मिडिल ईस्ट युद्ध के कारण पेट्रोलियम ईंधन की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ गई है। कई देशों में पेट्रोल, डीजल और LPG जैसी चीजों की कमी होने लगी है। भारत में ज्यादातर पेट्रोकेमिकल उत्पादों की कमी नहीं है लेकिन कुछ जगहों पर LPG की कमी देखी गई है। इसलिए सरकार ने तय किया है कि घरेलू उपभोक्ताओं को परेशानी न हो और इसके लिए LPG की बिक्री व्यावसायिक संस्थानों के लिए सीमित की जाएगी।
इस कमी की मुख्य वजह यह है कि भारत पेट्रोलियम उत्पादों खासकर LPG के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। जीवाश्म ईंधन के दो मुख्य स्रोत होते हैं- कच्चा तेल (क्रूड ऑयल) और प्राकृतिक गैस। ज्यादातर तेल के कुओं से तेल और गैस दोनों निकलते हैं जबकि कुछ कुओं से केवल गैस ही मिलती है। बाद में इन दोनों को रिफाइनरियों में अलग-अलग पेट्रोलियम उत्पादों में बदला जाता है।
LNG vs LPG
इन दिनों LNG और LPG की सप्लाई को लेकर काफी चर्चा हो रही है। LNG और LPG दोनों गैस ईंधन हैं, जिन्हें आसानी से ले जाने और स्टोर करने के लिए तरल (लिक्विड) रूप में रखा जाता है। लेकिन इन दोनों की बनावट और स्रोत अलग-अलग होते हैं।
प्राकृतिक गैस जीवाश्म ईंधन के दो मुख्य स्रोतों में से एक है जबकि दूसरा कच्चा तेल (क्रूड ऑयल) है। गैस और कच्चे तेल दोनों से कई तरह के पेट्रोकेमिकल उत्पाद बनाए जाते हैं।

प्राकृतिक गैस अपने सामान्य रूप में बड़ी मात्रा में टैंकरों के जरिए स्टोर या ट्रांसपोर्ट नहीं की जा सकती क्योंकि गैस होने के कारण एक बड़े टैंकर में भी इसकी मात्रा कम ही आ पाती है। इसलिए प्राकृतिक गैस को ठंडा करके लगभग -161°C तापमान तक लाया जाता है जिस पर यह लिक्विड बन जाती है।
इसी तरल रूप को LNG कहा जाता है। इसे टैंकों में आसानी से स्टोर किया जा सकता है और बड़े LNG टैंकरों के जरिए लंबी दूरी तक ले जाया जा सकता है। इसका मतलब यह है कि LNG कोई अलग पेट्रोलियम उत्पाद नहीं है बल्कि यह ठंडा करके तरल बनाई गई प्राकृतिक गैस ही होती है। कच्चे तेल की तरह प्राकृतिक गैस को भी रिफाइन करके कई तरह के हाइड्रोकार्बन उत्पाद बनाए जाते हैं।
LPG (Liquefied Petroleum Gas) कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस दोनों से बनने वाला ईंधन है। यह मुख्य रूप से प्रोपेन और ब्यूटेन गैस का मिश्रण होता है, जो गैस प्रोसेसिंग और तेल रिफाइनिंग के दौरान निकलते हैं। स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट के लिए इसे दबाव देकर तरल बनाया जाता है और इसलिए इसे LPG कहा जाता है। हालाँकि, इसे तरल बनाने के लिए ज्यादा दबाव नहीं लगता।
LNG में ज्यादातर मीथेन गैस होती है जबकि प्रोपेन और ब्यूटेन की मात्रा कम होती है। इसलिए LNG से LPG कम बनती है। दुनिया में ज्यादा LPG कच्चे तेल से बनती है क्योंकि उसमें कई तरह के हाइड्रोकार्बन होते हैं। भारत में LPG का सबसे ज्यादा उपयोग रसोई गैस के रूप में होता है। इसके अलावा छोटे उद्योग, हीटिंग, कृषि ड्रायर और कुछ पेट्रोकेमिकल उद्योगों में भी इसका उपयोग होता है।
LNG के भी कई उपयोग हैं। इसे एक खास टर्मिनल पर फिर से गैस बनाया जाता है और पाइपलाइन से भेजा जाता है। भारत में इससे मिलने वाली प्राकृतिक गैस का उपयोग बिजली उत्पादन, उर्वरक उद्योग, सिटी गैस नेटवर्क और वाहनों के लिए CNG बनाने में होता है।
भारत में कहाँ से आते हैं तेल और गैस?
