REVIEW: शास्त्रीजी की गुत्थी सुलझाते Terrorism और Secularism पर हमारे मन की बात है ‘द ताशकंद फाइल्स’

फ़िल्म की रिलीज के बाद पंकज त्रिपाठी का सेकुलरिज्म वाला डायलॉग (जिसका कुछ अंश ट्रेलर में भी दिखाया गया है) सोशल मीडिया पर वायरल होगा - यह पक्का है।

‘द ताशकंद फाइल्स’ 12 अप्रैल को रिलीज होने वाली है लेकिन ऑपइंडिया आपको 4 दिन पहले ही फ़िल्म की समीक्षा से रूबरू करा रहा है ताकि आपको फ़िल्म के बारे में सब कुछ पता चल जाए। ध्यान दें, ये कोई स्पॉइलर नहीं है, यहाँ फ़िल्म की कहानी नहीं बताई जाएगी बल्कि सिर्फ़ उसके कंटेंट के बारे में चर्चा की जाएगी। दिल्ली में हुई फ़िल्म की पहली स्क्रीनिंग के दौरान निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने वो कहानी दुहराई, जिसमें उन्होंने बताया था कि कैसे अच्छे स्कूल में पढ़ने वाले उनके बेटे को शास्त्रीजी के बारे में कभी नहीं बताया गया। विवेक अग्निहोत्री ने कहा कि इस फ़िल्म के लिए किसी प्रोड्यूसर के पास जाते, तो उन लोगों का एक ही जवाब होता- “यार, आज की जेनेरेशन में शास्त्रीजी को लेकर कौन इंटरेस्टेड है? युवा नहीं देखेगा। बोरिंग टॉपिक है।” खैर, फ़िल्म बनी और रिलीज होने को भी तैयार है।

‘द ताशकंद फाइल्स’: एक परिचय

अगर आपको नहीं पता हो तो बता दें कि ‘द ताशकंद फाइल्स’ भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के निधन/हत्या के पीछे का पर्दा उठाने की कोशिश करती है। फ़िल्म शास्त्रीजी की मृत्यु की गुत्थी सुलझाने के क्रम में भारत से लेकर रूस तक भ्रमण कराती है। फ़िल्म की शुरुआत एक डॉक्यूमेंट्री की तरह होती है, जिसे देख कर आपको सत्यजीत रे की ऐसी फ़िल्मों की याद आ जाएगी, जिसमें वो कमर्शियल एलिमेंट्स को धता बताकर अपनी फ़िल्मों में संवाद प्रयोग किया करते थे। जहाँ ज़रूरी हो वहाँ पात्र अंग्रेजी में ही बोला करते थे। अगर आपने ‘शतरंज के खिलाड़ी’ देख रखी है तो सत्यजीत रे की इस कला को आप भलीभाँति पहचानते होंगे।

विवेक अग्निहोत्री ने अंग्रेजों और रशियन पात्रों से जबरदस्ती टूटी-फूटी हिंदी नहीं बुलवाई है, सबटाइटल्स का सहारा लिया गया है। अजीब तरीके से हिंदी बोलते हुए विदेशी पात्र शायद ही आपको इस फ़िल्म में नज़र आएँ। फ़िल्म में जहाँ मिथुन चक्रवर्ती और नसीरुद्दीन शाह जैसे अनुभवी और वरिष्ठ कलाकार हैं तो पंकज त्रिपाठी के रूप में आज के दर्शकों के बीच लोकप्रिय हो रहा एक ऐसा चेहरा भी है, जो समय-समय पर एक गंभीर फ़िल्म में भी अपनी कॉमिक टाइमिंग से रोचकता बनाए रखता है। प्रकाश बेलवाड़ी और राजेश शर्मा जैसे सिनेमा के जाने-पहचाने चेहरे भी इस फिल्म में हैं। अगर आपने एयरलिफ्ट देख रखी है तो प्रकाश से अच्छी तरह परिचित होंगे। वहीं दूसरी तरफ अगर आपने ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ देखी होगी तो राजेश शर्मा के भी आप कायल हो चुके होंगे।

