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मद्रास HC ने DMK सरकार के आदेश को किया रद्द, ऐतिहासिक कल्लाझागर मंदिर फंड के कॉमर्शियल इस्तेमाल की दी थी अनुमति: पढ़ें कोर्ट ने क्या कहा

कोर्ट ने मंदिर के जमा अतिरिक्त धन में तेजी से आई कमी पर गंभीर चिंता जताई। ऑडिट खातों के अनुसार, मंदिर का सरप्लस मार्च 2021 में 96.6 करोड़ था, जो मार्च 2023 तक बढ़कर 107.60 करोड़ हो गया, लेकिन मार्च 2024 में यह तेजी से घटकर 62.37 करोड़ रह गया।

मद्रास हाई कोर्ट (मदुरै बेंच) ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें मदुरै जिले के ऐतिहासिक कल्लाझागर मंदिर के अतिरिक्त (सरप्लस) धन का उपयोग व्यावसायिक गतिविधियों के लिए करने की अनुमति दी गई थी।

कोर्ट ने 23 जनवरी 2026 को स्पष्ट कहा कि मंदिरों को विकास परियोजनाओं की तरह नहीं देखा जा सकता और ‘विकास’ के नाम पर होने वाली कोई भी गतिविधि मंदिर की धार्मिक भावना और मंदिर प्रशासन से जुड़े कानून के अनुरूप ही होनी चाहिए।

जस्टिस अनीता सुमंत और जस्टिस सी कुमारप्पन की डिवीजन बेंच ने 8 मार्च 2024 को जारी उस सरकारी आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मंदिर के धन से रेस्टोरेंट, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, कॉटेज और अन्य व्यावसायिक सुविधाओं के निर्माण की अनुमति दी गई थी।

बेंच ने कहा कि यह आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है और तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती (HR&CE) अधिनियम के कई प्रावधानों का उल्लंघन करता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह एक चिंताजनक प्रवृत्ति है, जहाँ राज्य मंदिर संसाधनों को अपना समझकर वैधानिक प्रक्रिया अपनाए बिना उपयोग करना चाहता है।

कोर्ट ने कहा- मंदिर का विकास उसकी धार्मिक भावना के अनुरूप होना चाहिए

फैसला सुनाते हुए हाई कोर्ट ने साफ किया कि मंदिर व्यावसायिक स्थान नहीं हैं और इन्हें इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की तरह नहीं बदला जा सकता। जजों ने HR&CE विभाग के रवैये की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि विभाग का मुख्य काम मंदिरों की रक्षा और संरक्षण करना है, न कि उन्हें कमाई का साधन बनाना।

कोर्ट ने कहा कि HR&CE अधिनियम की धाराएँ 35, 36, 66, 67 और 86 तथा ‘सरप्लस फंड उपयोग नियम’ यह स्पष्ट करते हैं कि मंदिर के रखरखाव का खर्च केवल वर्तमान आय से होना चाहिए, न कि वर्षों से जमा अतिरिक्त धन से। कोर्ट ने कहा कि राज्य ने मंदिर के रिजर्व फंड को गैर-जिम्मेदाराना और अवैध तरीके से खर्च किया है, जो कानून का उल्लंघन है।

बेंच ने यह भी कहा कि विभाग ने कल्लाझागर मंदिर को एक प्रोजेक्ट की तरह देखा, जिसे आधुनिक विकास और अपग्रेडेशन की जरूरत है, जबकि ऐसे विचार मंदिर की प्रकृति से ही अलग हैं। कोर्ट ने माना कि भक्तों के लिए बुनियादी सुविधाएँ जरूरी हैं, लेकिन ऐसा करते समय मंदिर की आध्यात्मिक पहचान से समझौता नहीं होना चाहिए और न ही कानूनी सुरक्षा को दरकिनार किया जा सकता।

बजट मंजूरी के बिना मंदिर धन का अवैध उपयोग

सरकारी आदेश रद्द करने का एक बड़ा कारण यह था कि HR&CE अधिनियम के तहत अनिवार्य बजट और मंजूरी की प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि करोड़ों रुपए का खर्च मंदिर के ट्रस्टी बोर्ड की अनुमति और उचित बजट बनाए बिना तय कर लिया गया।

बेंच ने बताया कि धारा 86 के तहत बजट प्रक्रिया में HR&CE आयुक्त की जाँच, विचार-विमर्श, स्पष्टीकरण और अवैध खर्च को हटाने की व्यवस्था है, लेकिन यहाँ इनमें से कुछ भी नहीं किया गया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि ट्रस्टियों ने खर्च की आवश्यकता या वैधता पर गंभीरता से विचार किया हो।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि धार्मिक संस्थाओं के धन को व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए बिना उचित मंजूरी और निगरानी के मोड़ा नहीं जा सकता, खासकर जब इसमें करोड़ों रुपये शामिल हों।

मंदिर के अतिरिक्त धन में तेज गिरावट ने बढ़ाई चिंता

कोर्ट ने मंदिर के जमा अतिरिक्त धन में तेजी से आई कमी पर गंभीर चिंता जताई। ऑडिट खातों के अनुसार, मंदिर का सरप्लस मार्च 2021 में 96.6 करोड़ था, जो मार्च 2023 तक बढ़कर 107.60 करोड़ हो गया, लेकिन मार्च 2024 में यह तेजी से घटकर 62.37 करोड़ रह गया।

