Homeदेश-समाजपूर्ण राज्य की डिमांड पर सुलगा लद्दाख, हिंसा के पीछे कॉन्ग्रेस का बताया जा...

पूर्ण राज्य की डिमांड पर सुलगा लद्दाख, हिंसा के पीछे कॉन्ग्रेस का बताया जा रहा हाथ: सोनम वांगचुक की ‘भूख हड़ताल’ कैसे आगजनी-पथराव तक पहुँची?

24 सितंबर की सुबह भूख हड़ताल वाली जगह भीड़ जमा होने लगी। यही भीड़ लेह के बीजेपी कार्यालय की ओर बढ़ी। इन्हें नियंत्रित रखने के लिए बैरिकेड्स लगाए गए थे। लेकिन जैसी ही प्रदर्शनकारियों ने आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश की गई, पथराव शुरू हो गया।

केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के लेह में बुधवार (24 सितंबर 2025) को बंद के दौरान हिंसा भड़क उठी। यह जल्द ही झड़प, आगजनी और अराजकता में बदल गई। इस बंद का आह्वान लेह एपेक्स बॉडी की ओर से किया गया था।

हिंसा के बाद विवादित एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने अपना भूख हड़ताल खत्म कर दिया है। हिंसा के पीछे कॉन्ग्रेस नेताओं का हाथ होने की बात कही जा रही है। बीजेपी सांसद संबित पात्रा ने कहा है कि लद्दाख के विरोध प्रदर्शन के पीछे जेन-जी का हाथ होने का दिखावा किया जा रहा है। हिंसा भड़काने के पीछे कॉन्ग्रेस है।

उन्होंने कहा कि अपर लेह से कॉन्ग्रेस काउंसलर स्टैनजिंग त्सेपांग मुख्य साजिशकर्ता हैं। कई तस्वीरें सामने आई हैं जिसमें कॉन्ग्रेस काउंसलर और उनके समर्थक हिंसा भड़काते दिख रहे हैं। उल्लेखनीय है कि हिंसा के दौरान बीजेपी के स्थानीय कार्यालय और पुलिस वैन को फूँक दिया गया। सुरक्षा बलों के साथ प्रदर्शनकारियों की हिंसक झड़प हुई।

लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने जैसी माँगों के समर्थन में सोनम वांगचुक की अगुवाई में सितंबर की शुरुआत से आंदोलन चल रहा था। लेकिन हिंसा के बाद भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) 2023 की धारा 163 लागू करनी पड़ी है। इसके तहत चार से अधिक लोगों के इकट्ठा होने, रैलियाँ निकालने और लाउडस्पीकरों के अनाधिकृत इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

हिंसा कैसे शुरू हुई

मीडिया रिपोर्टों में प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से बताया जा रहा है कि 23 सितंबर की शाम से ही माहौल तनावपूर्ण था। भूख हड़ताल पर बैठे दो बुज़ुर्गों को हालत बिगड़ने के बाद अस्पताल ले जाना पड़ा था। उनकी हालत बिगड़ने के बाद छात्रों और युवा कार्यकर्ता आक्रोशित हो गए। इनमें से कई बातचीत में देरी को लेकर पहले से ही असंतुष्ट थे।

24 सितंबर की सुबह भूख हड़ताल वाली जगह के पास भीड़ जमा होने लगी। बाद में यही भीड़ लेह के बीजेपी कार्यालय की ओर बढ़ी। इन्हें नियंत्रित रखने के लिए बैरिकेड्स लगाए गए थे। पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई थी। लेकिन जैसी ही प्रदर्शनकारियों ने आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश की गई, पथराव शुरू हो गया। हिंसा को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को आँसू गैस के गोले दागने पड़े।

