अंतिम यात्रा किसी परिवार के लिए केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं होती बल्कि वह भावनात्मक रूप से सबसे कठिन समयों में से एक होती है। ऐसे समय में यदि परिवार को अव्यवस्था, लंबी प्रतीक्षा, असुविधा और अनिश्चित खर्च का सामना करना पड़े तो वह पीड़ा और बढ़ जाती है। बिहार सरकार पिछले कुछ समय से इसी क्षेत्र में बदलाव की दिशा में काम कर रही है।
राज्य में आधुनिक शवदाह गृहों के निर्माण और पुराने श्मशान घाटों को सुविधायुक्त बनाने की पहल इसी सोच का हिस्सा है। राजधानी पटना के बाँसघाट शवदाह गृह को आधुनिक स्वरूप देकर उसके संचालन की जिम्मेदारी ‘सद्गगुरु’ जग्गी वासुदेव की संस्था ईशा फाउंडेशन को सौंपे दी गई है। हालाँकि, इसे लेकर अब विवाद भी शुरू हो गया है। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसे लेकर सवाल उठाए हैं।
पटना में सरकार के पैसे से बने एक शवदाह गृह और श्मशान घाट का संचालन अब जग्गी वासुदेव की संस्था करेगी।
— Ankit Kumar Avasthi (@kaankit) June 24, 2026
यहां अधिक शुल्क देकर VIP सुविधाओं के साथ अंतिम संस्कार की व्यवस्था उपलब्ध कराई जाएगी।
लेखक-पत्रकार @pushymitr की रिपोर्ट pic.twitter.com/ws4zVVhs14
कुछ लोग आरोप लगा रहे हैं कि सरकार संस्था के साथ मिलकर श्मशान का भी ‘व्यवसाय’ कर रही है और इससे गरीबों को कोई लाभ नहीं मिलेगा। हालाँकि, संस्थान का कहना है कि पूरे प्रयास को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है जबकि इसका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं बल्कि अंतिम संस्कार व्यवस्था को पारदर्शी, सुविधाजनक और सम्मानजनक बनाना है।
ईशा फाउंडेशन ने ऑपइंडिया को क्या बताया?
इस पूरे मॉडल को समझने से पहले यह देखना जरूरी है कि आखिर सरकार ने यह जिम्मेदारी ईशा फाउंडेशन को क्यों दी, यहाँ कौन-कौन सी सुविधाएँ विकसित की गई हैं। ऑपइंडिया ने ईशा फाउंडेशन से इस विषय पर कुछ सवाल किए, जिसका संस्था ने विस्तार से जवाब दिया है नीचे उन सवालों और जवाबों को क्रमवार लिखा गया है।
● ईशा फाउंडेशन ने शवदाह गृह (श्मशान घाट) के संचालन की जिम्मेदारी क्यों संभाली है?
ईशा फाउंडेशन शवदाह गृहों का संचालन इस उद्देश्य से करता है कि हर व्यक्ति को सम्मानजनक और गरिमापूर्ण अंतिम विदाई मिल सके। तमिलनाडु सरकार के साथ साझेदारी में फाउंडेशन पिछले 15 वर्षों से शवदाह गृहों का संचालन कर रहा है, जहाँ स्वच्छ और सुव्यवस्थित परिसर, प्रशिक्षित कर्मचारी तथा पारंपरिक अंतिम संस्कार की सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
इन केंद्रों पर अब तक 1,25,000 से अधिक अंतिम संस्कार किए जा चुके हैं। इन सुविधाओं के माध्यम से ईशा ने प्राचीन परंपराओं और मृत्यु संस्कारों को ऊर्जा-आधारित दृष्टिकोण के साथ पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है और इसे व्यावसायिक गतिविधि नहीं बल्कि सेवा के रूप में संचालित किया है।
इसी अनुभव को देखते हुए बिहार सरकार ने ईशा फाउंडेशन की सामाजिक एवं पर्यावरणीय इकाई ‘ईशा आउटरीच’ के साथ साझेदारी की है ताकि राज्य में शवदाह गृहों का संचालन और प्रबंधन किया जा सके, जबकि भूमि का स्वामित्व सरकार के पास रहेगा।
● यह शवदाह गृह मौजूदा सरकारी या नगर निगम के शवदाह गृहों से कैसे अलग होगा?