कोर्ट ने कहा कि यह गिरावट बिना बजट और बिना कानूनी मंजूरी के खर्च का नतीजा है। बेंच ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह देवता के खिलाफ अपराध है और यह स्थिति ‘खेत की रखवाली करने वाला ही फसल खाने’ जैसी है। कोर्ट के अनुसार, यह सिर्फ अवैध नहीं बल्कि मंदिर प्रबंधन में विश्वासघात भी है।

ट्रस्टी बोर्ड की अनुपस्थिति से आदेश की वैधता कमजोर

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि मंदिर के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज का कार्यकाल समाप्त हो चुका था और कानून के अनुसार नया बोर्ड गठित नहीं किया गया। HR&CE अधिनियम की धारा 46 के तहत नया बोर्ड बनाना जरूरी है, लेकिन ऐसा करने के कोई प्रमाण नहीं मिले। कोर्ट ने कहा कि ‘फिट पर्सन’ या कार्यकारी अधिकारी स्थायी रूप से ट्रस्टियों की जगह नहीं ले सकते।

बेंच ने साफ कहा कि ऐसे मंदिरों का संचालन अधिकारियों द्वारा नहीं, बल्कि ट्रस्टी बोर्ड द्वारा होना चाहिए। ट्रस्टी बोर्ड के बिना मंदिर वित्त से जुड़े फैसले और भी ज्यादा अवैध और कमजोर हो जाते हैं।

मंदिर सरकारी संपत्ति नहीं है, कोर्ट ने राज्य को दिलाया याद

हाई कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि मंदिर राज्य का हिस्सा या सरकारी विभाग नहीं हैं। बेंच ने स्पष्ट किया कि राज्य मंदिर की संपत्ति को अपना नहीं समझ सकता और न ही मंदिर के धन का उपयोग सरकार द्वारा सोची गई परियोजनाओं में कर सकता है।

कोर्ट ने राज्य की ‘आइकोनिक टेंपल डेवलपमेंट स्कीम’ की आलोचना करते हुए कहा कि विकास मंदिर और भक्तों की जरूरतों से निकलना चाहिए, न कि राजनीतिक घोषणाओं या एक जैसे मॉडल से। कोर्ट ने कहा कि मंदिर आस्था के स्थान हैं, प्रशासनिक प्रयोग के विकास प्रोजेक्ट नहीं।

कैसे हुई विवाद की शुरुआत?

यह विवाद 8 मार्च 2024 को जारी सरकारी आदेश और 11 अक्टूबर 2024 के कार्य आदेश से शुरू हुआ। इन आदेशों के तहत लगभग 40 करोड़ के सिविल कार्यों को मंजूरी दी गई थी। इस परियोजना में मंदिर परिसर में गेस्ट हाउस, डॉर्मिटरी, दुकानें, भोजनालय, पार्किंग सुविधा, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, पुजारियों के क्वार्टर और मंदिर संरचनाओं के नवीनीकरण जैसे कार्य शामिल थे।

इसके खिलाफ कई याचिकाएँ दायर की गईं, जिनमें कहा गया कि मंदिर धन का गलत उपयोग हो रहा है, ट्रस्टी बोर्ड की मंजूरी नहीं ली गई और HR&CE अधिनियम का उल्लंघन हुआ। सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने सरकारी आदेश और कार्य आदेश दोनों को रद्द कर दिया। साथ ही मंदिर के रख-रखाव और वसंत मंडपम की प्रसिद्ध भित्ति चित्रों के संरक्षण के निर्देश भी दिए।

अरुलमिघु नंदीश्वरर शिवन मंदिर: पहले भी आया था ऐसा ही मामला

यह पहली बार नहीं है जब मद्रास हाई कोर्ट ने मंदिर धन के व्यावसायिक उपयोग को रोका है। जनवरी 2025 में कोर्ट ने अरुलमिघु नंदीश्वरर शिवन मंदिर में शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बनाने की योजना भी रद्द कर दी थी। मुख्य जज केआर श्रीराम और जस्टिस सेंथिलकुमार राममूर्ति की बेंच ने कहा था कि संपन्न मंदिरों के अतिरिक्त धन का उपयोग शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बनाने में नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा था कि ऐसा निर्माण मंदिर की धार्मिक शिक्षाओं का प्रचार नहीं करता, जैसा कि HR&CE अधिनियम की धारा 66 में जरूरी है। बेंच ने चेतावनी दी थी कि व्यावसायिक निर्माण से मुकदमे, किराएदार विवाद और अतिक्रमण जैसी समस्याएँ पैदा हो सकती हैं, जबकि धन को सुरक्षित निवेश में रखा जाए तो निश्चित लाभ मिल सकता है।

उस मामले में भी कोर्ट ने सरकार की योजना रद्द करते हुए सुझाव दिया था कि धन का उपयोग गरीब हिंदुओं के विवाह, जरूरतमंदों को भोजन कराने और देशी पेड़ लगाने जैसे धार्मिक उद्देश्यों में किया जाए।

मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रृति सागर ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

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Shriti Sagar
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Journalist

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