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छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में सुलझा धर्मांतरण विवाद, 26 परिवारों ने घर वापसी: पढ़ें- साय सरकार ने मिशनरियों पर कैसे कसी नकेल, पहले कॉन्ग्रेस देती थी विवादों को हवा

जहाँ कॉन्ग्रेस के शासनकाल में ऐसे मामलों में केवल लीपापोती की जाती थी और मिशनरियों को मौन संरक्षण दिया जाता था, वहीं भाजपा सरकार के प्रशासन ने मध्यस्थता का ऐसा रास्ता निकाला जो पूरी तरह जनजातीय संस्कृति की रक्षा करता है।

छत्तीसगढ़ का बस्तर और जशपुर अंचल लंबे समय से ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण के खेल का केंद्र रहा है। भोले-भाले जनजातीय लोगों को बहला-फुसलाकर, तरह-तरह के प्रलोभन देकर या नए जमाने के डिजिटल माध्यमों से जाल में फंसाकर उनकी मूल संस्कृति से दूर करने की साजिशें यहाँ लंबे समय से आम रही हैं।

ताजा मामला छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के भरंडा और खड़का गाँवों से सामने आया, जहाँ धर्मांतरण को लेकर जनजातीय समाज और मतांतरित ईसाइयों के बीच तनाव चरम पर पहुँच गया था। स्थिति इतनी बिगड़ गई थी कि ईसाई मजहब को मानने वाले 26 परिवारों को ग्रामीणों ने सामाजिक बहिष्कार कर गाँव छोड़ने का अल्टीमेटम दे दिया था।

सालों से सुलग रही इस चिंगारी को जहाँ पिछली कॉन्ग्रेस सरकार के समय हिंसक होने के लिए खुला छोड़ दिया जाता था, वहीं मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की भाजपा सरकार और प्रशासनिक मुस्तैदी ने इसका समाधान निकाला।

नारायणपुर के खड़का गाँव में दिनभर चले तनाव के बाद प्रशासनिक मध्यस्थता के बीच मतांतरित परिवारों ने ईसाई मजहब का त्याग कर अपनी मूल जनजातीय संस्कृति और दूमा हांडी को छूकर सनातनी जड़ों में घर वापसी की है।

आइए जानते हैं कि आखिर नारायणपुर में यह विवाद क्यों भड़का, ईसाई मिशनरियाँ किस तरह ग्रामीण इलाकों में जहर घोल रही हैं और कैसे भाजपा सरकार छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 के जरिए इस समस्या की जड़ पर प्रहार कर रही है।

नारायणपुर के भरंडा और खड़का गाँव का पूरा विवाद

नारायणपुर जिले के भरंडा थाना क्षेत्र के भरंडा गाँव और उससे लगे खड़का गाँव में मतांतरण को लेकर उपजा असंतोष अचानक नहीं भड़का था, बल्कि इसकी पृष्ठभूमि दिसंबर 2025 से ही तैयार हो रही थी। गाँव में बड़ी संख्या में जनजातीय समुदायों को ईसाई मिशनरियों द्वारा कनवर्ट किया जा रहा था।

इससे मूल सनातन परंपरा और पेन संस्कृति को मानने वाले ग्रामीण बेहद आक्रोशित थे। 9 जून 2026 के बाद स्थिति तब और ज्यादा बिगड़ गई जब दोनों पक्षों के बीच जमकर मारपीट हुई और इस झड़प में कई महिलाओं के घायल होने की भी सूचना मिली।

इस घटना के बाद ग्रामीणों का विरोध लगातार बढ़ता गया और गाँव के गयता तथा पटेल समेत प्रमुख लोगों ने ईसाई मजहब मानने वाले 26 परिवारों को एक-एक कर घरों से बाहर निकाल दिया। घर से निकाले जाने के बाद ये परिवार गाँव के बाहर पेड़ों की छाँव में और खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हो गए।

ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप था कि ये मतांतरित लोग गाँव की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था, रीति-रिवाजों और सामुदायिक संस्थाओं का पालन नहीं कर रहे थे, जिससे पूरा सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो रहा था।

दूमा हांडी स्पर्श और आगा देवता की पूजा से निकला शांतिपूर्ण समाधान

जहाँ कॉन्ग्रेस के शासनकाल में ऐसे मामलों में केवल लीपापोती की जाती थी और मिशनरियों को मौन संरक्षण दिया जाता था, वहीं भाजपा सरकार के प्रशासन ने मध्यस्थता का ऐसा रास्ता निकाला जो पूरी तरह जनजातीय संस्कृति की रक्षा करता है। खड़का गाँव में दिनभर चले गतिरोध और तनाव के बाद प्रशासन, पुलिस और ग्रामीणों के बीच मैराथन बैठक हुई।

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक और तहसीलदार सहित बड़ी संख्या में पुलिस बल की मौजूदगी में मतांतरित परिवारों ने स्वीकार किया कि उनसे बड़ी चूक हुई थी और वे अपनी मूल संस्कृति में लौटना चाहते हैं। इसके बाद बस्तर की अति-पारंपरिक आदिवासी रीति-नीति के अनुसार मतांतरित परिवार के सदस्यों ने पितरों की पवित्र मटकी यानी दूमा हांडी का स्पर्श किया।

इसके बाद ग्राम आगा देवता की विशेष पूजा-अर्चने में भाग लेकर सामाजिक रूप से पुनः गाँव में शामिल होने की प्रक्रिया पूरी की। इस सामाजिक शुद्धि और घर वापसी के बाद ग्रामीणों ने अपना विरोध समाप्त कर दिया।

वहीं भरंडा गाँव में भी यह लिखित समझौता हुआ कि ईसाई परिवार बस्ती के भीतर कोई भी चंगाई सभा, घर पर सामूहिक प्रार्थना या ईसाई पद्धति से अंतिम संस्कार जैसी धार्मिक गतिविधि नहीं करेंगे, साथ ही गाँव वालों ने उन्हें मूल धर्म में लौटने के लिए एक महीने का समय दिया है।

ईसाई मिशनरियों का घिनौना खेल और ग्रामीण इलाकों में गहराया तनाव

छत्तीसगढ़ के सुदूर वनांचल क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियों की सक्रियता कोई मजहबी प्रचार का सामान्य मामला नहीं है, बल्कि यह देश के जनसांख्यिकीय ढाँचे को बदलने का एक सुविचारित एजेंडा है। मिशनरियाँ यहाँ के सीधे-साधे जनजातीय लोगों की गरीबी, बीमारी और कम पढ़े-लिखे होने का अनुचित फायदा उठाती हैं।

जनजातीय समाज प्रकृति पूजक और हिंदू सनातन व्यवस्था का अटूट हिस्सा रहा है, लेकिन मिशनरियाँ जब इनका धर्मांतरण कराती हैं, तो सबसे पहले वे जनजातीय लोगों को उनकी पारंपरिक पेन व्यवस्था, बुढ़ादेव की पूजा और पुरखों के रीति-रिवाजों को छोड़ने के लिए उकसाती हैं।

इससे गाँवों में सदियों पुराना आपसी भाईचारे का सामाजिक ताना-बाना बिखर जाता है। इसके अलावा जादुई इलाज और चंगाई सभाओं के नाम पर बड़ा फ्रॉड किया जाता है। कनवर्ट होने के बाद ये लोग अपने ही सगे भाइयों से नफरत करने लगते हैं, जिससे गृह-युद्ध जैसी स्थिति पैदा होती है।

जशपुर के हर्रापाठ गाँव का उदाहरण भी सामने आया था, जहाँ राष्ट्रपति की दत्तक संतान कहे जाने वाले पहाड़ी कोरबा जनजाति की 24 एकड़ से अधिक जमीन पर ईसाई बन चुके लोगों द्वारा चर्च बनाने के लिए अवैध कब्जे की कोशिश की गई थी, जिसे बाद में भारी राजनीतिक और सामाजिक दबाव के बाद मुक्त कराया जा सका।