लेकिन हालात तेजी से बेकाबू होते गए। पुलिस वैन में आग लगा दी गई। बीजेपी कार्यालय पर हमला कर उसे आग के हवाले कर दिया गया। प्रदर्शनकारी सोनम वांगचुक के समर्थन में नारे लगा रहे थे। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार झड़पों में दर्जनों लोग घायल हुए हैं। तीन से 5 लोगों की मौत का भी दावा किया जा रहा है, जिसकी खबर लिखे जाने तक पुष्टि नहीं हुई थी।

वांगचुक ने भूख हड़ताल कर शांति की अपील की

हिंसा के बाद सोनम वांगचुक ने भूख हड़ताल खत्म कर दी है। एक बयान में हिंसा पर अफसोस जताते हुए कहा है कि इससे उद्देश्य को नुकसान पहुँचता है। लेकिन लगे हाथ उन्होंने इसे ‘जेन-जी क्रांति’ और युवाओं की ‘हताशा की उपज’ बताते हुए अपनी नाकामी को छिपाने की भी कोशिश की है। गौरतलब है कि वांगचुक पिछले 5 साल से लद्दाख को राज्य का दर्जा दिलाने की माँग को लेकर चल रहे विरोध-प्रदर्शनों में सबसे आगे रहे हैं।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ और बातचीत का आह्वान

हिंसा के बाद, भाजपा आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने कॉन्ग्रेस काउंसलर पर हिंसा में शामिल होने का आरोप लगाते हुए X पर एक पोस्ट किया है। उन्होंने पूछा है कि क्या राहुल गाँधी इसी तरह के उपद्रव की कल्पना कर रहे हैं?

लेकिन सोनम वांगचुक ने कॉन्ग्रेस को क्लीनचिट देने की कोशिश की है। उनका कहना है कि लद्दाख में कॉन्ग्रेस का इतना प्रभाव नहीं है कि वह 5000 युवाओं को सड़कों पर उतार सके। साथ ही दावा किया है कि कॉन्ग्रेस काउंसलर इसलिए गुस्से में अस्पताल पहुँचे थे, क्योंकि उनके गाँव के दो लोगों को घायल होने के बाद भर्ती कराया गया था।

वहीं विपक्षी दल के नेता इसके लिए बातचीत में केंद्र सरकार की ओर से देरी को जिम्मेदार बता रहे हैं। कारगिल डेमोक्रेटिक फ्रंट के सज्जाद कारगिली ने X पर लिखा है, “लेह में जो कुछ भी हो रहा है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। लद्दाख सरकार के असफल प्रयोग के कारण निराशा और असुरक्षा की स्थिति में है। सरकार पर यह ज़िम्मेदारी है कि वह बातचीत फिर से शुरू करे, समझदारी से काम ले और लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची की माँग बिना किसी देरी के पूरा करे।”

नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेताओं ने भी अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद से लद्दाख के मामले में केंद्र सरकार के रवैए की आलोचना की है। शेख बशीर अहमद ने कहा है, “यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। हमारा मानना है कि 5 अगस्त 2019 के फैसले को लेह या जम्मू-कश्मीर के लोगों ने कभी स्वीकार नहीं किया। वे तब से स्वायत्तता और विधायी अधिकारों की माँग कर रहे हैं। केंद्र की उदासीनता के कारण ही लोगों में गुस्सा फूट पड़ा है।”

नेशनल कॉन्फ्रेंस के ही नेता तनवीर सादिक ने कहा है, “यह बेहद दुख की बात है कि हर चीज को गलत तरीके से सँभाला जा रहा है। जम्मू-कश्मीर में जो हुआ, वह लद्दाख में भी हो रहा है। हम हिंसा की निंदा करते हैं, लेकिन केंद्र सरकार से सार्थक बातचीत के लिए अपने दरवाजे खोलने का आह्वान करते हैं।”

