Saturday, January 16, 2021
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इस मर्ज की दवा कब तक: Covid-19 के संक्रमण पर काबू पाने के लिए क्या कर रही है दुनिया

इस समय Covid-19 पर काबू पाने के लिए युद्धस्तर पर काम चल रहा है। यह वैश्विक स्तर पर मानव जीवन के इतिहास की सबसे प्रेरणादायक कहानी साबित होगी। ना केवल Covid-19 की उत्पति और विस्तार से संबंधित रहस्य से पर्दा उठेंगे, बल्कि नई ग्लोबल महामारी की चुनौतियों से निपटने की पॉलिसी बनाने में भी मदद मिलेगी।

वायरस या विषाणु अतिसूक्ष्म जीव हैं। ये बैक्टीरिया से भी छोटे होते हैं। ये सिर्फ किसी जीवंत कोशिका के अंदर ही वंश वृद्धि कर सकते हैं। ये सालों साल सुसुस्प्ता अवस्था में रह सकते हैं और किसी सजीव के संपर्क में आते ही फिर से संक्रमण कर सकते हैं। वायरस मुख्यत: प्रोटीन और RNA या DNA से बना होता है।

वायरस सजीव कोशिका पर आक्रमण करने के बाद होस्ट कोशिका के कोसकिए (cellular) मशीनरी को हाइजैक करता है। उससे अपना प्रोटीन और न्यूक्लिक एसिड (DNA/RNA) बनवाने लगता है। रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम कर देता है। Covid-19 भी एक वायरस जनित बीमारी है। यह कोरोना वायरस या SARS-CoV-2 से होता है। कॉरोनाविरीदी वायरस की एक फैमिली है। इसमें SARS-CoV-2 के अलावा SARS और MERS जैसे रोग जनित वायरस भी हैं।

2018 में माय सेक्रेट तेर्रिउस (My secret terrius) नाम की एक फिल्म आई थी। आजकल इसका एक दृश्य वायरल हो रहा। इसमें इस फैमिली के वायरसों की बात हो रही है न कि SARS-CoV-2 की। कहा जा सकता है कि अतीत में कोरोना से संबंधित जो बातें हुई हैं, असल में वे कोरोना फैमिली की बात थी।

इस बीमारी का सबसे पहले पता 2019 में चीन के वुहान प्रांत के सी-फ़ूड मार्केट में काम करने वाले 41 वर्षीय एक व्यक्ति में चला था। इसके बाद इस वायरस के सोर्स को लेकर बहुत सारे कयास लगाए गए। कुछ का मानना था कि यह अधपके चमगादड़ के मांस खाने से मनुष्य में फैला। कुछ का कहना था कि यह चीन के बॉयो-वेपन्स लैबोरेट्रीज से लीक हुआ है।

SARS-CoV-2 एक जूनोटिक (zoonotic) रोग है। इसका मतलब है कि यह रोग जानवर से मनुष्य में फैलता है। प्रारंभ में ऐसा कहा गया कि Covid-19 के रोगी वुहान के समुद्री जिओ के बाज़ार गए थे। लेकिन बाद के मरीजों से पता लगा चला कि उनमें कुछेक बाज़ार नहीं गए थे। फिर इसके मनुष्य से मनुष्य में भी फैलने की पुष्टि हुई। अभी तक यह 205 देशों में फ़ैल चुका है और करीब 15 लाख लोगों को संक्रमित कर चुका है।

प्रसिद्ध मेडिसिन जर्नल नेचर के 17 मार्च 2020 के अंक में ‘द प्रोक्सिमल ओरिजिन ऑफ़ SARS-CoV-2’ नाम से एक रिपोर्ट छपी है। इसके अनुसार SARS-CoV-2 ना तो प्रयोगशाला में तैयार किया गया है और ना ही इसे किसी फ़ायदे के लिए प्रयोगशाला में उदेश्यपूर्ण तरीके से बदला गया है। जंतुओं से आदमी में इसके प्रवेश की सटीक पहचान के लिए जरूरी है कि Covid-19 के शुरुआती मरीजों के वायरस की नुक्लेइक एसिड सिक्वेंसिंग (Nucleic acid sequencing) स्टडीज़ की जाए। यह रिसर्च स्क्रिप्प्स रिसर्च संस्थान, ला-जोला, कैलिफ़ोर्निया, USA द्वारा क्रिस्टियन जी एंडरसन के नेतृत्व किया गया था।

नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ एलर्जी एंड इन्फेक्शस डिजीज (अमेरिका) के प्रांगण में रॉकी माउंटेन लैबोरेट्रीज के वैज्ञानिको ने इसी साल फरवरी में SARS-CoV 19 वायरस को मरीजों से निकाल कर इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी के द्वारा इसकी तस्वीर ली। यह देखने में Halo या प्रभामंडल के आकार (Halo आकार को लैटिन भाषा में करोना कहा जाता है) की तरह दिखता है। इसके मरीजों को बुखार, सूखी खाँसी और कभी-कभी साँस लेने मे कठिनाई जैसे लक्षण दिखते हैं।

यह रोग मुख्यत: एक रोगी से स्वस्थ मनुष्य में खाँसने या छींकने के दौरान बने रेस्पिरेटरी ड्रॉप्लेट्स (respirtory droplets) के कारण फैलता है। इस रोग के लक्षण परिलक्षित होने मे सामान्यत: 2 से 14 दिन लगते हैं। डॉक्टर रोगियों के प्रारंभिक लक्षणों के द्वारा इसकी पहचान करते हैं। लेकिन ये पूरी तरह सटीक नहीं है, क्योंकि ये सारे लक्षण दूसरे वायरस जनित रोग में भी एकसमान होते हैं। जैसे, 2002 मे फैला SARS-CoV के भी यही लक्षण थे।

SARS-CoV और SARS-CoV2 (Covid19) मे अनुवांशिक जानकारी सिंगल स्ट्रैंडडेड (single stranded) RNA मे होता है। वैसे तो इन दो वायरस के RNA में समानता होती है। लेकिन कुछ हिस्सा ऐसा है जो SARS-CoV2 में अनोखा या अलग होता है और टेस्ट के द्वारा इस अनोखे हिस्से को पहचान कर संक्रमण सुनिश्चित किया जाता है।

टेस्ट के लिए डॉक्टर रोगी के नाक या गला के swab सैंपल को इकट्ठा कर लैब में भेज देता है। लेकिन जब मनुष्य में इस वायरस का शुरुआती इन्फेक्शन होता है तब RNA की मात्रा इतनी कम होती है कि उसका लैब में पता कर पाना मुश्किल होता है। इससे निपटने के लिए लैब में SARS-CoV2 specific प्राइमर्स के द्वारा RT-PCR की जाती है। इसके बाद कन्फर्म रूप से कहा जा सकता है कि फलॉं संक्रमित है या नहीं।

RNA बहुत स्थायी नहीं होते हैं। उनका हैंडलिंग भी बहुत संवेदनशील होता है। विकासशील देशों में सभी हॉस्पिटल में RT-PCR की सुविधा उपलब्ध नहीं होती। इन वजहों से यह टेस्ट आसान नहीं है। साथ ही यह टेस्ट बेहद सेंसिटिव भी होता है। सैंपल में जरा सा भी सनदोशन या कंटैमिनेशन होने से गड़बड़ी की आशंका बढ़ जाती है। इस कारण से ही इस टेस्ट को तीन से पाँच बार भी करने की जरूरत पड़ जाती है। CDC टेस्ट सबसे प्रचलित है। सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल (अटलांटा) ने इसे ड़ेवलप किया है। लेकिन बहुत सारे टेस्ट के नतीजे नहीं निकलने के बाद इसके टेस्ट-किट के केमिकल्स में बदलाव करना पड़ा।

इस टेस्ट को लैब के बाहर करना मुश्किल है। इस कठिनाई को दूर किया अमेरिका की अबोट (Abbott) कंपनी की किट ID NOW ने। यह आइसोथर्मल एम्प्लिफीकेसन तकनीक इस्तेमाल करता है। रिजल्ट 10 से 15 मिनट में देता है। भारत ने भी इस किट का ऑर्डर दिया है और अप्रैल के तीसरे सप्ताह तक डिलिवरी की उम्मीद है। इस किट की कीमत 500-1000 रुपए होती है।

