Sunday, October 17, 2021
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818 मौतें और दमन का वही दौर: पाबंदी के बीच हर रात गुपचुप उतर रहे विमानों में कौन सा चीनी माल?

सिलीगुड़ी कॉरिडोर या चिकेन नेक के लिहाज से भी भारत और म्यांमार के प्रगाढ़ संबंध अहम हैं।

हिंदी फिल्म का एक मशहूर गाना है, मेरे पिया गए रंगून वहाँ से किया टेलीफोन… पर आज शायद ही कोई चाहे कि उसके पिया रंगून जाएँ। वजह रंगून वाला म्यांमार इस समय लोकतंत्र की वापसी के लिए प्रदर्शन कर रहे लोगों के सैन्य दमन से कराह रहा। वहाँ यह हालत इसलिए हुई क्योंकि 1 फरवरी 2021 को सेना ने संसदीय चुनावों से चुनकर सत्ता में आई सरकार का तख्तापलट दिया। इसके साथ म्यांमार फिर से उसी सैन्य शासन के दौर में चला गया जहाँ से 48 सालों बाद लौटा था। दशकों के संघर्ष के बाद 2011 में वहाँ लोकतंत्र पुनर्जीवित हुआ। लेकिन 10 साल में ही उसे फिर नजर लगी गई। किसकी? चीन की? इस सवाल का जवाब तलाशने से पहले उन तमाम पहलुओं पर गौर करते हैं जो म्यांमार की इस अस्थिरता से जुड़े हैं।

1948 में ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद म्यांमार में तीसरी बार सेना ने तख्तापलट किया और शासन अपने हाथ में ले लिया है। 1 फरवरी 2021 को सेना ने आपातकाल की घोषणा कर दी और लोकतान्त्रिक रूप से चुनी गई म्यांमार की शीर्ष नेता आंग सान सू की (Aung San Suu Kyi) और उनकी पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) के बाकी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद से ही म्यांमार में हिंसक प्रदर्शन शुरू हैं और सैन्य नरसंहार में कई प्रदर्शनकारियों की मृत्यु भी हो चुकी है।

नवंबर 2020 में म्यांमार में हुए संसदीय चुनावों में NLD ने बहुमत हासिल किया और आंग सान सू की देश की सर्वोच्च नेता चुनी गईं। चुने गए संसद सदस्यों ने 2021 में संसद का पहला सत्र बुलाया जिसके बाद ही सेना ने चुनावों में धोखाधड़ी का हवाला देते हुए देश में सैन्य शासन की घोषणा कर दी और सू की समेत अन्य नेताओं को हिरासत में ले लिया। फिलहाल म्यांमार का शासन सेना के कमांडर-इन-चीफ मिन आंग लैंग के हाथों में है। 1 फरवरी 2021 के बाद से लागू सैन्य शासन के बाद म्यांमार में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। ताजा खबरों के मुताबिक म्यांमार में इन प्रदर्शनों में अब तक 818 लोग मारे जा चुके हैं और 4,296 लोग हिरासत में हैं।  

म्यांमार दक्षिण-पूर्व एशिया का एक महत्वपूर्ण देश है जिसकी राजधानी नेपिडा (Nay Pyi Daw) है। म्यांमार का सबसे महत्वपूर्ण शहर यांगून (Yangon) है, जो कभी रंगून के नाम से जाना जाता था। भारत के साथ-साथ इस देश की सीमाएँ चीन, बांग्लादेश, थाइलैंड और लाओस जैसे देशों से जुड़ी हुई हैं। लगभग साढ़े पाँच करोड़ की जनसंख्या वाला म्यांमार मुख्यतः एक बौद्ध देश है।

म्यांमार की भौगोलिक स्थिति (फोटो : ब्रिटनिका)

