Friday, September 18, 2020
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राष्ट्रीय शक्ति का प्रतीक भारत का न्यूक्लियर ट्रायड

किसी भी देश की सशस्त्र सेना के तीन मुख्य अंग होते हैं: जल, थल और नभ। इन तीन माध्यमों से नाभिकीय अस्त्र प्रक्षेपित करने की क्षमता संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के हर स्थाई सदस्य देश ने विकसित की है। ऐसे में...

न्यूक्लियर अस्त्र दो प्रकार के होते हैं- स्ट्रेटेजिक न्यूक्लियर वेपन (SNW) और टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन (TNW)। स्ट्रेटेजिक न्यूक्लियर वेपन किसी नगर की बड़ी जनसंख्या पर आक्रमण करने के लिए होते हैं। विश्व इतिहास में SNW का प्रयोग प्रथम और अंतिम बार अमेरिका ने जापान के विरुद्ध 1945 में किया था। जापान पर अमेरिका के परमाणु हमले के बाद से ही अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में निशस्त्रीकरण की बहस चालू हुई। कहा गया कि ग़ैर ज़िम्मेदार (अमेरिकी बुद्धिजीवियों की शब्दावली में गरीब) देश परमाणु अस्त्र बनाने की क्षमता विकसित न करें और बड़ी अर्थव्यवस्था वाले अमीर देश अपने नाभिकीय हथियारों का ज़खीरा नष्ट करें।

चिर प्रतिद्वंद्वी अमेरिका और रूस ने अपने कितने SNW नष्ट किये इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है अलबत्ता इन देशों की आपसी खींचतान ने सामरिक जगत में एक नए प्रकार के अस्त्र को जन्म दिया। इसे टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन (TNW) कहा गया। इन अस्त्रों को विकसित करने के पीछे तर्क यह दिया गया कि चूँकि SNW से होने वाला विनाश बड़ा होता है इसलिए कम तीव्रता वाले छोटे TNW बनाए जाएँ जिनका प्रयोग युद्धकाल में जनता पर नहीं बल्कि शत्रु देश की सेना पर किया जाए। शीत युद्ध के समय इस प्रकार के हथियार अमेरिका और रूस द्वारा बड़ी मात्रा में विकसित किए गए और कहा जाता है कि शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात उन्हें नष्ट भी कर दिया गया।

अमेरिका और रूस ने भले ही अपने TNW नष्ट कर दिए हैं किंतु उनसे प्रेरणा लेते हुए पाकिस्तान ने ढेर सारे TNW विकसित किए गए हैं। किसी देश के द्वारा टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन विकसित करना यह दिखाता है कि वह युद्ध में परमाणु हथियार का प्रयोग पहले करने को आतुर है। भारत की 1998 में घोषित न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन में कहा गया कि हम युद्धकाल में न्यूक्लियर वेपन का प्रयोग पहले नहीं करेंगे। जब हम पर न्यूक्लियर हथियार से हमला किया जाएगा तब हम उसका मुँहतोड़ जवाब देंगे। पहले हमला न करने की नीति के चलते ही हमने टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन विकसित नहीं किए।

भारत ने पहले हमला न करने की नीति के साथ ही यह भी घोषणा की कि हम नाभिकीय अस्त्रों के प्रयोग में ‘credible minimum deterrence’ का पालन करेंगे। अर्थात हम पर इस बात के लिए विश्वास किया जा सकता है कि हम परमाणु हथियार का प्रयोग करना नहीं चाहते इसीलिए परमाणु हथियार विकसित करने की अपनी क्षमता में हम कोई कसर नहीं छोड़ेंगे ताकि कोई और देश हम पर परमाणु हमला करने से पहले सौ बार सोचे। इसी नीति पर चलते हुए भारत ने टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन ले जाने लायक डिलीवरी सिस्टम विकसित किए लेकिन TNW नहीं बनाए।

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‘डेटरेन्स’ या निवारक का अर्थ यह हुआ कि हमने शत्रु देश को हम पर हमला करने से पूर्व ही अपने परमाणु अस्त्र की शक्ति दिखा कर रोक दिया। इसे सुनिश्चित करने के लिए हमने स्ट्रेटेजिक न्यूक्लियर वेपन और इन्हें ले जाने लायक डिलीवरी सिस्टम विकसित किए। किसी भी देश की सशस्त्र सेना के तीन मुख्य अंग होते हैं: जल, थल और नभ। इन तीन माध्यमों से नाभिकीय अस्त्र प्रक्षेपित करने की क्षमता संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के हर स्थाई सदस्य देश ने विकसित की है। “जल थल और नभ से परमाणु हथियार दागने की क्षमता को हम न्यूक्लियर ट्रायड विकसित कर लेने की संज्ञा देते हैं।”

