व्यक्तिगत रूप से हम हिन्दू सभ्यता को बचाए रखने के लिए आखिर क्या कर सकते हैं?

सभ्यतागत संघर्ष को नकारना अब किसी भी हालत में सम्भव नहीं- इससे केवल सभ्यता को गर्त में धकेला ही जा सकता है। अब समय है कि हम उस खतरे को पहचानें जिसे हम ज़बरदस्ती नज़रअंदाज़ करते आ रहे हैं, और उस खतरे के निवारण के लिए कदम उठाएँ।

सदियों से ब्रिटिश शासकों एवं इस्लामिक आक्रांताओं द्वारा आक्रमण और दमन का दौर झेलने के बाद कुछ दशक पहले ही हिंदू सभ्यता ने राजनैतिक स्वतंत्रता हासिल करके दोबारा साँस भरनी शुरू की थी, लेकिन अब लगता है शायद फिर से यह अंधकार की ओर जाने की कगार पर है।

इस पीढ़ी के अधिकांश लोगों के लिए उस संघर्ष, कठिनाई, और उत्पीड़न की कल्पना भी कर पाना असंभव है जो हमारे पूर्वजों ने शत्रुतापूर्ण और असहिष्णु राजनीतिक शासन के अधीन रहकर झेला है। लेकिन यह एक विडम्बना है कि हमारी वर्तमान ‘सेक्युलर’ शिक्षा न केवल हमारे उस कल पर लीपापोती कर बनी है, बल्कि वास्तविक अतीत तक जाने में हमारे सामने सबसे बड़ा रोड़ा बनकर खड़ी है।

अगर ऐसा नहीं होता तो आज हम सामाजिक, राजनैतिक और सभ्यागत मोर्चों पर इस्लामिक प्रभुत्व के फिर से उभरने के संकेतों को स्पष्ट देख पाते। खुद सोचिए, हमारे मंदिर उस समय भी तोड़े जाते थे, और आज भी तोड़े जाते हैं; हमारी औरतों के साथ तब भी बलात्कार होता था और आज भी होता है; हिन्दू तब भी संकट में थे और अब भी हैं। उस समय भी हमारे पूर्वज जजिया देते थे, वह भी दूसरे-तीसरे दर्जे के नागरिक बन कर जीने के लिए, और अब भी देश की बहुसंख्यक आबादी जजिया-2.0 के अंतर्गत अल्पसंख्यकों के लिए विशिष्ट स्कीमों को वित्तपोषित करती है। आज हिंदुओं के ख़िलाफ़ छोटे स्तर पर होते जिहाद की घटनाओं में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही है, और हाल ही में हिंदुस्तान के ‘दिल’ नई दिल्ली में दुर्गा मंदिर पर हुए हमले इस बात का पुख्ता सबूत है कि हमलावर दिन-ब-दिन कितने बेख़ौफ़ होते जा रहे हैं।

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इन सीधे-सीधे हमलों में अगर ईसाईयों द्वारा अपने पंथ का आक्रामक प्रचार, आदिवासी इलाकों का तेजी से ईसाइकरण, भारत को तोड़ने और हिंदूवादी ताकतों को उखाड़ने के लिए हिंदुओं की सभ्यता और संस्कृति पर हुए हमलों को जोड़ दिया जाए तो पता चलेगा कि इस सभ्यता के दोबारा अंधकार में जाने में अब ज्यादा समय नहीं बचा है- अगर हिन्दू अपनी सभ्यता पर मँडराते इस खतरे को पहचान कर इसके खिलाफ कदम नहीं उठाते हैं।

मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि हम हिंदू व्यक्तिगत रूप से इस स्थिति के बारे में क्या कर सकते हैं? हम सबके पास अपनी नौकरी की चिंता है, अपना परिवार है। इसके अलावा हमारे पास एकता नहीं है, न ही धन है, और न ही कुछ करने की राजनीतिक शक्ति।

हालाँकि, यह सच है कि व्यक्तिगत रूप में हमारे साधन सीमित हैं, और यह भी सच है कि इन ज्वलंत मुद्दों को दूर करना सरकार की जिम्मेदारी है, जो दुर्भाग्य से वर्तमान सरकार हिंदू जनादेश पर सत्ता में आने के बावजूद न केवल नहीं कर रही है, बल्कि उसकी जगह ‘सबका विश्वास’ के नाम पर तुष्टिकरण की नीतियों की घोषणा कर रही है, मगर उतना ही सत्य ‘यथा राजा तथा प्रजा’ का लोकतांत्रिक उलट ‘यथा प्रजा, तथा राजा’ है। इसलिए इस महान हिंदू सभ्यता के व्यक्तिगत उत्तराधिकारियों के रूप में हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम अपने-अपने स्तर पर इसका उत्कर्ष करें।

