Homeदेश-समाज'पहले मंदिर में नमाज पढ़ेंगे, फिर कहेंगे मस्जिद थी': बुलंदशहर से भोजशाला तक, हिंदू...

‘पहले मंदिर में नमाज पढ़ेंगे, फिर कहेंगे मस्जिद थी’: बुलंदशहर से भोजशाला तक, हिंदू पवित्र स्थलों पर दावों का कट्टरपंथियों का पैटर्न और लिबरल गैंग के कुतर्कों की पड़ताल

हिंदुओं के पवित्र स्थानों पर नमाज अदा करना कोई भूल नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा है। अगर इन लोगों के मन में अल्लाह की इबाबत करना ही होता, तो ये हिंदू मंदिरों पर कब्जा नहीं करते। इनका असली मकसद दूसरे धर्म के प्रतीकों को मिटाना और अपने मजहब का ठप्पा लगाना हैं।

भारत में हिंदुओं के धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों पर मुस्लिम समुदाय के कुछ तत्वों द्वारा नमाज पढ़ने और फिर धीरे-धीरे उन स्थानों पर अपना कब्जा करना एक चिंताजनक पैटर्न है। यह शुरुआत बहुत ही सामान्य और मामूली दिखती है। कभी हल्की बूंदाबांदी से बचने के लिए, तो कभी थकान मिटाने के बहाने किसी मंदिर के परिसर में कदम रखा जाता है। इसके बाद वहाँ चुपचाप नमाज या इबादत अदा की जाती है।

जैसे ही ये करतूत सोशल मीडिया पर आती है या स्थानीय हिंदू इसका विरोध करते हैं, वैसे ही देश का एक खास वर्ग, जिसे हम ‘लिबरल हिंदू’ कहते हैं, वह छाती पीटना शुरू कर देता है। ये लिबरल जोर-जोर से रोना रोते हैं कि ‘अगर किसी ने भगवान के घर में अल्लाह की इबादत कर भी ली, तो क्या पहाड़ टूट पड़ा? ईश्वर तो एक ही है।’

लेकिन इतिहास और वर्तमान की घटनाएँ चीख-चीखकर गवाही देती हैं कि यह कोई मासूम इबादत नहीं, बल्कि एक बेहद सोची-समझी क्रोनोलॉजी है। इन्हीं लिबरल हिंदुओं के कुतर्कों से ऐसी कट्टरपंथी सोच को सबसे ज्यादा बल मिलता है। इसके बाद मामला सिर्फ नमाज तक सीमित नहीं रहता। कुछ ही वर्षों में वह पूरा स्थल मलिहाबाद के कंस किले या धार की भोजशाला जैसे विवादों में फँस जाता है। अंत में स्थिति यह हो जाती है कि हिंदुओं को अपनी ही प्राचीन जगहों के लिए दशकों तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है।

सबसे विडंबना की बात तो यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में गाली भी वही हिंदू खाते हैं जो अपने संवैधानिक और धार्मिक अधिकारों की बात करते हैं। समाज का लिबरल ताना-बाना उन दंगाइयों से कभी सवाल नहीं पूछता जिन्होंने चुपके से या बलपूर्वक उस जगह पर कब्जा किया हो।

बुलंदशहर : हनुमान मंदिर में नमाज

इस पूरे विवाद को समझने के लिए सबसे पहले हमें उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर की ताजा घटना को देखना होगा। यहाँ एक प्राचीन हनुमान मंदिर परिसर को साजिश के तहत नमाज स्थल में बदलने की धृष्टता की गई। 31 मई को मकान निर्माण के दौरान मुस्लिम राजमिस्त्री असर मोहम्मद और उसके साथियों की नीयत अचानक बदल गई। दोपहर में जैसे ही मौका मिला, वे सीधे हनुमान मंदिर के भीतर घुस गए।