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उपर्युक्त दोनों ही फ़िल्में सुपरहिट थी। अगर ‘द ताशकंद फाइल्स’ की बात करें तो इसमें अपना किरदार निभाने के लिए सभी अभिनेताओं ने मेहनत की है, जो कि दिखती है। अपने जमाने में एक्शन सुपरस्टार रहे मिथुन द्वारा ऐसे किरदार चुनना और उसे निभाना उन्हें तारीफ का पात्र बनाता है। इस फ़िल्म में डाक्यूमेंट्री वाली स्टाइल का सहारा लिया गया है, जैसा बीबीसी वाले अपनी सीरीजों में करते हैं। वैसे हमारा मानना है कि अगर ये फ़िल्म नेटफ्लिक्स जैसी वेब पोर्टल्स पर आए तो इसे दर्शकों के एक बड़े वर्ग तक पहुँचाया जा सकता है। आगे हम फ़िल्म का निर्देशन और स्क्रिप्ट की बात करेंगे।

निर्देशन, स्क्रिप्ट और सिनेमैटोग्राफी

विवेक अग्निहोत्री की पहले की फ़िल्मों को देखकर विश्वास नहीं होता कि ये फ़िल्म उन्होंने ही निर्देशित की है। जहाँ एक तरफ ‘चॉकलेट (2005)’ एक तेज़ सस्पेंस थ्रिलर की तरह बुनने की कोशिश की गई थी, वहीं रिवेंज ड्रामा ‘हेट स्टोरी (2012)’ में शायद कुछ ज्यादा ही ड्रामा था। 2014 में आई ‘ज़िद’ की बात ही न करें तो अच्छा है क्योंकि उसे क्यों बनाया गया था, इसे हम भी आज तक सोच रहे हैं। हाँ, ‘बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम (2014)’ से विवेक अग्निहोत्री ने बुद्धिजीवियों से लेकर युवाओं तक के बीच अपने निर्देशन का लोहा मनवाया। फ़िल्म अच्छी चली, चर्चा में आई और वास्तविक मुद्दों पर हाल के दिनों में सबसे बढ़िया फ़िल्मों में से एक है।

‘द ताशकंद फाइल्स’ में आपको दिल्ली की अच्छी-ख़ासी झलक दिखेगी। दिल्ली मेट्रो की आपाधापी और दिल्ली की सड़कों पर सुबह जॉगिंग करतीं अभिनेत्री श्वेता बासु प्रसाद, ये सभी दृश्य फ़िल्म को जीवंत बनाते हैं। फ़िल्म में अभिनेत्री श्वेता ने एक युवा पत्रकार का किरदार निभाया है और आपको बता दें कि उन्हें फ़िल्म में भी दिल्ली मेट्रो में सीट नहीं मिलती। अगर रात का समय हो तो वो सीट लेने में कामयाब हो जाती हैं। निर्देशक के तौर पर विवेक ने छोटी-मोती बातों का ध्यान रखा है। व्हीलचेयर पर बैठी पल्लवी जोशी (जो कि एक इतिहासकार का किरदार निभा रही हैं) या फिर कंठ में एक ख़ास इंस्ट्रूमेंट लगाकर बोलता बख़्शी, इन सबके पीछे विवेक की मेहनत आपको फ़िल्म देखने पर ही पता चलेगी।

फ़िल्म का नाम और थीम देखकर बहुत लोगों को ऐसा आभास हो सकता है कि ये फ़िल्म धीमी होगी, ड्रैग करेगी, स्लो स्पीड वाली होगी लेकिन इतना गंभीर मुद्दा उठाने और उसकी तह तक जाने के बावजूद फ़िल्म धीमी नहीं है। चीजें नियंत्रित तरीके से आगे बढ़ती हैं और दृश्य दर दृश्य घटनाक्रम आपको बोर नहीं करते। पत्रकारों के केबिन को कम्प्यूटर सिस्टम्स के साथ दिखाया गया है। मिथुन चक्रवर्ती जो कि एक नेता का किदार निभा रहे हैं, उनके बेढंगे बाल और बेढंगी धोती से किरदार में वास्तविकता लाने की कोशिश की गई है।

