‘गौहत्या रोकने के लिए चाहिए टास्क फ़ोर्स, लेकिन मुखिया ‘सेक्युलर’ होना चाहिए’

मेवात में गौहत्या रोकने के लिए त्वरित रूप से टास्क फ़ोर्स के गठन की सिफ़ारिश करते हुए बाल्यान ने इसके मुखिया की जो वांछित खूबियाँ गिनाई हैं, उनमें ऐसे अपराधों के विशेषज्ञ होने, बिना डर या लालच के निर्णय लेने की क्षमता के अलावा 'सेक्युलर विचारधारा' की अनिवार्यता शामिल है।

हरियाणा में लगातार हो रही गौहत्या रोकने को लेकर पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में अजीब टिप्पणी सुनने को मिली है। स्वराज्य पत्रिका की सम्पादक स्वाति गोयल शर्मा के अनुसार मामले में अदालत की सहायता के लिए ‘न्यायमित्र’ (एमाइकस क्युरे) नियुक्त हुए हरियाणा सरकार के एडिशनल एडवोकेट जनरल दीपक बाल्यान ने अदालत से कहा कि गौहत्या रोकने के लिए प्रस्तावित टास्क फ़ोर्स का जो मुखिया चुना जाए, उसका ‘सेक्युलर’ विचारधारा का होना आवश्यक है। यह शायद पहली बार है जब किसी सरकारी पद पर नियुक्ति के लिए एक खास राजनीतिक विचारधारा का ही होना अनिवार्य करने की बात किसी सरकारी अमले के अधिकारी की ओर से कही गई है

स्वाति गोयल शर्मा स्वराज्य के लिए पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में चल रही उस सुनवाई को कवर कर रहीं हैं, जिसमें हरियाणा गौवंश संरक्षण और गौसंवर्धन एक्ट, 2015 को प्रभावी रूप से लागू कर पाने में राज्य सरकार की नाकामी पर सुनवाई हो रही है। इस एक्ट के अंतर्गत गौवंश की तस्करी, हत्या के अलावा बीफ़ खाना या अपने पास रखना हरियाणा में प्रतिबंधित है। मार्च में जस्टिस महाबीर सिंह संधू ने इस पर सवाल खड़ा किया था कि इतने सारे मामलों में आरोपित गिरफ़्तारी से बच कर निकल कैसे जाते हैं। उन्होंने बाल्यान को मामले के लिए न्यायमित्र नियुक्त करने के अलावा हरियाणा के डीजीपी मनोज यादव को इस एक्ट के तहत दर्ज मामलों का अध्ययन करने का निर्देश दिया।

इसके बाद सामने आया यह चौंका देने वाला आँकड़ा कि इस एक्ट के तहत केवल मेवात जिले में (हरियाणा में कुल 22 जिले हैं) 792 एफआईआर लिखे जाने के बाद भी नवंबर, 2015 से मार्च 2019 के बीच एक भी गिरफ़्तारी नहीं हुई!!

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इस ढीलाढाली पर अदालत की फटकार के बाद न केवल डीजीपी ने मेवात में ऐसे केसों से निबटने के लिए पुलिस वालों को विशेष ट्रेनिंग दिए जाने के निर्देश दिए, बल्कि हरियाणा की खट्टर सरकार ने भी इस एक्ट में संशोधन कर पुलिस वालों को भी विशेष अधिकार दिए। यह अधिकार थे बीफ़ या हत्या के लिए ले जाई जा रहीं गायों के संदिग्ध वाहनों की तलाशी और उन्हें जब्त करने का अधिकार। इसके अलावा राज्य सरकार के एक प्रतिनिधि ने अदालत को बताया कि सरकार गायों के एक जगह से दूसरी जगह ले जाए जाने का समय सुबह 7 से शाम 5 बजे के बीच निर्धारित करने पर भी विचार कर रही है। यह भी एमाइकस क्युरे बाल्यान का ही सुझाव था। इसके बाद अदालत ने बाल्यान को मेवात (अब नूह) के सभी पुलिस थानों का दौरा कर इस एक्ट को ढंग से लागू करने के सुझाव तैयार करने का निर्देश दे दिया था। बाल्यान का ‘सेक्युलर’ पुलिस अधिकारी वाला सुझाव इसी संदर्भ में था।

28 नवंबर, 2019 को बाल्यान द्वारा जमा रिपोर्ट के हवाले से स्वाति गोयल शर्मा का दावा है कि इस एक्ट के अंतर्गत दायर किए गए मुकदमों को पुलिस के काम करने के आम ढर्रे पर नहीं सुलझाया जा सकता है। बकौल स्वाति, बालियान ने गौहत्या और गौ-तस्करी रोकने के लिए एक विशेष टास्क फ़ोर्स के गठन का सुझाव दिया है, जिसका मुखिया कम-से-कम एसएसपी रैंक का अधिकारी हो। फ़िलहाल इसकी जिम्मेदारी एक डीएसपी रैंक अफ़सर के पास है, लेकिन उनके पास दो अन्य पुलिस थानों का भी कार्यभार है। इसके अलावा बाल्यान ने यह भी बताया था कि जो ‘स्पेशल सेल’ इन मामलों को देख रही है, उसके पास आधारभूत ढाँचे, पर्याप्त संख्या में लोगों समेत सुविधाओं का बेहद अभाव है।

इसी रिपोर्ट में उन्होंने मेवात में गौहत्या रोकने के लिए त्वरित रूप से टास्क फ़ोर्स के गठन की सिफ़ारिश करते हुए बाल्यान ने इसके मुखिया की जो वांछित खूबियाँ गिनाई हैं, उनमें ऐसे अपराधों के विशेषज्ञ होने, बिना डर या लालच के निर्णय लेने की क्षमता के अलावा ‘सेक्युलर विचारधारा’ की अनिवार्यता शामिल है। इसके अलावा उन्होंने संवेदनशील इलाकों में चेक पॉइंट बनाए जाने के साथ ही एक और महत्वपूर्ण सुझाव की वकालत की है। उन्होंने कहा है कि पुलिस वालों के पास एक ‘मोबाइल’ (चलती-फिरती) लैब होनी चाहिए, ताकि घटनास्थल पर ही बरामद मीट की जाँच कर यह बताया जा सके कि यह गाय का है या नहीं। रिपोर्ट के मुताबिक, उपरोक्त भारी संख्या में मामले दर्ज होने के बावजूद किसी को दोषी इसलिए नहीं करार दिया जा पाता है क्योंकि माँस के बीफ़ होने का पता उसके सड़ने के पहले ही लगाया जा सकता है।

इसके अलावा रिपोर्ट में नूह में स्थानीय ‘सौहार्द’ को गौहत्या रोकने के लिए ज़रूरी बताया गया है। इसका कारण यह कहा गया है कि वहाँ की बहुसंख्य जनता मुस्लिम है, जो बीफ़ के मामलों की जाँच में पुलिस के साथ सहयोग नहीं करती है, क्योंकि उसे तथाकथित रूप से पुलिस पर भरोसा नहीं है।

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