मद्रास हाईकोर्ट ने 15 दिसंबर 2025 को अरुलमिगु अन्नामलाईनाथर मंदिर की 3.93 एकड़ जमीन की बिक्री को रद्द कर दिया। कोर्ट ने माना कि 1990 के दशक में हुई यह बिक्री अवैध थी, प्रक्रिया में गंभीर खामियाँ थीं और धार्मिक संपत्तियों की सुरक्षा के मकसद के पूरी तरह खिलाफ थी।
इस मामले में कई पक्षकार थे, जिनमें करीब 90 लोग मुस्लिम थे और इसमें कम से कम दो मस्जिदें भी शामिल थीं। ऑपइंडिया के पास मद्रास हाई कोर्ट के फैसले की कॉपी मौजूद है।
मद्रास हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि मंदिर की जमीन को निजी संपत्ति की तरह बेचा नहीं जा सकता। इसे देवता और भक्तों के फायदे के लिए संरक्षित रखना जरूरी है। कोर्ट ने आगे आदेश दिया कि यह जमीन मंदिर को वापस लौटाई जाए। इस फैसले के साथ करीब 30 साल से चल रहा विवाद खत्म हो गया।
Fantastic news from Madras High Court –
— trramesh (@trramesh) January 4, 2026
A news deliberately not reported in news media.
An Hon'ble Division Bench of the Madras High Court RESTORED 3.93 acres of Temple Land (currently valued at about Rs.110.00 Crores) that was illegally allowed to be sold in the… pic.twitter.com/NvmG7vzpvP
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त विभाग (HR&CE) के तहत काम करने वाले ट्रस्टी और अधिकारी मंदिर की संपत्ति के मालिक नहीं, बल्कि सिर्फ उसके संरक्षक होते हैं। अगर कानून में तय सुरक्षा प्रावधानों का उल्लंघन किया गया हो, तो बाद में सरकार के आदेश भी ऐसी अवैध बिक्री को वैध नहीं बना सकते।
फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ संपत्ति विभाग (एचआरएंडसीई) के ट्रस्टी और अधिकारी सिर्फ मंदिर संपत्ति के संरक्षक हैं। कानूनी सुरक्षा प्रावधानों से कोई विचलन, भले ही बाद में सरकारी आदेशों से समर्थित हो, अवैध बिक्री को वैध नहीं बना सकता। फैसले ने दोहराया कि एचआरएंडसीई एक्ट के अनिवार्य प्रावधान सिर्फ औपचारिकताएँ नहीं हैं। ये धार्मिक संपत्तियों के दुरुपयोग और क्षरण को रोकने के लिए ठोस सुरक्षा हैं।
कौन सी जमीन थी शामिल और वह मंदिर की क्यों थी?
यह विवाद कडयनल्लूर में स्थित 3.93 एकड़ जमीन को लेकर था। यह जमीन लंबे समय से अरुलमिगु अन्नामलाईनाथर मंदिर की दर्ज थी। यह मंदिर की दान में दी गई संपत्तियों का हिस्सा थी और धार्मिक व धर्मार्थ कार्यों के लिए आय या उपयोग उत्पन्न करने के लिए थी। खास बात यह है कि ये दान देवता के नाम पर होते हैं, न कि किसी व्यक्तिगत ट्रस्टी या प्रशासक के नाम पर।
कोर्ट ने कहा कि मंदिर की जमीनों को विशेष कानूनी दर्जा प्राप्त है। इन्हें मनमाने ढंग से बेची जाने वाली व्यावसायिक संपत्ति नहीं माना जा सकता। ये धार्मिक संपत्तियां हैं जिन्हें कानून, परंपरा और सार्वजनिक विश्वास से संरक्षण मिला है। ऐसी जमीन बेचने का फैसला जरूरत, पारदर्शिता और मंदिर को स्पष्ट लाभ के सख्त परीक्षणों से गुजरना पड़ता है।
इसी पृष्ठभूमि में 30 साल पहले हुई बिक्री की जाँच की गई। सुनवाई में कोर्ट ने देखा कि जमीन कैसे बेची गई और क्या किसी चरण में कानून का पालन हुआ। ऐसी किसी भी भूमि की बिक्री तभी संभव है, जब वह अत्यंत आवश्यक हो, पूरी तरह पारदर्शी हो और उससे मंदिर को स्पष्ट और प्रत्यक्ष लाभ हो। इस तथ्य पर ये सौदा खरा नहीं उतरा।
ट्रस्टी ने मंदिर की जमीन बेचने का निर्णय कैसे लिया?
