Tuesday, November 24, 2020
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मुस्लिमों द्वारा हिंदुओं पर भयावह अत्याचार की कहानी: मेवात में ग्राउंड रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों की जुबानी

क्या आज का मेवात पाकिस्तान जैसा है या इसकी स्थिति वाकई सन 90 के कश्मीर से भी बुरी है, जहाँ इसी तरह कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार करके उन्हें घाटी से बाहर कर दिया गया था। आज मेवात में दलितों को आए दिन जिस तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है वो........

हरियाणा के मेवात में हिंदुओं पर होते अत्याचारों को रोकने के लिए कल (जून 16, 2020) मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कई घोषणाएँ की। इस बीच उन्होंने सभागार में मौजूद दोनों पक्षों को सुना और पत्रकारों से बात की। उन्होंने आश्वासन दिया कि इलाके में न्यायव्यवस्था कायम करने की हर संभव कोशिश की जाएगी।

उन्होंने बताया कि धर्मांतरण व लव जिहाद को रोकने के लिए धर्मांतरण विरोधी कानून बनाया जाएगा, गोकशी मामलों को फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुना जाएगा और हिंदुओं की धार्मिक व सार्वजनिक संपत्तियों पर से कब्जा हटाकर उनके लिए बोर्ड बनाया जाएगा। सीएम की इन घोषणाओं के बाद कई हिंदूवादी संगठनों और उन पत्रकारों में संतोष की स्थिति दिखी। जिन्होंने इस मुद्दे को उठाया और मेवात की धरती पर हिंदुओं को इंसाफ दिलाने के लिए अपनी जी जान लगा दी।

जस्टिस पवन कुमार की 4 सदस्यीय रिपोर्ट से संबंधी प्रेस रिलीज सामने आने के बाद ऑपइंडिया ने मेवात का यह मुद्दा 1 जून को ही उठाया था। हमने जस्टिस पवन कुमार से बात करते हुए अपनी खबर में उन सभी मामलों का उल्लेख किया था। जिसके कारण मेवात को दलितों का कब्रिस्तान बताया गया।

इसके बाद हमने मेवात के हालातों को जानने के लिए कई स्थानीय लोगों से संपर्क किया। इस बीच हमारी बात उन पत्रकारों से भी हुई। जिन्होंने इस मामले के प्रकाश में आने के बाद वहाँ ग्राउंड रिपोर्टिंग की और मेवात की हकीकत अपने चैनलों के माध्यम से दर्शकों के सामने पेश की। आज इन्हीं पत्रकारों की अनुमति से हम उनके अनुभव आपसे साझा कर रहे हैं।

क्या कहते हैं मेवात में रिपोर्टिंग करने के बाद पत्रकार, क्या है इनका अनुभव?

  • न्यूज नेशन के पत्रकार विकास चंद्रा से ऑपइंडिया की बातचीत के अंश

‘कश्मीर में भी अब वो हालात नहीं है, जो सालों से इस समय मेवात के हैं’- ये शब्द उस पत्रकार के हैं जिसने मेवात के गाँव-गाँव में घूमकर दलित हिंदुओं की हकीकत की परतें खोली। हम बात कर रहे हैं न्यूज नेशन के पत्रकार विकास चंद्रा की। 

विकास चंद्रा ने मेवात का मुद्दा प्रकाश में आने के बाद अपनी जान जोखिम में डालते हुए वहाँ रिपोर्टिंग की और पीड़ित परिवार के ऐसे बयान लिए, जिसने सवाल खड़े कर दिए कि क्या मेवात वाकई हिंदुस्तान का हिस्सा है।

बकौल विकास चंद्रा, “मेवात में ऐसी कई जगह हैं जहाँ पर अब हिंदू अपने बच्चों के नाम मुस्लिमों वाले रखते हैं। ताकि अगर वे बाहर अपना नाम बताएँ, तो उनकी जान बच जाए। मेवात के हिंदू अपने यहाँ शादियो में गाने नहीं बजा पाते, क्योंकि मुस्लिम बहुल आबादी के लोग आकर सारा सामान तोड़कर चले जाते हैं। वहाँ पर लड़कियों का अपहरण होना। बारातियों को मारा जाना – ये सब बहुत आम बातें हैं।”