पुणे की कंपनी मायलैब डिस्कवरी सॉल्यूशन द्वारा विकसित किट पैथोडिटेक्ट covid-19, भारत की पहली Covid 19 डिटेक्शन किट है। भोपाल की कंपनी किल्पेस्ट इंडिया की TRUPCR, इसी तकनीक पर आधारित है।

जब हमारे शरीर में वायरस का प्रवेश होता है तो हमारा शरीर उस वायरस से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज बनाता है।एक दूसरे प्रकार का टेस्ट जो एलिसा (ELISA) तकनीक इस्तेमाल करती है, हमारे ब्लड से इस वायरस की उपस्थति के कारण बने एंटीबॉडी की पहचान कर संक्रमण बताता है। यह टेस्ट फ़ास्ट होता है। इससे उन रोगियों की भी पहचान की जा सकती है जो पहले संक्रमित थे लेकिन बाद में ठीक हो गए। उनकी भी पहचान की जा सकती है जिनमें मजबूत रोग निरोधक क्षमता के कारण संक्रमित होने के बाद भी उसके लक्षण परलक्षित नहीं हुए। बेंगलुरु की Bione कंपनी की तैयार किट एंटीबॉडी को डिटेक्ट कर Covid19 की पहचान करती है और पूरी प्रक्रिया सिर्फ 5-10 मिनट में हो जाती है।

अभी तक Covid19 के लिए कोई वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। इस कारण से इसके रोकथाम में कुछ विशेष प्रगति नहीं हो पाई है। तीन सप्ताह पहले ही USA की Moderna कंपनी ने NIAID, USA के साथ मिल कर mRNA-1273 का पहला क्लीनिकल ट्रायल शुरू किया है। वैक्सीन देने के लिए 45 स्वस्थ वालंटियर्स चुने गए हैं। इन्हें एक्चुअल वायरस नहीं दिया जा रहा है, इसलिए जान का कोई खतरा नहीं है। वैक्सीन डेवलपमेंट की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए ही पहले चरण में लैब में जंतुओं पर टेस्ट की अनिवार्यता खत्म कर दी गई है।

कुछ दूसरी कंपनियॉं जैसे, अमेरिका की ही इनोवियो फर्मास्यूटिकल अपना ट्रायल अगले महीने यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेनसिल्वेनिया में शुरू करने जा रही है। जॉनसन एंड जॉनसन ने 1 अप्रैल को प्रेस ब्रीफिंग कर बताया कि Covid-19 वैक्सीन के फेज 1 का पहला क्लीनिकल ट्रायल इस साल सितंबर में शुरू करेगी। सब कुछ सही रहा तो 2021 के जनवरी में वैक्सीन लॉन्च हो सकता है।

होथ थेराप्यूटिक्स (Hoth Therapeutics) के साथ मिलकर हेलोवाक्स (HaloVax) Covid-19 के लिए वाक्ससेलेरात (VaxCelerate) नामक सेल्फ असेंबली वैक्सीन शुरू करने जा रही है। यह वायरस में हो रहे जेनेटिक ड्रिफ्ट को तीव्र गति से अनुकूलित भी करता है। mRNA संबंधित मेडिसिन्स बनाने वाली अमेरिकी कंपनी अर्क्टुरुस (Arcturus) भी लूनर लिपिड मिडीएतेद के सहयोग से Covid-19 वैक्सीन पर काम करने जा रही है। GSK (GlaxoSmithKline) भी Xiamen Innovax के साथ मिलकर Covid-19 के लिए recombinant प्रोटीन आधारित वैक्सीन पर काम कर रही है।

Vaccitech और CanSinoBio के वैक्सीनस स्टेज 2 ट्रायल पे हैं। हालॉंकि थोड़ी आशा की किरण egeneron pharma और सनोफ़ी के द्वारा किया जा रहा दवा केव्जारा (Kevzara) (sarilumab) और Gilead साइंसेज कि remdesvir से भी देखने को मिल सकता है। FDA, USA द्वारा एप्रूव्ड एंटी वायरल ड्रग लोपिनाविर और रितोनाविर दोनों ड्रग ट्रायल में फेल हो गए है। लेकिन क्लीनिकल ट्रायल्स में ऐसा पाया गया कि रेम्देस्वीर कोरोना वायरस के रेप्लिकेसन को रोकता है और कंपनी तीसरे चरण का ट्रायल कर रही है। ये उन ट्रायल्स के अलावा है जो चाइना-जापान फ्रेंडशिप हॉस्पिटल के द्वारा चीन के हुबेई प्रांत में चलाया जा रहा है।