इस विवाद की शुरुआत 1990 के शुरुआती वर्षों में हुई जब मंदिर के वंशानुगत ट्रस्टी वी सुब्रमण्या अय्यर ने मंदिर की कुछ जमीन बेचने का फैसला लिया। बिक्री का तर्क दिया गया कि पैसा जमा कराया जाएगा और उसका ब्याज मंदिर के खर्चों के लिए इस्तेमाल होगा। लेकिन बाद में इस तर्क की गहराई से जाँच हुई क्योंकि मंदिर संपत्तियों का कानून बिक्री की इजाजत सिर्फ तभी देता है जब वह अनिवार्य हो और संस्था को स्पष्ट लाभ हो।
कोर्ट ने देखा कि रिकॉर्ड में कोई सामग्री नहीं थी जो दिखाती कि मंदिर को ऐसी आर्थिक तंगी थी कि जमीन बेचनी पड़ी। बल्कि प्रस्ताव प्रशासनिक सुविधा से प्रेरित लगता था, न कि वास्तविक जरूरत से। कोर्ट ने जोर दिया कि ट्रस्टी का काम अल्पकालिक नकदी बढ़ाना नहीं बल्कि भावी पीढ़ियों के भक्तों के लिए मंदिर संपत्ति संरक्षित रखना है।
इसी पृष्ठभूमि में कोर्ट ने करीब 30 साल पहले हुई इस जमीन की बिक्री की जाँच की। सुनवाई के दौरान यह परखा गया कि जमीन किन परिस्थितियों में बेची गई, किस प्रक्रिया का पालन किया गया और क्या किसी भी स्तर पर कानून का सही तरीके से अनुपालन किया गया था या नहीं।
1995 की सार्वजनिक नीलामी और कम मूल्यांकन के आरोप
ट्रस्टी द्वारा जमीन बेचने का फैसला लेने के बाद वर्ष 1995 में एक सार्वजनिक नीलामी कराई गई। कागजों में यह प्रक्रिया नियमों के अनुसार दिखाई गई, लेकिन इसके तरीके पर जल्द ही गंभीर सवाल खड़े हो गए। नीलामी में सबसे अधिक बोली लगाने वाला आर सुब्रमणियम निकला, जो मंदिर के वंशानुगत ट्रस्टी का भतीजा था। यह बात सामने आते ही हितों के टकराव (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) के आरोप लगने लगे।
उस समय यह जमीन करीब 10.17 लाख रुपए में बेच दी गई, जबकि कई संबंधित लोगों का कहना था कि यह कीमत बाजार मूल्य से बहुत कम थी। आज उसी जमीन की कीमत लगभग 110 करोड़ रुपए आँकी जा रही है। बाद में कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब मंदिर की जमीन बेची जाती है, तो अधिकारियों की जिम्मेदारी होती है कि संस्था को सबसे बेहतर और उचित कीमत मिले। यदि किसी बिक्री से मंदिर को नुकसान पहुँचता है और निजी लोगों को फायदा होता है, तो यह HR&CE एक्ट के तहत मंदिर की संपत्तियों की रक्षा के उद्देश्य के खिलाफ है।
नीलामी के बाद आपत्तियाँ कानूनी समस्या क्यों बन गईं?