विकास कहते हैं मेवात में अधिकांश हिंदू लड़कियाँ पाँचवीं या छठी क्लास के बाद स्कूल नहीं जाती हैं। क्योंकि लोगों को डर होता है कि कहीं उनकी बच्चियों को उठा न लिया जाए। वहाँ धर्मपरिवर्तन के लिए तरह-तरह के हथकंडे आजमाए जा रहे हैं। जैसे-डराना, धमकाना, मारना- पीटना, जमीन-घर-श्मशान पर कब्जा कर लेना आदि।

विकास के अनुसार, मेवात से हिंदुओं को भगाने के लिए वहाँ पर श्मशान पर कब्जा कर लिया जाता है, जब हिंदू अपने शमशानों में शवों को ही नहीं जला पाएगा, तो या तो इस्लाम अपनाएगा या फिर मेवात छोड़कर भाग जाएगा। इसके अलावा वहाँ मुस्लिम बहुल आबादी के लोग हिंदुओं को भगाने के लिए या फिर उन्हें इस्लाम कबूल करवाने के लिए लड़कियों से बदसलूकी भी करते हैं।

विकास बताते हैं कि उनकी अपनी पड़ताल बताती है करीब 110 गाँव हिंदू विहीन हो चुके हैं। जिन गाँवों को लेकर पहले कहा जा रहा था कि वहाँ पर हिंदू हैं, वहाँ भी जब हम गए, तब कोई हिंदू घर नहींं था। पुलिस की यदि बात करें, तो वहाँ पुलिस प्रशासन भी संतोषजनक कार्रवाई करने में असफल रहता है।

वे मेवात पर अपने अनुभवों को हमसे साझा करते हुए कहते हैं कि हम रिपोर्टिंग के दौरान कई जगहों पर गए। लेकिन वहाँ रिपोर्टिंग करना आसान काम नहीं है। मुस्लिम बहुल आबादी के लोग मारने-काटने पर उतारू हो जाते हैं। कई बार कई जगहों से हमें भागना पड़ा, तो कहीं-कहीं तो लॉकडाउन या फिर खेती पर अपनी रिपोर्टिंग करनी पड़ी। ताकि वह भ्रमित हो जाएँ। मेवात घूमते हुए आपको हर कोने में मस्जिद मिलेगा, मदरसा मिलेगा, मरकज मिलेगा। जहाँ जगह खाली होगी वहाँ इनके निर्माण का काम जारी होगा।

विकास कहते हैं कि भले ही बिजनेस क्लास को लेकर मेवात में हिंदुओं की संख्या 11 प्रतिशत बताया जाता है। लेकिन किसी गाँव का यदि औसत निकालें तो मालूम चलेगा कि 98% मुस्लिम समुदाय के लोग हैं। विकास, खुद को पुन्हाना में हुई लूटपाट की एक घटना का प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं और कहते हैं कि उनकी आँखों के सामने एक व्यक्ति की दुकान को लूट लिया गया। व्यक्ति की गलती सिर्फ़ इतनी थी कि उसने अपने दुकान के सामने एक युवक को पेशाब करने से मना कर दिया। जिसपर उस युवक ने दुकानदार को जवाब दिया कि ये क्या कम है कि तुम काफिरों पर या तुम्हारे शरीर पर नहीं कर रहे केवल दुकान के सामने कर रहे हैं।

मेवात के हालातों को समझाने के लिए विकास कहते हैं कि वहाँ हिंदुओं की हालत बिलकुल वैसी है, जेैसे 32 दांतों के बीच में जीभ। विकास, मेवात में रिपोर्टिंग करने के दौरान सबसे ज्यादा दुखी शासन प्रशासन के रवैये को देखकर होते हैं। अपनी निराशा व्यक्त करते हुए वे कहते हैं कि वहाँ वाकई में अपराधियों पर उपयुक्त कार्रवाई नहीं होती। वहाँ हत्या के मामलों को भी आत्महत्या में बदल दिया जाता है।

