Wednesday, July 28, 2021
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संस्कृत सिर्फ भाषा नहीं… संस्कृति, विज्ञान, तार्किक क्षमता और अन्य भाषाओं की प्राण भी है

"संस्कृत भाषा की प्राचीनता जो भी हो, यह एक अद्भुत संरचना है। यह ग्रीक भाषा से अधिक परिपूर्ण, लैटिन भाषा से अधिक समृद्ध और इन दोनों की अपेक्षा अधिक शुद्ध और मनोहारी है।"

संस्कृत भाषा के महत्व पर शंका करना अपने अस्तित्व पर शंका करने के बराबर है, क्योंकि जब तक मानव है, संस्कृत का महत्व तब तक असीम है। यह केवल वर्तमान भारत भूभाग की ही आधारशिला नहीं, अपितु मानवता की आधारशिला है।

वर्तमान समय में जब भी हम संस्कृत भाषा के महत्व की समीक्षा करते हैं, तब हम अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं के समानांतर इस भाषा को रखकर विचार करते हैं कि जैसे उन भाषाओं के ज्ञाता को धन की उपलब्धि होती है अथवा आजीविका मिलती है तो क्या ऐसा संस्कृत जानने वाले को भी उपलब्ध होगा?

संस्कृत भाषा के इस पक्ष में आई न्यूनता का मुख्य आधार परतंत्र इतिहास और स्वतंत्रता के बाद के शासन की त्रुटि है। इस पक्ष के अतिरिक्त आइए संस्कृत भाषा का महत्व विचारते हैं ।

ज्ञान की आदिमा भाषा

विश्व का सबसे प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ ऋग्वेद है। यह तथ्य सर्वमान्य है। मैक्समूलर ने यहाँ तक कहा है, “जब तक मानव अपने इतिहास में रुचि लेता रहेगा और जब तक हम अपने पुस्तकालयों तथा संग्रहालयों में प्राचीन युग की स्मृतियों के चिन्ह सँजोए रहेंगे, तब तक मानव जाति के अभिलेखों से भरी-पूरी पुस्तकों की पंक्तियों के बीच पहली पुस्तक ऋग्वेद ही रहेगी।”

अत: मानव जाति के आदिम ग्रंथ की भाषा भी आदिमा है। अर्थात् संसार की प्रथम भाषा संस्कृत भाषा है। भाषा से भावों तथा ज्ञान की अभिव्यक्ति होती है तथा भाषा स्वैच्छिक वाचिक ध्वनि संकेतों की वह पद्धति है, जिसके द्वारा मानव समाज परस्पर विचारों का आदान-प्रदान करता है।

संस्कृत भाषा अन्य भाषाओं की तरह केवल अभिव्यक्ति का साधन मात्र ही नहीं है, अपितु वह मनुष्य के सर्वाधिक संपूर्ण विकास की कुंजी भी है। इस रहस्य को जानने वाले मनीषियों ने प्राचीन काल से ही संस्कृत को देव भाषा और अमृतवाणी के नाम से परिभाषित किया है।

संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं बल्कि संस्कारित भाषा है। इसीलिए इसका नाम संस्कृत है। ऋग्वेद की भाषा विश्व के भाषाई अध्ययन में प्राचीनतम एवं महत्वपूर्ण स्थान रखती है। स्वयं ऋग्वेद में अनेक स्थलों पर भाषा तत्व के गंभीर सिद्धांत, दार्शनिक चिंतन, भाषा की परिशुद्धता, वैज्ञानिकता तथा सूक्ष्मता को जानना आवश्यक बताया गया है।

अत: मानव जाति के आदि स्रोत ग्रंथ को जानने के लिए संस्कृत का महत्व अनंत है। जो व्यक्ति ज्ञान के आदि स्रोत को नहीं जानना चाहता, उसके लिए उसकी भाषा का भी कोई महत्व नहीं है ।

देवताओं की भाषा

देवता शब्द से अभिप्राय है – जो देते हैं या जो प्रकाश वाले हैं “दानाद्वा दीपनाद्वा”। विश्व के आदिम ग्रंथ में प्रकृति के महत्व को बहुत अधिक सूक्ष्मता से बताया गया है। क्योंकि मानव का अस्तित्व प्रकृति के सामंजस्य पर ही निर्भर करता है तथा ज्ञान नैमित्तिक है, मनुष्य उसे प्रकृति से सीखता है। अत: उन ग्रंथों में सृष्टि के हर उस पदार्थ को जो मनुष्य को कुछ देता है, देवता या देव कहकर संबोधित किया गया है।

