Thursday, January 21, 2021
Home देश-समाज माघी अमावस्या पर मौन साधना का महत्व, कुम्भ का दूसरा शाही स्नान

माघी अमावस्या पर मौन साधना का महत्व, कुम्भ का दूसरा शाही स्नान

इस बार मौनी अमावस्या पर कई योग मिलकर महायोग बना रहें हैं। सोमवती योग के साथ, यह श्रवण नक्षत्र में भी है। ज्योतिष के हिसाब इस बार पाँच दशकों में अति दुर्लभ योग बन रहा है।

हिंदी कैलेंडर के माघ महीने की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मौनी या माघी अमावस्या कहते हैं। यह तिथि अगर सोमवार के दिन पड़ती है, तो इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। कहते हैं, सोमवार हो और साथ ही कुम्भ लगा हो तब इसका प्रभाव अनन्त गुना फलदाई हो जाता है।

इस साल 2019 में मौनी अमावस्या सोमवार 4 फरवरी को है। इस दिन चंद्रमा मकर राशि में सूर्य, बुध, केतु के साथ हैं और वृहस्पति वृश्चिक राशि में हैं, जिससे कुम्भ का प्रमुख शाही स्नान का योग भी बन रहा है। इस बार मौनी अमावस्या पर कई योग मिलकर महायोग बना रहे हैं। सोमवती योग के साथ, यह श्रवण नक्षत्र में भी है। ज्योतिष के हिसाब इस बार पाँच दशकों में अति दुर्लभ योग बन रहा है। कुम्भ मेले का दूसरा शाही स्नान माघ मौनी अमावस्या के दिन ही है।

इस माह को भी कार्तिक माह के समान पुण्य प्रद माना गया है। गंगा तट पर इसी पुण्य प्रताप के लिए भक्त जन, साधु-संत एक महीने तक कुटी बनाकर गंगा सेवा, ध्यान, तप एवं आध्यात्मिक साधना करते हैं। कहते हैं कि इस दिन पवित्र संगम में देवताओं का निवास होता है, इसलिए इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है।

प्रयागराज कुम्भ में मौनी अमावस्या के विशेष स्नान के लिए एकत्रित श्रद्धालु

मौनी अमावस्या शरद-संक्रांति के बाद की दूसरी या महाशिवरात्रि से पहले की अमावस्या होती है। मौनी अर्थात मौन साधना का दिवस, आमतौर पर मकर संक्रांति से लेकर शिवरात्रि तक का समय योगिक परम्परा में साधना के लिए श्रेष्ठ माना गया है।

मौनी अमावस्या पर मौन साधना के माहात्म्य पर प्रकाश डालते हुए सदगुरु कहते हैं, “अस्तित्व की हर वो चीज जिसको पाँचों इंद्रियों से महसूस किया जा सके, वह दरअसल ध्वनि की एक गूँज है। हर चीज जिसे देखा, सुना, सूँघा जा सके, जिसका स्वाद लिया जा सके या जिसे स्पर्श किया जा सके, ध्वनि या नाद का एक खेल है। मनुष्‍य का शरीर और मन भी एक प्रतिध्वनी या कंपन ही है। लेकिन शरीर और मन अपने आप में सब कुछ नहीं है। वे तो बस एक बड़ी संभावना की ऊपरी परत भर हैं, वे एक दरवाजे की तरह हैं। बहुत से लोग ऊपरी परत के नीचे नहीं देखते, वे दरवाजे की चौखट पर बैठकर पूरी ज़िंदगी बिता देते हैं। लेकिन दरवाजा अंदर जाने के लिए होता है। इस दरवाजे के आगे जो चीज है, उसका अनुभव करने के लिए चुप रहने का अभ्यास ही मौन कहलाता है।”

मौन क्या है? कितना प्रभावी है, इसका अनुभव आप सभी ने किया होगा। आमतौर पर अंग्रेजी शब्द साइलेंस मौन के बारे में बहुत कुछ नहीं बता पाता है। संस्कृत में मौन और नि:शब्द दो महत्वपूर्ण शब्द हैं। मौन का अर्थ आम भाषा में चुप रहना होता है, यानी आप कुछ बोलते नहीं हैं। नि:शब्द का अर्थ है, जहाँ शब्द या ध्वनि नहीं है। अर्थात, शरीर, मन और सारी सृष्टि के परे। ध्वनि के परे जाने का मतलब ध्वनि की गैरमौजूदगी नहीं, बल्कि ध्वनि से आगे जाना है।