बूंदाबांदी का बहाना बनाया गया। मजबूरी का ढोंग रचा गया। इस पूरे मौके का फायदा उठाकर असर मोहम्मद ने पवित्र मंदिर परिसर के भीतर नमाज पढ़ डाली। उसका साथी नजर मोहम्मद इस पूरे दुस्साहस के दौरान सुरक्षा कवच बनकर वहीं मुस्तैद खड़ा रहा। यह साफ तौर पर हिंदुओं की धार्मिक सहिष्णुता की पीठ में छुरा घोंपने और आस्था के केंद्र पर कब्ज़े की आक्रामक शुरुआत थी।

Video Viral होते ही स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पुलिस प्रशासन भारी फोर्स को तुरंत मौके पर तैनात करना पड़ा। पुलिस ने इस साजिश को भांपते हुए त्वरित कार्रवाई की। मुख्य कट्टरपंथी असर मोहम्मद, नजर मोहम्मद और उन्हें सह देने वाले मकान मालिक राजकुमार के खिलाफ गंभीर धाराओं में FIR दर्ज की गई। मुख्य आरोपित असर मोहम्मद को तुरंत चालान कर सलाखों के पीछे धकेला गया।

लिबरल हिंदुओं के आत्मघाती तर्क: कट्टरपंथ को ऑक्सीजन देने वाली सोच

जब भी बुलंदशहर जैसी घटनाएँ देश के किसी कोने में होती हैं, तो सेक्युलर और लिबरल की फौज सोशल मीडिया पर सक्रिय हो जाती है। इनके तर्क इतने खोखले और आत्मघाती होते हैं कि वे सीधे तौर पर बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक चेतना को सुन्न कर देते हैं। आइए इन लिबरलों के प्रमुख तर्कों को समझते हैं।

‘ईश्वर और अल्लाह में कोई भेद नहीं है’: लिबरल हिंदुओं का सबसे पहला और पसंदीदा तर्क यही होता है। वे कहते हैं कि मंदिर भी भगवान का घर है, इसलिए वहाँ अगर किसी ने सच्चे दिल से अपने अल्लाह को याद कर लिया, तो इससे मंदिर अपवित्र नहीं हो जाता। वे इसे ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ का सबसे सुंदर उदाहरण बताकर पेश करने लगते हैं।

‘जगह की कमी या मजबूरी का बहाना’: बुलंदशहर मामले में भी यही तर्क दिया गया कि बाहर बारिश हो रही थी, इसलिए मुस्लिम मजदूर मंदिर के अंदर चले गए। लिबरल इस पर भावुक होकर लिखते हैं कि ‘क्या एक प्यासे को पानी और एक नमाजी को दो गज जमीन देना भी अपराध है?’ वे इसे पूरी तरह एक मानवीय दृष्टिकोण से जोड़कर असली खतरे से ध्यान भटका देते हैं।

विरोध करने वाले हिंदुओं को ‘कट्टरपंथी’ बताना: जो हिंदू समाज इस तरह की अनधिकृत नमाज का विरोध करता है और कानून की शरण लेता है, उसे ये लिबरल तुरंत ‘नफरती चिंटू’, ‘सांप्रदायिक’ या ‘कट्टरपंथी’ का टैग दे देते हैं। उनके अनुसार, विरोध करने वाले लोग देश का माहौल खराब कर रहे हैं, न कि वे लोग जो मंदिर की मर्यादा भंग कर रहे हैं।

इन्हीं आत्मघाती और कायरतापूर्ण तर्कों के कारण कब्जा करने वाली ताकतों के हौसले बुलंद होते हैं। वे जान जाते हैं कि हिंदू समाज का एक बड़ा हिस्सा खुद ही उनके इस अतिक्रमण का बचाव करने के लिए खड़ा हो जाएगा।

हमारा विरोध बेवजह नहीं: क्यों अब सचेत और आक्रामक होने लगा है हिंदू समाज?

