Wednesday, May 22, 2024
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ठंड में ठिठुरती बच्ची बनी प्रेरणा, आज 18 राज्यों में उजियारा फैला रही है AROH: 5 लाख लोगों के जीवन में बदलाव लाने की कहानी

“मैं विकास की कमी के लिए सरकार और स्थानीय निकायों को दोष देने के बजाय अंतर को पाटना चाहती थी। मैंने महसूस किया कि गाँवों में गए बिना, बिना समस्याओं जाने और उन्हें सही रूप से विकसित किए बिना यह संभव नहीं होगा।"

एक गैर सरकारी संस्था (NGO) है। नाम है- A Ray Of Hope (AROH)। इसका मकसद है गरीब और पिछड़े हुए लोगों की पढ़ाई, नौकरी और स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर करना है। इस फाउंडेशन का मुख्य उद्देश्य महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देना है। इसकी फाउंडर डॉ. नीलम गुप्ता हैं। फाउंडेशन की शुरुआत 2001 में हुई। मगर इसकी रुपरेखा काफी पहले ही नीलम गुप्ता के जेहन में तैयार हो गई थी, जरूरत थी तो बस उसे जमीन पर उतारने की और यह साकार हुआ 2001 में।

हालाँकि नीलम गुप्ता के लिए इसे शुरू करना इतना आसान नहीं रहा, क्योंकि वह भी हमारी-आपकी तरह ही मिडिल क्लास फैमिली से थी और मिडिल क्लास फैमिली में तो बस ऑफिस में जाकर 9-10 घंटे काम करना और उसके लिए सैलरी मिलने को ही नौकरी माना जाता है। इस बात से आप भी भलीभँति परिचित होंगे और कहीं न कहीं सहमत भी होंगे कि मिडिल क्लास फैमिली में सोशल सर्विस (दूसरों की मदद करना), दूसरों के सपनों को पूरा करने को कोई जॉब नहीं माना जाता है। 

बहरहाल नीलमा गुप्ता के इस चुनौती भरे सफर पर नजर करने से पहले बात करते हैं कि फाउंडेशन की शुरुआत किस तरह से हुई। नीलम को किन कारणों ने चुनौतियों से लड़कर इस फाउंडेशन की शुरुआत करने की प्रेरणा दी।

नीलम गुप्ता की लाइफ का टर्निंग प्वाइंट और AROH फाउंडेशन की शुरुआत

वह दिसंबर की सर्द सुबह थी। नीलम गुप्ता स्कूल जा रही थीं। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक गरीब बच्ची ठंड से काँप रही है। उसके शरीर पर कोई गर्म कपड़े नहीं है। उसने फटी, पतली, सूती कमीज पहनी हुई थी। बच्ची की इस हालत को देखकर उन्हें दया आ गई। उन्होंने अपनी स्वेटर उतार कर बच्ची को दे दिया। अगले दिन जब वह स्कूल जा रही थी तो उन्होंने उसी बच्ची को वही पुराने-फटे कपड़े पहने देखा। आज भी वह ठंड से काँप रही थी। यह देख वह थोड़ी सी हैरान रह गई। उन्होंने जब बच्ची से स्वेटर के बारे में पूछा तो उसने बताया कि उसके पिता ने उसे कुछ पैसे में बेच दिया, क्योंकि उनके पास खाने के लिए कुछ नहीं था। यह घटना गुप्ता की लाइफ का टर्निंग प्वाइंट था। उन्होंने उसी क्षण गरीब, जरूरतमंदों और वंचित लोगों के उत्थान के लिए काम करने और अधिक से अधिक लोगों को विकास के समान अवसर प्रदान करने का फैसला किया।