म्यांमार में सैन्य शासन

1948 में म्यांमार को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त हुई। इसके बाद 1958 से 1960 तक सेना ने म्यांमार की सत्ता अपने पास रखी। 1960 में चुनावों के माध्यम से सेना ने लोकतान्त्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को म्यांमार का शासन सौंप दिया, लेकिन 2 साल बाद ही 1962 में एक बार फिर देश में सैन्य शासन लागू हो गया। यह सैन्य शासन 2011 तक चला। 2010 में म्यांमार सेना ने देश को एक लोकतंत्र बनाने का निर्णय लिया और एक बार फिर चुनावों के द्वारा चुनी हुई सरकार ने म्यांमार का शासन सँभाल लिया। 2015 में NLD ने ही चुनाव जीता था और सरकार बनाई थी।

आंग सान सू की हमेशा से ही म्यांमार में लोकतंत्र की बहाली की समर्थक रही हैं। 1989 से 2010 के बीच सू की 15 सालों तक हिरासत में रहीं। इस दौरान 1991 में उन्हें शांति का नोबल पुरस्कार भी प्रदान किया गया जब वो लोकतंत्र की बहाली के लिए रैली और प्रदर्शन करने के कारण हाउस अरेस्ट में थीं।

म्यांमार की नेता आंग सान सू की (फोटो : हिंदुस्तान टाइम्स)

आसियान का दरवाजा

वर्तमान में म्यांमार में चल रही इस राजनैतिक उथल-पुथल के एक नहीं बल्कि कई महत्वपूर्ण पहलू हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि म्यांमार की अस्थिरता न केवल म्यांमार के लिए, बल्कि भारत के लिए भी मायने रखती है। दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की स्थिति पहले से काफी बेहतर हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले से चली आ रही ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ को ‘ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी’ से बदल दिया और दक्षिण-पूर्व एशिया समेत अन्य पूर्वी देशों के साथ बेहतर आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों की शुरुआत की।

भारत के लिए म्यांमार दक्षिण-पूर्व एशिया और आसियान के दरवाजे की तरह है और शायद यही कारण है कि भारत और म्यांमार के बीच कई समझौते हुए हैं। लेकिन म्यांमार की वर्तमान स्थिति चिंताजनक है और यह चिंता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि म्यांमार में चल रही इस राजनैतिक अस्थिरता में चीन का बड़ा योगदान बताया जा रहा है।   

भारत और दक्षिण-पूर्वी एशिया की स्थिति

ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी की सफलता

भारत और म्यांमार के बीच प्रगाढ़ होते संबंधों के बारे में जानने से पहले हमें सिलीगुड़ी कॉरिडोर या चिकेन नेक की चर्चा करनी चाहिए। दरअसल भारत अपने पूर्वोत्तर हिस्से से एक छोटे से कॉरिडोर के माध्यम से जुड़ा हुआ है। 20-21 किमी का यह कॉरिडोर चिकेन नेक कहलाता है। इसे लेकर हमेशा से ही भारत के रक्षा विशेषज्ञ चिंतित रहते हैं क्योंकि इस छोटे से गलियारे को ब्लॉक करके भारत का संपर्क उसके पूर्वोत्तर हिस्से से खत्म किया जा सकता है। भौगोलिक स्थिति ही ऐसी है।

चिकेन नेक कहा जाने वाला गलियारा (फोटो : टाइम्स ऑफ इंडिया)

आपको याद होगा कि दिल्ली में शाहीनबाग के विरोध प्रदर्शनों के मास्टरमाइंड शरजील इमाम ने CAA विरोधी रैली में असम और पूर्वोत्तर भाग को भारत से काटने की बात कही थी। उसने कहा था, “अगर 5 लाख लोग हमारे पास ऑर्गेनाइज्ड हों तो हम नार्थ-ईस्ट और हिंदुस्तान को परमानेंटली काट कर सकते हैं। परमानेंटली नहीं तो कम से कम एक या आधे महीने के लिए असम को हिंदुस्तान से काट ही सकते हैं।“ इमाम ने चिकेन नेक का जिक्र करते हुए कहा था कि भारतीय सेना को असम तक पहुँचने से रोकने के लिए चिकेन नेक को काटा (ब्लॉक) जा सकता है, क्योंकि चिकेन नेक एक मुस्लिम बहुल इलाका है।  