हिंदू समाज का यह विरोध किसी नफरत या बेवजह के डर पर आधारित नहीं है। इसके पीछे सैकड़ों वर्षों का कड़वा अनुभव और वर्तमान में लगातार सामने आ रहे धोखे हैं। हिंदू समाज अब अच्छी तरह समझ चुका है कि हर ऐसी ‘मासूम शुरुआत’ का अंत एक बहुत बड़े विवाद और उनके पवित्र स्थल के छिन जाने के रूप में होता है।

जब इतिहास में बार-बार एक ही तरह का धोखा हुआ हो, तो आने वाली पीढ़ियों का सचेत होना स्वाभाविक है। हिंदुओं ने देखा है कि कैसे उनके सीधेपन और उदारता का नाजायज फायदा उठाया गया। आज का हिंदू समाज यह भली-भांति जानता है कि यदि आज बुलंदशहर के हनुमान मंदिर में नमाज पढ़ने पर चुप्पी साध ली गई, तो कल उसी मंदिर के गर्भगृह पर दूसरा पक्ष अपना दावा ठोक देगा। यह डर काल्पनिक नहीं है, बल्कि इसके पीछे मलिहाबाद और धार जैसे दर्जनों जीवित और सुलगते हुए उदाहरण मौजूद हैं।

मलिहाबाद का कंस किला विवाद: तीन साल की ‘इबादत’ ने कैसे छीन लिया पासी समाज का हक

इस पूरी रणनीति का सबसे सटीक उदाहरण उत्तर प्रदेश के लखनऊ स्थित मलिहाबाद का है। यहाँ कांसमंडी इलाके में ऐतिहासिक ‘राजपासी राजा कंस का किला’ स्थित है। यह किला पासी समाज के गौरवशाली इतिहास का प्रतीक है और उनके लिए एक अत्यंत पवित्र एवं आस्था का केंद्र है। लेकिन यहाँ जो कुछ हुआ, वह आँखें खोलने वाला है।

लगभग तीन साल पहले, बहराइच जिले से मौलाना जमील अहमद नाम का एक व्यक्ति यहाँ आया और इस ऐतिहासिक किले के एक हिस्से में रहने लगा। शुरुआत में उसने बहुत ही सामान्य तरीके से किले के परिसर की सफाई करने की अनुमति माँगी। इसके बाद उसने वहाँ चुपचाप नमाज अदा करना शुरू कर दिया। स्थानीय हिंदुओं ने उदारता दिखाते हुए तब इसका विरोध नहीं किया। लेकिन धीरे-धीरे मौलाना जमील ने इस ऐतिहासिक धरोहर को पूरी तरह मुस्लिम गतिविधियों का केंद्र बना दिया।

28 मार्च 2026 को यह विवाद तब पूरी तरह फूट पड़ा जब ‘लाखन आर्मी’ नामक संगठन ने मलिहाबाद थाने में एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में बेहद चौंकाने वाले खुलासे किए गए। मौलाना जमील अहमद ने राजा कंस के किले पर अवैध तरीके से कब्जा कर लिया था और वहाँ ‘सुलेमानिया स्कूल’ नाम से एक अवैध मदरसा संचालित करना शुरू कर दिया था। इस मदरसे में नबीपनाह गाँव के करीब 20 हिंदू बच्चों को लाया जाता था। शिक्षा की आड़ में उन बच्चों का ब्रेनवॉश किया जा रहा था और उनका धर्म परिवर्तन कराने का एक बड़ा केंद्र विकसित किया जा रहा था। लाखन आर्मी ने पुलिस से इस अवैध कब्जे को तुरंत हटाने की माँग की।

इसके बाद स्थिति और खराब हो गई। 26 मई 2026 को कांसमंडी कला स्थल पर बने इस कथित विवादित ढांचे को लेकर तनाव इतना गहरा गया कि प्रशासन को भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा। पासी समाज ने बड़े मंगल के मौके पर इस कंस किले के परिसर में सुंदरकांड का पाठ करने का एलान किया था। लेकिन प्रशासन ने कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए हिंदुओं को सुंदरकांड पढ़ने की इजाजत नहीं दी। पासी समाज के अध्यक्ष को उनके घर में ही नजरबंद कर दिया गया और अन्य समर्थकों को किले के आसपास भी फटकने नहीं दिया गया।

यहाँ तक कि बकरीद की नमाज पर भी रोक लगानी पड़ी। पुलिस ने पासी समाज के 15 बड़े नेताओं को नोटिस थमाकर सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी। अब स्थिति यह है कि जिस पासी समाज का वह किला था, उसी समाज के लोगों को वहाँ जाने से रोका जा रहा है, और यह सब सिर्फ तीन साल पहले शुरू हुई एक ‘मासूम नमाज’ के कारण हुआ है।

