असम-मेघालय सीमा पर बसा छोटा-सा औद्योगिक शहर बर्नीहाट (Byrnihat) इन दिनों हर जगह खबरों में बना हुआ है। कभी अपनी खूबसूरती के लिए तारीफें बटोरने वाला यह शहर अब दुनिया का ‘सबसे प्रदूषित महानगरीय इलाका’ घोषित किया गया है।
हाल ही में यह मामला और ज्यादा चर्चा में आ गया, जब पत्रकार सार्थक गोस्वामी की यूट्यूब डॉक्यूमेंट्री ‘दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर से’ (Inside The World’s Most Polluted City) वायरल हो गई।
इस वीडियो में सार्थक एक स्थानीय अनुवादक के साथ बर्नीहाट का दौरा करते हैं, लोगों से बात करते हैं और पेड़ों की पत्तियों, घरों की छतों और सब्जियों पर जमी मोटी काली कालिख दिखाते हैं। वीडियो में प्रदूषण के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदारी एक खास फैक्ट्री एथेनॉल डिस्टिलरी पर डाली गई है।
इस वीडियो को अब तक 10 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है। इसके बाद लोगों में गुस्सा बढ़ा, विरोध प्रदर्शन हुए और राज्य सरकार से सीधे सवाल पूछे जाने लगे। लोगों का गुस्सा पूरी तरह समझ में आता है।
बर्नीहाट का प्रदूषण बढ़ा-चढ़ाकर नहीं दिखाया गया है। यहाँ लोग सच में बीमार पड़ रहे हैं, हवा वाकई बेहद खराब है और स्थानीय लोग सालों से इस समस्या के साथ जी रहे हैं। लेकिन जब पूरे घटनाक्रम और समय क्रम को ध्यान से देखा जाता है, तो यह दावा कि सिर्फ एक एथेनॉल फैक्ट्री की वजह से बर्नीहाट दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बना, तथ्यों के आधार पर सही नहीं ठहरता।
बर्नीहाट में एथेनॉल फैक्ट्री से प्रदूषण: टाइमलाइन जो दूर करती है सारे सवाल
सबसे पहले पूरे घटनाक्रम की टाइम लाइन समझ लेते हैं। इस पूरे मामले के केंद्र में उमियाम डिस्टिलेशन प्राइवेट लिमिटेड नाम की एक अनाज आधारित एथेनॉल डिस्टिलरी है, जो मेघालय के री-भोई जिले के बर्नीहाट स्थित एक्सपोर्ट प्रमोशन इंडस्ट्रियल पार्क (EPIP) में है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्लांट ने सितंबर 2024 में आधिकारिक तौर पर एथेनॉल का व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया।
अब इसकी तुलना उस समय से कीजिए, जब बर्नीहाट में प्रदूषण की समस्या पहली बार सामने आई थी। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने 2022-23 में ही बर्नीहाट को गंभीर रूप से प्रदूषित क्षेत्र घोषित कर दिया था। यानी एथेनॉल प्लांट शुरू होने से करीब दो साल पहले ही इस इलाके में प्रदूषण की गंभीर स्थिति दर्ज की जा चुकी थी।
अब उस रिपोर्ट की बात करते हैं, जिसने बर्नीहाट को पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना दिया। 2024 IQ एयर वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट के मुताबिक, यहाँ PM2.5 का सालाना औसत स्तर 128.2 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सुरक्षित सीमा 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से 25 गुना से भी ज्यादा है।
यह रिपोर्ट मार्च 2024 में प्रकाशित हुई थी, यानी एथेनॉल प्लांट के शुरू होने से पूरे छह महीने पहले। अब जरा सोचिए कि इसका क्या मतलब निकलता है। जो फैक्ट्री उस समय तक शुरू भी नहीं हुई थी, वह उस प्रदूषण संकट की वजह कैसे हो सकती है, जिसे नियामक एजेंसियाँ पहले ही दर्ज कर चुकी थीं और जिसकी जानकारी एक वैश्विक रिपोर्ट पहले ही दुनिया के सामने ला चुकी थी।
यह किसी राय या अलग-अलग व्याख्या का मामला नहीं है, बल्कि सिर्फ तारीखों का सवाल है। और इस मामले में तारीखें एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं।
कहाँ से आई कोयले की राख?
