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‘पीड़िता के लिए मैकबुक खरीदें’: POCSO केस में समझौता होने पर आरोपित से बॉम्बे HC, नाबालिग ने चाचा से वापस लिए आरोप; जानें कब और क्यों होता है ऐसा फैसला

ऐसे समझौतों की जड़ में हाई कोर्ट की एक खास कानूनी शक्ति होती है। यह शक्ति दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 की धारा 482 में दी गई थी, जिसे अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 528 में शामिल किया गया है।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने पक्षकारों के बीच आपसी समझौता होने के बाद हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में POCSO एक्ट 2012 के तहत दर्ज FIR को रद्द कर दिया है। इस फैसले के बाद न्याय, संवेदना और कानून की सख्ती को लेकर चर्चा तेज हो गई है। इस मामले में मोहन मारुति जाधव पर उनकी नाबालिग भतीजी ने POCSO एक्ट की धारा 8 और 12 के तहत आरोप लगाए थे। साथ ही उन पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की कुछ धाराओं के तहत भी मामला दर्ज किया गया था।

बाद में पीड़िता ने अदालत में कहा कि अब उसे अपने चाचा से कोई शिकायत नहीं है। उसने यह भी बताया कि उसके चाचा उसे बेटी की तरह रखते हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि यह आरोप एक ‘गलतफहमी’ की वजह से लगाए गए थे। समझौते के तहत आरोपित को 1.5 लाख रुपए जमा करने का निर्देश दिया गया। यह राशि पीड़िता की पढ़ाई के लिए मैकबुक खरीदने के उद्देश्य से तय की गई है।

13 फरवरी 2026 को दिए गए इस फैसले को एक ऐसे बढ़ते रुझान के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें भारतीय अदालतें आपसी समझौते के आधार पर आपराधिक मामलों की कार्यवाही रोक देती हैं, भले ही वे मामले सामान्य तौर पर समझौते योग्य (compoundable) न हों। अब सवाल उठ रहा है कि ऐसे फैसले क्यों होते हैं और सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णय इनकी वैधता के बारे में क्या कहते हैं?

कानूनी ढाँचा: CrPC की धारा 482 के तहत केस रद्द करने की शक्ति

ऐसे समझौतों की जड़ में हाई कोर्ट की एक खास कानूनी शक्ति होती है। यह शक्ति दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 की धारा 482 में दी गई थी, जिसे अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 528 में शामिल किया गया है। इस प्रावधान के तहत हाई कोर्ट को यह अधिकार है कि वह न्याय के हित में या कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए किसी FIR या आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर सकता है।

आमतौर पर कुछ अपराध ऐसे होते हैं जिनमें दोनों पक्ष आपसी समझौता कर सकते हैं। इन्हें ‘समझौता योग्य’ (compoundable) अपराध कहा जाता है और इनका प्रावधान CrPC की धारा 320 में है। लेकिन POCSO या बलात्कार जैसे गंभीर अपराध ‘गैर-समझौता योग्य’ (non-compoundable) माने जाते हैं यानी इन्हें निजी तौर पर सुलझाया नहीं जा सकता। इसके बावजूद हाल के वर्षों में अदालतों ने धारा 482 का इस्तेमाल करते हुए कुछ मामलों में कार्यवाही रद्द की है, खासकर तब जब मामला निजी विवाद का हो और दोनों पक्षों में आपसी समझौता हो चुका हो।

हालाँकि, यह अधिकार असीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि FIR रद्द करना एक असाधारण कदम है और इसे बहुत सावधानी से इस्तेमाल किया जाना चाहिए। ऐसा तभी किया जाना चाहिए जब आरोप पूरी तरह बेबुनियाद हों या मुकदमा जारी रखने से नुकसान ज्यादा और फायदा कम हो। POCSO जैसे मामलों में अदालतें खास तौर पर दो बातों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती हैं एक तरफ समझौता और दूसरी तरफ बच्चों की सुरक्षा। कई मामलों में अगर पीड़िता बालिग हो चुकी हो और वह खुद समझौते के लिए तैयार हो या आरोपी से शादी कर चुकी हो तो अदालतें कार्यवाही रद्द करने की अनुमति दे देती हैं।