धार का भोजशाला विवाद: खिलजी और दिलावर के आक्रमण से लेकर आज तक की कानूनी लड़ाई

ठीक ऐसा ही एक और ऐतिहासिक और दर्दनाक उदाहरण मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ‘भोजशाला’ का है। भोजशाला मूल रूप से 11वीं शताब्दी में राजा भोज द्वारा निर्मित एक अत्यंत भव्य और पवित्र वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर और एक महान संस्कृत विश्वविद्यालय था। यह सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए परम पूजनीय और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है।

लेकिन अलाउद्दीन खिलजी और दिलावर खान जैसे क्रूर मुस्लिम आक्रमणकारियों ने इस पवित्र परिसर को बेरहमी से रौंदा। उन्होंने मंदिर के वैभव को नष्ट करने का पूरा प्रयास किया, लेकिन वे इसके सनातन धार्मिक निशानों को पूरी तरह नहीं मिटा सके। बाद में मुस्लिम पक्ष ने इस पूरे परिसर पर अपना दावा ठोक दिया और इसे ‘कमाल मौलाना मस्जिद’ कहना शुरू कर दिया।

यह विवाद आधुनिक भारत में भी हिंदुओं के लिए नासूर बना रहा। 21 मई 2022 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ द्वारा दायर एक महत्वपूर्ण याचिका को स्वीकार किया। इस याचिका में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के 7 अप्रैल 2003 के उस विवादित आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत ASI ने हर शुक्रवार को मुस्लिमों को इस प्राचीन मंदिर परिसर के भीतर नमाज पढ़ने की अनुमति दे दी थी।

हिंदू संगठनों ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कोर्ट के सामने पुख्ता ऐतिहासिक प्रमाण प्रस्तुत किए। हिंदुओं की माँग है कि भोजशाला परिसर में देवी सरस्वती की मूल मूर्ति को फिर से स्थापित किया जाए। साथ ही पूरे परिसर की आधुनिक वीडियोग्राफी कराई जाए और केंद्र सरकार से यहाँ बनी प्राचीन कलाकृतियों और मूर्तियों की ‘रेडियो कार्बन डेटिंग’ जाँच कराई जाए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। फिर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना और हिंदुओं को पूजा करने का अधिकार मिला। लेकिन एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद।

सीताराम गोयल का ऐतिहासिक दस्तावेज: मंदिरों को ध्वस्त कर बनाई गईं 1800 से अधिक मस्जिदें

यह तर्क कि ‘मुस्लिम शासकों या कट्टरपंथियों ने कभी मंदिरों पर कब्जा नहीं किया’, पूरी तरह से झूठा और इतिहास विरोधी है। साल 1990 में प्रख्यात इतिहासकार सीताराम गोयल ने अरुण शौरी, हर्ष नारायण, जय दुबाशी और राम स्वरूप जैसे विद्वानों के साथ मिलकर एक अत्यंत प्रामाणिक और शोध-आधारित किताब प्रकाशित की थी, जिसका नाम है-‘हिंदू टेंपल्स: व्हाट हैपन्ड टू देम’ (Hindu Temples: What Happened To Them)।

इस किताब के 2 सेक्शन में मुस्लिम आक्रमणकारियों और शासकों द्वारा किए गए ऐतिहासिक अत्याचारों का पूरा कच्चा चिट्ठा खोला गया। सीताराम गोयल ने देश भर में 1800 से अधिक ऐसे विशिष्ट स्थानों, मस्जिदों, मजारों और विवादित ढांचों की पहचान की, जिन्हें या तो सीधे तौर पर हिंदू, जैन और बौद्ध मंदिरों को ध्वस्त करके बनाया गया या फिर उन मंदिरों को तोड़ने के बाद निकले मलबे, खंभों और कलाकृतियों का इस्तेमाल करके खड़ा किया गया।