यह पहली बार नहीं है जब बर्नीहाट के लोगों ने हर सुबह पूरे शहर पर औद्योगिक धूल और कालिख की मोटी परत जमी हुई देखी हो। एथेनॉल प्लांट चर्चा में आने से बहुत पहले ही बर्नीहाट का औद्योगिक इलाका कोयले से चलने वाले कोक ओवन और फेरो-अलॉय भट्टियों के लिए जाना जाता था। इसी तरह के उद्योग वही कालिख और राख जैसी परत पैदा करते हैं, जो आज भी डॉक्यूमेंट्री में पेड़ों की पत्तियों और घरों की छतों पर जमी हुई दिखाई गई है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने 2018 में ही बर्नीहाट औद्योगिक क्षेत्र को क्रिटिकली पॉल्यूटेड एरिया घोषित कर दिया था। उस समय यहाँ 34 छोटे, मध्यम और बड़े उद्योग चलते थे, जिनमें ज्यादातर कोक (कोयले से बनने वाला ईंधन) और सीमेंट का उत्पादन करते थे।
इलाके के रहने वालों के मुताबिक, कई सालों से यहाँ हर सुबह गाड़ियों, पौधों, घरों की छतों और बाहर सूखने के लिए डाले गए कपड़ों पर रात भर में राख और काली धूल की मोटी परत जम जाती थी।
हालिया डॉक्यूमेंट्री में भी यही दृश्य दिखाए गए हैं, लेकिन उन्हें ऐसे दिखाया है की मानो यह कोई नई समस्या हो। जबकि हकीकत यह है कि यह प्रदूषण का वही पुराना पैटर्न है, जो एथेनॉल प्लांट शुरू होने से कई साल पहले से मौजूद था और जिसकी मुख्य वजह कोयले का इस्तेमाल करने वाले उद्योग थे, न कि एथेनॉल डिस्टिलरी।
बाद में राज्य सरकार ने इस पर कार्रवाई भी की। सितंबर 2024 में मेघालय राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MSPCB) ने उत्सर्जन मानकों का पालन न करने पर बर्नीहाट की छह औद्योगिक इकाइयों को बंद करने का नोटिस जारी किया।
इनमें शिलांग इस्पात और रोलिंग मिल, श्याम सेंचुरी फेरस लिमिटेड, नलारी फेरो अलॉयज, जैंतिया फेरो अलॉयज, मैथन अलॉयज और खासी अलॉयज शामिल थीं। ये सभी कोयले पर आधारित कोक या फेरो-अलॉय उद्योगों से जुड़ी इकाइयाँ थीं।
इसके अलावा, मार्च 2025 में मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा ने राज्य विधानसभा में बताया कि प्रदूषण नियमों का उल्लंघन करने पर सरकार ने इलाके की सात औद्योगिक इकाइयों को बंद कर दिया है। ये वही उद्योग थे, जिनसे स्थानीय लोगों के अनुसार कोयले की राख और काली धूल की परत बनती थी। इनमें से कई इकाइयाँ सितंबर 2024 में एथेनॉल प्लांट शुरू होने से पहले ही बंद हो चुकी थीं।
ऐसे में अगर आज भी किसी डॉक्यूमेंट्री में बर्नीहाट की सतहों पर काली कालिख या राख दिखाई देती है, तो उपलब्ध रिकॉर्ड और नियामक एजेंसियों के इतिहास को देखते हुए इसकी ज्यादा तार्किक वजह दशकों से चल रहे कोयला आधारित कोक और फेरो-अलॉय उद्योग माने जाएँगे, न कि वह एथेनॉल डिस्टिलरी, जो बाद में शुरू हुई और MSPCB की जून 2026 की जाँच के मुताबिक फिलहाल अपने तय उत्सर्जन मानकों के भीतर काम कर रही है।
बर्नीहाट: दर्जनों फैक्ट्रियों वाला शहर
डॉक्यूमेंट्री में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि सिर्फ एक एथेनॉल फैक्ट्री ही बर्नीहाट के प्रदूषण की असली वजह है। इस तरह की कहानी लोगों को इसलिए आसानी से समझ आती है, क्योंकि यह बहुत सीधी लगती है, एक ही दोषी, एक ही वजह और एक साफ-सुथरी कहानी। लेकिन बर्नीहाट का औद्योगिक ढाँचा इतना आसान नहीं है।
खुद सार्थक गोस्वामी की डॉक्यूमेंट्री में उनका स्थानीय अनुवादक बताता है कि शहर और उसके आसपास करीब 80 फैक्ट्रियाँ चल रही हैं। इनमें सीमेंट प्लांट, चूना पत्थर (लाइमस्टोन) प्रोसेसिंग यूनिट, फेरो-अलॉय फैक्ट्रियाँ, स्टील प्लांट और कम से कम तीन अलग-अलग शराब और डिस्टिलरी इकाइयाँ शामिल हैं, सिर्फ वही एक फैक्ट्री नहीं जो वायरल वीडियो के बाद चर्चा में आई।