‘कौरवों’ की पहचान

किसी भी काम को करने में पहला कदम उसमें निहित चुनौतियों को पहचानना है। इन चुनौतियों को हम भिन्न-भिन्न प्रकार के ‘कौरवों’ के रूप में सोच सकते हैं। हिंदू संरचना में हम जीवन और समाज को समझने के लिए धर्म-अधर्म की श्रेणियों का प्रयोग करते हैं। महाभारत में हम ऐसे चित्रणों को पाएँगे जिनमें कई प्रकार की अधर्मी ताकतें स्पष्ट होतीं हैं।

सबसे पहले दुर्योधन, जो अधर्म का अवतरण था- धर्मराज युद्धिष्ठिर का प्रतिद्वंद्वी। दूसरा कर्ण, जो दुर्योधन (अधर्म) की कुचालों में सक्रिय रूप से सहायक था; तीसरे भीष्म, जो न चाहते हुए भी दुर्योधन की तरफ से लड़कर अधर्म का साथ दे रहे थे; चौथे धृतराष्ट्र, जो बिना कुछ किए आँख बंद करके निष्क्रिय रूप से दुर्योधन के साथ खड़े होकर अधर्म के साथी थे।

हम इन सभी प्रकार के अधर्मियों को आज के समाज में देख सकते हैं। आज इस्लाम और ईसाईकरण जैसी धर्म-विरोधी ताकतें भारत और हिंदुत्व/हिन्दू-धर्म को तोड़ना चाहतीं हैं। मीडिया, एनजीओ, नौकरशाहों का गठजोड़ इन अधार्मिक ताकतों के लिए सक्रिय सहयोगियों का काम कर रहे हैं। फिर कुछ अनचाहे सहयोगी हैं, जिन्हें बल, धोखाधड़ी और अन्य साधनों का प्रयोग करके सहयोग करने के लिए ब्लैकमेल किया जाता है। और अंत में हमारे पास बड़ी तादाद में ऐसे लोग हैं जो खुद को धोखे में रखकर, ‘धिम्मी, बने रहकर ‘सर्वधर्म समभाव’ का प्रोपेगैंडा आगे बढ़ाते हैं, और अंततः धृतराष्ट्र की भाँति अधर्म का प्रतिरोध न कर उसके सहयोगी ही बन जाते हैं ।

संक्षेप में कहूँ तो ‘कुछ नहीं करना’ बहुत लंबे समय तक विकल्प नहीं रहने वाला है। कुछ नहीं करना आपको हिंदू सभ्यता के विरोधियों का अप्रत्यक्ष रूप से सहयोगी बनाता है।

हिंदुत्व/हिन्दू धर्म के लिए आवश्यक तीन P

ज़रूरी गतिविधियों के विस्तार को समझने के लिए हमें ’3-P मॉडल’ को समझने की आवश्यकता है। इसे मैंने अपने मेंटॉर श्री हरि किरण वदलामणि से सीखा है। वो इसका प्रयोग इंडिक अकादमी के कार्यकलापों की कल्पना करने के लिए और हिंदू मसलों को समझने के लिए करते हैं। मैं इसका विस्तार हिंदू सभ्यता के ज्वलंत मुद्दों पर कर रहा हूँ।

3-P: Preserve(संरक्षण), Protect (सुरक्षा), Promote(प्रचार/प्रोत्साहन)