इस किताब के दूसरे भाग, ‘द इस्लामिक एविडेंस’ (The Islamic Evidence) में तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों और मुगल काल के आधिकारिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए इस बात के अकाट्य प्रमाण दिए गए हैं कि कैसे हिंदू आस्था के केंद्रों को मिटाकर उन पर इस्लामिक विजय के प्रतीक खड़े किए गए। इस किताब में दी गई राज्यवार सूची आज के हिंदुओं को जागरूक करने के लिए काफी है।

सीताराम गोयल की किताब के आँकड़े भारत के अलग-अलग राज्यों की एक कड़वी कहानी बयाँ करते हैं। सबसे पहले उत्तर प्रदेश की बात करते हैं। यहाँ ऐसी 299 जगहें हैं जहाँ मंदिरों को नुकसान पहुँचाया गया। वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद इसका बड़ा उदाहरण है। यह प्राचीन विश्वेश्वर मंदिर को तोड़कर बनी है। लखनऊ की टीले वाली मस्जिद भी पहले लक्ष्मण टीला मंदिर थी। मेरठ की जामी मस्जिद को एक बौद्ध विहार पर बनाया गया। अयोध्या का राम मंदिर विवाद भी इसी का हिस्सा रहा है।

उत्तर प्रदेश के इन विवादों पर बड़े बयान भी सामने आए। 31 जुलाई 2023 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साफ कहा था कि ज्ञानवापी को मस्जिद कहना गलत है। उसके भीतर आज भी त्रिशूल और हिंदू धर्म के निशान मौजूद हैं। ASI के सर्वे में वहाँ शिवलिंग भी मिला है। वहीं दूसरी तरफ 6 अगस्त 2020 को राम मंदिर भूमि पूजन के अगले ही दिन ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष साजिद रशीदी ने एक विवादित बयान दिया। उन्होंने धमकी दी थी कि मंदिर को दोबारा तोड़कर वहाँ फिर से बाबरी मस्जिद बनाई जाएगी। इसके लिए उन्होंने तुर्की के हागिया सोफिया का उदाहरण दिया था।

अब बात करते हैं दक्षिण और पश्चिम भारत के राज्यों की। कर्नाटक में ऐसी 192 जगहें हैं। वहाँ के प्राचीन हिंदू शहर बीदर और बीजापुर को पूरी तरह मुस्लिम राजधानियों में बदल दिया गया। वहाँ की सोला खंबा मस्जिद और जामी मस्जिद पूरी तरह हिंदू मंदिरों के मलबे से बनी हैं। तमिलनाडु में 175 ऐसी जगहें हैं। तिरुचिरापल्ली में नाथर शाह वाली की दरगाह एक शिव मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी। वहाँ मंदिर के पवित्र शिवलिंग का उपयोग दरगाह में दीपक रखने के आधार के रूप में किया गया।

गुजरात और राजस्थान में भी यही सब हुआ। गुजरात में ऐसी 170 जगहें हैं। प्राचीन मंदिरों को नष्ट करके अहमदाबाद शहर को मुस्लिम स्वरूप दिया गया। अहमद शाह की जामी मस्जिद इसका सीधा उदाहरण है। द्वारका और सोमनाथ में भी कई मस्जिदें मंदिर के स्थानों पर बनी हैं। राजस्थान में भी 170 ऐसी जगहें हैं। अजमेर को नष्ट करके वहाँ 1199 में ‘अढ़ाई-दिन-का-झोंपरा’ और मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह बनाई गई। जालोर की तोपखाना मस्जिद में पार्श्वनाथ जैन मंदिर के पत्थर और सामग्री लगी है।

मध्य भारत और बाकी राज्यों की स्थिति भी अलग नहीं है। मध्य प्रदेश में 151 ऐसी जगहें हैं। भोपाल की जामी मस्जिद प्राचीन सभामंडल मंदिर के स्थान पर बनी है। महाराष्ट्र में 143 जगहें हैं। मुंबई की प्रसिद्ध मैना हज्जम की मज़ार महालक्ष्मी मंदिर को तोड़कर बनी है। आंध्र प्रदेश में 142 जगहें हैं। वहाँ की जामी मस्जिद वेणुगोपालस्वामी मंदिर को नष्ट करके बनाई गई थी। पश्चिम बंगाल में 102 जगहें हैं जहाँ हिंदू राजधानी को नष्ट करके मुस्लिम शहर बसाए गए।