ईशा मॉडल की सबसे बड़ी विशेषता गरिमा, स्वच्छता और संवेदनशील सेवा पर उसका ध्यान है। इन शवदाह गृहों का पेशेवर तरीके से रखरखाव किया जाता है, शुल्क व्यवस्था पारदर्शी होती है और प्रशिक्षित कर्मचारी पूरे अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को संवेदनशीलता के साथ संभालते हैं।
परिसर में पारंपरिक अंतिम संस्कार के लिए समर्पित स्थान और सुव्यवस्थित सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं, जिससे शोकग्रस्त परिवारों का बोझ कम हो सके।
● अंतिम संस्कार के लिए क्या शुल्क तय किया गया है?
इलेक्ट्रिक शवदाह के लिए शुल्क ₹3,500 तय किया गया है, जो नगर निकाय समझौते के तहत अनुमत सीमा के भीतर सबसे कम शुल्क बताया गया है। यह राशि बिजली और रखरखाव संबंधी खर्चों को पूरा करने के लिए निर्धारित की गई है। लकड़ी आधारित अंतिम संस्कार के लिए सेवा शुल्क ₹3,500 रहेगा, लेकिन लकड़ी का खर्च परिवार को स्वयं वहन करना होगा।
● क्या गरीब और जरूरतमंद परिवारों के लिए कोई रियायत, मुफ्त सेवा या सरकारी सहायता उपलब्ध होगी?
बिहार में आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए सहायता योजना पर काम किया जा रहा है। वर्तमान में तमिलनाडु में ईशा फाउंडेशन गरीबी रेखा से नीचे (BPL) आने वाले परिवारों को मुफ्त अंतिम संस्कार सेवा उपलब्ध करा रहा है।
● इसे ‘VIP शवदाह गृह’ क्यों कहा जा रहा है?
इसे विशेष या VIP पहुँच के कारण नहीं बल्कि बेहतर बुनियादी ढाँचे के कारण ऐसा कहा जा रहा है। स्वच्छ परिसर, व्यवस्थित पार्किंग, विशाल प्रतीक्षा क्षेत्र और बेहतर सुविधाओं का उद्देश्य हर परिवार को सम्मानजनक और व्यवस्थित वातावरण उपलब्ध कराना है।
● क्या यह पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल (इको-फ्रेंडली) मॉडल पर आधारित होगा? प्रदूषण और उत्सर्जन कम करने के लिए कौन-सी तकनीक इस्तेमाल होगी?
इस शवदाह गृह को पर्यावरण-अनुकूल दृष्टिकोण के साथ विकसित किया जा रहा है। इलेक्ट्रिक शवदाह इसकी प्रमुख व्यवस्था होगी, जिसे उत्सर्जन नियंत्रित करने वाली चिमनी प्रणाली का समर्थन मिलेगा।
साथ ही लकड़ी आधारित भट्टियों को चरणबद्ध तरीके से LPG आधारित प्रणाली में बदलने का प्रस्ताव है, जो पारंपरिक लकड़ी चिताओं की तुलना में कम प्रदूषणकारी होगी और लकड़ी पर निर्भरता भी कम करेगी। उद्देश्य कम उत्सर्जन और पर्यावरणीय प्रभाव वाला आधुनिक शवदाह केंद्र बनाना है।
● पूरे परिसर का संचालन और प्रबंधन कैसे किया जाएगा?
