लेकिन किसी के गले में हाथ डालकर इन्हें करना ज़रूरी भी नहीं कहा गया है। जिसे इन्हें करने से वर्णित लाभ चाहिए, वह कर सकता है, जिसे नहीं चाहिए, वह न करे।

हिन्दू धर्म संदर्भ के हिसाब से कितना उदार और लचीला है, इसके उदाहरण में नितिन बताते हैं कि एक तरफ़ “सत्यं वद्, प्रियं वद्” हमारे यहाँ सिखाया जाता है, वहीं दूसरी ओर इस एक छड़ी से सबको नहीं हाँका जा सकता। इसके अपवाद का उदाहरण वे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों पर काम कर रहे लोगों का देते हैं, जिनके लिए झूठ के बीच जीना ही उनका ‘विशेष धर्म’ होगा, और वे अगर गला फाड़ कर हर चीज़ का सच हर जगह गाने लगेंगे तो यह अधर्म होगा। (किसी को यह चीज़ नए-नए जनेऊधारी ब्राह्मण बने राहुल गाँधी और कोट के ऊपर जनेऊ पहन रही कॉन्ग्रेस को भी बतानी चाहिए थी।)

व्यक्तिवादी हिंदुत्व/हिन्दू धर्म भी है- लेकिन…

नितिन का कहना है कि आज के समय में हिंदुत्व/हिन्दू धर्म और धार्मिक समाज के बारे में कही जाने वाली यह बात कि हिन्दू व्यक्तिवादी नहीं हैं, परिवार-समाज आदि का महत्वपूर्ण स्थान होता है धर्म के निर्धारण में- यह सब आधा सच हैं। हिन्दू धर्म में व्यक्ति का, इंडिविजुअल का बहुत महत्व है- अंतर यह है कि आधुनिक व्यक्तिवाद जहाँ हर समय केवल हक माँगने व खुद को बेचारा और पीड़ित दिखाने पर आधारित है, वहीं धार्मिक रूपरेखा में व्यक्ति, इंडिविजुअल अपने कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों के निर्वहन को प्राथमिक मानता है।

सामान्य, सनातन, स्व-धर्म

‘सनातन धर्म’ के बारे में नितिन का कहना है कि यह धर्म का पूरे ब्रह्माण्ड को ही ‘धारण’ करने वाला, व्यवस्थित करने वाला पहलू है। व्यवहारिक रूप से देखा जाए तो आम इंसान के लिए, आम हिन्दू के लिए जिस ‘धर्म’ की बात होती है, वह भी सनातन धर्म का एक पक्ष है, उससे अलग नहीं है- लेकिन पूरी तरह से, केवल उसी को ही सनातन धर्म भी नहीं कह सकते।

व्यवाहरिक धर्म के दो हिस्से नितिन बताते हैं- सामान्य धर्म और विशेष धर्म। वे बताते हैं कि सामान्य धर्म (जोकि नितिन की इसी विषय पर लिखी और हाल ही में प्रकाशित किताब का नाम भी है) में वे चीज़ें आतीं हैं जिनकी अपेक्षा हर इंसान से की जा सकती है। नितिन की किताब के कवर पर धर्म को एक बैल के रूप में दिखाया गया है जिसके चार पैर सामान्य धर्म के चार सबसे महत्वपूर्ण अंग हैं- सत्य, दया, तपस् (सामान्य भाषा में हम इसे अपने कार्य में परिश्रम समझ सकते हैं) और शौच (योग्यता, न कि साफ़-सफ़ाई; स्वच्छता शौच-अशौच का एक अंग है, पूरी परिभाषा नहीं)। सामान्य धर्म के बारे में नितिन एक दिलचस्प बात यह भी बताते हैं कि यदि वे इच्छुक हों तो इसका पालन मुस्लिम और ईसाई भी कर सकते हैं बिना अपनी आस्था के खिलाफ गए।