विकास के अनुसार, मेवात में 1992 से पहले वाकई हिंदू मुसलमान मिलकर रहा करते थे। लेकिन बाद में तबलीगी और देवबंदियों ने वहाँ लोगों का माइंड वॉश करना शुरू किया। पहले वहाँ मुसलमान भी हिंदुओं के रीति-रिवाजों को मानते थे। उनके त्यौहारों को मनाते थे। कोई मांस बेचने आता था, तो मना कर देते थे कि यहाँ हिंंदू भी रहते हैं। लेकिन 1992 के बाद सब बदलता गया। वहाँ मुस्लिमों के दिमाग के भरा जाने लगा कि तुम मुस्लिमों की तरह दिखो, उनकी तरह रहो, उनकी तरह बोलो, उनकी तरह खाओ। न्यूज नेशन पत्रकार दो टूक कहते हैं, “आज मुझे नहीं लगता, जितने कट्टर मेवात के मुस्लिम है, उतने कट्टर दुनिया में कोई और जगह के मुसलमान होंगे।”

  • पंजाब केसरी अंबाला एडिशन के जिला इंचार्ज- दिनेश देशवाल

ऑपइंडिया से बात करते हुए पंजाब केसरी अंबाला एडिशन के जिला इंचार्ज दिनेश देशवाल भी 1992 वाले एंगल का जिक्र करते हैं और बतौर स्थानीय व एक मीडियाकर्मी हमसे मेवात के हालात साझा करते हैं।

वे 1992 और 2020 की वोटर लिस्ट का हवाला देते हुए बताते हैं कि उन्होंने मेवात में कुछ हिंदू बहुल गाँवों को यदि छोड़ दिया जाए, तो जितने भी मुस्लिम बहुल गाँव हैं, वहाँ हर जगह हिंदुओं की संख्या घटी है। मेवात के एक हिंदू बहुल गाँव आलदो में रहने वाले दिनेश कहते हैं कि उन्होंने मेवात में रहते हुए अपने आसपास के गाँवों में ऐसी कई घटनाएँ देखी हैं और उन्होंने कई रिपोर्ट कवर भी की हैं। हालिया किसी घटना के बारे में पूछने पर दिनेश बताते हैं कि अभी हाल में एक पीड़िता परिवार ने यहाँ पर एक मीडिया चैनल को अपना बयान दे दिया था। जिसके बाद उनसे मारपीट की गई। यहाँ बता दें, ऑपइंडिया ने इस घटना की जानकारी मिलते ही पीड़ित परिवार से संपर्क करने की कोशिश की थी। मगर, जो नंबर हमें पीड़ित परिवार के नाम से मिला, वह गाँव के किसी और व्यक्ति ने उठाया। जिसके बाद हमने परिवार की सुरक्षा लिहाज से आगे उनसे पूछताछ नहीं की।

मेवात के युवा समाजसेवी पेज पर साझा पोस्ट (साभार: दिनेश देशवाल)

दिनेश दावा करते हैं कि उन्होंने स्वंय वोटर लिस्ट की छँटनी की है और अपनी सभी बाते वे सरकारी दस्तावेजों के आधार पर बता रहे हैं। उदहारण के तौर पर समझाने के लिए वे कहते हैं कि मान लीजिए अगर 1992 में मुस्लिम बहुल आबादी वाले किसी गाँव में हिंदुओं की 20 वोट थी तो अब 2020 में वह 8-10-12 ही बचे हैं। इसी प्रकार मुसलमानों की वोटर लिस्ट देखें, तो वह 1992 में अगर 300 थे, तो आज ये संख्या 2020 तक 1000 या उसके पार पहुँच गई है। इसका मतलब तो यही है न कि इस बीच में मुस्लिमों की वोट अगर बहुत बड़ी संख्या में बढ़ी है, तो हिंदुओं की संख्या बहुत बढ़ी संख्या में घटी है।

दिनेश देशवाल द्वारा साझा की गई मेवात में एक वकील की हत्या की खबर

मेवात में पलायन के बारे में बताते हुए दिनेश कहते हैं कि 1992 में जब बाबरी विध्वंस हुआ, तो उसका असर यहाँ भी दिखा। उस समय तक हिंदू बाजार ज्यादा होते थे। लेकिन, 1992 की इस घटना के बाद मुस्लिमों ने हिंदुओं के बाजारों का बहिष्कार कर दिया था। इसके बाद जब भी कोई भी घटना होती है, जिसमें हिंदू विरोध करते हैं, तो यह लोग हिंदुओं के दुकानों से सामान लेने से मना कर देते हैं। जिसके कारण हिंदू पलायन करने को मजबूर हो गए।

