Wednesday, March 3, 2021
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बिहार कवरेज की शुरुआत होनी थी माता सीता की जन्मस्थली पुनौरा धाम से, हम पहुँच गए सिमुलतला

दो सूत्र हाथ लगने के बाद हम उत्साहित थे, क्योंकि तब मीडिया में इसकी चर्चा नहीं थी। लिहाजा झाझा के दूसरे हिस्से के गाँवों में जाने का भी फैसला किया। इस उत्साह में श्रेयसी सिंह से लिए गए समय का भी ध्यान नहीं रहा।

मैं 10 अक्टूबर को दिल्ली से रवाना हुआ था और 11 अक्टूबर की शाम बिहार के मधुबनी जिले स्थित अपने पैतृक गाँव पहुँचा। जैसा कि पहले भी कई बार बता चुका हूँ कि मैं पहली बार माइक और कैमरे के साथ था, तो दबाव में था। लेकिन, मेरे पास कागजों पर तैयार एक परफेक्ट प्लान था। उसके हिसाब से आगे बढ़ना था। दिल्ली से मैं यह सोचकर चला था;

  • माता सीता की जन्मस्थली सीतामढ़ी स्थित पुनौरा धाम से अपनी पहली कवरेज करेंगे। रितु जायसवाल जैसे चेहरे से शुरुआत करेंगे। ग्रामीण इलाकों पर फोकस करेंगे।
  • बिहार में तीन बड़े दल (बीजेपी, जदयू, राजद) में से दो जिस तरफ हों, वह आसानी से जीत जाते हैं। तीनों अलग-अलग हों तो बीजेपी सबसे आगे होगी।
  • चिराग पासवान ने जो बड़े नाम खासकर, बीजेपी से आए मजबूत नेताओं को उतारा है वे आसानी से जीत जाएँगे। रामविलास पासवान की मृत्यु से उपजी सहानुभूति का फायदा भी लोजपा को होगा। यानी, मेरा मानना था कि चुनाव बाद बीजेपी+लोजपा भी बहुमत के करीब हो सकती है।

जमीन पर सब कुछ उलट-पुलट

  • 12 अक्टूबर को प्लान पर अमल शुरू किया। रितू जायसवाल से संपर्क नहीं हो पाया। पुनौरा धाम की योजना भी टालनी पड़ी। वैसे भी इन इलाकों में आखिरी चरण में वोट पड़ने थे।
  • नीतीश कुमार से काफी नाराजगी दिख रही थी। इससे यह बात समझ में आई कि इस बार का चुनाव अलग है।
  • संसाधन सीमित थे और समय कम। यह भी समझ में आ गया कि खबरों के लिहाज से हम दूसरे संस्थानों से शायद ही बाजी मार सकते हैं। कई मीडिया संस्थान राज्य की एक फेरी लगा चुके थे, हम काफी देर कर चुके थे। उनकी तीन-तीन टीम बिहार के दौरे पर दिल्ली से आई थी।
  • अमूमन चुनावों में नेताओं के विवादित बोल सुर्खियों में होते हैं। सोशल मीडिया के इस दौर में ऐसी खबरें मीडिया से पहले लोगों तक पहुँचती हैं। ऐसे में चर्चा के केंद्र में आने के लिए किसी खबर का हाथ लगना भाग्य भरोसे था। अब जरूरी हो गया था कि यात्रा की योजना नए सिरे से बनाई जाए।

श्रेयसी सिंह का चेहरा क्यों चुना?