विशेष धर्म, नितिन श्रीधर के मुताबिक, व्यक्ति की पहचान, कार्य और स्थिति (देश, समय आदि) पर निर्भर करता है। विशेष धर्म के एक उदाहरण का उल्लेख ऊपर हमने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े लोगों के संदर्भ में किया है। एक दूसरे उदाहरण में मान लीजिए एक कसाई है तो वैसे तो उसका धर्म अपने सामने रखे पशु की हत्या करना ही होगा। लेकिन अगर वह जानवर बीमार है, या आस-पास स्वाइन फ्लू फैला है और पशु की डॉक्टरी जाँच नहीं हुई है, तो उसके लिए धार्मिक कार्य पशु की हत्या न करना होगा।

विशेष धर्म के निर्धारण में व्यक्ति के वर्ण (जिसका संबंध स्वभाव से अधिक होता है, न कि केवल जाति या परिवार से निर्धारित) और आश्रम (जीवन की किस स्थिति या किस पड़ाव पर आप हैं- विद्यार्थी, युवा गृहस्थ, वृद्ध गृहस्थ या फिर जीवन के अंतिम वर्षों में) की अहम भूमिका होती है।

हर व्यक्ति से अपेक्षित सामान्य धर्म और हर व्यक्ति के लिए विशिष्ट और समय के साथ परिवर्तनशील विशेष धर्म को मिलाकर बनता है स्वधर्म, जिसके बारे में श्री कृष्ण गीता में अर्जुन से कहते हैं, “स्वधर्मे निधनम् श्रेयः परधर्मो भयावहः”।

धर्म बनाम पंथ, “धर्म एक जीवनशैली है”

नितिन के अनुसार धर्म का अनुवाद पंथ या रिलीजियन के रूप में करना और फिर इससे निकली ‘धर्मनिर्पेक्षता’ (जिसका सीधा मतलब अ-धर्म होगा) को नीति बना लेना एक ऐतिहासिक भूल थी, जिसके मूल में हिन्दू धर्म को ‘(महज़) एक जीवनशैली’ तक सीमित कर देना और अब्राहमी पंथों के रीति-रिवाजों को ही आस्था, रिलीजियन या पंथ का एकमात्र पैमाना बना देना है। धर्म एक सीमित संदर्भ में भारतोय उद्गम वाली/हिन्दू उपासना पद्धतियों के लिए बेशक प्रयुक्त हो सकता है। वहीं ‘जीवनशैली’ के तर्क को वह इस आधार पर ख़ारिज करते हैं कि हिन्दुओं में ही नहीं, मुस्लिमों और ईसाईयों में भी खुद की एक ‘जीवनशैली’ होती है- इसलिए ‘जीवनशैली’ का तमगा खुद को देकर हिन्दुओं को आत्ममुग्ध नहीं हो जाना चाहिए।

नितिन आगे यह भी जोड़ते हैं कि जब एक ओर अब्राहमी पंथ इस्लाम और ईसाईयत धड़ल्ले से मतांतरण कर रहे हैं तो ऐसी परिस्थति में ‘हम तो कोई आस्था या पंथ नहीं, रिलीजियन नहीं, केवल एक जीवन शैली हैं’ का चोगा ओढ़ कर बैठ जाना एक सभ्यता के तौर पर हमें निराश्रय और कमज़ोर छोड़ देता है। राजनीतिक रूप से, अल्पकालिक और व्यवहारिक तौर पर, हिन्दूइज़्म/हिंदुत्व/हिन्दू धर्म को एक रिलीजियन के तौर पर मान्यता दिए जाने की बेहद ज़रूरत है, भले ही दीर्घकालिक लक्ष्य इसे महज़ एक रिलीजियन से बहुत अधिक वृहद तौर पर स्थापित करने का हो।