जब मिशनरियों के इशारे पर फूटा था जनजातीय और SP का सिर

नारायणपुर में हुआ यह विवाद कोई पहली घटना नहीं है, क्योंकि छत्तीसगढ़ में ईसाई मिशनरियों के आक्रामक धर्मांतरण के खिलाफ जनजातीय समाज का आक्रोश पहले भी हिंसक रूप ले चुका है। दिसंबर 2022 और जनवरी 2023 का नारायणपुर के एड़का गाँव का दंगा इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।

एड़का पंचायत के गोर्रा गाँव में नए-नए ईसाई बने मतांतरितों ने चर्च के पादरियों के नेतृत्व में जनजातीय समाज के लोगों पर लाठी, डंडों, रॉड और धारदार हथियारों से जानलेवा हमला कर दिया था। इसके विरोध में जब जनजातीय समाज ने पाँच हजार से अधिक लोगों की महा-रैली निकाली, तो चर्च के इशारे पर बाहर से बुलाए गए करीब 700 से 800 ईसाइयों की उग्र भीड़ ने भारी पत्थरबाजी की थी।

इस दौरान स्थिति को शांत कराने पहुँचे नारायणपुर के तत्कालीन SP सदानंद कुमार पर चर्च के भीतर ही हमला किया गया, जिससे उनका सिर फट गया था। इस हिंसक झड़प में थाना प्रभारी भुनेश्वर जोशी और कई अर्धसैनिक बलों के जवान भी लहूलुहान हुए थे, जिससे साफ पता चलता है कि मिशनरी किस हद तक कानून व्यवस्था को चुनौती देने की तैयारी के साथ काम करते हैं।

कॉन्ग्रेस राज में तुष्टिकरण और खुली छूट बनाम भाजपा राज में त्वरित न्याय

छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के साथ ही धर्मांतरण के खिलाफ लड़ाई का दृष्टिकोण पूरी तरह बदल गया है और दोनों सरकारों के रवैये में जमीन-आसमान का अंतर साफ देखा जा सकता है। कॉन्ग्रेस के शासनकाल में वोट बैंक की राजनीति के कारण अवैध धर्मांतरण पर आँखें मूंद ली गई थीं।

यहाँ तक कि तत्कालीन सरकार के मंत्रियों के रिश्तेदारों पर ही जनजातीय लोगों की कीमती जमीनें ठग कर अपने नाम कराने के गंभीर आरोप लगे थे। उस दौर में जब जनजातीय समाज शिकायत लेकर जाता था, तो जिला प्रशासन मूकदर्शक बना रहता था, जिसके कारण छोटे विवाद अंततः बड़े हिंसक दंगों में बदल जाते थे।

इसके विपरीत, वर्तमान विष्णु देव साय की भाजपा सरकार स्पष्ट रूप से जनजातीय संस्कृति और सनातन अस्मिता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। नारायणपुर, भरंडा और खड़का के मामलों में जैसे ही विवाद की भनक लगी, एएसपी और तहसीलदार भारी पुलिस बल के साथ खुद मौके पर पहुँचे और चौबीस घंटे के भीतर कानून का डर दिखाते हुए शांतिपूर्ण समाधान निकाला।

कड़े प्रशासनिक रुख के कारण अब मतांतरितों को भी समझ आ गया है कि सरकार पूरी तरह जनजातीय समाज के साथ खड़ी है, इसलिए वे स्वेच्छा से घर वापसी का मार्ग चुन रहे हैं।

छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 के सख्त कानूनी प्रावधान

विष्णु देव साय सरकार केवल तात्कालिक प्रशासनिक समझौतों पर भरोसा नहीं कर रही है, बल्कि वह इस सामाजिक बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 लेकर आई। यह कानून वर्ष 1968 के पुराने मध्य प्रदेश के कानून की जगह लेगा, जिसकी कमजोरियों का फायदा उठाकर मिशनरी गिरोह आसानी से बच निकलते थे।

नए कानून के तहत सामूहिक धर्मांतरण को राज्य की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना गया है, इसलिए इसके दोषियों को कम से कम दस साल से लेकर आजीवन कारावास यानी पूरी जिंदगी जेल में काटने की सजा मिलेगी और साथ ही देश में सर्वाधिक पच्चीस लाख रुपए का भारी जुर्माना भी लगाया जाएगा।

यदि कोई व्यक्ति किसी नाबालिग, महिला, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति का अवैध तरीके से धर्म बदलवाता है, तो उसे दस से बीस साल तक की जेल काटनी होगी। इसके अतिरिक्त, सोशल मीडिया या ऑनलाइन गेमिंग के जरिए किए जाने वाले डिजिटल धर्मांतरण को भी इस कानून के दायरे में लाया गया है।

इसके तहत सभी अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती होंगे, जिससे पुलिस बिना वारंट के पादरियों या दलालों को गिरफ्तार कर सकेगी और विशेष अदालतों में इसकी त्वरित सुनवाई होगी।

घर वापसी को मिला कानूनी कवच और जड़ों की ओर लौटना हुआ आसान

इस नए कानून की सबसे क्रांतिकारी और बहुप्रशंसित विशेषता यह है कि यह धर्मांतरण और अपनी जड़ों की ओर लौटने यानी घर वापसी के बीच के अंतर को पूरी तरह स्पष्ट करता है। कानून के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति अपना मौजूदा बाहरी धर्म छोड़कर वापस अपने पैतृक धर्म या अपने पूर्वजों के मूल धर्म यानी सनातन अथवा जनजातीय संस्कृति में लौटता है, तो इसे कानूनी रूप से धर्मांतरण नहीं माना जाएगा।

इसका सबसे बड़ा व्यावहारिक लाभ यह है कि नारायणपुर के खड़का गाँव के जनजातीय समाज ने जो दूमा हांडी छूकर अपनी मूल परंपरा में वापसी की है, उसके लिए उन्हें किसी जिला मजिस्ट्रेट को पहले से सूचना देने या तीस दिनों तक किसी सरकारी आपत्ति का इंतजार करने की कोई आवश्यकता नहीं होगी।

सरकार ने अपनी मूल संस्कृति और धर्म में वापस आने वाले लोगों के लिए कानूनी दरवाजे पूरी तरह से अड़चन-मुक्त और खुले रखे हैं, जबकि नया धर्म अपनाने वालों के लिए कठोर स्क्रूटनी की व्यवस्था की है ताकि कोई भी लाचारी या मजबूरी का फायदा न उठा सके।

नारायणपुर का खड़का और भरंडा विवाद देश के सामने एक जीवंत उदाहरण है कि जब शासन और प्रशासन की नीयत साफ हो, तो बिना किसी खून-खराबे के सनातन संस्कृति की रक्षा की जा सकती है। ईसाई मिशनरियों ने सुदूर वनांचलों में जनजातीय समाज को बाँटने और समाज में जहर घोलने का जो धंधा चला रखा था, उस पर अब भाजपा सरकार के कड़े रुख और नए कानून ने पूरी तरह से पूर्णविराम लगा दिया है।

छत्तीसगढ़ सरकार का यह रवैया साफ संदेश देता है कि राज्य के हर नागरिक की परंपरा, संस्कृति और उसके विश्वास को सुरक्षित रखना उनकी प्राथमिकता है और अब राज्य में धोखे या प्रलोभन के जरिए धर्मांतरण का खेल खेलने वालों के लिए कोई जगह नहीं बची है।

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सौम्या सिंह
सौम्या सिंह
ख़ुद को तराशने में मसरूफ़

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