इसके अलावा, बर्नीहाट एक कटोरे जैसी घाटी में बसा हुआ है। इस भौगोलिक स्थिति की वजह से यहाँ निकलने वाला धुआँ और प्रदूषण आसानी से वातावरण में फैल नहीं पाता, बल्कि इलाके के ऊपर ही फंसा रहता है।
यानी इन दर्जनों उद्योगों से निकलने वाला धुआँ और बारीक प्रदूषक कण हवा में दूर जाने के बजाय शहर के ऊपर जमा होते रहते हैं और समय के साथ प्रदूषण बढ़ता जाता है।
इसके साथ ही, बर्नीहाट पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र का एक बड़ा औद्योगिक और परिवहन केंद्र भी है, इसलिए यहाँ हर समय भारी ट्रकों और अन्य वाहनों की आवाजाही बनी रहती है। ऐसे में यहाँ का प्रदूषण किसी एक फैक्ट्री की वजह से नहीं बल्कि कई अलग-अलग कारणों के एक साथ असर का नतीजा है।
मेघालय के स्वास्थ्य मंत्री वैलाडमिकी शायला भी सार्वजनिक रूप से इस जटिल स्थिति को स्वीकार कर चुके हैं। उनका कहना है कि बर्नीहाट के प्रदूषण में योगदान देने वाली ज्यादातर फैक्ट्रियाँ मेघालय नहीं बल्कि असम की सीमा में स्थित हैं। ऐसे में यह तय करना कि किस राज्य या किस फैक्ट्री से कितना प्रदूषण हो रहा है, आसान नहीं है, क्योंकि बर्नीहाट दो राज्यों की सीमा पर बसा हुआ शहर है।
जब अधिकारियों ने जाकर चेक किया तो क्या हुआ?
डॉक्यूमेंट्री वायरल होने और लोगों का दबाव बढ़ने के बाद मेघालय राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MSPCB) ने इंतजार नहीं किया। 29 जून 2026 को बोर्ड ने अपनी पहल पर ही उमियाम डिस्टिलेशन प्लांट का निरीक्षण करने के लिए एक विशेष टीम भेजी।
जाँच के नतीजे 1 जुलाई 2026 को सार्वजनिक किए गए। इस निरीक्षण में कई पहलुओं की जाँच की गई, जिनमें पार्टिकुलेट मैटर (PM) का स्तर, स्टैक वेलोसिटी, डिफरेंशियल प्रेशर और उत्सर्जन स्रोत का तापमान शामिल था।
बोर्ड के मुताबिक, जाँच के दौरान दर्ज किए गए पार्टिकुलेट मैटर के स्तर प्लांट को दिए गए कंसेंट टू ऑपरेट की तय सीमा के भीतर पाए गए। जाँच में यह भी सामने आया कि प्लांट में लगे प्रदूषण नियंत्रण उपकरण सही तरीके से काम कर रहे थे।
इनमें कैप्टिव पावर यूनिट के लिए लगाया गया इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रीसिपिटेटर और डिस्टिलरी के लिए मल्टी-इफेक्ट इवैपोरेटर के साथ जीरो लिक्विड डिस्चार्ज प्रणाली शामिल है। अधिकारियों के अनुसार, कच्चे और शोधन किए गए अपशिष्ट जल (Effluent) के नमूनों की लैब में जाँच कराई गई, जिसमें पुष्टि हुई कि शोधन के बाद पानी को पर्यावरण में छोड़ने के बजाय प्लांट के कूलिंग टावर में दोबारा इस्तेमाल किया जा रहा है।
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि बर्नीहाट की हवा पूरी तरह सुरक्षित है, और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भी ऐसा कोई दावा नहीं किया है। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत बर्नीहाट आज भी आधिकारिक तौर पर नॉन-अटेनमेंट शहर की श्रेणी में है।
यानी यह अब भी राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं उतर रहा है और इसी वजह से इसकी लगातार निगरानी की जा रही है। पिछले दो वर्षों में प्रदूषण मानकों का उल्लंघन करने पर कई अन्य औद्योगिक इकाइयों को बंद भी किया जा चुका है। लेकिन जहाँ तक इस एक एथेनॉल प्लांट का सवाल है, नियामक अधिकारियों ने जब इसकी कानूनी मानकों के आधार पर जाँच की, तो उन्हें किसी तरह का उल्लंघन नहीं मिला।
दोषी भले ही एक ना हो लेकिन त्रासदी तो वास्तविक