इसी समस्या को खत्म करने के लिए भारत और म्यांमार संयुक्त रूप से ‘कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांसिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट’ पर कार्य कर रहे हैं। इस परिवहन प्रोजेक्ट के तहत कोलकाता को म्यांमार के रखाइन प्रांत स्थित सित्वे बंदरगाह से जोड़ा जा रहा है। इसके बाद भारत के पूर्वोत्तर भाग तक पहुँचने के लिए परिवहन के माध्यम के रूप में म्यांमार की प्रमुख नदी कलादान और म्यांमार के भूभाग का उपयोग किया जाएगा। इस तरह भारत म्यांमार के रास्ते भी अपने सबसे महत्वपूर्ण पूर्वोत्तर भाग से जुड़ पाएगा। यह प्रोजेक्ट ही चिकेन नेक की समस्या का एक बड़ा समाधान है।

भारत को पूर्वोत्तर क्षेत्र से जोड़ने वाला ‘कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांसिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट (फोटो : विकिपीडिया)

अब आते हैं भारत के आर्थिक हितों पर। अपने ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी के कारण भारत के संबंध दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के साथ बेहतर हुए हैं। भारत, म्यांमार और थाइलैंड के साथ एक त्रिपक्षीय हाइवे प्रोजेक्ट पर भी काम कर रहा है। इस प्रोजेक्ट के जरिए भारत का उद्देश्य है सड़क मार्ग से म्यांमार होते हुए थाइलैंड और उसके बाद अन्य दक्षिण-पूर्वी देशों के साथ संपर्क बढ़ाना। ध्यान दें कि म्यांमार आसियान संगठन का एकमात्र देश है जो जमीन और समुद्र दोनों माध्यमों से भारत से जुड़ा हुआ है। भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास और रणनीतिक सुरक्षा के लिए म्यांमार एक बड़ी भूमिका अदा कर सकता है।

भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय हाइवे प्रोजेक्ट (फोटो : विकिपीडिया)

हालाँकि म्यांमार की सेना के साथ भी भारत के संबंध सही रहे हैं। 2020 में म्यांमार ने 22 भारतीय उग्रवादियों को भारत को सौंपा था। इसके अलावा भारत ने म्यांमार को सैन्य उपकरण निर्यात करने का फैसला भी किया था। चूँकि भारत की एक बड़ी सीमा म्यांमार के साथ जुड़ी हुई है, ऐसे में भारत को म्यांमार की सेना की सहायता भी आवश्यक है। 2015 में भारत की सेना ने म्यांमार में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक की थी। भारतीय सेना के पास जानकारी थी कि म्यांमार के पोन्यु इलाके के पास उंजिया में उग्रवादी गुट ‘द नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड-खापलांग’ (NSCN-K) के कैंप सक्रिय हैं। 8 और 9 जून की रात को भारतीय सेना के जवान म्यांमार की सीमा में दाखिल हुए थे और सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया था। स्ट्राइक के बाद म्यांमार को इसकी सूचना दे दी गई थी।

चीन की BRI

यहाँ भी चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट एण्ड रोड इनिशिएटिव (BRI) की चर्चा करना आवश्यक हो जाता है, क्योंकि म्यांमार ने इसका हिस्सा बनना स्वीकार किया है। म्यांमार में अपनी इस परियोजना के माध्यम से चीन बंगाल की खाड़ी और उसके बाद हिन्द महासागर के पूर्वी हिस्से में अपनी उपस्थिति मजबूत करना चाहता है।