धर्म किसी ‘विंग’ के पास गिरवी नहीं है

इस सवाल के जवाब में कि क्या धर्म केवल ‘राइट विंग’ के काम की चीज़ है, या इसमें ‘लेफ्ट विंग’ के पक्ष भी होते हैं, नितिन का कहना था कि धर्म में कोई ‘विंग’ होता ही नहीं है। धर्म अंततः व्यक्तिवादी सिद्धांत है, हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग रूप से व्याख्या होती है, न कि समूह या गुट के लिए। लेकिन समय-समय पर, परिस्थितियों के अनुरूप कभी लेफ़्ट तो कभी राइट विंग के मुद्दे एक धार्मिक शासक का धर्म बन जाते हैं- यानि अगर कोई भूखा है तो उसकी भूख मिटाना (जिसे गरीबों की हिमायत के रूप में लेफ्टविंग नीति के पालन के तौर पर देखा जा सकता है) शासक का धर्म हो सकता है (और अगर किसी समय देश पर हमला हो रहा हो तो उसके ख़िलाफ़ अपनी ताकत का भरपूर इस्तेमाल शासक का धर्म हो सकता है, जिसे ‘राइट विंग’ नीति के रूप में देखा जाएगा)।

नितिन यह भी साफ करते हैं कि हालाँकि धर्म लेफ्ट विंग (या राइट विंग भी) के उठाए मुद्दों से सहमत हो सकता है, उसकी चिंताओं से इत्तेफ़ाक़ रख सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनके सुझाए समाजवादी या कम्युनिस्ट उपायों को भी धर्म की स्वीकृति मिल ही जाए। (मसलन धर्म यह तो स्वीकार कर सकता है कि गरीबों को आर्थिक सहायता दिए जाने की ज़रूरत है, लेकिन इसके लिए वह कम्युनिस्टों के अमीरों से जबरन पैसा छीनने या समाजवादियों के उच्च टैक्स दर के उपाय से भी सहमत हो जाए, यह ज़रूरी नहीं)।

बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक के सवाल पर उन्होंने कहा कि धार्मिक दृष्टि से कोई एक व्यक्ति हर परिस्थिति में बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक होगा ही नहीं, अतः इस सवाल को ही धार्मिक तौर पर परिभषित व्यक्ति और परिस्थिति के संदर्भ में किया जाएगा। साथ ही, जब धर्म के लिए बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की ही कोई जड़ परिभाषा नहीं है, कोई एक फॉर्मूला नहीं है, तो इसमें किसी भी एक वर्ग के प्रति दुर्भावना या पूर्वाग्रह का सवाल ही नहीं है।

इस धार्मिक सिद्धांत की वैधता और स्वीकार्यता का उदाहरण वे भारत में पारसी, यहूदी आदि दुनिया के हर हिस्से में प्रताड़ित समुदायों की आवक का देते हैं। इन सबने शरण भारत में इसी लिए ली क्योंकि इन्हें पता था कि यहाँ के शासकों का धर्म और राजधर्म उन समुदायों के लोगों की प्रताड़ना और हिंसा से रक्षा करेगा।

मंदिर सामुदायिक केंद्र नहीं, देवता का घर है

नितिन का मानना है कि अयोध्या और सबरीमाला, दोनों ही जगह विवाद की जड़ में हिन्दू धर्म को ईसाई-मुस्लिम पंथ के बराबर में खड़ा कर देना, और मंदिर को मस्जिद-चर्च जैसा ही मान लेना है। जबकि ऐसा है नहीं। मंदिर बनाने के पीछे यह आस्था होती है कि मंदिर में देवता (जोकि ‘टेक्निकली’ ईश्वर नहीं होते) को सशरीर रखा जा सकता है- मूर्ति, प्रतिमा या विग्रह को उन्हीं का, उनके ‘शरीर’ का एक अंश माना जाता है, और इसमें देवता की स्थापना की बाकायदा एक विधि होती है, जिसे ‘प्राण प्रतिष्ठा’ कहते हैं। मंदिर का दूसरा नाम ही ‘देवालय’ है- देवता का घर।