पूरी जमीन बिक्री प्रक्रिया में एक गंभीर खामी थी, खासकर आपत्तियाँ आमंत्रित करने के समय को लेकर। नियमों के अनुसार, मंदिर की संपत्ति की नीलामी को अंतिम रूप देने से पहले भक्तों, किराएदारों और अन्य हितधारकों से आपत्तियाँ माँगी जानी चाहिए थीं। इसका उद्देश्य यह होता है कि नीलामी की आवश्यकता, जमीन का सही मूल्य और प्रक्रिया की निष्पक्षता पर पहले ही विचार किया जा सके।
लेकिन इस मामले में अधिकारियों ने पहले नीलामी कर दी और उसके बाद आपत्तियाँ आमंत्रित कीं। यह पूरी प्रक्रिया को उल्टा करने जैसा था। मद्रास हाई कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि नीलामी के बाद आपत्तियाँ बुलाना कोई छोटी या सुधारी जा सकने वाली गलती नहीं है, बल्कि यह कानून में तय सुरक्षा प्रावधानों का गंभीर उल्लंघन है।
कोर्ट के अनुसार, आपत्तियाँ पहले बुलाने का मकसद ही यही होता है कि कोई भी चिंता या आपत्ति समय रहते सुनी जाए, ताकि कोई गलत या नुकसानदेह फैसला होने से रोका जा सके। जब यह मौका ही नहीं दिया गया, तो संबंधित लोगों को अपनी बात रखने का वास्तविक अधिकार नहीं मिला। इसी वजह से पूरी बिक्री प्रक्रिया को अवैध और कानून के खिलाफ माना गया।
2001 में दीवानी अदालत के फैसले में बिक्री को घोषित किया गया अमान्य
नीलामी में हुई गड़बड़ियों के कारण यह मामला अंततः सिविल कोर्ट तक पहुँचा। वर्ष 2001 में सिविल कोर्ट ने नीलामी के जरिए खरीदार के पक्ष में बनाए गए सभी बिक्री विलेखों को अमान्य और शून्य घोषित कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि यह बिक्री कानून की अनिवार्य शर्तों का उल्लंघन करके की गई थी और केवल इसे ‘सार्वजनिक नीलामी’ बताकर वैध नहीं ठहराया जा सकता।
यह फैसला इसलिए भी अहम था क्योंकि इसे न तो खरीदारों ने और न ही संबंधित अधिकारियों ने कभी चुनौती दी। परिणामस्वरूप यह निर्णय अंतिम (फाइनल) हो गया। कानूनी रूप से इसका अर्थ यह हुआ कि बिक्री स्वतः रद्द मानी गई और वह जमीन मंदिर की ही संपत्ति बनी रही।
बाद में हाई कोर्ट ने भी स्पष्ट किया कि जब एक सक्षम सिविल कोर्ट पहले ही इस लेन-देन को अवैध घोषित कर चुका है, तो उसे किसी प्रशासनिक या कार्यकारी आदेश के जरिए दोबारा जीवित या वैध करने का कोई कानूनी आधार नहीं है।
सिविल कोर्ट के मौजूदा फैसले के बावजूद यह मामला दोबारा कैसे आया सामने?
सिविल कोर्ट के फैसले को कभी चुनौती नहीं दी गई थी और वह अंतिम रूप ले चुका था, फिर भी विवाद खत्म नहीं हुआ। कई वर्षों बाद नीलामी में जमीन खरीदने वाले व्यक्ति ने HR&CE कानून के तहत सरकार से हस्तक्षेप की माँग की। हैरान करने वाली बात यह रही कि सरकार ने एक आदेश जारी कर विभाग को बिक्री विलेख (सेल डीड) के निष्पादन की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का निर्देश दे दिया। इस तरह सरकार ने उस लेन-देन को फिर से जीवित करने की कोशिश की, जिसे सिविल कोर्ट पहले ही अवैध घोषित कर चुका था।
इस पर हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने साफ कहा कि कोई भी कार्यपालिका या सरकारी प्राधिकारी न्यायालय के फैसले के ऊपर अपील की तरह काम नहीं कर सकता, खासकर तब जब वह फैसला अंतिम हो चुका हो। यदि किसी सरकारी आदेश को सिविल कोर्ट के निर्णय पर हावी होने दिया जाए, तो यह न केवल कानून के शासन को कमजोर करेगा, बल्कि धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक खतरनाक मिसाल भी कायम करेगा।
धारा 34 के तहत सरकारी हस्तक्षेप और इसके कानूनी निहितार्थ