व्यवस्था पर दबाव और व्यावहारिक सोच

देश की अदालतों पर इस समय भारी बोझ है। साल 2026 की शुरुआत तक करीब 5.4 करोड़ मामले लंबित हैं जिनमें से लगभग 70% आपराधिक मामले हैं। दीवानी (सिविल) मामलों में फैसले आने में अक्सर दशकों लग जाते हैं। ऐसे में कई बार पक्षकार ज्यादा दबाव बनाने के लिए विवाद को आपराधिक रंग दे देते हैं। यानी जो मामला शुरू में पारिवारिक या कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ा विवाद होता है, वह आगे चलकर ऐसी FIR में बदल जाता है, जिसमें यौन अपराध, मारपीट या धोखाधड़ी जैसे आरोप लगा दिए जाते हैं।

स्थिति और जटिल तब हो जाती है जब पुलिस जाँच में देरी होती है। जाँच लंबी खिंचती है, गवाह मुकर जाते हैं और समय बीतने के साथ सबूत कमजोर हो जाते हैं। ऐसे में दोष साबित करना मुश्किल हो जाता है। इन हालात में जब दोनों पक्ष आपसी समझौता कर लेते हैं तो अदालतें कई बार व्यावहारिक रुख अपनाती हैं। इससे एक तरफ लंबित मामलों का बोझ कम होता है तो दूसरी तरफ अगर पीड़िता आरोपित से शादी कर ले या अपने आरोप वापस ले ले तो सामाजिक शांति की कोशिश होती है।

केस रद्द करने के मार्गदर्शक सिद्धांत

सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई महत्वपूर्ण फैसलों के जरिए यह साफ किया है कि गैर-समझौता योग्य अपराधों में FIR रद्द करते समय बहुत सावधानी बरतनी चाहिए। भारत की दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत जो अपराध धारा 320 में शामिल नहीं हैं उन्हें गैर-समझौता योग्य माना जाता है। इन मामलों में राज्य खुद अभियोजन चलाता है क्योंकि इन्हें समाज के खिलाफ अपराध माना जाता है।

साल 1992 के चर्चित मामले ‘हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल’ में सुप्रीम कोर्ट ने FIR रद्द करने के 7 आधार बताए थे। इनमें यह भी शामिल था कि यदि आरोप पहली नजर में बेहद अविश्वसनीय हों या किसी अपराध का खुलासा ही न करते हों, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। इस फैसले ने बेकार और निरर्थक मुकदमों को रोकने के लिए अदालतों को एक आधार दिया।

इसके बाद 2012 के ऐतिहासिक मामले ‘ज्ञान सिंह बनाम पंजाब राज्य’ में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर समझौते से न्याय सुनिश्चित होता है, तो हाई कोर्ट को यह अधिकार है कि वह गंभीर अपराधों में भी कार्यवाही रद्द कर सकता है बशर्ते उनका स्वरूप मुख्य रूप से निजी या सिविल विवाद से जुड़ा हो। हालाँकि, अदालत ने साफ चेतावनी दी कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध या ऐसे अपराध जो समाज पर व्यापक असर डालते हैं उन्हें वैवाहिक या कारोबारी विवादों की तरह नहीं देखा जा सकता। ऐसे मामलों में FIR रद्द करना बेहद सावधानी और सीमित परिस्थितियों में ही संभव है।

इसके आगे बढ़ते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के मामले ‘नरेंद्र सिंह बनाम पंजाब राज्य’ में यह स्पष्ट किया कि हत्या के प्रयास जैसे गंभीर मामलों में भी किन परिस्थितियों में FIR रद्द की जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि फैसला लेते समय 3 बातों पर खास ध्यान दिया जाना चाहिए अपराध की गंभीरता, समझौते की सच्चाई (क्या वह दबाव में तो नहीं हुआ) और दोष सिद्ध होने की संभावना।

