Wednesday, December 2, 2020
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को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ: प्रयागराज की महिमा भला कौन कह सकता है

प्रयागराज की महिमा कौन कह सकता है भला? यदि पाप रूपी मदमस्त हाथियों का समूह सब कुछ नष्ट करने पर तुला हो तो सिंह रूपी तीर्थराज प्रयाग उनका वध कर सकता है।

तीर्थराज प्रयागराज की महिमा जानने से पूर्व यह जानना आवश्यक है कि ‘तीर्थयात्री’ कौन होता है। तीर्थ शब्द ‘तृ’ धातु से निर्मित हुआ है, जिसका अर्थ है तैरना। यात्रा शब्द की उत्पत्ति ‘या’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है कहीं गमन करना या जाना। इस प्रकार तीर्थयात्री वह है जो जीवन रूपी भवसागर को तैरकर पार कर जाता है।

प्रयाग शब्द ‘प्र’ और ‘यज्’ धातु के योग से बना है। यज् धातु से निर्मित याग शब्द के कई अर्थ निकलते हैं जैसे- यज्ञ के द्वारा देवता की पूजा करना, संगति करना या दान देना। ऐसा स्थान जहाँ कोई वृहद यज्ञ किया गया हो, वह प्रयाग है। पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी ने यहाँ यज्ञ किया था।

प्रयागराज को तीर्थों का राजा कई कारणों से कहा गया है। पद्म पुराण के अनुसार: “ग्रहाणां च यथा सूर्यो नक्षत्राणां यथा शशी। तीर्थानामुत्तमं तीर्थे प्रयागाख्यमनुत्तमम्।” अर्थात- जैसे ग्रहों में सूर्य तथा नक्षत्रों में चन्द्रमा हैं, वैसे ही तीर्थों में प्रयाग सर्वोत्तम है।”

कुछ दिनों पहले शासन ने इलाहाबाद कहे जाने वाले नगर का नाम आधिकारिक रूप से प्रयागराज कर दिया। इसे नाम का परिवर्तन नहीं कहा जा सकता। नगर का नाम बदला नहीं गया है। कुछ सौ वर्षों से लोगों में जो भ्रम था, बस वही दूर किया गया है।

नगर का नाम प्रयाग तो आदिकाल से है। पुराणों में प्रयाग नगरी के नामकरण और माहात्म्य के वर्णन तो हैं ही, तीर्थराज प्रयाग की महिमा गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में भी बताई है। गोस्वामी जी ने प्रयागराज को परमार्थ प्रदान करने वाले एक राजपुरुष के रूप में चित्रित किया है।

अयोध्याकाण्ड का प्रसंग इस प्रकार है कि जब भगवान राम सीताजी और लक्ष्मण जी सहित वनवास के लिए निकले तो सुमंत्र को विदा करने के पश्चात् उन्होंने नाव से गंगा पार की, केवट को भक्ति का वरदान दिया, गंगा जी से आशीर्वाद लिया और प्रयाग पहुँचे।

गोस्वामी जी कहते हैं: “तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू, लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू, प्रात प्रातकृत करि रघुराई। तीरथराजु दीख प्रभु जाई” अर्थात्- उस दिन सभी ने वृक्ष के नीचे विश्राम किया, जिसकी पूरी व्यवस्था लक्ष्मण जी और सखा गुह ने कर दी। प्रातःकाल नित्यक्रिया से निवृत्त होने के पश्चात् प्रभु ने ‘तीर्थराज’ के दर्शन किए।

अभी वे नगर के भीतर नहीं गए हैं, बाहर से ही वर्णन किया जा रहा है। प्रयाग का वर्णन करते हुए गोस्वामी जी लिखते हैं: “सचिव सत्य श्रद्धा प्रिय नारी, माधव सरिस मीतु हितकारी।“ अर्थात्- यह जो तीर्थों का राजा है, इसके सचिव (मंत्री आदि) का नाम सत्य है। यहाँ नगर को ही राजा मान लिया गया है, जिसके मंत्रीगण सत्यनिष्ठा से सुशोभित हैं।

ऐसी उपमा देकर गोस्वामी जी यह बता रहे हैं कि मृत्यु और मोक्ष ही परम सत्य नहीं है (जो काशी में आकर सिद्ध होता है), अपितु तीर्थों के दर्शन से पापों का निवारण होता है यह भी अटल सत्य है, इसीलिए तो ‘तीर्थों के राजा’ के मंत्री ‘सत्य’ हैं।

यहाँ गोस्वामी जी कर्म करने की प्रेरणा देते हैं। व्यक्ति पापों का नाश तभी करना चाहेगा जब या तो उसे पुनर्जन्म लेना होगा अथवा इसी जन्म में सत्कर्म करने होंगे। इस प्रकार तीर्थराज प्रयाग कर्मों का वह मार्ग प्रशस्त करते हैं जिसका अनुगमन कर व्यक्ति काशी पहुँचता है और यहाँ देहत्याग कर मोक्ष की प्राप्ति करता है।

आज भी देखिए तो प्रयाग और काशी को जोड़ने वाला राजमार्ग एकदम सीधा है। यही नहीं गोस्वामी जी के अनुसार तीर्थराज की अर्धांगिनी ‘श्रद्धा’ हैं क्योंकि श्रद्धा के बिना किसी भी तीर्थ के दर्शन का फल नहीं मिलता। तीर्थ तो छोड़िए दैनिक पूजा भी यदि आप श्रद्धा के बिना करते हैं तो वह व्यर्थ ही है।