मंदिर के उलट चर्च या मस्जिद को स्पष्ट रूप से उस पंथ के लोगों के आस्था से जुड़े कार्यों के लिए इकठ्ठा होने की जगह माना गया है। इस अंतर के मूल में इन दोनों मज़हबों में ईश्वर की जो परिकल्पना है, उसका हमारे यहाँ के देवताओं से अलग होना है। एक ईश्वर की सत्ता को सर्वोपरि हमारे यहाँ भी माना गया है, लेकिन हमारे यहाँ देवता भी हैं, जो ईश्वर का विशिष्ट अंश या रूप हैं- और मंदिर उन्हीं देवताओं की उपासना उस देवता विशेष के या उनसे जुड़े विशेष संदर्भों में करने की परम्परा है।

अय्यप्पा के मामले में वह विशेष संदर्भ उनका सबरीमाला स्थित प्रतिमा विशेष में नैष्ठिक ब्रह्मचारी के रूप में स्थापित होना है, वहीं श्री राम जन्मभूमि के मामले में देवता का जन्म उसी स्थान पर हुआ माना गया था- और बाबर के उस स्थान विशेष पर मस्जिद बनाने का भी कारण उस स्थान के, उससे जुड़े देवता की महत्ता को नकारने का प्रयास ही था

सबरीमाला के बारे में विवाद के चर्चा में आने के समय से नितिन श्रीधर लम्बे समय से कहते आ रहे हैं कि यह पीरियड्स का नहीं, रजस् नामक आध्यात्मिक गुण का मुद्दा है और इसे उसी परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की ज़रूरत है। इस बातचीत में भी उन्होंने इसे दोहराया। उन्होंने बताया कि पीरियड्स रजस्वला उम्र की स्त्रियों में रजस् गुण की उपस्थिति का नतीजा हैं, अपने आप में उन्हें मंदिर में प्रवेश से प्रतिबंधित किए जाने का कारण नहीं। इसके अतिरिक्त उन्होंने इस संदर्भ में एक और महत्वपूर्ण बात बताई। कोई श्रद्धालु स्त्री जब अय्यप्पा स्वामी के पिछले दर्शन बहुत छोटी उम्र में (10 साल से कम) की होती है, और अपना समूचा यौवन उनसे ‘विरह’ में बिताने के बाद 50 से ऊपर की उम्र में यानि 40 साल बाद करती है तो उसे अलग ही आनंद की अनुभूति होती है। ऐसा न केवल माना जाता है बल्कि कई सारे मामलों में देखा भी गया है। सबरीमाला का मुद्दा असल में था अयप्पा स्वामी के नैष्ठिक ब्रह्मचारी होने और इस कारण रजस् गुण से ही दूर रहने का, और इसे मीडिया ने पीरियड्स का मुद्दा बनाकर हिन्दुओं और हिन्दू धर्म पर जम का कीचड़ उछाला। इसी दुष्प्रचार को तोड़ने के लिए पीरियड्स पर हिन्दू मत को विस्तार से समझते हुए नितिन ने “The Sabarimala Confusion – Menstruation Across Cultures: A Historical Perspective” नामक एक किताब भी लिखी है।