कम संख्या वाले राज्यों में भी यही तरीका अपनाया गया। बिहार में 77 जगहें हैं जहाँ जैन और हिंदू मंदिरों को मजार में बदला गया। हरियाणा में भी 77 जगहें हैं। हिसार का निर्माण फिरोज शाह तुगलक ने प्राचीन अग्रोहा शहर के मंदिरों के मलबे से किया था। दिल्ली में 72 ऐसी जगहें हैं। कुतुब मीनार परिसर और कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद को 27 भव्य हिंदू और जैन मंदिरों को तोड़कर बनाया गया। ओडिशा में 12 और पंजाब में 14 ऐसी जगहें हैं जहाँ मंदिरों के स्थान पर मस्जिदें बनीं। असम, केरल और लक्षद्वीप में 2-2 ऐसी जगहें हैं। लक्षद्वीप की स्थिति यह है कि आज वहाँ की आबादी लगभग 100 प्रतिशत मुस्लिम हो चुकी है। दीव और हिमाचल प्रदेश में भी 1-1 ऐसा ऐतिहासिक उदाहरण मिलता है जहाँ प्राचीन मंदिरों की सामग्री से मस्जिद या गेट बनाए गए।

भरूच की जामा मस्जिद का विवाद: इतिहास के पन्नों से निकलता सच

सीताराम गोयल की इसी किताब में दर्ज गुजरात के भरूच जिले की ‘जामा मस्जिद’ का मामला है। 7 जनवरी 2026 को भरूच शहर की यह ऐतिहासिक जामा मस्जिद फिर से विवादों में आई थी। ‘अखिल भारतीय संत समिति’ के संतों ने आरोप लगाया कि यह मस्जिद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में होने के बावजूद यहाँ धड़ल्ले से अवैध निर्माण किया जा रहा है और पुरातत्व विभाग के कड़े नियमों की सरेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही।

संतों ने इन गंभीर आरोपों के साथ मस्जिद के बाहर एक बड़ा धरना प्रदर्शन किया था। स्थिति इतनी तनावपूर्ण थी कि पुलिस और जिला प्रशासन को बीच-बचाव करने के लिए आना पड़ा। प्रशासन ने संतों को उचित कार्रवाई का भरोसा देते हुए दो महीने का समय माँगा, जिसके बाद संतों ने अपना धरना समाप्त किया।

इस धरने के बाद इतिहासकार सीताराम गोयल की किताब का वह हिस्सा दोबारा चर्चा में आया, जिसमें स्पष्ट लिखा था कि भरूच की इस जामा मस्जिद का निर्माण साल 1321 में वहाँ स्थित अत्यंत प्राचीन हिंदू और जैन मंदिरों को तोड़कर किया गया था। मस्जिद के भीतर आज भी जो खंभे और स्तंभ खड़े हैं, वे चीख-चीखकर अपने जैन और हिंदू मूल के होने की गवाही दे रहे हैं।

क्या मंशा सच में इबादत की होती है? मूर्तियों और मंदिरों पर हमलों का कड़वा सच

जो लिबरल और सेक्युलर बुद्धिजीवी यह दलील देते हैं कि ‘मुस्लिमों की मंशा केवल इबादत की होती है और वे हिंदू पूजा स्थलों को भी उसी सम्मान से देखते हैं’… उन्हें पिछले कुछ सालों में देश के विभिन्न हिस्सों में हुए इन हमलों और मूर्तियों के खंडित किए जाने की घटनाओं का जवाब देना चाहिए।

अहमदाबाद के पिराना मंदिर पर मुस्लिम भीड़ का हमला (8 मई 2024)- अहमदाबाद के पिराना स्थित ऐतिहासिक ‘प्रेरणा पीठ निष्कलंकी मंदिर’ पर अचानक एक हिंसक मुस्लिम भीड़ धावा बोल देती है। विश्व हिंदू परिषद इस हमला का Video भी जारी करती है। इस वीडियो में जालीदार टोपी पहने सैकड़ों मुस्लिम हाथों में लकड़ी और लोहे के डंडे लेकर मंदिर परिसर में घुसते है।