संरक्षण– हिंदू सभ्यता के संरक्षण का तात्पर्य हमारी ज्ञान-प्रणालियों, परंपराओं, संस्थाओं और प्रथाओं को संरक्षित ही नहीं, समृद्ध करना भी है। इसलिए इन ज्ञान-परंपराओं (वेदाध्ययन, संगीत, नृत्य, नाटक, धार्मिक रिवाज, मंदिरों की प्रथाएँ, त्यौहार, कथाओं की प्रथाएँ, भाषा) के प्रति हमारी गहन प्रतिबद्धता, (समय, श्रम और धन का) निवेश और तन्मयता होनी चाहिए। हम हिंदू सभ्यता को जीवित रखने के लिए इन परंपराओं में से किसी भी विधा की साधना प्रारम्भ कर सकते हैं, जिससे हम उस परंपरा और विधा के सच्चे उत्तराधिकारी बन पाएँ और उसे संरक्षित कर अन्य लोगों और अपनी आगामी पीढ़ी तक पहुँचा पाएँ। सभ्यता का संरक्षण (Preservation) तीनों ‘P’ में शायद सबसे बुनियादी है, क्योंकि इसके बिना हम अपनी पहचान, अपना आत्म-बोध ही खो देंगे। हमारा मूल-स्वरूप ही सदा के लिए समाप्त हो जाएगा।

सुरक्षा– हिंदू सभ्यता को बचाने का अर्थ हमारी संस्कृति और प्रथाओं को बाहरी के साथ भीतरी हमलों से भी सुरक्षित करना है। इसमें शामिल है हमारे आत्मसम्मान की सुरक्षा के साथ ही हमारे विश्वास और आस्था, ज्ञान और प्रथाओं को विकृत किए जाने, तोड़े-मरोड़े जाने से रोकना। यह हमले कई स्तरों पर होते हैं: शारीरिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, बौद्धिक, कानूनी। हमें इन हमलों का सामना करने के लिए आवश्यक प्रतिक्रियाओं और रणनीतियों को विकसित करने के लिए अपने समय और संसाधनों का निवेश करने की आवश्यकता है।

प्रचार/प्रोत्साहन– हिंदू सभ्यता को बढ़ावा देने का तात्पर्य हमारी शिक्षा, सभ्यता और मूल तत्वों को बाहरी दुनिया में पहचान दिलाना है। प्रचार और प्रोत्साहन को ऐसे करना महत्वपूर्ण है जिसमें प्रामाणिक ज्ञान और प्रथाओं को मानवता की भलाई के लिए उपलब्ध कराया तो जाए ही, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित हो कि उन्हें (अथवा उनके हिन्दू धर्म से संबंध को) क्षीण कर अन्य पंथों/मज़हबों/सभ्यताओं द्वारा उनपर दावा किए जाने से रोका जा सके।

व्यक्तिगत तौर पर हिन्दू क्या कर सकते हैं?

हालाँकि, उपरोक्त तीनों ही बिंदु (संरक्षण, सुरक्षा और प्रचार/प्रोत्साहन) हिंदू सभ्यता के लिए महत्वपूर्ण हैं, पर हर व्यक्ति यह तीनों कार्य नहीं कर सकता। अतः हर व्यक्ति को अपने क्षमता, स्वभाव, रुझान, योग्यता और संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर इनमें से उन एक या 2 बिंदु का चुनाव करना चाहिए, जिनको वह सबसे बेहतर तरीके से कर सकें। जरूरी यह नहीं कि हर व्यक्ति तीनों ही चीज़ें करे, लेकिन छोटे-से-छोटे कार्य को करने के दौरान भी “360-डिग्री दूरदर्शिता” होनी चाहिए। आप यद्यपि काम, उदाहरण के तौर पर, सुरक्षा के लिए कर रहे हों, तो भी संरक्षण और प्रचार/प्रोत्साहन के तत्व आपके जेहन में हों। ऐसी दृष्टि का अभाव हमारे लिए सही नहीं होगा।

इसका उदाहरण देखिए, म्यूनिख (जर्मनी) के इंडिएन इंस्टीटुट (इंडियन इंस्टिट्यूट) ने 4 जुलाई, 2019 को भरतनाट्यम पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया था, जिसकी विषयवस्तु थी “Dancing body Dancing soul- Der tanzende Jesuit by Fr. Saju George” (नाचता शरीर, नाचता मन- नृत्यरत जेसुइट, फादर साजु जॉर्ज द्वारा)। ऊपरी तौर पर भरतनाट्यम का कार्यक्रम लग रहा है। यह असल में हिन्दुओं के पवित्र,धार्मिक नृत्य भरतनाट्यम के ईसाईकरण का ‘समारोह’ था। और इस समारोह की प्रचार सामग्री में यह स्पष्ट तौर पर लिखा था कि यह म्यूनिख में भारत के महावाणिज्यदूतावास के प्रायोजन से हो रहा था। यानि भारतीय संस्कृति और कला के संरक्षण और प्रचार के नाम पर भारत सरकार ने अधार्मिक ताकतों के ईसाईयों द्वारा हिन्दू कला का अपने पंथ में सम्मिश्रण (वह भी बिना उसके हिन्दू उद्गम को स्वीकार्यता या आभार दिए) करने में सक्रिय सहयोग दिया, जो अंततोगत्वा उस कला के हिन्दू रूप और उसके स्वरूप का विघटन ही होता। सौभाग्यवश वह कार्यक्रम अंतिम समय में रद्द कर दिया गया, सोशल मीडिया पर उसके विरोध में प्रदर्शन के बाद।