सनोफ़ी की Plaquenil जो कि मलेरिया के उपचार की दवा हाइड्रोक्सीक्लोरोकुइन (hydroxychloroquine) है, की भी तीसरे चरण की क्लीनिकल ट्रायल शंघाई पब्लिक हेल्थ क्लीनिक सेंटर में जारी है। कोलंबिया यूनिवर्सिटी इरविंग मेडिकल सेंटर में भी इसकी ट्रायल अगले वर्ष तक कर लेने की उम्मीद है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ एंटीमाइक्रोबियल एजेंट्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक azitromycine (एक एंटीबायोटिक) हाइड्रोक्सीक्लोरोकुइन के साथ मिलकर वायरस का सफाया करने में ज्यादा कारगर है। हालॉंकि बहुत विश्वसनीय प्रमाण के अभाव और मरीजों की सुरक्षा को देखते हुए इसे ज्यादा तवज्जो नहीं दिया जा रहा है।

जापान की ताकेदा फार्मास्यूटिकल ने 4 अप्रैल को US कॉन्ग्रेस के मेंबर्स को अपने एंटीबाडी बेस्ड (Polyclonal hyperimmune globulin H-IG) ट्रीटमेंट प्लान से अवगत कराया। कैनेडियन कंपनी भी Lilly के साथ मिलकर, USA के पहले Covid-19 पेशेंट के एंटीबाडी पर काम की शुरुआत की है, जो कोरोना वायरस के संक्रमण से ठीक हुआ था। ऐसे बहुत सारे वैक्सीन और ट्रीटमेंट पर काम जारी हैं।

मगर इस मर्ज की दवा बनाने में सबसे बड़ी बाधा है समय। किसी भी दवा या वैक्सीन का क्लीनिकल ट्रायल्स जो जंतुओं में टेस्टिंग के उपरांत, मानव में परीक्षण के सामान्तया तीन स्टेज से होकर गुजरता है। पहले स्टेज में कुछ दर्जन स्वस्थ वालंटियर्स के ऊपर अजमा कर देखा जाता है कि ये उपयोग के लिए सुरक्षित है या नहीं। यह करीब तीन महीने ले लेता है। दूसरे स्टेज के ट्रायल्स में करीब 6-8 महीने लगते हैं। इसमें कुछ सौ लोग उस एरिया/क्षेत्र से प्रतिभागी बनते हैं, जहाँ उस रोग का आउटब्रेक हुआ है। तीसरे स्टेज में ये पक्रिया कुछ हज़ार लोगों पर दुहराई जाती है। इस पक्रिया के पूरे होने में भी 6-8 महीने का समय लग जाता है। इसके बाद USA में फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन सारे ट्रायल से संबंधित डाटा के पुनरीक्षण के बाद वैक्सीन या दवा के उपयोग के लिए अपनी सहमति देता है। भारत में यह काम सेंट्रल ड्रग्स स्टैण्डर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन, नई दिल्ली करती है। यह पक्रिया पूरी होने में 1 महीने से 1 साल लगता है। अगर सारे प्रक्रिया को जोड़ा जाए तो Covid-19 के जो ड्रग्स क्लीनिकल ट्रायल्स स्टेज 3 में भी हैं उनके भी मरीजों तक पहुॅंचने में अभी 6 महीने और लग जाएँगे।

वैक्सीन के विकास में अमूमन एक से डेढ़ साल लगते हैं। इस समय Covid-19 पर काबू पाने के लिए युद्धस्तर पर काम चल रहा है। यह वैश्विक स्तर पर मानव जीवन के इतिहास की सबसे प्रेरणादायक कहानी साबित होगी। Covid-19 की उत्पति और विस्तार से संबंधित साइंटिफिक रिपोर्ट्स ना केवल इसके रहस्य से पर्दा उठाएँगे, बल्कि नई ग्लोबल महामारी की चुनौतियों से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कैसे निबटा जाए, इससे संबंधित पॉलिसी बनाने में भी मदद मिलेगी।

(लेखक डॉ. राजीव रमण जर्मनी के मैडेनबर्ग स्थित leibniz institute for neurobiology में वैज्ञानिक हैं)

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