पिछले साल अगस्त में रिपोर्ट आई थी कि म्यांमार में BRI के अंतर्गत चीन के द्वारा शुरू किए गए प्रोजेक्ट लगातार देरी में चल रहे हैं। म्यांमार यांगून मेगा सिटी प्रोजेक्ट में चीन की भूमिका को सीमित करना चाहता है। म्यांमार ने इस मेगा प्रोजेक्ट को चीन की कंपनी के अलावा अन्य वैश्विक कंपनियों के लिए खोलने का निर्णय लिया है। यांगून मेगा सिटी प्रोजेक्ट, चीन-म्यांमार इकोनॉमिक कॉरिडोर (CMEC) का एक हिस्सा है। CMEC के अंतर्गत चीन ने अपने युन्नान प्रांत को म्यांमार के मंडाले से जोड़ने का लक्ष्य रखा है।

इसके अलावा म्यांमार के काचीन प्रांत में निर्माणरत मिटकिना इकोनॉमिक डेवलपमेंट जोन (MEDZ) पर भी म्यांमार सरकार और चीन की कंपनियों के बीच सामंजस्य नहीं बन पा रहा है। 2018 में हुए समझौते के बाद 2021 में इस प्रोजेक्ट के पूरा होने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन असहमति के कारण यह प्रोजेक्ट शुरू भी नहीं हुआ है। दरअसल चीन इन परियोजनाओं के माध्यम से अपने शहरों को बंगाल की खाड़ी से जोड़ना चाहता है।

हालाँकि पिछले कुछ समय से म्यांमार और भारत में नजदीकियाँ बढ़ी हैं और दोनों देश इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के मामले में साथ कार्य करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। भारत, म्यांमार में श्वे ऑयल एण्ड गैस प्रोजेक्ट (Shwe Oil and Gas Project) में निवेश कर रहा है। साथ ही भारत ने रखाइन स्टेट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के अंतर्गत म्यांमार के रखाइन प्रांत में विकास कार्यक्रमों के लिए समझौता किया है।

चीन पर आरोप

अब बात करते हैं कि म्यांमार में सैन्य तख्तापलट के बाद चीन की भूमिका पर प्रश्न क्यों उठ रहे हैं। म्यांमार ने पहले भी चीन पर अराकान आर्मी और अराकान रोहिंग्या सैलवेशन आर्मी की सहायता करने का आरोप लगाया था। दोनों ही म्यांमार के रखाइन प्रांत के उग्रवादी समूह हैं। इसके अलावा म्यांमार में चीनी नागरिकों पर यह आरोप भी लगे कि 2015 से 2017 के बीच उन्होंने म्यांमार नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस आर्मी को फंडिंग की। यह एक वामपंथी सशस्त्र संगठन है।

इस वामपंथी संगठन ने चीनी नागरिकों के द्वारा वीचैट के माध्यम से पाँच लाख डॉलर (लगभग 3 करोड़ 65 लाख रुपए) जुटाए थे। इसके अलावा भी चीन पर म्यांमार के सबसे बड़े सशस्त्र संगठन यूनाइटेड वा स्टेट आर्मी की सहायता करने का भी आरोप है। इस समूह को चीनी उद्योगपति ने पॉन्जी स्कीम की सहायता से करोड़ों रुपए की फंडिंग की।

अब आते हैं म्यांमार में सैन्य शासन और उसके चीन से कथित संबंधों पर। ताइवान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार चीनी सैनिकों की तरह दिखने वाले कई लोग चीन से फ्लाइट के माध्यम से म्यांमार आ रहे हैं और इन्हें म्यांमार के शहरों में देखा जा सकता है। थिंक टैंक ऑस्ट्रेलियन स्ट्रेटेजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट (ASPI) के मुताबिक म्यांमार में अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर प्रतिबंध के बाद भी हर रात संदिग्ध फ्लाइट म्यांमार के हवाईअड्डों में उतरती हैं जिनमें बड़ी संख्या में लोग होते हैं और संदिग्ध सामान होता है।

म्यांमार में एक बड़े वर्ग के बीच यह चर्चा है कि चीन, म्यांमार की सेना (मिलिट्री जनता) को तकनीकी सहायता प्रदान कर रहा है जिससे सोशल मीडिया के जरिए विरोध-प्रदर्शन के लिए लोगों को इकट्ठा होने से रोका जा सके। स्थानीय लोगों में चीन के प्रति गुस्सा भी है। इसी के चलते 14 मार्च 2021 को हलिंगथैया (Hlaingthaya) में चीनी फैक्ट्री को आग के हवाले कर दिया गया था।