  • 13 अक्टूबर को माँ उच्चैठ भगवती के दर्शन करने के बाद दरभंगा के लिए निकला। व्यालोक जी से मुलाकात हुई। उनसे चर्चा के बाद तय किया कि जमुई से बीजेपी की उम्मीदवार श्रेयसी सिंह के चेहरे से शुरुआत करेंगे। श्रेयसी खेल के मैदान में खुद को साबित कर चुकी थीं। फ्रेश चेहरा थीं। युवा और महिला भी। साथ ही राजनीतिक विरासत भी उनसे जुड़ा है। यह भी तय किया कि इंटरव्यू के दौरान उनसे उनके पिता को लेकर सवाल नहीं करूँगा, क्योंकि बीबीसी सहित कई संस्थानों ने उनका जो साक्षात्कार किया था उसमें इसी पर फोकस था। ध्यान रखिएगा यह मैंने तय किया था, श्रेयसी सिंह से हमारा संपर्क नहीं हुआ था।
  • जमुई जाने की बात हुई तो यह भी तय किया कि पहले सिमुलतला जाना है। इससे इसी जिले की झाझा सीट कवर हो जाती। सिमुलतला जाने का मकसद नीतीश के एक ड्रीम प्रोजेक्ट से आपको रूबरू करवाना था। इससे यह भी पता चलता कि नीतीश के पहले कार्यकाल के सपने इस तीसरे कार्यकाल तक आते-आते कैसे बिखरे (सिमुलतला पर हम आगे अलग से एक स्टोरी करेंगे)।
  • दरभंगा से लौटने के बाद 13 अक्टूबर की शाम बेनीपट्टी में मुरलीधर मिले, जो इस पूरी यात्रा में हमारे साथ रहे। उन्होंने गाड़ी पर ऑपइंडिया को जगह दी। हमारी सवारी तैयार हो गई। वैसे तो मैं उपकरण लेकर दिल्ली से गया था। फिर भी उन्होंने अपना कैमरा, ट्राइपॉड, माइक वगैरह रख लिया ताकि किसी आपात परिस्थिति में परेशानी नहीं हो।
  • 13 अक्टूबर की शाम तक श्रेयसी सिंह से संपर्क स्थापित करने की मेरी कोशिश विफल रही थी। लेकिन रात के करीब 10 बजे उनकी बहन मानसी से संपर्क हो पाया, जिन्होंने आगे भी हमारी काफी मदद की। हमें 15 अक्टूबर का समय दिया गया। लेकिन, मैं समय से नहीं पहुँच पाया। बावजूद इसके श्रेयसी सिंह ने बड़प्पन दिखाते हुए हमें 16 अक्टूबर को तबीयत खराब होने के बाद भी पर्याप्त समय दिया था।
सिमुलतला में इस तरह की करीब 500 बदहाल कोठी है। बदहाली का यह सिलसिला लालू के राज में शुरू हुआ था।

सिमुलतला का सफर

  • 14 अक्टूबर को हम सिमुलतला के लिए रवाना हुए। रास्ते में कई जगह हाल लेते चल रहे थे। इस चक्कर में झाझा पहुँचते-पहुँचते रात के करीब 10 बज गए। पुलिस वाले से सिमुलतला जाने का रास्ता पूछा तो उसने इतनी रात उधर जाने से रोका। असल में कभी यह इलाका नक्सल प्रभावित था। बाद में स्थानीय लोगों से पता चला कि जंगलराज की समाप्ति के बाद हालात बदल चुके हैं और वे देर रात भी झाझा से आराम से लौट आते हैं। यह भी याद रखिएगा कि सिमुलतला में कोई होटल नहीं है। यह जंगलों से घिरा इलाका है। यहाँ एक शिक्षक ने उस रात हमारे ठहरने और भोजन का आधी रात के करीब भी खुशी-खुशी इंतजाम कर दिया था। अगली सुबह उन्होंने हमारे गाइड का भी काम किया। हम आसपास के कई गाँव में गए।
  • सिमुलतला के आसपास के गाँव में जाने के बाद अहसास हुआ कि लोजपा के जो मजबूत उम्मीदवार बताए जा रहे हैं, उनकी हालत जमीन पर खराब है। यहाँ से लोजपा ने बीजेपी विधायक रवींद्र यादव को उम्मीदवार बनाया था। सीट जदयू के कोटे में जाने के बाद वे लोजपा में शामिल हो गए थे और मीडिया में काफी मजबूत उम्मीदवार बताए जा रहे थे।
  • यह भी पता चला कि नीतीश से नाराजगी के बावजूद जदयू के जो उम्मीदवार पिछली बार हार गए थे वे जीतने की स्थिति में हैं। झाझा से जदयू के उम्मीदवार पूर्व मंत्री दामोदर राउत थे जो चुनाव जीतने में सफल रहे हैं।
  • ऊपर के दोनों सूत्र हाथ लगने के बाद हम उत्साहित थे, क्योंकि तब मीडिया में इसकी चर्चा नहीं थी। लिहाजा झाझा के दूसरे हिस्से के गाँवों में जाने का भी फैसला किया। इस उत्साह में श्रेयसी सिंह से लिए गए समय का भी ध्यान नहीं रहा।

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अजीत झा
देसिल बयना सब जन मिट्ठा

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