धर्म में लोकतंत्र को मान्यता है, लेकिन ‘होली काऊ’ नहीं

समकालीन राजनीति और लोकतंत्र के ऊपर धार्मिक दृष्टिकोण के बारे में नितिन का कहना है कि धर्मशास्त्रों हालाँकि लोकतंत्र की खूबियों का बखान सम्मान अवश्य किया है, लेकिन उसकी कमज़ोरियाँ पुरातन हिन्दू समाज को अधिक गंभीर लगीं। इसको समझाने के लिए वे दुनिया पहले गणतंत्रों में एक माने जाने वाले महाजनपदों का उदाहरण देते हैं। उनके मुताबिक इनमें एक ओर अगर यह खूबी थी कि लोकतंत्र और स्थानीय जवाबदेही के चलते उनमें स्थानीय समस्याओं का प्रभावी निवारण होता था, तो यह बड़ी खामी भी रही कि महाजनपद कभी व्यक्तिगत तौर पर या महाजनपद-समूह बनकर भी एक सशक्त राजनीतिक शक्ति बनकर नहीं उभर पाए इसी लोकतंत्र के चलते- जिसमें मतभेद सुलझाने और आम सहमति बनाने में ही सारी ऊर्जा खप जाती थी। यही नहीं, उनके अनुसार धर्मशास्त्रों में इस बात की भी आलोचना की गई है कि एक महाजनपद के खुद के अंदर भी इसी लोकतंत्र और ज़बरदस्ती की असहमति के चलते केंद्रीय सत्ता कमज़ोर रही।

उन्होंने कहा कि वे वर्तमान लोकतंत्र का सम्मान अवश्य करते हैं, लेकिन निजी तौर पर उनके लिए यह कोई दिव्य, अंतिम सत्य, आलोचना के परे व्यवस्था नहीं है- कल को बहुत सम्भव है धार्मिक रूपरेखा में लोकतंत्र से अधिक प्रभावी, जनकल्याणकारी, सबको ‘धारण’ कर सकने वाली व्यवस्था विकसित हो जाए।

वे उदाहरण मैसूर राज्य का देते हैं, जहाँ का राजपरिवार अंग्रेजों के समय में भी और बाद में भारतीय राष्ट्र-राज्य में विलय के चलते राजनीतिक ताकत खो देने के बाद भी जनकल्याण और राजधर्म के यथासम्भव पालन के लिए सक्रिय रहा। इसी कारण आज भी मैसूर शहर में राजपरिवार का सम्मान लोग अपने आप, बिना किसी क़ानूनी ज़बरदस्ती के करते हैं।

धार्मिक मूल्यों पर चलने वाली राजनीति को वह ‘क्षात्रत्व’ के रूप में परिभाषित करते हैं, जिसके अंतर्गत न केवल ‘हर स्थिति में अहिंसा’ को नकारा जाता है, बल्कि एक राष्ट्र राज्य अपना प्रभाव-क्षेत्र लगातार बढ़ाते रहने के लिए इच्छुक भी होता है। इस प्रभाव क्षेत्र में वे आर्थिक, सांस्कृतिक, कूटनीतिक जैसे ‘सॉफ़्ट पावर’ क्षेत्र ही नहीं बल्कि सैन्य, रणनीतिक जैसे ‘हार्ड पावर’ क्षेत्रों को भी रखते हैं।

व्यक्तिगत रूप से हिन्दू क्या कर सकते हैं?

इसके जवाब में नितिन ’3-P मॉडल’ समझाते हैं- यानि Preserve(संरक्षण), Protect (सुरक्षा), Promote(प्रचार/प्रोत्साहन)। इसके अंतर्गत उनका मानना है कि हिन्दू सभ्यता की सुरक्षा तभी की जा सकती है जब हिन्दू अपनी कलाओं, आध्यात्म, धर्म, परम्पराओं का एक ही साथ संरक्षण (अभ्यास और अनुपालन द्वारा), सुरक्षा (उनसे जो इन्हें खत्म कर देना चाहते हैं, और उनसे भी जो इनकी जड़ें हिन्दू सभ्यता से काट देना चाहते हैं- जैसे कभी योग तो कभी भरतनाट्यम तो कभी आयुर्वेद के साथ हम देखते रहते हैं, और जो BHU में अभी चल रहा है।), और प्रचार/प्रोत्साहन (जो इनके बारे में नहीं जानते, उन तक इन सभी को ले जाना, बशर्ते वे इसकी हिन्दू जड़ों को इसमें से काटे नहीं।) इस विषय पर उनकी एक पुस्तक, सामान्य धर्म, भी उपलब्ध है।

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