हर हिंदू के लिए जरूरी है कि वह अपने सीमित दायरे में हिंदू सभ्यता के लिए काम करते हुए भी सभ्यता के संघर्ष की बात भूले न। जैसे हिंदू सभ्यता के संरक्षण में शामिल व्यक्ति को भी संरक्षण और संवर्धन में शामिल चुनौतियों के बारे में जागरुक और सतर्क तो होना ही चाहिए। इसी तरह, हिंदू प्रथाओं के संरक्षण में शामिल एक व्यक्ति को उन प्रथाओं में मूलतः आधारित होना चाहिए। अन्यथा होगा यह कि हम उनकी रक्षा के नाम पर अपनी सभ्यता, अपनी संस्कृति, अपनी प्रथाओं को खुद ही समाप्त कर देंगे! इसकी एक बानगी हिन्दुओं में ‘अनिवार्य सुधार’ की प्रवृत्ति है, जो हिन्दू प्रथाओं और परम्पराओं को एक-एक ईंट कर के विखण्डित कर रही है। एक हिन्दू युवती के गैर-हिन्दू पद्धति से विवाह को हिन्दू विवाह-परम्परा और व्यवस्था को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल करने का उदाहरण कुछ दिन पहले हमने देखा ही है। हिन्दू धर्म और प्रथाओं, परम्पराओं के प्रचार-प्रसार में शामिल लोगों को भी हमेशा सचेत रहना चाहिए कि हमारे ज्ञान और प्रणालियों को इतना धूमिल या व्यवसायीकृत न किया जाए कि उनके मूल रूप, उनकी आत्मा से छेड़-छाड़ होने लगे या वह क्षीण हो जाए।

इस सावधानी और जागरुकता के साथ हिंदू सभ्यता के संरक्षण, सुरक्षा और प्रचार-प्रसार के लिए हिंदू काफी कुछ कर सकते हैं। कुछ व्यावहारिक सुझाव निम्नलिखित हैं:

संरक्षण के मोर्चे पर:

  • यदि कोई व्यक्ति बौद्धिक प्रकृति या रुझान का है, तो वह शास्त्रों का अध्ययन कर सकता है।
  • इस तरह के अध्ययन को विभिन्न विशेषज्ञताओं के आधार पर विभाजित किया जा सकता है- मसलन वेदों का अध्ययन, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र, इतिहास-पुराण, काव्य, व्याकरण, आयुर्वेद, लोक ज्ञान, आदि।
  • इन ज्ञान प्रणालियों के गहन अध्ययन, इसमें नए शोध, नई अंतर्दृष्टि/पहलुओं को जोड़ना और इन शिक्षाओं को हमारे समय के लिए प्रासंगिक और समकालीन बनाना बहुत महत्वपूर्ण है।
  • किसी भी कला-विधा, संगीत, नृत्य, रंगमंच, चित्रकला, मूर्तिकला, लोक, शास्त्रीय कला को लिया जा सकता है; उसे लेकर उसके सिद्धांत और व्यवहार दोनों में महारत हासिल करनी होगी।
  • योग, ध्यान (meditation), आयुर्वेद, ज्योतिष, तंत्र, इत्यादि सभी हमारे पारम्परिक ज्ञान की विभिन्न धाराएँ हैं। इनमें से किसी को भी लिया जा सकता है। इनका अध्ययन हिंदू पारंपरिक ज्ञान के हिस्से के रूप में किया जाना चाहिए न कि परंपराओं से अलग-थलग अकेले विषयों के रूप में।
  • भक्ति और भावुक प्रकृति के लोग स्तोत्र, भजन, कथा-पाठ, कथा-पाठन आदि सीख सकते हैं।
  • आप गणित और विज्ञान में भी भारत की मृतप्राय पारम्परिक ज्ञान परम्परा को पुनर्जीवित कर सकते हैं।
  • भाषा और साहित्य का संरक्षण भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जिसपर ध्यान देने की आवश्यकता है।
  • अभिवावकों को हिंदू संस्कृति के बारे में खुद भी शिक्षित और अवगत होना चाहिए ताकि वह उसके बारे में अपने बच्चों को भी पढ़ा सकें।
  • इसके अलावा यह भी आवश्यक है कि हिंदू अपनी सभ्यता से जुड़े ज्ञान परम्पराओं, प्रणालियों और प्रथाओं के संरक्षण और संवर्द्धन/प्रोत्साहन में रत वेद पाठशालाओं, थिएटर, कला, संगीत आदि के संगठनों को आर्थिक सहयोग करते रहें, जिससे संस्कृति को सुरक्षित रखा जा सके।