सरकार ने अपने आदेश को HR&CE अधिनियम की धारा 34 का सहारा लेकर सही ठहराने की कोशिश की। इस धारा के तहत विशेष परिस्थितियों में मंदिर की संपत्ति बेचने की अनुमति दी जा सकती है। लेकिन हाई कोर्ट ने इस तर्क को साफ तौर पर खारिज कर दिया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 34 कोई खुली छूट नहीं देती। इस अधिकार का प्रयोग कड़े नियमों और शर्तों के तहत ही किया जा सकता है। इसका इस्तेमाल न तो कानून में तय सुरक्षा प्रावधानों को दरकिनार करने के लिए किया जा सकता है और न ही किसी न्यायिक फैसले को अनदेखा या निष्प्रभावी करने के लिए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि धारा 34 के तहत सरकार पहले से अवैध घोषित की जा चुकी बिक्री को बाद में वैध नहीं बना सकती। किसी भी तरह की सरकारी मंजूरी से पहले यह अनिवार्य है कि सभी जरूरी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाए।
इनमें यह साबित करना शामिल है कि बिक्री वास्तव में आवश्यक थी, संबंधित लोगों को पहले से नोटिस दिया गया हो और उनकी आपत्तियों पर विचार किया गया हो। मौजूदा मामले में कोर्ट ने पाया कि इनमें से कोई भी बुनियादी कानूनी प्रक्रिया सही तरीके से पूरी नहीं की गई थी, इसलिए धारा 34 का सहारा लेकर सरकारी आदेश को सही नहीं ठहराया जा सकता।
हाई कोर्ट ने HR&CE अधिनियम में कानूनी खामियों को भी किया दूर
कोर्ट ने इस मामले की जाँच करते हुए HR&CE अधिनियम में बनाए गए सुरक्षा उपायों का विस्तार से विश्लेषण किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये नियम इसलिए बनाए गए हैं ताकि मंदिर की संपत्तियों का दुरुपयोग उन लोगों द्वारा न हो जो उनकी देखभाल के लिए जिम्मेदार हैं।
ट्रस्टी और अधिकारी इस बात के लिए जिम्मेदार हैं कि वे मंदिर और भक्तों के हित की रक्षा करें, न कि मंदिर की संपत्ति को अपनी मर्जी से बेचने या इस्तेमाल करने के लिए। कोर्ट ने कहा कि कानून में तय किया गया क्रम पूरी तरह उलट दिया गया था।
सार्वजनिक सूचना देना, आपत्तियों पर विचार करना और आवश्यकताओं का मूल्यांकन करना या तो नहीं किया गया, या केवल औपचारिकता के रूप में किया गया। ऐसे उल्लंघन मामूली गलती नहीं हैं, बल्कि वे उस लेन-देन की वैधता की जड़ को ही कमजोर कर देते हैं।
ट्रस्टी की शक्तियों की आवश्यकता, लाभ और दुरुपयोग पर कोर्ट के निष्कर्ष
कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या मंदिर की जमीन को बेचना वास्तव में आवश्यक था या उससे मंदिर को कोई वास्तविक लाभ होने वाला था। ट्रस्टी ने यह तर्क दिया कि जमीन बेचकर जो धन मिलेगा, उसे जमा कर दिया जाएगा और उस पर मिलने वाले ब्याज से मंदिर के खर्च चलाए जाएँगे। लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह अपर्याप्त और अस्वीकार्य माना।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि इस तरह की दलील को स्वीकार कर लिया जाए, तो किसी भी मंदिर की जमीन को केवल ब्याज कमाने के बहाने बेचा जा सकता है। ऐसा होने पर मंदिर संपत्तियों की रक्षा के लिए बनाए गए कानूनों और सुरक्षा प्रावधानों का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा।
फैसले में यह भी कहा गया कि ट्रस्टियों को मंदिर की संपत्ति बेचने की खुली छूट नहीं है। मंदिर की जमीन धार्मिक और परोपकारी उद्देश्यों के लिए ट्रस्ट के रूप में रखी जाती है, इसलिए उसके प्रबंधन पर सख्त कानूनी नियंत्रण होता है। बिना किसी ठोस और अनिवार्य आवश्यकता के ऐसी संपत्ति को बेचना, जिससे उसका स्थायी नुकसान हो, ट्रस्ट की जिम्मेदारी का उल्लंघन माना जाएगा।
मंदिर की भूमि पर कब्जा करने वालों की स्थिति और अधिकारियों द्वारा उठाए गए कदम
अपने फैसले में कोर्ट ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि विवाद के अंतिम चरण तक पहुँचते-पहुँचते जमीन के कुछ हिस्सों पर कई लोग कब्जा कर चुके थे। कोर्ट ने सीधे सभी को हटाने का आदेश देने के बजाय एक व्यावहारिक रास्ता अपनाया। कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद प्रशासन ने कब्जाधारियों को दो विकल्प दिए, या तो वे मंदिर के अधीन किराएदार बनकर जमीन को नियमित करें, या फिर उसे खाली करें।