आजकल के कॉप थ्रिलर्स के कुछ मसाले भी फ़िल्म में प्रयोग किए गए हैं। हमने सिंघम में देखा था कि कैसे गुंडों द्वारा किसी को परेशान किया जाता है। उसमे सिंघम के घर की बत्ती बुझा दी जाती है, उसके घर के आसपास रात में कुछ संदिग्ध लोग दिखते हैं, इत्यादि। ‘द ताशकंद फाइल्स’ में भी ऐसे कुछ तत्वों का सहारा लिया गया है। जब फ़िल्म भारत से रूस पहुँचती है तो आपको ऐसा महसूस होगा जैसे कोई सस्पेंस थ्रिलर चल रही हो। कुछ ही पलों के लिए सही लेकिन आपको ‘चॉकलेट’ की झलक दिख ही जाती है। कुल मिलाकर स्क्रिप्ट बढ़िया है, कहानी सही तरीके से बनाई गई है और निर्देशन के पीछे मेहनत की गई है।

सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा: फ़िल्म का थीम

फर्स्ट हाफ में लाल बहादुर शास्त्री के प्रति इंटरेस्ट जगाने की कोशिश की गई है। उनकी आवाज़, उनका पार्थिव शरीर, उनके ओरिजिनल फुटेज और उनकी मृत्य के पीछे का रहस्य, इन सबके पीछे क्या है? आज के युवाओं को कुछ दिखाने के लिए पहले उसके बारे में इंटरेस्ट जगाना होता है और विवेक ने ये काम बख़ूबी किया है। शास्त्रीजी की समाधि के कुछ दृश्य हैं जो आपको अभिभूत कर देंगे। सीआईए, केजीबी, भारत सरकार, इतिहासकारों और मीडिया के बीच फँसे इस रहस्य को कैसे निकालने की कोशिश की गई है, ये आप फ़िल्म देखकर जानेंगे। सबसे बड़ी बात यह कि फ़िल्म में इतिहास है, आज की भी कहानी है जो शास्त्रीजी की प्रासंगिकता के बारे में चर्चा करती है।

ये सब तो थी तकनीकी बातें। अब आपको फ़िल्म की थीम बताते हैं, कहानी के कोई भी अंश का ख़ुलासा किए बिना। विवेक अग्निहोत्री ने अपने पुत्र को लेकर जो बातें कही, वो फ़िल्म में उन्होंने मंदिरा बेदी (सामाजिक कार्यकर्ता) के मुँह से कहवाई है। फ़िल्म की रिलीज के बाद पंकज त्रिपाठी का सेकुलरिज्म वाला डायलॉग (जिसका कुछ अंश ट्रेलर में भी दिखाया गया है) सोशल मीडिया पर वायरल होगा – यह पक्का है। लेकिन, आतंकवाद और उसके विभिन्न प्रकारों की परिभाषा सहित व्याख्या जो मिथुन चक्रवर्ती के किरदार द्वारा दी गई है, उसे हम फ़िल्म का सबसे पसंदीदा और व्यापक असर डालने वाला दृश्य रेट करेंगे। इस दृश्य में मिथुन चक्रवर्ती ने देश के करोड़ों लोगों के मन की बात एक झटके में कह डाली है। इस बारे में विशेष आप फ़िल्म देखकर ही जान पाएँगे।

कुल मिलकर देखें तो आतंकवाद और सेकुलरिज्म पर विवेक जो कहना चाहते थे, उन्होंने उसे कहने में सफलता पाई है। अगर आपको लगता है कि ये केवल राइट विंग की फ़िल्म है तो आपको उस दृश्य का इन्तजार करना चाहिए, जिसमें मिथुन चक्रवर्ती पंकज त्रिपाठी से कुछ कहते हैं। उसके बाद आपको पता चलेगा कि फ़िल्म को सिर्फ़ और सिर्फ किसी विचारधारा विशेष को प्रोमोट करने के लिए नहीं बनाया गया है। सामाजिक कार्यकर्ता मंदिरा बेदी के किरदार पर इतिहासकार पल्लवी जोशी और इमरान क़ुरैसी के किरदार द्वारा कुछ महिला-विरोधी कमेंट किए जाते हैं, जिसके बाद के दृश्यों को देखकर आपको लगेगा कि विवेक ने काफ़ी अच्छी तरह से इन समस्याओं को भी सामने रखा है।