भारत ने भी 1983 में प्रारंभ किए गए Integrated Guided Missile Development Program के अंतर्गत 26 दिसंबर 2016 को अग्नि-5 मिसाइल का पाँचवी बार सफलतापूर्वक परीक्षण किया था। अग्नि-5 पाँच हजार किलोमीटर से अधिक दूरी तक न्यूक्लियर वेपन ले जा सकने वाली Intermediate Range Ballistic Missile है। जनवरी 2017 में हमने कम दूरी की IRBM अग्नि-4 का भी परीक्षण किया था। यह धरातल से धरातल पर मार करने वाली मिसाइलें हैं। अग्नि की क्षमता IRBM से आगे बढ़कर एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक मार करने वाली ICBM तक की है।

भारत ने अग्नि के विकास में Multiple Independently targetable Re-entry Vehicle तकनीक तक की महारत हासिल कर ली है। MIRV का अर्थ यह है कि एक बार लॉन्च होने पर मिसाइल कई अलग लक्ष्यों को एक साथ भेद कर समूल नष्ट कर सकती है। पूर्व डीआरडीओ अध्यक्ष वी के सारस्वत के अनुसार अग्नि शृंखला की मिसाइलें भविष्य में एंटी सैटेलाइट हथियार के रूप में भी विकसित की जा रही हैं। अग्नि के अतिरिक्त भारत के पास कम और मध्यम दूरी की पृथ्वी, धनुष और निर्भय सब सोनिक क्रूज़ मिसाइलें भी हैं। धनुष युद्धपोत से धरातल पर 350 किमी तक मार कर सकती है। प्रहार मिसाइल 150 किमी तक की टैक्टिकल रेंज में स्ट्रेटेजिक न्यूक्लियर वेपन ले जा सकने में सक्षम है।

चूँकि भारत ने पहले न्यूक्लियर वेपन प्रयोग न करने की नीति अपनाई है इसलिए हमने अपने मिसाइल लॉन्चर को Launch on Warning अथवा Launch through Attack क्षमता पर नहीं रखा है। एलर्ट का स्तर इंटेलिजेंस से प्राप्त सूचनाओं पर निर्भर होता है। हमें पाकिस्तान या उससे दूर के लक्ष्य (600-2000 किमी तक) को भेदने के लिए 8 से 13 मिनट का समय लगेगा।

वायुसेना की बात करें तो भारतीय वायुसेना के पास न्यूक्लियर वॉरहेड ले जाने में सक्षम जगुआर, मिराज-2000 और सुखोई-30 MKI युद्धक विमान हैं। फ्रांस से हाल ही में खरीदे गए राफेल विमान भी परमाणु बम गिराने में सक्षम हैं।

भारतीय नौसेना ने समुद्र से परमाणु अस्त्र प्रक्षेपित करने वाली सबमरीन का निर्माण भी किया है। नवंबर 5, 2018 को भारत की प्रथम स्वदेशी न्यूक्लियर सबमरीन आईएनएस अरिहंत ने समुद्र में गश्त लगाई थी। इसे Ship Submersible Ballistic Nuclear (SSBN) सबमरीन कहा जाता है। जल के भीतर होने से अरिहंत शत्रु की नज़र से लगभग ओझल ही रहेगी जिसके कारण भारतीय नौसेना को रणनीतिक लाभ होगा। अरिहंत 6000 टन की 367 फिट लंबी पनडुब्बी है जो K-15 बैलिस्टिक मिसाइल से लैस की जा सकती है। इस मिसाइल की रेंज 750 किमी तक मार करने की है। K शृंखला की इन मिसाइलों का नाम K से प्रारंभ होता है जो डॉ अब्दुल कलाम के नाम का द्योतक है। हालाँकि अभी यह रेंज कम है लेकिन डीआरडीओ Submarine Launched Ballistic Missile (SLBM) विकसित करने और इसे अरिहंत पर तैनात करने की ओर अग्रसर है जिसकी रेंज 5000 किमी तक बढ़ाई जा सकती है। भारत अब MTCR का सदस्य भी बन चुका है इसलिए रूस के साथ संयुक्त रूप से विकसित ब्रह्मोस क्रूज़ मिसाइलों की तकनीक दूसरे देश को देने और अत्याधुनिक हथियारों की तकनीक किसी से लेने में भी अब कोई अड़चन नहीं आएगी।

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