मोदी सरकार नए आयकर कानून को लागू करने के लिहाज से आयकर विधेयक-2025 लेकर आई है। इसे सोमवार (21 जुलाई 2025) को मानसून सत्र में पेश किया गया। बिल के कई प्रावधानों को जस का तस रखा गया है। पर साथ ही 285 नए सुझाव भी शामिल किए गए हैं।
आयकर विधेयक-2025 पर प्रवर समिति की रिपोर्ट में ‘डिजिटल पासवर्ड और गोपनीयता’से जुड़े प्रावधानों को लेकर विशेष ध्यान दिया गया है। 64 साल पुराने आईटी कानून में कुछ अहम बदलाव होने जा रहे हैं। 4575 पन्नों की रिपोर्ट में कई संशोधन के साथ अहम बातें शामिल की गई हैं।
मोदी सरकार ने वर्तमान आयकर अधिनियम 1961 को बेहतर बनाने के लिए कई संशोधन किए हैं। इसके तहत अधिकारियों को दिए गए अधिकारों, खास तौर पर तलाशी और जब्ती के दौरान जाँच के दायरे में आने वाले लोगों के सोशल मीडिया और निजी ईमेल तक को जाँच सकते हैं और जानकारी निकालने की मंजूरी भी दी गई है।
13 फरवरी 2025 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में आयकर बिल पेश किया था। इसके कई प्रावधानों को लेकर तीखी आलोचना हुई थी। इसके बाद विधेयक को बीजेपी सांसद बैजयंत पांडा की अध्यक्षता वाली 31 सदस्यीय समिति के पास समीक्षा के लिए भेजा गया था। समीक्षा पूरी करने के बाद समिति ने मानसून सत्रह को पहले दिन अपनी रिपोर्ट पेश कर दी।
डिजिटल पासवर्ड और गोपनीयता पर समिति की टिप्पणियाँ
अपने सुझाव में समिति ने बिल को लेकर कहा है कि सरकार को नया अधिकार देने का प्रस्ताव है ताकि तलाशी और जब्ती के मौजूदा अधिकारों के तहत डिजिटल पासवर्ड या एक्सेस कोड को अपने नियंत्रण में रख सकता है। यह प्रावधान टैक्स अधिकारियों को सोशल मीडिया, ईमेल, व्हाट्सएप जैसे एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म तक पहुँच की अनुमति भी दे सकता है।
नए बिल में 5 लाख 12 हजार की जगह 2 लाख 60 हजार शब्द ही शामिल किए गए हैं। इसके अलावा समिति ने कहा है कि अगर कोई व्यक्ति समय पर इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल नहीं कर पाता है, फिर भी उसे रिफंड मिलना चाहिए। जुर्माने से बचने के लिए रिटर्न फाइल करने के लिहाज से कोई कानून नहीं होना चाहिए।
हालाँकि विशेषज्ञों ने इस पर निजता के हनन की आशंका जताई है। उनका कहना है कि इससे उपयोगकर्ताओं के निजी डिजिटल डेटा की जानकारी सरकारी लोगों तक पहुँच सकती है। विधेयक में ‘वर्चुअल डिजिटल स्पेस’ की परिभाषा दी गई है। इसमें ईमेल सर्वर और सोशल मीडिया अकाउंट्स, ऑनलाइन बैंकिंग और ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म के साथ क्लाउड स्टोरेज और रिमोट सर्वर जैसी बातें शामिल की गई हैं।
सरकार का कहना है कि बिल में बदलाव केवल भाषा को बेहतर और स्पष्ट करने के लिए किया गया है। साथ ही कई पुराने अधिकारों को जस का तस शामिल किया गया है। हालाँकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक नया अहम अधिकार है, जिससे टैक्स अधिकारी पासवर्ड क्रैकिंग सॉफ़्टवेयर या सेवा प्रदाताओं से लॉग-इन जानकारी माँग सकते हैं।
समिति के सुधार
समिति ने रिपोर्ट में 285 सुझाव दिए हैं। इनमें विधेयक भाषा को सरल बनाने, धाराओं को 819 से 536 करने, 1200 प्रोविजन और 900 स्पष्टीकरण हटाने और डिजिटल अधिकारों और गोपनीयता से जुड़े मुद्दों को आदि को शामिल किया गया है।
समिति ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) की परिभाषा को MSME एक्ट के साथ मिलाने का भी सुझाव दिया है। रिपोर्ट के संशोधनों में अध्यायों की संख्या 47 से घटाकर 23 कर दी गई है। इन प्रावधानों को सूची की तरह सरल रखा गया है कि करदाताओं को आसानी से समझ आए। गैर-लाभकारी संगठनों के लिए विशेष अध्याय बनाया गया है। इसमें सरल भाषा में विस्तृत जानकारी दी गई है ताकि ऐसे संगठनों को प्रावधानों का अनुपालन करना आसान हो।
‘पिछले वर्ष’ और ‘मूल्यांकन वर्ष’ की जगह अब केवल ‘कर वर्ष’ का प्रयोग किया जाएगा। इससे कर भुगतान उसी वर्ष में होगा जिसमें आय अर्जित की गई है। नये विधेयक में स्पष्टता बढ़ाने के लिए तालिकाओं की संख्या 18 से बढ़ाकर 57 कर दी गई है, और सूत्रों की संख्या भी 6 से बढ़ाकर 46 कर दी गई है।
राजस्व विभाग ने किया स्वीकार
वित्त मंत्रालय के तहत राजस्व विभाग ने समिति को कहा कि प्रस्तावित बदलाव मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप किए गए हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में शामिल किसी भी जानकारी को सीमित करने के लिहाज से मंत्रालय ने कहा कि डिजिटल डेटा व्यापक होता है।
इसमें किसी भी ईमेल या सोशल मीडिया अकाउंट का लॉगिन आईडी और पासवर्ड शामिल होता है, जिन्हें एन्क्रिप्टेड चैट्स में वित्तीय डेटा छिपाने के लिए उपयोग किया जाता है। ऐसे में इसे सीमित नहीं किया जा सकता है।
समिति की ओर से डिजिटल स्पेस की परिभाषा से सोशल मीडिया अकाउंट्स को बाहर करने के सुझाव पर मंत्रालय ने कहा कि कई जरूरी साक्ष्य और जानकारी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स से हासिल किए जाते हैं। इनमें व्हाट्सएप, ईमेल आदि शामिल होता है।
तलाशी अभियानों के अधिकांश मामलों में करदाता (टैक्सरेपेयर्स) ऑनलाइन मंचों, पोर्टल्स और ईमेल अकाउंट्स आदि के पासवर्ड या लॉगिन क्रेडेंशियल साझा नहीं करते। इसके पीछे कारण ये है कि करदाता अपने कई बेहिसाब लेनदेन पर एन्क्रिप्टेड संचार माध्यमों के जरिए चर्चा करते हैं। ऐसे में डेटा उपयोग को लेकर संशोधन सही हैं ताकि अन्य प्रावधान भी तर्कसंगत रह सकें।