वेद में सृष्टि की दैवीय शक्तियों का मनुष्य को बोध (ज्ञान) कराया गया है। उस ज्ञान कराने की शैली स्तुति परक है। स्तुति के माध्यम से हम किसी भी पदार्थ के गुण और कर्मों को बताते हैं। वेदों में प्रकृति और उस प्रकृति के संचालक एवं नियामक के स्वरूप को बताया गया है, जो प्रत्येक मनुष्य को जानने योग्य है। संस्कृत भाषा देवों के स्वरूप बताने के कारण देवों की भाषा कहलाती है। प्रकृति और उसके नियामक के स्वरूप को जानने के लिए संस्कृत भाषा का महत्व सर्वदा रहेगा ।

संस्कृति का आधार

संस्कृति का अर्थ है परिमार्जित संस्कारों से युक्त मनुष्यों की सभ्यता। हमारी आत्मा, हमारी अस्मिता, भारत की भारतीयता उसकी संस्कृति में है, जिसका प्राण संस्कृत भाषा है। संस्कृति व्यक्ति के विकास के साथ-साथ आंतरिक विकास की भी बोधक होती है।

इसका लक्ष्य व्यक्ति का विकास और प्रकृति का संतुलन है। भाषा संस्कृति की वाहिका होती है। भारतीय संस्कृति के सभी पक्षों जैसे  ऐतिहासिक, आर्थिक, धार्मिक, प्राकृतिक, राजनैतिक तथा कला, ज्ञान, विज्ञान आदि का सूक्ष्म तथा वास्तविक ज्ञान संस्कृत भाषा के माध्यम से ही हो सकता है।

वैज्ञानिक तथा तार्किक क्षमता वर्धिका

संस्कृत भाषा में वैदिक साहित्य से अतिरिक्त भी अन्य सभी विद्याओं तथा ज्ञान-विज्ञान का बहुत सूक्ष्म अध्ययन उपलब्ध है। संस्कृत हमारे दार्शनिकों, वैज्ञानिकों, गणितज्ञों, कवियों, नाटककारों, व्याकरण आचार्यों आदि की भाषा थी। इसके माध्यम से भारत की उत्कृष्टतम मनीषा, प्रतिभा, अमूल्य चिंतन, मनन, विवेक, रचनात्मक, सर्जना और वैचारिक प्रज्ञा का अभिव्यंजन हुआ है।

व्याकरण के क्षेत्र में पाणिनी और पतंजली (अष्टाध्यायी और महाभाष्य के लेखक) के समतुल्य पूरे विश्व भर में कोई दूसरा नहीं है। खगोलशास्त्र और गणित के क्षेत्र में आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और भास्कर के कार्यों ने मानव जगत को नवीन मार्ग दिखाया। वहीं औषधि के क्षेत्र में चरक और सुश्रुत ने महत्वपूर्ण कार्य किया।

दर्शन के क्षेत्र में गौतम (न्याय व्यवस्था के जन्मदाता) शंकराचार्य बृहस्पति आदि ने पूरे विश्व भर में विस्तृत दार्शनिक व्यवस्था को प्रतिपादित किया है। ये सब ग्रंथ संस्कृत भाषा की वैज्ञानिकता तथा तार्किकता के द्योतक हैं क्योंकि किसी भी विषय को कम से कम शब्दों में सूत्र रूप में कहना उस भाषा की वैज्ञानिकता को बताता है।

संस्कृत भाषा इतनी सक्षम है कि इसमें तकनीकि विचारों को पूरे विशुद्धता, तार्किकता और सुस्पष्टता के साथ व्यक्त किया जा सकता है। विज्ञान में परिशुद्धता कि आवश्यकता होती है, साथ ही विज्ञान को एक लिखित भाषा की जरूरत होती है, जिसमें विचारों को पूरे स्पष्टता और तार्किकता के साथ व्यक्त किया जा सके।

जैसे- अंग्रेजी के ‘A’ से ‘Z’ तक के वर्णों को किसी तार्किक आधार पर व्यवस्थित नहीं किया गया है। इसके पीछे कोई विशेष कारण नहीं है कि F, G से पहले क्यों आता है या P, Q से पहले क्यों आता है? अंग्रेजी के वर्णों को यादृच्छता के आधार पर व्यवस्थित किया गया है। जबकि दूसरी तरफ, पाणिनी ने अपने पहले 14 सूत्रों में संस्कृत भाषा को अत्यंत वैज्ञानिक व तार्किक आधार पर व्यवस्थित किया है।

संस्कृत के अतिरिक्त विश्व की किसी और भाषा के वर्णों को इस तरह से तार्किक व वैज्ञानिक रूप से नहीं रखा गया है। इस तरह से हम देखते हैं कि संस्कृत भाषा में छोटे-छोटे विषयों को कितनी गंभीरता से लिया गया है, बड़े-बड़े विषयों पर कितनी गहराई से चिंतन किया गया होगा।