सुरक्षा के मोर्चे पर

  • हिंदुओं को खुद को मोहल्ला स्तरों पर संगठित करने की जरूरत है। ऐसे स्थानीय स्तर के आयोजनों के लिए व्यक्तियों को पहल करनी चाहिए।
  • इसकी शुरुआत के लिए एक-जैसे रुझान के लोग आपस में मिल कर स्थानीय स्तर पर गतिविधियों का एजेंडा तय कर लें। ऐसी जगहों पर आवश्यकता और इच्छानुसार दोस्तों, परिवारवालों और सहकर्मियों को भी लाया जा सकता है।
  • मोहल्ले में होने वाली ऐसी बैठकें हिन्दू-सभ्यता के और राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों पर केंद्रित हों। ऐसी बातचीत में सिर्फ़ सैद्धातिंक बातें शामिल न होकर SWOT (Strength, Weakness, Opportunity, Threat; क्षमताएँ, कमज़ोरियाँ, अवसर और खतरे) का विश्लेषण और कार्यान्वन-उन्मुख योजनाएँ शामिल हों।
  • इन योजनाओं से हिंदू सभ्यता के संरक्षण के लिए कई अन्य रणनीतियों को भी निर्मित किया जा सकता है।
  • ऐसे प्रोग्राम बनाए जा सकते हैं जिनके जरिए हिंदू सभ्यता को संरक्षित, सुरक्षित रखने के लिए लक्ष्य तय किए जाएँ, जिन्हें नगरों से लेकर मोहल्ला-स्तर तक ले जाया जा सके।
  • सक्रिय हिंदू सामुदायिक समूहों का गठन विशेष रूप से जनसांख्यिकीय (demographically) तौर पर महत्वपूर्ण क्षेत्रों में किया जाना चाहिए ताकि विपरीत परिस्थितियों में हिंदू हितों की रक्षा की जा सके और विरोधी शक्तियों का मुकाबला किया जा सके।
  • जहाँ भी संभव हो, शारीरिक प्रशिक्षण, शारीरिक-फिटनेस और लड़ने के कौशल को सिखाना शुरू किया जाना चाहिए।
  • युवाओं को सभ्यता-संबंधी मुद्दों, हिंदू इतिहास, हिंदू दर्शन की उचित शिक्षा और इनके प्रति संवेदनशीलता उत्पन्न करने की तत्काल आवश्यकता है।
  • सभ्यतागत मूल्यों की शिक्षा के अलावा हिन्दू अभिवावकों को अपने बच्चों- बेटियों और बेटों, दोनों को ही आत्म-रक्षा के लिए आवश्यक युद्धकला में भी निपुण बनाने के लिए प्रयास करना होगा। यह आत्म-रक्षा केवल शारीरिक ही नहीं, मानसिक और कथानक के स्तर पर भी सिखानी होगी।
  • मीडिया और ‘बौद्धिक’ वर्ग में हिन्दू धर्म का जो विकृत चेहरा पेश किया जा रहा है, उसे ठीक करने के लिए हिन्दुओं को अपनी सभ्यता के गहन पक्षों को भी समझना और उनका अध्ययन करना होगा।
  • एक समाज, एक समूह के तौर पर हम नैरेटिव बनाना और ज़मीनी स्तर पर सक्रियता में से किसी एक को नहीं चुन सकते- हमें दोनों की ही आवश्यकता है। लेक्चरों, वर्कशॉप्स (कार्यशालाएँ), किताबों पर परिचर्चा के कार्यक्रमों का भी आयोजन होना चाहिए।
  • हिंदुओं को यथासंभव सक्रियता से सामाजिक गतिविधियों का हिस्सा बनना चाहिए। हमें ध्यान रखना चाहिए कि हमारे समुदाय का कोई व्यक्ति भूखा न रहे। इससे हमारे आस-पास के समाज में एकजुटता आएगी।
  • हिंदू परिवारों को अपनी आय का छोटा सा हिस्सा धर्मांश के रूप में दान करके उन संगठनों, लोगों और पहलों को बढ़ावा देने के लिए देना चाहिए जो हिंदू सभ्यता को बचाने के लिए कार्यरत हैं। यह दान हमारी सभ्यता के मूल्यों को सँजोने में रत गौशालाओं, वेद-पाठशालाओं, आश्रमों को दिया जा सकता है। ऐसे कुछ संगठन भी हैं, जैसे Upword, People for Dharma, Indic Collective, India Pride Project, इत्यादि।
  • हिंदुत्व/हिन्दू-धर्म को बचाने के लिए ‘एक्टिविज्म’ एक बहुत बड़ी आवश्यकता है। जो लोग कानूनी क्षेत्र से जुड़े हुए हैं उन्हें हिंदू समाज और सभ्यता के पक्ष में कानूनी सक्रियता दिखानी चाहिए। जो बौद्धिक क्षेत्र (मीडिया और अकादमिक) से जुड़े हैं उन्हें बौद्धिक स्तर पर सक्रियता दिखानी चाहिए और उन हिंदू-विरोधी आवाजों के ख़िलाफ़ अपनी आवाज उठानी चाहिए जो आज मीडिया के नाम पर उभर रही हैं। राजनीतिक रूप से सक्रिय लोग राजनीतिक रूप से हिन्दू-विरोध से लड़ सकते हैं। हिन्दू हितों की हिमायत स्थानीय, राज्य और राष्ट्र- तीनों स्तरों पर होनी चाहिए।