वहाँ कट्टरपंथी भीड़ तोड़फोड़ करती है। फिर इस जगह पर मुस्लिम पक्ष दावा करती है कि यहाँ पहले दरगाह थी, जबकि यहाँ हमेशा से हिंदुओं का मंदिर ही था। इस बात की अफवाह भी उठाई जाती है कि मंदिर प्रशासन ने वहाँ से कुछ प्राचीन कब्रें हटाई थी। इसके बाद स्थानीय मुस्लिमों की भीड़ जमा होकर हमला और हिंसा फैलाती है। इस हमले में भीड़ मंदिर के गर्भगृह के भीतर स्थापित हिंदू देवी-देवताओं की कई पवित्र मूर्तियों को तोड़ देती है।

मुरादाबाद में देवी की प्रतिमा को पैरों से ठोकर मारी (23 सितंबर 2023)- उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में घृणास्पद घटना होती है। गाँव के रहने वाले सुरेश कुमार 21 सितंबर को वहाँ बन रहे एक नए देवी मंदिर पर मजदूरी का काम करते हैं। शाम के समय वहाँ गफूर का बेटा सद्दाम अपने दो साथियों नियाज़ी और अबरार के साथ पहुँचता है। सद्दाम मंदिर के गेट और पाइप के बारे में पूछताछ कर विवाद शुरू करता है। जब सुरेश इसका विरोध करता है तो सद्दाम हिंदुओं को गंदी-गंदी गालियाँ बकना शुरू करता है।

इसके बाद सद्दाम निर्माणाधीन मंदिर के अंदर घुसकर वहाँ स्थापित की जाने वाली देवी की पवित्र मूर्ति पर अपने पैरों से ठोकर मारता है और धमकी देता है कि ‘इस मूर्ति को उठाकर अपने हिंदुओं के मोहल्ले में ले जाओ, वरना तुम्हारा अंजाम बहुत बुरा होगा।’ बाद में पुलिस सद्दाम को गिरफ्तार करती है।

बिहार के दरभंगा में दुर्गा मंदिर पर पथराव (23 जुलाई 2023)- बिहार के दरभंगा में मोहर्रम का झंडा लगाने को लेकर दो समुदायों में विवाद होता है। कट्टरपंथियों की भीड़ जानबूझकर एक प्राचीन माँ दुर्गा मंदिर के ठीक सामने मोहर्रम का मजहबी झंडा लगाती है। मंदिर में मौजूद हिंदू श्रद्धालु जब इसका शांतिपूर्वक विरोध करते हैं तो कुछ मुस्लिम पक्ष के लोग मजहबी नारे लगाना शुरू करते हैं। देखते ही देखते इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ दुर्गा मंदिर को निशाना बनाते हुए पत्थरबाजी शुरू करती है। इस पथराव में दुर्गा माता का मंदिर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाता है और कई श्रद्धालु इस हमले में घायल हो जाते है। पुलिस को स्थिति नियंत्रण में लेने के लिए भारी लाठीचार्ज करना पड़ा।

बरेली में काँवड़ियों पर मस्जिद से पथराव (23 जुलाई 2023)- उसी दिन बरेली जिले में पवित्र सावन महीने में अपनी धार्मिक यात्रा पर जा रहे काँवड़ यात्रियों के एक जत्था अचानक हमला करता है। ‘हिंदू जागरण मंच’ के अनुसार, जब काँवड़िए बालखंडी नाथ मंदिर के पास से गुजरते हैं तो वहाँ स्थित एक बड़ी मस्जिद के अंदर से काँवड़ियों पर पथराव किया जाता है। मस्जिद की छतों से बड़े-बड़े पत्थर फेंके जाते हैं, जिससे कई काँवड़िए लूल-लहान होते हैं। हमलावर जानबूझकर मस्जिद के भीतर से काँवड़ यात्रा को निशाना बनाते हैं।