पूरे परिसर का संचालन ईशा आउटरीच द्वारा किया जाएगा, जिसमें मानव संसाधन, सफाई व्यवस्था, कचरा प्रबंधन, बागवानी और रखरखाव शामिल होगा। इसके अलावा तकनीकी संचालन जैसे भट्टियाँ, विद्युत प्रणाली, प्लंबिंग और अन्य बुनियादी संरचना की जिम्मेदारी भी फाउंडेशन संभालेगा।
● क्या बिचौलियों और अवैध शुल्क वसूली को रोकने के लिए कोई पारदर्शी व्यवस्था होगी?
हाँ, पूरी व्यवस्था पारदर्शिता सुनिश्चित करने और बिचौलियों की भूमिका कम करने के उद्देश्य से बनाई गई है। अंतिम संस्कार और परिसर संचालन सीधे प्रबंधित होने के कारण परिवारों को मुख्य सेवाओं के लिए मध्यस्थों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। जहाँ अतिरिक्त पारंपरिक सेवाओं की आवश्यकता होगी, वहाँ स्पष्ट नियमों का पालन किया जाएगा ताकि अनावश्यक शुल्क न लिया जा सके।
● यदि किसी दिन अंतिम संस्कार के मामलों की संख्या अधिक हो जाए तो भीड़ और प्रतीक्षा समय को कैसे संभाला जाएगा?
हाँ, अधिक संख्या में मामलों को संभालने के लिए पर्याप्त व्यवस्था की गई है। यह सुविधा एक समय में 18 अंतिम संस्कार संभाल सकती है और इसमें कई भट्टियाँ, प्रशिक्षित ऑपरेटर तथा पर्याप्त सहयोगी कर्मचारी उपलब्ध रहेंगे।
वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 1–2 मामलों की आवश्यकता है, लेकिन बुनियादी ढाँचा कहीं अधिक क्षमता के अनुसार विकसित किया गया है। साथ ही प्रतीक्षा क्षेत्र, बैठने की व्यवस्था और लगभग 40 वाहनों की पार्किंग सुविधा उपलब्ध होगी।
● क्या ईशा फाउंडेशन ने पटना जैसी व्यवस्था कहीं और भी लागू की है?
ईशा फाउंडेशन का ‘कायंथा स्थानम’ मॉडल वर्ष 2010 में तमिलनाडु के कोयंबटूर के नंजुंडापुरम क्षेत्र से शुरू हुआ था, जब पहला शवदाह गृह ईशा को सौंपा गया था। इसके बाद यह मॉडल पूरे राज्य में विस्तारित हुआ। वर्तमान में ईशा तमिलनाडु में 33 शवदाह गृहों का संचालन कर रहा है और पिछले 15 वर्षों में 1,25,000 से अधिक अंतिम संस्कार किए जा चुके हैं।
पिछले वर्ष ईशा ने तमिलनाडु में अपने प्रबंधित शवदाह गृहों पर गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों के लिए मुफ्त अंतिम संस्कार सेवा भी शुरू की थी।
4.5 एकड़ में बने श्मशान में एक साथ 18 शवों की अंत्येष्टि, जानें क्या है सुविधाएँ
पटना का बांसघाट श्मशान 4.5 एकड़ में फैला है। पटना स्मार्ट सिटी लिमिटेड ने इसे 89.40 करोड़ रुपए की लागत से विकसित किया है। यहाँ पहले मौजूद श्मशान 1.24 एकड़ में फैला था। इसे एक ऐसे परिसर के रूप में तैयार किया गया है जहाँ अंतिम संस्कार से जुड़ी लगभग पूरी प्रक्रिया को व्यवस्थित करने की कोशिश की गई है।
इस परिसर को आधुनिक स्वरूप दिया गया है और इसे एशिया के सबसे बड़े श्मशान परिसरों में से एक बताया जा रहा है। यहाँ एक साथ 18 अंतिम संस्कार किए जा सकते हैं। इसके लिए तीन तरह की व्यवस्थाएँ बनाई गई हैं। पहली व्यवस्था पारंपरिक चिता आधारित अंत्येष्टि की है जिसके लिए 8 खुले स्थल बनाए गए हैं।