भारत में तेल और गैस की जरूरत घरेलू उत्पादन और आयात दोनों से पूरी होती है। देश में कुछ कच्चा तेल समुद्र के अंदर के क्षेत्रों जैसे मुंबई हाई और जमीन पर मौजूद क्षेत्रों जैसे असम और गुजरात से निकलता है लेकिन यह देश की कुल जरूरत का केवल छोटा हिस्सा ही पूरा कर पाता है। इसलिए भारत को ज्यादातर कच्चा तेल बाहर से मँगाना पड़ता है जैसे- इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और रूस।
LNG के मामले में भी भारत आयात पर काफी निर्भर है क्योंकि देश में प्राकृतिक गैस का उत्पादन जरूरत से कम है। भारत को सबसे ज्यादा LNG कतर से मिलती है, इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात और अन्य देशों से भी सप्लाई होती है। इन आयातों का बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है, जो दुनिया का एक अहम समुद्री ऊर्जा मार्ग है और अभी ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध के कारण प्रभावित है।
LPG का कुछ उत्पादन भारत में रिफाइनरी और गैस प्लांट्स में होता है लेकिन यह माँग के लिए काफी नहीं है। भारत हर साल लगभग 31 मिलियन टन LPG इस्तेमाल करता है जबकि देश में सिर्फ करीब 13 मिलियन टन ही बन पाती है। इसलिए भारत को बड़ी मात्रा में LPG आयात करनी पड़ती है। इसके मुख्य सप्लायर सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत हैं। हालाँकि, भारत हाल के समय में US जैसे अन्य देशों से भी आयात बढ़ा रहा है। कुल मिलाकर भारत की LPG जरूरत का करीब 40% देश में बनता है जबकि बाकी 60% आयात के जरिए आता है।
सिर्फ LPG की ही कमी क्यों?
अब सवाल उठता है कि जब LPG कच्चे तेल और LNG से बनती है, तो देश में पेट्रोल-डीजल की कमी नहीं है लेकिन LPG की कमी क्यों हो रही है।
इसकी मुख्य वजह रिफाइनरी की सीमाएँ हैं। तेल रिफाइनरी एक तय तकनीक और कच्चे तेल के हिसाब से बनी होती हैं। एक बैरल कच्चे तेल से कितना पेट्रोल, डीजल या LPG निकलेगी यह पहले से लगभग तय होता है। इसलिए अचानक LPG का उत्पादन बढ़ाना आसान नहीं होता। इसके लिए रिफाइनरी में बड़े बदलाव करने पड़ते हैं, जिसमें बहुत पैसा और कई साल लगते हैं।
प्रोपेन और ब्यूटेन जैसी गैसें सीमित मात्रा में ही निकलती हैं। इन्हें ज्यादा बढ़ाने के लिए या तो अन्य पेट्रोकेमिकल उत्पादों को कम करना पड़ेगा या नई महँगी मशीनें लगानी पड़ेंगी।
दूसरी वजह स्टोरेज और सप्लाई सिस्टम है। LPG को दबाव वाले टैंक और खास सिलेंडरों में ही रखा और ले जाया जा सकता है, इसलिए इसे ज्यादा मात्रा में जमा करना मुश्किल होता है। जबकि पेट्रोल और डीजल जैसे तरल ईंधन सामान्य टैंकों में आसानी से स्टोर किए जा सकते हैं। LPG की पूरी सप्लाई व्यवस्था लगातार चलने वाले सिस्टम पर आधारित है। यानी इसे लंबे समय तक बड़े भंडार के रूप में जमा करके नहीं रखा जाता। वहीं, कच्चे तेल, पेट्रोल और डीजल जैसे ईंधनों के रणनीतिक भंडार बनाए जाते हैं जो लगभग दो महीने की माँग पूरी कर सकते हैं।
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)