कुम्भ में विचरण करते साधु-संत

आज जब हर जगह विज्ञान का बोलबाला है तो कहीं न कहीं सनातन ज्ञान-विज्ञान की परम्परा को गौड़ साबित करने की होड़ मची है। ऐसा वे लोग कर रहे हैं जिन्होंने कुछ भी स्वतः तलाशा नहीं है। उनकी नज़र में भौतिकता ही जीवन का पर्याय है। बस एक को अच्छा साबित करने के चक्कर में दूसरी सभी परम्पराओं, मान्यताओं को खारिज़ करने में ख़ुद को खपाए जा रहे हैं।

माना कि विज्ञान ने प्रचलित ज्ञान को तकनीक के माध्यम से सुलभ बनाकर लोगों तक पहुँचाया, आज वही लोग सुविधाभोगी होकर, भौतिकता में ही सुख खोजने लगे। निरंतर ख़ोज की सनातन परम्परा विलुप्त सी होती गई। जिसे सुखद कहा जाए या दुःखद, पर उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि आज कुछ भी समझाने के लिए विज्ञान की भाषा में बात करनी पड़ती है। जबकि विज्ञान स्वयं निरंतर ख़ोज की प्रक्रिया में आगे बढ़ता हुआ उन्नति करता गया और लोग अपनी मूलभूत सनातन क्षमता खोते गए। विशेष पर्वों से जुड़ी मान्यताएँ, आध्यात्मिक साधनाएँ हमें पुनः अपने गौरव और उनके पीछे छिपी रहस्यों के प्रति जागरूकता के साथ पुनः उन्हें समझने में योगदान देती हैं।

कुम्भ जैसे पर्व हमारी धार्मिक, आध्यात्मिक साधना पद्धतियों को समझने के केंद्र भी हैं। सनातन परम्परा में गूढ़ हमारी सारी साधनाएँ अस्तित्व की अनुभूति के साथ उसके परे जाने के विज्ञान पर ही आधारित हैं। आज यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि पूरा अस्तित्व ही ऊर्जा की एक प्रतिध्वनि या कंपन है। इंसान हर कंपन को ध्वनि के रूप में महसूस कर सकता है। सृष्टि के हर रूप के साथ एक खास ध्वनि जुड़ी हुई है। ध्वनियों के इसी जटिल संगम को ही हम सृष्टि के रूप में महसूस कर रहे हैं। सभी ध्वनियों का आधार नि:शब्द है। नि:शब्द अर्थात शून्यता। सृष्टि के किसी अंश का सृष्टि के स्रोत में रूपांतरित होने की कोशिश ही मौन है। एक ऐसा आयाम जो जीवन और मृत्यु के परे हो, मौन या नि:शब्द कहलाता है। कमाल की बात ये है कि मौन की साधना इंसान कर नहीं सकता, इसमें सिर्फ़ हुआ जा सकता है।

सद्गुरु इस बात पर जोर देते हैं कि मौन का अभ्‍यास करने और मौन होने में अंतर है। अगर आप किसी चीज का अभ्यास कर रहे हैं, तो निश्चित रूप से आप वह नहीं हैं। अगर आप पूरी जागरूकता के साथ मौन में प्रवेश करने की चेष्‍टा करते हैं तो आपके मौन होने की संभावना बनती है।

शाही स्नान को जाते अखाड़े

संगम में स्नान और इसके माहात्म्य के संदर्भ में प्रचलित है सागर मंथन की कथा। कहते हैं जब सागर मंथन से भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए, उस समय देवताओं एवं असुरों में अमृत कलश के लिए खींचा-तानी शुरू हो गई। इससे अमृत की कुछ बूंदें छलक कर प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में जा गिरी। यही कारण है कि यहाँ की नदियों में स्नान करने पर अमृत स्नान का पुण्य प्राप्त होता है।

माघ की महिमा शास्त्रों में भी बखानी गई है। कहा गया है, सत युग में जो पुण्य तप से मिलता था, द्वापर में हरि भक्ति से, त्रेता में ज्ञान से, कलियुग में दान से, लेकिन माघ महीने में संगम स्नान हर युग में अन्नंत पुण्यदायी होगा।

ऐसे में माघ माह की मौनी अमावस्या पर प्रयागराज कुम्भ में हैं तो बहुत अच्छा, नहीं तो कहीं भी गंगा स्नान कर इस दिन के माहात्म्य का स्वतः अनुभव करें। हो सके तो मौन रहें और ख़ुद अनुभव करें कि क्यों मौन को नाद से भी प्रभावशाली माना गया है।

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रवि अग्रहरि
अपने बारे में का बताएँ गुरु, बस बनारसी हूँ, इसी में महादेव की कृपा है! बाकी राजनीति, कला, इतिहास, संस्कृति, फ़िल्म, मनोविज्ञान से लेकर ज्ञान-विज्ञान की किसी भी नामचीन परम्परा का विशेषज्ञ नहीं हूँ!

 

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