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कभी ‘AK-47’ तो कभी बीच मैदान नमाज, कभी ‘6-0’ तो कभी मुस्लिम बनने का ऑफर: पाकिस्तानी क्रिकेटरों ने बैट-बॉल के गेम को बना दिया मजहब का खेल, इस्लामी एजेंडा आगे-खेल भावना पीछे

क्रिकेट को 'जेंटलमैन गेम' कहा जाता है, लेकिन पाकिस्तानी खिलाड़ियों की हरकतें बार-बार इसकी गरिमा को ठेस पहुँचाती हैं। चाहे वह साहिबजादा फरहान का फायरिंग सेलिब्रेशन हो, हारिस रऊफ का भड़काऊ इशारा।

क्रिकेट को दुनिया भर में एक ऐसा खेल माना जाता है, जो लोगों को जोड़ता है, भाईचारे को बढ़ाता है और खेल भावना को सबसे ऊपर रखता है। लेकिन जब बात भारत-पाकिस्तान के क्रिकेट मैच की आती है, तो यह सिर्फ खेल नहीं रह जाता। यह एक भावनात्मक जंग बन जाता है, जिसमें मैदान पर खेल से ज्यादा सियासत और मजहबी रंग नजर आता है।

एशिया कप 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए मुकाबले ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि पाकिस्तानी खिलाड़ी खेल के मैदान को भी मजहबी कट्टरपंथ का अखाड़ा बनाने से नहीं चूकते। साहिबजादा फरहान का बल्ले को एके-47 की तरह दिखाकर ‘फायरिंग सेलिब्रेशन’ करना हो या हारिस रऊफ का ‘6-0’ का इशारा, पाकिस्तानी खिलाड़ियों ये हरकतें खेल भावना को तार-तार करती हैं।

खेल के मैदान पर इस्लामी कट्टरपंथ फैलाते हैं पाकिस्तानी खिलाड़ी

पाकिस्तानी खिलाड़ियों का इतिहास रहा है कि वे मैदान पर खेल भावना को कम और मजहबी कट्टरपंथ को ज्यादा तवज्जो देते हैं। साहिबजादा फरहान ने एशिया कप 2025 के सुपर-4 मैच में अर्धशतक बनाकर बल्ले को बंदूक की तरह इस्तेमाल किया और ‘गोली चलाने’ का इशारा किया।

इसी तरह हारिस रऊफ ने बाउंड्री लाइन पर फील्डिंग करते हुए ‘6-0’ का इशारा किया और विमान गिराने की एक्टिंग की, जो पाकिस्तान के उस दावे से जोड़ा गया, जिसमें उसने फर्जी तरीके से भारत के छह राफेल विमान गिराने की बात कही थी।

ये इशारे खेल भावना के खिलाफ हैं और साफ दिखाते हैं कि पाकिस्तानी खिलाड़ी मैदान पर भी सियासत और मजहबी भावनाओं को लाने से नहीं हिचकते।

यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने ऐसी हरकतें की हैं। मोहम्मद रिजवान का मैदान पर नमाज पढ़ना भी कई बार चर्चा का विषय बना है। 2023 में नीदरलैंड के खिलाफ एक मैच में रिजवान का बीच मैदान में नमाज पढ़ने का वीडियो वायरल हुआ था।

कट्टरपंथी रहा है पाकिस्तान का ड्रेसिंग रूम

पाकिस्तानी क्रिकेट में मजहबी कट्टरपंथ का इतिहास पुराना है। पाकिस्तान के हिंदू टेस्ट क्रिकेटर दानिश कनेरिया ने कई बार खुलासा किया कि उन्हें अपने करियर के दौरान मजहब के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ा।

दानिश कनेरिया ने 2006 में एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्हें कभी धर्म बदलने के लिए मजबूर तो नहीं किया गया, लेकिन टीम में उनके साथ अलग व्यवहार होता था। उन्होंने यह भी बताया कि कुछ खिलाड़ी उन्हें ‘काफिर’ कहकर ताने मारते थे। यह साफ दिखाता है कि पाकिस्तानी क्रिकेट में गैर-मुस्लिम खिलाड़ियों के लिए माहौल कितना मुश्किल रहा है।

इसी तरह यूसुफ योहाना (जो अब मोहम्मद यूसुफ के नाम से जाने जाते हैं) की कहानी और भी चौंकाने वाली है। योहाना पहले ईसाई थे, लेकिन उसने साल 2005 में इस्लाम कबूल कर लिया। कई लोगों का मानना है कि यह फैसला उनके करियर को लंबा खींचने और टीम में अपनी जगह पक्की करने के लिए दबाव में लिया गया था।

