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घर के सामने ही दूरदर्शन के डायरेक्टर को मारी थी जिहादियों ने गोली, अपने ही लोगों ने की थी मुखबिरी

13 फरवरी, 1990 की शाम करीब 7:15 बजे थे और दूरदर्शन कश्मीर के डायरेक्टर कौल अपने बीमार माता-पिता के पास उनसे मिलने जा रहे थे। जैसे ही घर के बाहर उन्होंने अपनी गाड़ी का दरवाज़ा खोला, जेकेएलएफ के बंदूकधारियों ने उन्हे गोली मार दी।

31 अक्टूबर को जम्मू-कश्मीर का दो केंद्र-शासित प्रदेशों में बंटना इतिहास में एक बहुत बड़े बदलाव के रूप में दर्ज हो गया। भारतीय संविधान के वे सभी वाक्य अब हमेशा के लिए बदल गए हैं, जिनमें कहा जाता था, “यह कानून जम्मू-कश्मीर के अलावा अन्य राज्यों के लिए है”- यानी केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए सारे कानून अब जम्मू-कश्मीर में लागू होंगे। इसी के साथ भारतीय दंड संहिता की बजाय राज्य में लागू रणबीर दंड संहिता का भी अंत हो गया। इन्हीं बदलावों के बीच ‘रेडियो कश्मीर’ का नाम भी ‘ऑल इंडिया रेडियो’ हो गया है।

हालाँकि रेडियो कश्मीर ‘जम्मू’ और रेडियो कश्मीर ‘श्रीनगर’ दोनों को ही ऑल इंडिया रेडियो के साथ जोड़ पहले ही दिया गया था, मगर इन दोनों ही स्टेशनों का नाम नहीं बदला गया था, क्योंकि इन्हीं के ज़रिए मुज़फ्फराबाद, पीओके से प्रसारित पाकिस्तानी प्रोपेगंडा को जवाब दिया जाता था।

इनके नाम बदलाव की इस घोषणा के बाद न्यूज़ एजेंसी एएनआई की संपादक स्मिता प्रकाश ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के कर्मचारी लस्सा कौल के बारे में ट्वीट किया। बता दें कि कौल की हत्या का आरोप सूबे के जिहादी संगठन जेकेएलएफ यानी जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट पर है, जिसके आतंकियों ने उन्हें फरवरी 1990 को उन्हीं के घर के सामने गोली मार दी थी

13 फरवरी, 1990 की शाम करीब 7:15 बजे थे और दूरदर्शन कश्मीर के डायरेक्टर कौल अपने बीमार माता-पिता के पास उनसे मिलने जा रहे थे। जैसे ही घर के बाहर उन्होंने अपनी गाड़ी का दरवाज़ा खोला, जेकेएलएफ के बंदूकधारियों ने उन्हे गोली मार दी। कौल के निर्देशन में दूरदर्शन कश्मीर जिहादियों की अलगाववादी हिंसा का आलोचक था और इसके लिए कौल को जेकेएलएफ़ वालों ने धमकी भी दे रखी थी।

पत्रकार राहुल पंडिता ने अपने ट्वीट्स में जेकेएलएफ द्वारा उनकी हत्या के घटनाक्रम को याद करते हुए उनकी एक तस्वीर शेयर की। कौल की हत्या का मुख्य आरोपित सरगना बिट्टा कराटे है, जो फ़िलहाल जेकेएलएफ़ का मुखिया है और उसे ‘पंडितों का कसाई’ कहा जाता है

अपने ट्वीट में राहुल ने बताया कि कश्मीर में उग्रवाद बढ़ने के वक़्त कौल पहले ही अपनी पत्नी और बेटी को ग़ाज़ियाबाद स्थित एक रिश्तेदार के घर छोड़ गए थे। कौल की हत्या के बाद उनके दो सहकर्मी उनके परिवार को तलाशते हुए श्रीनगर ले जाने के लिए आए मगर उनके पास कोई पता नहीं था। उनका पता तब चला जब पुलिस को एक घर से विलाप की खबर मिली।

कुछ लोगों का मानना है कि कौल के साथी भी उनकी हत्या की साजिश में मिले हुए थे। कहा यह भी जाता है कि उनकी खबरें उनके ही आसपास के लोगों ने आतंकियों तक पहुँचाईं थीं। अपने माँ-बाप की सात संतानों में से इकलौते जिंदा बचे ‘लस्सा’ के नाम का कश्मीरी में अर्थ होता है ‘लम्बी उम्र वाला’, मगर जेकेएलएफ़ ने उनके जीवन की डोर बहुत पहले ही काट दी।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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