कोर्ट के सामने रखे गए अभिलेखों के अनुसार, कई लोगों ने मंदिर प्रशासन के तहत किराएदार के रूप में बने रहने पर सहमति जताई। जिन लोगों ने सहयोग करने से इनकार किया, उनके खिलाफ स्थानीय प्रशासन की मदद से बेदखली की कार्यवाही शुरू की गई।
हाई कोर्ट ने इन तथ्यों का उल्लेख यह दिखाने के लिए किया कि मंदिर की संपत्ति की बहाली केवल कागजी प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि उसे जमीन पर वास्तव में लागू किया जा रहा था।
इस संदर्भ में जमीन पर कब्जा किए लोगों की पहचान का भी उल्लेख हुआ, हालाँकि यह बात कोर्ट के कानूनी निर्णय का आधार नहीं बनी। मामले के रिकॉर्ड से पता चलता है कि जिन लोगों को प्रतिवादी बनाया गया था, वे वही थे जिन्होंने मूल बिक्री के बाद जमीन खरीदी थी या बाद में खरीद के जरिए कब्जे में आए थे।
कार्यवाही में दर्ज नामों से यह भी सामने आया कि इनमें से अधिकांश लोग स्थानीय मुस्लिम समुदाय से थे और विवादित भूमि पर कम से कम दो मस्जिदें भी मौजूद थीं, जिन्हें भी मुकदमे में पक्षकार बनाया गया था। हालाँकि इन धार्मिक ढाँचों की मौजूदगी या कब्जा करने वालों की पहचान को कोर्ट ने निर्णायक नहीं माना।
हाई कोर्ट ने खुद को केवल इस प्रश्न तक सीमित रखा कि मूल बिक्री कानूनी थी या नहीं और जिन अनुमतियों के आधार पर बिक्री की गई थी वे वैध थीं या नहीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमीन पर बाद में हुए निर्माण या कब्जा करने वाले लोगों की पहचान, मंदिर की संपत्ति से जुड़े वैधानिक संरक्षणों और कानूनी प्रावधानों को निष्प्रभावी नहीं कर सकती।
कोर्ट द्वारा जारी अंतिम निर्देश और उनका व्यावहारिक प्रभाव
मामले का निपटारा करते हुए हाई कोर्ट ने बिक्री को रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा और स्पष्ट किया कि संबंधित भूमि मंदिर के पास ही बनी रहेगी। कोर्ट ने उन सरकारी आदेशों को भी रद्द कर दिया, जिनके माध्यम से अवैध लेन-देन को दोबारा जीवित करने की कोशिश की गई थी।
कोर्ट ने दो टूक कहा कि कोई भी कार्यपालिका आदेश न तो कानून में तय प्रावधानों से ऊपर हो सकता है और न ही कोर्ट के अंतिम निर्णय को निष्प्रभावी कर सकता है।
कोर्ट ने यह भी साफ संदेश दिया कि धार्मिक न्यासों (मंदिर संपत्ति) के मामलों में समय बीत जाने से अवैधता वैध नहीं हो जाती। यदि कोई लेन-देन कानून का उल्लंघन करके किया गया है, तो भले ही वह कई दशकों पुराना क्यों न हो, उसकी जाँच की जा सकती है और उसे निरस्त किया जा सकता है।
निष्कर्ष
यह फैसला इस बात को स्पष्ट करता है कि मंदिर की संपत्ति कोई साधारण सरकारी या प्रशासनिक संपत्ति नहीं होती। यह एक पवित्र न्यास (ट्रस्ट) है, जिसे कानून के अनुसार और श्रद्धालुओं के हित में ही संचालित किया जाना चाहिए। कोर्ट ने लगभग तीन दशक पुराने एक अवैध बिक्री सौदे को रद्द करके यह दोहराया कि HR&CE अधिनियम में जो कानूनी सुरक्षा प्रावधान दिए गए हैं, उनका उद्देश्य मंदिर संपत्तियों को धीरे-धीरे और चुपचाप खत्म होने से बचाना है।
ये प्रावधान इसलिए बनाए गए हैं ताकि प्रक्रियाओं के नाम पर मंदिर की जमीन या संपत्ति का दुरुपयोग न हो सके। इस निर्णय में कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि मंदिर के ट्रस्टी हों या सरकार, सभी देवी-देवता और भक्तों के प्रति जवाबदेह हैं। कोई भी गैरकानूनी काम केवल समय बीत जाने से वैध नहीं बन जाता। यदि कोई लेन-देन कानून के खिलाफ है, तो उसे वर्षों बाद भी रद्द किया जा सकता है।
यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।