इसके बाद 2017 में ‘पर्बतभाई अहीर बनाम गुजरात राज्य’ में सुप्रीम कोर्ट ने फिर दोहराया कि समझौते के बावजूद आर्थिक अपराधों या ऐसे मामलों में FIR रद्द नहीं की जानी चाहिए जिनका समाज पर व्यापक असर पड़ता है।

खास तौर पर यौन अपराधों के मामलों में अदालतें बेहद सतर्क रहती हैं क्योंकि ऐसे अपराधों का असर सिर्फ पीड़ित पर ही नहीं, बल्कि पूरे समाज पर पड़ता है। 2025 के मामले ‘मधुकर बनाम महाराष्ट्र राज्य’ में SC ने कहा कि बलात्कार से जुड़ी FIR को केवल ‘असाधारण परिस्थितियों’ में ही रद्द किया जा सकता है। यह तभी संभव है जब दोनों पक्षों के बीच स्वेच्छा से समझौता हुआ हो और अदालत को लगे कि मुकदमा जारी रखने में कोई जनहित नहीं है।

हालाँकि, 2024 के मामले ‘रामजी लाल बैरवा बनाम राजस्थान राज्य’ में सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ समझौते के आधार पर POCSO की कार्यवाही रद्द करने से साफ इनकार कर दिया था। अदालत ने कहा कि POCSO कानून का मुख्य उद्देश्य बच्चों को शोषण से बचाना है इसलिए केवल आपसी समझौता इस तरह के गंभीर मामलों को खत्म करने का आधार नहीं बन सकता।

FIR रद्द करने और ना करने का पैटर्न

अलग-अलग मामलों में अदालतों का रुख इसी सिद्धांत पर आधारित दिखाई देता है। POCSO मामलों में कई बार FIR तब रद्द की जाती है जब पीड़िता आरोपित से शादी कर चुकी हो और दोनों पारिवारिक जीवन जी रहे हों।

2025 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में कार्यवाही इसलिए समाप्त कर दी गई क्योंकि एक शादीशुदा दंपती को लंबे मुकदमे से परेशान करना उचित नहीं माना गया। इसी तरह 2025 में केरल हाई कोर्ट ने दो POCSO मामलों को समझौते के बाद इसलिए रद्द कर दिया क्योंकि दोनों मामलों में शादी हो चुकी थी। 2023 में दिल्ली हाई कोर्ट ने भी एक POCSO एफआईआर को खत्म कर दिया था, जहाँ दोनों पक्ष नाबालिग थे और आपसी समझौता हो चुका था।

हालाँकि, हर मामले में राहत नहीं मिलती। 2026 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने समझौते के बावजूद बलात्कार से जुड़े POCSO मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि पीड़िता का शरीर ‘उसका मंदिर’ है और ऐसा अपराध सामाजिक अपराध है।

इसी तरह 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने एक शिक्षक के खिलाफ दर्ज POCSO एफआईआर को बहाल कर दिया। इससे पहले हाई कोर्ट ने पारिवारिक समझौते के आधार पर उसे रद्द कर दिया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए उस आदेश को पलट दिया।

निष्कर्ष: न्याय या समझौता?

ऐसे समझौते अदालतों पर बढ़ते बोझ, जजों की कमी और लंबी कानूनी प्रक्रिया के बीच एक व्यावहारिक रास्ता बनकर सामने आते हैं। हालाँकि, आलोचकों का कहना है कि इससे गंभीर अपराधों के खिलाफ सख्त संदेश कमजोर हो सकता है, खासकर बच्चों से जुड़े मामलों में।

बॉम्बे हाई कोर्ट के मामले में शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता का आदेश पीड़ित-केंद्रित सोच दिखाता है, लेकिन यह सवाल भी उठाता है कि क्या पैसों से सम्मान और न्याय की भरपाई हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि समझौता सार्वजनिक हित से ऊपर नहीं हो सकता। अदालतों को हर मामले में तथ्यों को सावधानी से परखते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि FIR रद्द करना सुविधा नहीं बल्कि न्याय का माध्यम बने।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़े सकते हैं)

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Divyansh Tiwari
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