डॉक्यूमेंट्री की टाइमलाइन या निरीक्षण के नतीजे उस असल चीज को खत्म नहीं करते जो सार्थक गोस्वामी की वीडियो में दिखाया गया है। जो विजुअल्स हैं, वे वाकई परेशान करने वाले हैं, फसलों और घरों की छतों पर जमी मोटी काली धूल, लोगों का यह कहना कि सब्जियों को खाने से पहले कई बार धोना पड़ता है और परिवारों का अस्थमा, त्वचा की बीमारियों और सांस लेने की दिक्कतों के बढ़ते मामलों का जिक्र भी खौफनाक लगता है।
डॉक्यूमेंट्री के साथ उद्धृत सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, इस इलाके में सांस संबंधी बीमारियों के मामले 2022 में 2082 से बढ़कर 2024 में 3681 हो गए हैं, यानी सिर्फ दो साल में लगभग 77 प्रतिशत की बढ़ोतरी। यह एक वास्तविक और गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है और इसे राष्ट्रीय स्तर पर मिल रही चर्चा पूरी तरह से जायज है।
असल सवाल यह नहीं है कि बर्नीहाट में प्रदूषण की समस्या है या नहीं यह तो साफ है कि है। असल सवाल यह है कि इस समस्या को जनता के सामने कैसे समझाया जा रहा है।
इसे सिर्फ एक एथेनॉल फैक्ट्री की गलती बताना कहानी को आसान और शेयर करने लायक जरूर बनाता है और लोगों को गुस्सा निकालने के लिए एक साफ लक्ष्य भी दे देता है। लेकिन इससे बाकी लगभग 79 फैक्ट्रियाँ, अनियंत्रित वाहन यातायात, दो राज्यों के बीच कमजोर नियामक व्यवस्था और सालों से चल रहा औद्योगिक विस्तार पूरी तरह से चर्चा से बाहर हो जाते हैं।
अगर सार्वजनिक चर्चा सिर्फ उस एक प्लांट पर केंद्रित रह जाती है, जो वैसे भी उस समय शुरू हुआ था जब प्रदूषण संकट पहले ही दर्ज किया जा चुका था, तो बाकी जिम्मेदार कारण आसानी से छिपे रह जाते हैं। इसमें एक और बड़ी विडंबना भी है।
एथेनॉल मिश्रित ईंधन को केंद्र सरकार बड़े पैमाने पर एक साफ और हरित विकल्प के रूप में बढ़ावा दे रही है और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी जैसे नेता इसे सुरक्षित, कम उत्सर्जन वाला और किसानों के लिए फायदेमंद बताते रहे हैं।
डॉक्यूमेंट्री के इस फ्रेमिंग के आलोचकों का कहना है कि बर्नीहाट की असली कहानी एथेनॉल उत्पादन को स्वाभाविक रूप से प्रदूषणकारी बताने की नहीं है, बल्कि एक ऐसे शहर में औद्योगिक विकास के खराब नियमन की है जो पहले से ही पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील था, और जहाँ कोई भी एथेनॉल प्लांट आने से बहुत पहले से यह समस्या मौजूद थी।
बर्नीहाट को CPCB ने 2022-2023 में ही पहले से क्रिटिकली पॉल्यूटेड क्षेत्र के रूप में चिन्हित कर दिया था। मार्च 2024 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में इसे दुनिया का सबसे प्रदूषित महानगरीय क्षेत्र भी बताया गया। जिस एथेनॉल फैक्ट्री को अभी जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, उसने सितंबर 2024 में ही व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया, यानी इन दोनों अहम घटनाओं के बाद।
जून 2026 में की गई एक सरकारी जाँच में पाया गया कि यह प्लांट अपने तय किए गए उत्सर्जन मानकों के भीतर ही काम कर रहा था और उसमें लगे प्रदूषण नियंत्रण उपकरण भी सही तरीके से कार्यरत थे। वहीं दूसरी तरफ, बर्नीहाट और उसके आसपास करीब 80 फैक्ट्रियाँ चलती हैं, जिनमें सीमेंट, स्टील, फेरो-अलॉय और कई डिस्टिलरी इकाइयाँ शामिल हैं, सिर्फ एक नहीं।
बर्नीहाट की हवा वाकई खतरनाक है और वहाँ रहने वाले लोगों को वास्तविक जवाब और वास्तविक जवाबदेही की जरूरत है। लेकिन उपलब्ध टाइमलाइन और सबूतों को देखें तो यह दावा कि सिर्फ एक एथेनॉल फैक्ट्री ही बर्नीहाट को दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बनाने की जिम्मेदार है, तथ्यों के हिसाब से मेल नहीं खाता।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