दूसरी व्यवस्था इलेक्ट्रिक शवदाह इकाइयों की है, जहाँ 4 आधुनिक यूनिट लगाई गई हैं। तीसरी व्यवस्था 6 लकड़ी आधारित पर्यावरण अनुकूल फर्नेस की है जिनमें कम लकड़ी और नियंत्रित प्रक्रिया के साथ अंतिम संस्कार किया जा सकता है। इसके अलावा गैस आधारित फर्नेस की तैयारी भी की जा रही है जिन्हें भविष्य में शुरू किया जाना प्रस्तावित है।
सरकार का कहना है कि इससे लागत और प्रदूषण दोनों कम होंगे, लेकिन चर्चा केवल दाह प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। अंतिम यात्रा में आने वाले लोगों के लिए यहाँ दो बड़े एसी वेटिंग हॉल बनाए गए हैं ताकि लोगों को कठिन परिस्थितियों में भी धूप, भीड़ और असुविधा का सामना न करना पड़े।
6 वुड क्रीमेसन ओवन हैं। इसे बिहार की कंपनी ने तैयार किया हैं। इसमें शव जलाने में कम लकड़ी लगती है। शव 20-25 मिनट में राख हो जाता है। धुंए को बाहर निकालने के लिए चिमनी लगाई गई है। परिसर में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया गया है, साफ और व्यवस्थित शौचालय बनाए गए हैं, लोगों के लिए कैंटीन की व्यवस्था की गई है।
श्मशान घाट की दीवारों पर पेंटिंग और राजा हरिश्चंद्र की कहानी
इस श्मशान घाट के दीवारों पर पेंटिंग बनाई गई है, जहाँ इंसान के जन्म से लेकर मृत्यु तक की जीवन यात्रा और कर्मों के आधार पर स्वर्ग-नरक के मार्ग को बेहद खूबसूरती से उकेरा गया है। इसके अलावा राजा हरिश्चंद्र की तस्वीर के साथ उनकी कहानी को उकेरी गई है, यह शोकाकुल लोगों को किसी भी परिस्थिति में सच्चाई और कर्तव्यों के पालन के लिए प्रेरित करेगी।
परिसर की दीवारों पर त्रिशूल बना आकर्षक फ्रेम लगाए गए हैं, जिसे मोक्ष धाम और वैकुंठ धाम नाम दिया गया है। यह एक HPL (हाई प्रेशर लैमिनेट) शीट है। इस व्यू कटर को गुजरात से मंगाया गया है। इसके अलावा परिसर के भीतर अंतिम संस्कार सामग्री उपलब्ध कराने के लिए दुकानें बनाई गई हैं ताकि परिजनों को बाहर भागदौड़ न करनी पड़े।
कपड़े, पूजन सामग्री, अगरबत्ती, लकड़ी, हवन सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुएँ एक ही स्थान पर उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है।
आकर्षण का मुख्य केंद्र श्मशान घाट के दो द्वार हैं। इसमें से एक मोक्ष द्वार और दूसरा बैकुंठ द्वार है। दोनों की ऊँचाई 42 फीट है। एक एंट्री और दूसरा निकास पॉइंट है। दोनों द्वार में कांसे से बना ओम चिन्ह स्थापित किया गया है। इन्हें जालंधर के कारीगर ने तैयार किया है।
गंगाजल, अस्थि विसर्जन, मोर्चरी और डिजिटल सेवाएँ, 12 फीट ऊँची भगवान शिव की प्रतिमा