लद्दाख को राज्य का दर्जा देने की माँग

अगस्त 2019 में आर्टिकल 370 को समाप्त कर दिया गया था। जम्मू कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया था। एक विधानसभा वाला जम्मू कश्मीर, दूसरा बिना विधायिका के लद्दाख। शुरुआत में मोटे तौर पर लेह लद्दाख के लोगों ने इस फैसले का स्वागत किया। लेकिन सोनम वांगचुक जैसे विवादित एक्टिविस्ट विधायी शक्ति को लेकर मुखर रहे हैं।

गौरतलब है कि लद्दाख की 90% से ज्यादा आबादी अनुसूचित जनजाति है। इस आधार पर इसे छठी अनुसूची में शामिल किए जाने का स्वाभाविक दावेदार बताया जाता है। आशंका जताई जा रही है कि इस दर्जे के बगैर स्थानीय लोगों की जमीन, नौकरी और सांस्कृति पहचान पर खतरा पैदा हो सकता है।

धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक संगठनों का गठबंधन लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) इस आंदोलन में सबसे आगे रहे हैं। 2020 से वे कई बार विरोध प्रदर्शन कर चुके हैं। केंद्र के कई दौर की बातचीत कर चुके हैं। इसी साल 27 मई को हुई बैठक में लद्दाख के लिए एक अधिवास नीति प्रस्तावित की गई थी। लेकिन राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल करने को लेकर सहमति नहीं बन पाई है।

केंद्रीय मंत्रालय ने 20 सितंबर को लद्दाखी प्रतिनिधियों के साथ दोबारा बातचीत शुरू करने की घोषणा की थी। 6 अक्टूबर को नई दिल्ली में बातचीत निर्धारित है। माँगों पर विचार के लिए 2 जनवरी 2023 को एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति (एचपीसी) का भी गठन किया गया था। लेकिन लद्दाखी प्रतिनिधियों का दावा किया है कि प्रगति धीमी और असंतोषजनक रही है।

केंद्र के साथ बातचीत की सार्थकता को लेकर सोनम वांगचुक शुरुआत से संदेह जताते रहे हैं। केंद्र पर टालमटोल का आरोप लगाते रहे हैं। उनका कहना है कि भारत के लोगों का ध्यान लद्दाख की ओर आकर्षित करने के लिए लगातार विरोध प्रदर्शनों और भूख हड़ताल करते रहे हैं। पर 24 सितंबर को भड़की हिंसा के बाद अक्टूबर की प्रस्तावित बातचीत पर भी प्रभाव पड़ने की आशंका है।

केडीए ने 25 सितंबर को बंद का आह्वान किया है। अगले महीने लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद (एलएएचडीसी) के चुनाव भी होने हैं।

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

Anurag
Anuraghttps://lekhakanurag.com
Anurag is a Chief Sub Editor at OpIndia with over twenty one years of professional experience, including more than five years in journalism. He is known for deep dive, research driven reporting on national security, terrorism cases, judiciary and governance, backed by RTIs, court records and on-ground evidence. He also writes hard hitting op-eds that challenge distorted narratives. Beyond investigations, he explores history, fiction and visual storytelling. Email: [email protected]

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

कॉकरोचों के प्रदर्शन में घुसी नेहा बोरा कौन है? जानिए AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष का चिट्ठा- उमर खालिद को बताती है बेचारा, ब्राह्मणों से...

आइए जानते हैं CJP के प्रदर्शन में घुसकर वामपंथी एजेंडे को हवा देने वाली नेहा बोरा कौन हैं और कैसे वो ब्राह्मणों के खिलाफ जहर उगलती आईं हैं।

गाजियाबाद के सीवर प्लांट में पोलियो वायरस मिलने से स्वास्थ्य विभाग अलर्ट, किसी बच्चे में संक्रमण नहीं: जानिए पाकिस्तान और अफगानिस्तान ने कैसे बढ़ाई...

गाजियाबाद के सीवर में पोलियो वायरस मिला। यह वायरस पोलियो वैक्सीन के कमजोर अंश से विकसित होता है जो कमजोर टीकाकरण वाले इलाकों में फैलता है।
- विज्ञापन -