संस्कृत के बारे में इंग्लैंड के विद्वान और एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के फोर्ट विलियम के न्यायाधीश सर विलियम जोन्स ने 1786 में कहा था कि संस्कृत भाषा की प्राचीनता जो भी हो, यह एक अद्भुत संरचना है। यह ग्रीक भाषा से अधिक परिपूर्ण, लैटिन भाषा से अधिक समृद्ध और इन दोनों की अपेक्षा अधिक शुद्ध और मनोहारी है।

अत: ऐसी वैज्ञानिक भाषा के अध्ययन से व्यक्ति के मस्तिष्क का विकास होता है।

विश्वकल्याणकारी भाषा

संस्कृत भाषा की एक प्रमुख विशेषता यह है कि वह व्यष्टि से समष्टि को तथा परमेष्टि को जोड़ती है। उसकी प्रत्येक प्रार्थना में विश्व बंधुत्व की भावना व्याप्त है। जो विपुल ज्ञान भंडार संस्कृत में है, उसे देश की प्रगति और मानवता के कल्याण के लिए उपयोग में लाया जा सकता है।

संस्कृत के बारे में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में लिखा है, “यदि कोई मुझसे पूछता है कि भारत के पास बहुमूल्य खजाना क्या है और इसके पास सबसे बड़ी धरोहर क्या है, तो मैं बेहिचक कह सकता हूँ कि वह खजाना संस्कृत भाषा और उसमें निहित समस्त वांगमय है। यह एक महत्त्वपूर्ण विरासत है। यह जब तक सक्रिय रहेगी और हमारे सामाजिक जीवन को प्रभावित करेगी, तब तक भारत की आधारभूत बुद्धिमत्ता बनी रहेगी।”

अन्य भाषाओं की प्राण

संस्कृत भाषा से ही विश्व की अनेक भाषाओं की उत्पत्ति हुई है। विश्व की अधिकांश भाषाओं में संस्कृत भाषा के शब्द मिश्रित हैं, जो उनके व्यावहारिक प्रयोग को सरल करने में सहायक हैं।

संस्कृत भाषा हमारी भारतीय भाषाओं को भी बहुत सशक्त करती है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 251 में स्पष्टत: उल्लेख है कि ‘हम भारतीय भाषाओं को सशक्त करेंगे और भारतीय भाषाओं के विकास और समृद्धि के लिए संस्कृत अहम भूमिका निभाएगी।’

यह संस्कृत की ही विशिष्टता और सुंदरता है कि यदि संस्कृत में ‘आकाश:’ बोलते हैं, तो हिंदी में ‘आकाश’, तेलुगु में ‘आकाशमु’ और कन्नड़ में ‘आकाशवु’ बोलते हैं। इसी प्रकार संस्कृत में यदि ‘भूमि:’ बोलते हैं, तो हिंदी, तेलुगु और कन्नड़ में भी ‘भूमि’ ही बोलते हैं।

संस्कृत से अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना करने पर अनेक मौलिक समानताओं को देखा जा सकता है। इस तथ्य को वैश्विक संदर्भ में देखने पर संस्कृत की अनेक पाश्चात्य भाषाओं में अंत: समानताएँ ज्ञात होती हैं।

तुलनात्मक भाषा विज्ञान के अध्ययन में विद्वानों ने संस्कृत की ग्रीक, लैटिन आदि भाषाओं से समानता को प्रदर्शित किया है और संस्कृत भाषा को ही तुलनात्मक भाषा विज्ञान का जनक माना है। अंग्रेजी और संस्कृत में भी अनेक समानताएँ स्पष्टत: दिखाई देती हैं, जिनके आधार पर संस्कृत से अंग्रेजी की उत्पत्ति मान सकते हैं।

जैसे माँ को संस्कृत में ‘मातर’ बोलते हैं तो अंग्रेजी में उसी को ‘मदर’ बोलते हैं। बेटी को संस्कृत में ‘दुहितर’ बोलते हैं, तो अंग्रेजी में ‘डॉटर’ बोलते हैं। इस प्रकार से देखा जाए, तो दुनिया की दर्जनों भाषाओं में संस्कृत का विपुल शब्द भंडार व्याप्त है।

इस प्रकार संस्कृत भाषा और इसके समृद्ध साहित्य का महत्व सहज ही स्पष्ट हो जाता है। प्राचीनता, अविच्छिन्नता, वैज्ञानिकता, व्यापकता, धार्मिक व सांस्कृतिक मूल्य तथा कलात्मक दृष्टि से ही नहीं अपितु धर्म व दर्शन के विचारात्मक अध्ययन की दृष्टि से भी संस्कृत भाषा का अपना निजी महत्त्व है।

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डॉ. सोनिया अनसूया
Studied Sanskrit Grammar & Ved from traditional gurukul (Gurukul Chotipura). Assistant professor, Sanskrit Department, Hindu College, DU. Researcher, Centre for North East Studies.

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