धर्म परिवर्तन के बाद यूसुफ का व्यवहार भी बदल गया और आज वह एक कट्टरपंथी मौलाना के रूप में जाने जाते हैं। एशिया कप 2025 में ही भारत-पाकिस्तान के पिछले मैच के बाद यूसुफ ने एक टीवी शो में भारतीय कप्तान सूर्यकुमार यादव के लिए अपशब्द कहे और भारत पर अंपायरों के दुरुपयोग का आरोप लगाया। यह व्यवहार न सिर्फ खेल भावना के खिलाफ है, बल्कि उनके मजहबी कट्टरपंथ को भी दर्शाता है।

श्रीलंकाई खिलाड़ी को मैदान पर दिया मुस्लिम बनने का ऑफर

पाकिस्तानी खिलाड़ियों की हरकतें सिर्फ उनके देश तक सीमित नहीं रहतीं। कई बार वे विरोधी टीमों के खिलाड़ियों को भी निशाना बनाते हैं। कुछ साल पहले एक श्रीलंकाई खिलाड़ी ने खुलासा किया था कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने उन्हें मैदान पर इस्लाम कबूल करने का ऑफर दिया था।

खुद मैदान छोड़ने वाले पाकिस्तानी सिखा रहे खेल भावना

एशिया कप 2025 में भारत-पाकिस्तान मैच के बाद एक और विवाद ने सुर्खियाँ बटोरीं, जब भारतीय खिलाड़ियों ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों से हाथ मिलाने से इनकार कर दिया। इसकी वजह थी भारत का पहलगाम हमले को लेकर गुस्सा, जिसके लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया गया। भारतीय कप्तान सूर्यकुमार यादव ने टॉस के समय और मैच के बाद पाकिस्तानी खिलाड़ियों से दूरी बनाए रखी।

पाकिस्तानी क्रिकेट बोर्ड (PCB) और खिलाड़ियों ने इसे खेल भावना के खिलाफ बताया, लेकिन सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान का इतिहास खेल भावना का समर्थन करता है? 2006 में इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट मैच में पाकिस्तानी टीम ने मैदान छोड़ दिया था, क्योंकि उन्हें बॉल टैंपरिंग का दोषी ठहराया गया था। यह घटना क्रिकेट इतिहास में खेल भावना के उल्लंघन का सबसे बड़ा उदाहरण है।

पाकिस्तानी खिलाड़ियों और बोर्ड का यह दावा कि भारत ने खेल भावना का उल्लंघन किया। ऐसे में हास्यास्पद लगता है-जब उनके अपने खिलाड़ी मैदान पर भड़काऊ इशारे करते हैं और मजहबी रंग लाते हैं और PCB इसका बचाव करे।

क्रिकेट या सियासत का मैदान?

पाकिस्तानी खिलाड़ियों की हरकतें बार-बार यह सवाल उठाती हैं कि क्या वे क्रिकेट को सिर्फ एक खेल की तरह देखते हैं? 2023 में भारत में हुए वर्ल्ड कप के दौरान, जब पाकिस्तानी खिलाड़ी मोहम्मद रिजवान पवेलियन लौट रहे थे, तो दर्शकों ने ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए। इस पर पाकिस्तानी मीडिया और खिलाड़ियों ने इसे धार्मिक उन्माद से जोड़ा, लेकिन खुद रिजवान का मैदान पर नमाज पढ़ना क्या था? क्या यह खेल के मैदान को मजहबी मंच बनाने की कोशिश नहीं थी?

पाकिस्तान के पूर्व खिलाड़ी जैसे शाहिद अफरीदी और मोहम्मद यूसुफ भी अपने बयानों से विवाद खड़ा करते रहे हैं। अफरीदी ने एशिया कप 2025 के हैंडशेक विवाद के बाद भारत सरकार पर ‘हिंदू-मुस्लिम कार्ड‘ खेलने का आरोप लगाया। यह बयान न सिर्फ आधारहीन था, बल्कि खेल को सियासत और मजहब से जोड़ने की उनकी मानसिकता को दर्शाता है।

खेल भावना की जरूरत

क्रिकेट को ‘जेंटलमैन गेम’ कहा जाता है, लेकिन पाकिस्तानी खिलाड़ियों की हरकतें बार-बार इसकी गरिमा को ठेस पहुँचाती हैं। खेल का मैदान सम्मान, एकता और प्रतिस्पर्धा का प्रतीक होना चाहिए, न कि मजहबी या सियासी जंग का अखाड़ा। पाकिस्तानी खिलाड़ियों को यह समझना होगा कि क्रिकेट सिर्फ जीत-हार का खेल नहीं है, बल्कि यह दुनिया भर के प्रशंसकों के लिए एक भावना है। आखिरकार इतिहास हमेशा खेल भावना का मूल्यांकन करता है और इस मामले में पाकिस्तानी खिलाड़ी बार-बार नाकाम साबित हुए हैं।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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