अब आते हैं नीलम गुप्ता के स्कूल से निकल कर पीएचडी करने और फिर AROH फाउंडेशन की शुरुआत करने के बीच आई चुनौतियों पर। नीलम का जन्म दिल्ली के एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ। उनके पिता एक सरकारी कर्मचारी थे और माँ हाउसवाइफ थीं। 80 और 90 के दशक में एक सरकारी कर्मचारी का परिवार काफी मुश्किलों से अपना गुजारा करते थे। नीलम कहती हैं कि वह चाहकर भी दूसरों की मदद करने की स्थिति में नहीं थे।

फाउंडेशन की शुरुआत करने को लेकर नीलम गुप्ता The Better India से बात करते हुए कहती हैं, “पहली और सबसे बड़ी चुनौती मेरे माता-पिता की तरफ से आई, जिन्होंने मुझे ‘फालतू विचार’ (‘stupid idea’) को छोड़ने और नौकरी करने व शादी करने के लिए कहा। मेरे माता-पिता ने दान करने को बेवकूफी भरा फैसला बताया। हम अपने पिता के कम वेतन में मुश्किल से समय गुजारते थे। मुझे वित्तीय स्थिरता हासिल करने और मेरे सपने को पंख देने के लिए सही समय की प्रतीक्षा करने के लिए कहा गया था।”

हालाँकि, नीलम ने दूसरों की मदद करने के अपने सपने को कभी नहीं छोड़ा। उन्होंने अपनी पीएचडी पूरी करने के बाद एक प्रिंटिंग एंड पब्लिशिंग बिजनेस शुरू किया। इससे उन्होंने अच्छा पैसा कमाया और फिर 2001 में AROH लॉन्च किया। वह बताती हैं कि वह प्रिंटिंग एंड पब्लिशिंग बिजनेस से सालाना 3-5 लाख रुपए कमाती थी। इसने उनके अंदर सामाजिक क्षेत्र में उद्यम करने के लिए आत्मविश्वास पैदा किया।

2001 में स्थापित और पंजीकृत, AROH फाउंडेशन शिक्षा, कौशल विकास, स्थायी आजीविका, स्वास्थ्य और स्वच्छता के क्षेत्र में अच्छी तरह से डिज़ाइन किए गए कार्यक्रमों के माध्यम से गरीब और हाशिए के समुदायों को सशक्त बनाने की दिशा में काम करता है। वर्तमान में NGO भारत के 18 से अधिक राज्यों में फैला हुआ है। मेघालय के बीहड़ इलाकों से लेकर, छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित लाल गलियारों से लेकर सीतामढ़ी, बिहार के कई जिलों तक, भारत के दूरस्थ स्थानों में AROH काम कर रहा है।

AROH फाउंडेशन ने अपने विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से 5 लाख से अधिक लोगों की जिंदगी बदली है। उनके जीवन में सामाजिक-आर्थिक विकास हुआ है। NGO ने विभिन्न हस्तक्षेपों के माध्यम से एक लाख से अधिक महिलाओं के जीवन को प्रभावित किया है। अब तक फाउंडेशन ने 25,000 से अधिक युवाओं को प्रशिक्षित किया और उन्हें नौकरियों व स्वरोजगार में लगाया है। इसने संगठन में लगभग 200 लोगों को रोजगार देकर अर्थव्यवस्था में भी मदद की है।

AROH फाउंडेशन को भारत में सामाजिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली है। फाउंडेशन को सभी 17 SDG को प्रभावित करने के अपने काम के लिए जाना जाता है, जिसके लिए इसे 2019 में ग्लोबल कॉम्पैक्ट इंडिया नेटवर्क से सर्वश्रेष्ठ NGO का पुरस्कार मिला।

फाउंडेशन की शुरुआत में, नीलम गुप्ता ने ग्रामीण क्षेत्रों में भारत सरकार की परियोजनाओं के लिए अनुसंधान और रणनीति नियोजन सहायता प्रदान की, लेकिन जल्द ही लोगों के साथ सीधे अपने NGO के माध्यम से काम करना शुरू कर दिया। सरकारी परियोजनाओं का अध्ययन करते समय, नीलम ने पाया कि सरकार की नीतियों और उनके कार्यान्वयन के बीच एक बड़ा गैप था और उन्हें लगा कि वह एक बदलाव ला सकती हैं।