दिल्ली के चाँदनी चौक में मंदिर के भीतर तोड़फोड़-आगजनी (2 जुलाई 2019)- दिल्ली के चाँदनी चौक इलाके में अचानक आधी रात को एक मामूली विवाद के बाद सैकड़ों इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ हंगामे पर उतर आती है। इस्लामी भीड़ चाँदनी चौक में स्थित एक प्राचीन हिंदू मंदिर का दरवाजा तोड़कर अंदर घुसती है। कट्टरपंथी मंदिर के अंदर स्थापित भगवान की पवित्र मूर्तियों को पूरी तरह नष्ट करते हैं।

मंदिर के पर्दों और धार्मिक सामग्रियों को आग के हवाले कर दिया। मूर्तियों की सुरक्षा के लिए लगाए गए मोटे कांच के शील्ड भी ईंटों से तोड़ देते हैं और पूरे मंदिर परिसर में जूते चप्पल और ईंटें फैला देते हैं। हमलावर लगातार ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाह-हू-अकबर’ के मजहबी नारे लगाती है। पुलिस बल के हस्तक्षेप करने पर इस्लामी भीड़ पुलिसकर्मियों पर भी पथराव करती है।

इबादत के ढोंग में कब्जे की साजिश

इन सभी घटनाओं को देखकर एक बात तो साफ हो जाती है कि हिंदुओं के पवित्र स्थानों पर नमाज अदा करना कोई भूल नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा है। अगर इन लोगों के मन में अल्लाह की इबाबत ही करना होता, तो ये हिंदू मंदिरों पर कब्जा नहीं करते। साफ है कि इनका असली मकसद दूसरे धर्म के प्रतीकों को मिटाना है। वे इन पवित्र जगहों पर अपने मजहब का ठप्पा लगाना चाहते हैं। हमारे देश के लिबरल हिंदू इसे बहुत बड़ी उदारता समझते हैं। लेकिन कट्टरपंथी इसे हिंदुओं की कमजोरी और कायरता मानते हैं।

इतिहास गवाह है कि जो समाज जागरूक नहीं रहता, उसका अस्तित्व मिट जाता है। बुलंदशहर की घटना पर आज का हिंदू समाज तुरंत एक्शन ले रहा है। वे पुलिस में FIR दर्ज कराकर मामले को तुरंत खत्म करना चाहता है। आज की जरा सी लापरवाही कल एक बड़े विवाद को जन्म दे सकती है। पुराने मामलों में हमने मलिहाबाद और भोजशाला जैसी अंतहीन कानूनी लड़ाई देखी है, जिसमें अपनी ही जमीन पर हक साबित करने के लिए हिंदुओं की पीढ़ियाँ कोर्ट के चक्कर काटती रही हैं। इसलिए अब ऐसे मामलों पर विश्वास करने से अच्छा है कि तुरंत इनकी मंशा समझकर साजिश को खत्म किया जाए।

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

विशेषता
विशेषता
सुर्खियों के पीछे छिपी कहानियों की तलाश में...

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

विवादों में ‘कॉकरोचों’ का 6 जून का प्रदर्शन, दिपके ने माना- ‘नहीं ली प्रोटेस्ट की परमिशन’: समझें- SC का फैसला, 7 दिन वाला नियम...

CJP के प्रस्तावित प्रदर्शन के बहाने समझिए जंतर-मंतर पर धरना देने की पूरी प्रक्रिया, दिल्ली पुलिस के नियम और सुप्रीम कोर्ट का रुख।

AC ब्लास्ट के बढ़ते मामलों के पीछे चीन का हाथ? जानिए कैसे घटिया गैस से बढ़ रहा घरों में विस्फोट का खतरा, भारत सरकार...

आए दिन एसी ब्लास्ट की खबरें सामने आती हैं। इनकी पीछे कहीं चीन का हाथ तो नहीं है? क्योंकि इन एसी में चाइनीज R-152a गैस भरी जा रही है, जो ओवरहीटिंग के कारण जल्दी आग पकड़ लेती है।
- विज्ञापन -