प्रचार-प्रसार/प्रोत्साहन के मोर्चे पर

  • हम बहुत सारी ऐसी गतिविधियाँ कर सकते हैं जिनसे हमारी ज्ञान की प्रमाणिकता से, अविकृत रूप में प्रचार हो- विशिष्ट पाठ्यक्रम, कार्यशालाएँ आदि।

ये महज़ कुछ उदाहऱण हैं जिन्हें हर हिंदू खुद के जीवन में कार्यान्वित कर सकता है। हर व्यक्ति हर कार्य नहीं कर सकता है, इसलिए जरूरी है कि हम अपनी क्षमता के अनुसार इनका चुनाव करें। हो सकता है कुछ लोग बौद्धिक स्तर की गतिविधियों को अच्छे से कर पाते हों जबकि कुछ भक्ति संबंधी। कुछ हो सकता है लोगों को संगठित करने में अच्छा कार्य करते हों, तो कुछ दूसरों को आत्म-रक्षा सिखाने में निपुण हों। हमें ऐसे सभी प्रयासों को एक दिशा देनी है जो तीन ‘P’ पर आधारित हों। ऐसा करके न केवल हम हिंदू सभ्यता को एक नया जीवन देंगे बल्कि उसे दोबारा निखारेंगे भी।

हालाँकि, संरक्षण एक बहुत लंबी निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जिसे हम नकार नहीं सकते हैं, लेकिन फिलहाल हमारे सभ्यता को जिंदा रखने के लिए जो जरूरी है वो ये कि हम चुनौतियों का सामना करके अपनी सभ्यता को अधार्मिक, विरोधी ताकतों से सुरक्षित रख सकें। इसके लिए हमारे पास खुद को संगठित करने और खुद को शारीरिक, बौद्धिक, राजनीतिक और सामाजिक रूप से लड़ाई के लिए तैयार करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है।

सभ्यतागत संघर्ष को नकारना अब किसी भी हालत में सम्भव नहीं- इससे केवल सभ्यता को गर्त में धकेला ही जा सकता है। अब समय है कि हम उस खतरे को पहचानें जिसे हम ज़बरदस्ती नज़रअंदाज़ करते आ रहे हैं, और उस खतरे के निवारण के लिए कदम उठाएँ।

(लेखक नितिन श्रीधर के इंडियाफैक्ट्स पर प्रकाशित मूल लेख का अनुवाद जयंती मिश्रा और सम्पादन मृणाल प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव ने किया है।)

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