वह कहती हैं, “मैं विकास की कमी के लिए सरकार और स्थानीय निकायों को दोष देने के बजाय अंतर को पाटना चाहती थी। मैंने महसूस किया कि गाँवों में गए बिना, बिना समस्याओं जाने और उन्हें सही रूप से विकसित किए बिना यह संभव नहीं होगा। मैंने सरकारी परियोजनाओं के लिए प्रयास किया, लेकिन ग्रामीण विकास मंत्रालय से अपना पहला प्रोजेक्ट पाने में मुझे लगभग आठ साल लग गए। यह एक कौशल विकास और नियोजन कार्यक्रम था जिसे स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोजगार योजना (SGSY) कहा जाता है।”

कार्यक्रम सफल रहा और 30 महिलाओं सहित लगभग 100 युवाओं को रिटेल, हॉस्पिटैलिटी और बीपीओ क्षेत्रों में रोजगार मिला। यह 2008 था और उन्होंने तब से पीछे मुड़कर नहीं देखा। AROH ने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और मेघालय जैसे राज्यों के दूरदराज के गाँवों में भारत सरकार के एकीकृत ग्राम विकास कार्यक्रम को लागू किया है। इस कार्यक्रम में भारत के 100 से अधिक गाँवों में 10000 व्यक्तिगत घरों का निर्माण, और 6000 सौर स्ट्रीट लाइट और 250 सोलर वाटर फिल्टरेशन यूनिट्स की स्थापना शामिल थी। संगठन ने 5000 हेक्टेयर से अधिक भूमि को बेहतर फसल और खेती की तकनीक के तहत लाया है और 100 से अधिक तालाबों का कायाकल्प किया है।

गाँवों में काम करने के दौरान और स्थानीय लोगों से सहयोग लेने में होने वाली परेशानियों के बारे में बात करते हुए नीलम कहती हैं, “लोग गाँवों में प्रवेश करने से डरते हैं। हमें समूहों द्वारा कहा गया है, यदि आप इस क्षेत्र में प्रवेश करते हैं, तो आप जीवित नहीं लौटेंगे। आपका यहाँ पर कोई काम नहीं है। कई बार हमें ग्रामीणों के विरोध का सामना करना पड़ता है, वो सोचते हैं कि हम उनसे कुछ छीन रहे हैं। लेकिन मैंने अपने लोगों से कहा कि उनके साथ बैठो और उन्हें समझाओ कि हमारा काम उनके खिलाफ नहीं है। हम उन्हें समझाते हैं कि हम उनके लाभ के लिए काम कर रहे हैं। हम उनकी आजीविका और विकास के लिए काम कर रहे हैं।”

वह कहती हैं, “AROH फाउंडेशन का भविष्य केवल वही नहीं है जो मैंने सपना देखा है या प्लान बनाती हूँ। अब यह सभी कर्मचारियों और लाभार्थियों का सपना है। भविष्य की योजना में ऐसे मुद्दे भी शामिल हैं जिन पर समाज के हाशिए के वर्गों के संपूर्ण विकास के लिए तत्काल विचार और कार्रवाई की आवश्यकता है। लगभग दो दशकों के अपने अनुभव, विशेषज्ञता और सीखने के साथ, AROH के पास राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, अपने आउटरीच में खुद को सबसे बड़े एनजीओ के रूप में स्थापित करने के लिए एक मजबूत रोडमैप है। मुझे AROH को एक विश्वसनीय संस्थान के रूप में स्थापित करने पर गर्व है जो नई ऊँचाइयों को छू रहा है और गरीबों के सशक्तिकरण के लिए काम कर रहा है।”

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