मेवात में हिंदू बाजारों का बहिष्कार करने के लिए डाला गया पोस्ट (साभार: दिनेश देशवाल)

बाकायदा ‘बाजार जिहाद’ शब्द का जिक्र करते हुए दिनेश कहते हैं, आज ये लोग बड़े स्तर पर अपने बाजारों का विस्तार कर रहे हैं और हिंदुओं के बाजार का बहिष्कार कर रहे हैं। ऐसे में मानिए कि उन्होंने (मुस्लिमों ने) हमसे मारपीट नहीं भी की, हमारी बहन-बेटियों से बदसलूकी नहीं भी की… लेकिन जब कोई हमारे बिजनेस को ही प्रभावित कर देगा, उसका बहिष्कार कर देगा, तो इसका सीधा असर हम पर ही तो पड़ेगा। जाहिर है फिर हम यहाँ से निकलने का प्रयास करेंगे।

विकास चंद्रा की भाँति मेवात के स्थानीय व पंजाब केसरी के पत्रकार दिनेश देशवाल का भी यही मानना है कि मेवात में पहले हिन्दुओं की स्थिति ठीक-ठाक थी। लेकिन जमातियों के आने के बाद इनमें कट्टरपन आ गया और हालात ऐसे होते गए। गौतस्करी पर बोलते हुए वह बताते हैं कि कुछ दिन पहले जमाल गढ़ गाँव से 2572 गाय की खालें बरामद हुई थी।

  • सुदर्शन के पत्रकार गौरव मिश्रा से ऑपइंडिया की बातचीत

गौरव मिश्रा ने मेवात का मामला उठने के बाद वहाँ लगातार कई दिन ग्राउंड रिपोर्टिंग की। उन्होंने बताया कि वह 3 गाँवों में गए। उन्होंने वहाँ ऐसे घरों को देखा, जिनकी स्थिति एक समय में बहुत अच्छी रही होगी, घर बड़ा रहा होगा। लेकिन, उन घरों को लोगों ने वहाँ छोड़ दिया। जब गौरव ने इस संबंध में आसपास के लोगों से पूछा तो लगभग सबने एक जैसा जवाब बताया। जैसे- वहाँ अधिकांश हिंदू मानते थे कि अगर उनकी लड़की बड़ी हो गई। जवान हो गई है। तो उसके साथ कुछ भी हो सकता है।

गौरव कहते हैं कि मुस्लिम बहुल आबादी का इतना दबाव है कि कोई घटना घटने पर और कार्रवाई न होता देख भी लोगों ने गाँवों से पलायन किया है। वहाँ हिंदू परिवार या तो लड़कियाँ को छठी-सातवीं तक पढ़वाते हैं या फिर अगर स्थिति अच्छी है तो वह उसे हिम्मत करके 10वीं करवा देते हैं, लेकिन इससे आगे पढ़ाई नहीं करने देते।

लड़कियों को ज्यादा न पढ़ाने के पीछे का कारण बताते हुए गौरव कहते हैं कि वहाँ पर अधिकाँश शैक्षणिक संस्थान मुस्लिम बहुल इलाकों में हैं। ऐसे में जब लड़कियाँ वहाँ जाती हैं, तो मुस्लिम लड़के उन्हें छेड़ते हैं, उनपर फब्तियाँ कसते हैं।

इसके अलावा एक लड़की के साथ साक्षात्कार का हवाला देते हुए गौरव ने कहा कि उन्हें लड़की ने इंटरव्यू देते हुए बताया कि जब वह कॉलेज जाती हैं, तो मुस्लिम युवक ट्रैक करते हैं। जिसके कारण उन्हें पिता या भाई को बुलाने की जरूरत पड़ती है।

कई बार ऐसे मामले भी आते हैं कि मुस्लिम लड़कियाँ ही हिंदू लड़कियों के साथ मिलकर अपने मजहब और मुस्लिम लड़कों की बहुत तारीफ करती हैं। जिससे लव जिहाद की शुरुआत होती है। इसके बाद ऐसे लड़कों से भी मिलवाया जाता है जो कलावा पहनकर आते हैं या फिर माथे पर टीका लगाकर आते हैं, ताकि लड़कियाँ उनपर मोहित हों।