चीन में बाकी देशों की तरह आंतरिक विरोध की कोई समस्या नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि चीन की कम्युनिस्ट सरकार एक पूर्ण तानाशाही सरकार है जो दुनिया पर आधिपत्य स्थापित करने के लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ रही है। यही कारण है कि बिना किसी आंतरिक विरोध की चिंता किए बिना चीन दूसरे देशों के मामलों में दखल देता रहता है।

म्यांमार के उच्च सैन्य अधिकारियों के साथ चीन के संबंध पहले उतने सही नहीं थे जितने अब हैं। म्यांमार के इन अधिकारियों ने कई बार चीन के प्रोजेक्ट्स का विरोध किया है। लेकिन चीन समय के साथ अपनी रणनीतियों को बदलना जानता है। म्यांमार में सैन्य शासन के बाद जहाँ पश्चिमी देशों ने म्यांमार की सैन्य सरकार पर प्रतिबंध लगाने की शुरुआत की वहीं चीन ने इसमें अपने फायदे के लिए अवसरों को तलाश लिया। एक ओर जहाँ यूके और अमेरिका ने सेना के कमांडर-इन-चीफ मिन आंग लैंग पर रोहिंग्या मुद्दे के बाद प्रतिबंध लगाए वहीं चीन के विदेश मंत्री ने लैंग को भरपूर इज्जत देते हुए उनसे मुलाकात की और म्यांमार सेना के ‘राष्ट्रीय पुनर्निर्माण’ के लक्ष्य की सराहना की।

हालाँकि म्यांमार की सेना के उच्च सैन्य अधिकारी और चीन किस रणनीति पर काम कर रहे हैं यह स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया है लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के विशेषज्ञ ऐसे मामलों में चीन की कुटिलता के विषय में लगातार बात कर रहे हैं। अस्थिरता में अवसर की तलाश करना ही चीन की रणनीति रही है।

रोहिंग्या विरोधी कमांडर

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि म्यांमार की सत्ता सेना के कमांडर-इन-चीफ मिन आंग लैंग के हाथों में है और ये वही हैं जिन पर रोहिंग्या मुस्लिमों के नरसंहार का आरोप है। ऐसे में लैंग के सत्ता अपने हाथ में लेने से रोहिंग्या मुसलमानों का पलायन और तेज हो सकता है। अब आगे आने वाले समय में यह देखना होगा कि क्या एक बार फिर बड़ी संख्या में रोहिंग्या बांग्लादेश या भारत का रूख करते हैं। हालाँकि भारत रोहिंग्या मुस्लिमों को डिपोर्ट करने की रणनीति पर काम कर रहा है। हाल ही में अपने एक आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर के अवैध रोहिंग्या घुसपैठियों के विषय में कहा था कि इन अवैध घुसपैठियों के नियमानुसार डिपोर्टेशन को अनुमति दी जा सकती है।  

म्यांमार सेना के कमांडर-इन-चीफ मिन आंग (फोटो : डेक्कन हेराल्ड)

म्यांमार की यह अस्थिरता किस सीमा तक जाती है, यह तो समय ही बताएगा लेकिन म्यांमार की परिस्थितियों पर भारत पूरी तरह से नजर बनाए हुए है। जब तक आंग सान सू की (Aung San Suu Kyi) और उनकी पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) सत्ता में थी तब भारत के म्यांमार से बेहतर संबंध थे। म्यांमार की सेना के साथ भी भारत के संबंध खराब नहीं हैं। लेकिन तख्तापलट में चीन की भूमिका को लेकर उठते सवाल एक नया रणनीतिक मोर्चा खोल रहा है।

 

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ओम द्विवेदी
Writer. Part time poet and photographer.

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