आजकल लोग श्रद्धाविहीन होकर तीर्थस्थलों पर पिकनिक मनाने, एडवेंचर करने चले जाते हैं फिर जब प्राकृतिक आपदा के शिकार होते हैं तब भगवान् से रोष प्रकट करते हैं। यह बड़ी विचित्र बात है! जब यात्रा प्रारंभ करने से पूर्व मन में श्रद्धा नहीं थी तो गिरने पड़ने पर रोष कैसा? इसीलिए गोस्वामी जी ने सैकड़ों वर्ष पूर्व ही बता दिया था कि तीर्थ यात्रा पर जाओ तो मन में श्रद्धा अवश्य होनी चाहिए।

यह तो बात हुई कि राजा के मंत्री, रानी और मित्र सलाहकार आदि कैसे हैं। आगे गोस्वामी जी तीर्थराज की संपन्नता के बारे में बताते हैं: “चारि पदारथ भरा भँडारू। पुन्य प्रदेस देस अति चारू।“ अर्थात्- यह ऐसा पुण्य प्रदेश है, जो चारों पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) से परिपूर्ण है। यहाँ पदारथ का अर्थ पुरुषार्थ है।

ये चारों पुरुषार्थ मनुष्य के जीवन का लक्ष्य निर्धारित करते हैं। धर्म का अनुसरण हमें किसी भी काल परिस्थिति में कर्तव्यनिष्ठ बनाता है। आर्थिक संपन्नता हमें दैहिक सौष्ठव, पारिवारिक स्थिरता तथा सामाजिक स्वीकार्यता प्रदान करती है। काम हमें जीवन में आगे बढ़ने को प्रेरित करता है। इन तीनों की सिद्धि के पश्चात् मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं।

तीर्थराज प्रयाग ऐसे राजा हैं, जिनके दर्शन से इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है। सूक्ष्म दृष्टि डाली जाए तो देश की उन्नति में भी ये चारों पुरुषार्थ सहायक हैं क्योंकि व्यक्ति का मन यदि इन पुरुषार्थों को साध ले तो अच्छा नागरिक बन सकता है। मन से मानव बनता है, मानव से समाज और देश का उत्कर्ष समाज के उत्थान में निहित है।

तीर्थराज की संपन्नता का बखान करने के पश्चात् गोस्वामी जी यह बताते हैं कि प्रयागराज का सुरक्षा घेरा कैसा था: “छेत्र अगम गढ़ु गाढ़ सुहावा। सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा, सेन सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा।“ अर्थात्- यह किले जैसा क्षेत्र अतीव दुर्गम है। यह ऐसा गढ़ (दुर्ग) है, जिसे स्वप्न में भी शत्रु जीत नहीं सकते। यहाँ शत्रु का अभिप्राय पाप से है।

प्रयागराज को कोई विधर्मी पापी दीर्घकाल तक जीत कर नहीं रख सकता। इसका प्रमाण तो उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री योगी जी ने ही दे दिया। चार सौ वर्षों से अधिक समय तक अकबर ने प्रयागराज की आभा पर ‘इलाही’ पर्दा डाल रखा था। आज वह भ्रम दूर हुआ और स्वयं गोरक्षपीठाधीश्वर ने आधिकारिक रूप से प्रयागराज का नामकरण कर जनमानस को आलोकित किया।

प्रयाग के भीतर जितने भी तीर्थ हैं, वे इसके वीर सैनिक हैं जो बड़े रणधीर हैं और पाप की सेना को पराजित करने में सक्षम हैं। प्रयागराज का कुछ ऐसा ही वर्णन मत्स्य पुराण में मार्कण्डेय ऋषि युधिष्ठिर से करते हैं। वे कहते हैं कि प्रयाग में साठ हजार वीर धनुर्धर गंगा की रक्षा करते हैं तथा सात घोड़ों से जुते हुए रथ पर चलने वाले सूर्य यमुना की देखभाल करते हैं।

इसके अतिरिक्त इंद्र, भगवान विष्णु और महेश्वर भी इसकी रक्षा करते हैं। यह ऐसा तीर्थ है, जहाँ पापी या अधर्मी व्यक्ति घुस ही नहीं सकता। प्रयागराज को कोई विधर्मी पापी दीर्घकाल तक जीत कर नहीं रख सकता।

इसका प्रमाण तो उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री योगी जी ने ही दे दिया। चार सौ वर्षों से अधिक समय तक अकबर ने प्रयागराज की आभा पर ‘इलाही’ पर्दा डाल रखा था। आज वह भ्रम दूर हुआ और स्वयं गोरक्षपीठाधीश्वर ने आधिकारिक रूप से प्रयागराज का नामकरण कर जनमानस को आलोकित किया।

आगे गोस्वामी जी बताते हैं कि गंगा यमुना सरस्वती का संगम ही तीर्थराज का सिंहासन है, अक्षयवट वृक्ष उनका छत्र है, गंगा जी और जमुना जी की तरंगे (लहरें) चँवर हैं, जिन्हें देखकर ही दुःख दरिद्रता का नाश हो जाता है: “संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा।। चवँर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा।“

इसके आगे है: “सेवहिं सुकृति साधु सुचि पावहिं सब मनकाम। बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम।।“ अर्थात् पुण्यात्मा साधू प्रयागराज की महिमा गाते हैं और वेद पुराण सब मिलकर उसके निर्मल गुणों का बखान करते हैं।

अंत में गोस्वामी जी कहते हैं: “को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ।। अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा।।“ अर्थात्- प्रयागराज की महिमा कौन कह सकता है भला? यदि पाप रूपी मदमस्त हाथियों का समूह सब कुछ नष्ट करने पर तुला हो तो सिंह रूपी तीर्थराज प्रयाग उनका वध कर सकता है। ऐसे तीर्थराज का दर्शन कर स्वयं प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने भी सुख पाया।

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