बांसघाट में कई ऐसी व्यवस्थाएँ भी जोड़ी गई हैं जिनकी चर्चा सामान्य रूप से श्मशान घाटों के संदर्भ में कम होती है। यहाँ गंगाजल आधारित दो अलग तालाब बनाए गए हैं। एक स्नान के लिए और दूसरा अस्थि विसर्जन के लिए उपयोग में लाया जाना प्रस्तावित है। दो तालाबों के बीच 12 फुट ऊँची भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित की गई है।
प्रतिमा को तमिलनाडु के आदियोगी के तर्ज पर तैयार किया गया है। इसे बनाने के लिए जालंधर से कारीगर आए थे। इसे फाइबर मटेरियल से बनाया गया है। इस 15 फीट ऊँचे त्रिशूल के साथ स्थापित प्रतिमा में शिव की जटाओं से गंगा निकलती दिखाई देंगी और साथ ही आसपास लाइटिंग भी की गई है। वहीं, आगे की तरफ रास्तों पर ग्रीन एरिया को डेवलप गया है।
इसके पीछे तर्क ये है कि बदलती भौगोलिक परिस्थितियों के कारण हर समय सीधे नदी तक पहुँच आसान नहीं होती। परिसर में मोर्चरी सुविधा भी विकसित की गई है जिससे आवश्यकता होने पर शव को सुरक्षित रखा जा सके। ऑनलाइन स्लॉट बुकिंग की व्यवस्था को भी जोड़ा गया है ताकि लोगों को लंबी कतारों और अव्यवस्था से राहत मिल सके।
लोग ऑनलाइन स्लॉट भी बुक कर सकते हैं। इसके लिए पटना नगर निगम की वेबसाइट पर जाकर टिकट आईडी जेनरेट करना होगा। व्हाट्सएप चैटबोट 9264447449 के जरिए भी बुकिंग कर सकते हैं। हेल्प डेस्क जैसी व्यवस्था भी रखी गई है ताकि लोगों को दस्तावेज और प्रक्रियाओं में सहायता मिल सके।
वहीं पिकअप सर्विस के लिए मुक्ति रथ भी बुक कर सकते हैं। इसके साथ ही डेथ सर्टिफिकेट के लिए भी आवेदन कर सकते हैं। सरकार का कहना है कि अंतिम संस्कार जैसी व्यवस्था में डिजिटल सुविधाओं का उद्देश्य सुविधा देना है, न कि परंपराओं को बदलना।
‘डिग्निटी इन डेथ’ : संस्था की मूल सोच
इस पूरे मॉडल के केंद्र में जिस विचार की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वह है ‘डिग्निटी इन डेथ’। ईशा फाउंडेशन का मानना है कि मृत्यु एक मानवीय और भावनात्मक स्थिति है। इसी कारण प्रशिक्षित स्वयंसेवकों की तैनाती, प्रक्रिया में सहायता, कम प्रतीक्षा समय, परिजनों के साथ सहयोग और व्यवस्थित वातावरण पर जोर दिया गया।
बिहार में अत्याधुनिक तकनीक से 40 शवदाह गृह बनाए जा रहे हैं। इसमें से 20 शवदाह गृह का निर्माण पूरा हो चुका है। उत्तर बिहार के 12 और दक्षिण बिहार के 8 जिलों में आधुनिक शवदाह गृहों का निर्माण हो चुका है। इन तैयार किए गए 20 शवदाह गृहों के सौंदर्यीकरण का काम अंतिम चरण में है, जिसके बाद इन्हें जल्द ही चालू कर दिया जाएगा।
पटना के दीघा घाट में भी ईशा फाउंडेशन की ओर से LPG गैस आधारित श्मशान घाट बनाया जाएगा। इसके अलावा, बेगूसराय के सिमरिया घाट, भागलपुर, गयाजी, सहरसा और छपरा में भी शवदाह गृहों को आधुनिक करने की योजना है। संस्था का यह भी कहना है कि सेवा का उद्देश्य लाभ नहीं बल्कि परिवार को कठिन समय में एक सम्मानजनक अनुभव देना है। सरकार का यह कदम किसी व्यवसाय का विस्तार नहीं बल्कि अंतिम यात्रा को गरिमा देने की कोशिश है।