अगर आपने 1957 की ऑस्कर जीतने वाली हॉलीवुड फ़िल्म ’12 एंग्री मेन’ देख रखी है तो फ़िल्म में बहस के दौरान आपको उसकी कुछ झलक दिखेगी। फ़िल्म के बहस वाले दृश्य ज़ोरदार हैं, तर्कसंगत हैं और तथ्यों पर बात करते हैं। सारे किरदार एक सा नहीं सोचते, वे एक-दूसरे की बात से सहमत नहीं होते बल्कि एक-दूसरे को तथ्यों व फैक्ट्स से काटते हैं। फ़िल्म एक पक्ष को नहीं रखती बल्कि सभी पक्षों को बराबर मौक़ा देती है।

एक्टिंग और किरदार

मिथुन चक्रवर्ती के जो पुराने फैंस हैं, उन्हें शायद पता होगा कि वे अपने करियर की ऊँचाई के दिनों में भी रामकृष्ण परमहंस जैसे चुनौतीपूर्ण किरदार सफलतापूर्वक निभा चुके हैं। इस फ़िल्म में आपको कुछ दृश्यों में पुराने ‘विंटेज मिथुन’ की झलक दिखेगी। एक बंगाली नेता के रूप में उन्होंने अपने हाव-भाव में थोड़ी नाटकीयता तो लाई है लेकिन उनकी संवाद अदाएगी का स्टाइल ही यही है। नसीरुद्दीन शाह और उनका कुत्ता, दोनों ने ही ठीक-ठाक एक्टिंग की है। वो अभी भी ओंकारा हैंगओवर में ही जी रहे हैं। कुटिल गृहमंत्री का उनका किरदान रटा-रटाया है, इसमें कुछ भी नया नहीं है।

पंकज त्रिपाठी, राजेश शर्मा और प्रकाश बेलवाड़ी इस फ़िल्म के बहस वाले हिस्सों में ख़ासे प्रभावी रहे हैं। उनके बिना शायद ही इस फ़िल्म में जीवंतता की कल्पना की जा सके। यहाँ पल्लवी जोशी को स्पेशल मेंशन देना पड़ेगा क्योंकि उनका व्हीलचेयर पर बैठी इतिहासकार वाला किरदार चुनौतीपूर्ण था। शायद विवेक ने जेएनयू में ऐसे किसी इतिहासकार को देखा होगा, जिन पर पल्लवी का किरदार आधारित है। एक दायरे में रहकर एक्टिंग करना आपको बाँध देता लेकिन उन्होंने अपनी संवाद-अदाएगी से प्रभावित किया है।

फ़िल्म की मुख्य अभिनेत्री श्वेता बासु प्रसाद ने दिखाया है कि वो इस जेनेरेशन की कई अभिनेत्रियों से बेहतर है और इमोशनल दृश्यों में वो ख़ासी प्रभावी रही हैं। ख़ासकर, नशे वाली हालत में और शास्त्रीजी के समाधी वाले दृश्य में, इन दोनों में ही उनकी एक्टिंग शानदार है। फ़िल्म के क्लाइमैक्स में उनका प्रदर्शन शानदार है। कई दृश्यों में वो काफ़ी सुन्दर भी लगी हैं।

‘द ताशकंत फाइल्स’: अंतिम वर्डिक्ट

‘द ताशकंद फाइल्स’ आज के युवाओं को देखनी चाहिए। फ़िल्म में सच्चाई से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है। ज्यादा ड्रामा दिखाने के चक्कर में तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा नहीं गया है। ये कोई डॉक्यूमेंट्री नहीं है बल्कि फ़िल्म के कुछ दृश्य ‘इंफॉर्मेटिव डॉक्यूमेंट्रीज’ की याद दिलाते हैं। इस फ़िल्म को थिएटर में देखें, शास्त्रीजी के लिए, निर्देशक व अभिनेताओं की मेहनत के लिए, सच्चाई की खोज के लिए और उस खोज को दिखाने में ईमानदारी के लिए। यह एक बहादुरी भरा प्रयास है, जिसकी सराहना होनी चाहिए।

किसी वास्तविक मुद्दे पर बिना ज्यादा ड्रामा ठूँसे ऐसी रोचक फ़िल्म हाल के दिनों में तो नहीं ही बनी है। निर्देशक विवेक अग्निहोत्री इसके लिए बधाई के पात्र हैं। जैसा कि हमने पहले ही कहा, इसे किसी बड़े वेब पोर्टल पर भी रिलीज करनी चाहिए ताकि ये दर्शकों के एक बड़े वर्ग तक पहुँचे।

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