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मेवात के मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंदू लड़कों की शादी के मुद्दे पर गौरव कहते हैं कि कई लोग इस बारे में वहाँ स्पष्ट नहीं बोलते। 100 में से 3-4 परिवार होंगे, जो बताते हैं कि यहाँ रहने के कारण बाहर के लोग उन्हें लड़की देने से मना कर देते हैं। उनका मानना है कि उनकी बेटी वहाँ सुरक्षित नहीं रहेगी।

मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में पानी की समस्या पर भी गौरव हमसे बात करते हैं। वे कहते हैं कि एक गाँव है शहरी जिसे ‘शिरी’ भी कहा जाता है। बकौल गौरव, “इस गाँव में अधिकांश पानी के कनेक्शन मुस्लिम लोगों के पास हैं। इस गाँव में लगभग 50 घर हिंदुओं के बचे है, जिनमें साफ पानी नहीं आता। इस मामले में मैंने उस गाँव की एक बुजुर्ग महिला से बात की। जिन्होंने बताया कि जब वह लोग 1 km पानी लेने जाती हैं, तो उन्हें ‘कंजरी’ जैसे शब्दों से पुकारा जाता है। इसलिए वे वहाँ बहु-बेटियों को नहीं भेजतीं। खुद ही पानी लेने चली जाती हैं।”

गौरव के मुताबिक, कोरोना के समय में घर से निकलकर उन्हें गाँव में कुछ भी खाने को नसीब नहीं होता था। घर से ले गए चनों को चबाते-चबाते वह भरी दोपहरी में रिपोर्ट करते और उसके बाद भी वहाँ जल्दी कोई बात करने को तैयार नहीं होता। क्यूँकि जो लोग बात करते हैं उन्हें बाद में धमकियाँ मिल जाती हैं। वे कहते हैं कि जिन लोगों ने उनसे बात की उन्होंने मुँह पर कपड़ा बाँधा, या फिर कैमरे की ओर पीठ करके जवाब दिए।

बता दें, सीएम मनोहर लाल खट्टर के साथ हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में गौरव ने हिस्सा लिया था। उन्होंने बताया कि दोनों पक्षों के साथ हुई इस बैठक में कई लोगों ने गंगा-जमुनी तहजीब को बचाने का हवाला देकर कई बातें कहीं। मगर, सीएम को ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाए। सीएम ने कई अहम फैसले लिए। जिन्हें अगर लागू किया गया तो मेवात में निश्चित ही स्थिति में सुधार आएगा।

गौरव कहते हैं कि रिपोर्टिंग के दौरान उन्हें कई मुसीबतें आईं। उनकी गाड़ी की वीडियो बनाई गई। उनसे आ आकर पूछा गया कि कौन से रास्ते से जाओगे। हिम्मत है तो उस रास्ते से जाकर दिखाना। तुमने मुद्दा दिखाकर अच्छा नहीं किया- जैसी कई धमकी भरी बातें बोलीं गई। इस संबंध में तो गौरव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक ट्वीट भी किया था।

इतना ही नहीं, कॉन्फ्रेंस के दौरान सवाल उठाने पर कई अन्य रिपोर्टरों ने उनका विरोध किया। जिसके कारण उन्हें उस समय बाहर कर दिया गया। लेकिन सीएम खट्टर ने बाद में उनसे ऑफ कैमरा बातें कीं, जहाँ उन्होंने मामले की जमीनी हकीकत दिखाने पर चैनल की तारीफ की और नाराजगी जताते हुए यह भी पूछा कि सुदर्शन न्यूज ने उनकी प्रतिक्रिया जानने का प्रयास क्यों नहीं किया?

ऑपइंडिया का मेवात पर प्रयास

यहाँ बता दें ऑपइंडिया भी मेवात के इस मामले पर लगातार राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष, हरियाणा महिला आयोग अध्यक्ष और हरियाणा सीएम ऑफिस की प्रतिक्रिया जानने के लिए उनसे कई बार संपर्क करने का प्रयास कर रहा था। लेकिन संपर्क न हो पाने के कारण कहीं से कोई जवाब नहीं मिला। इस बीच हमने स्थानीयों लोगों से बात की और इन पत्रकारों से भी उनके अनुभव जाने। ताकि हर पक्ष साफ हो सके।

आज भले ही कुछ तथाकथित सेकुलरिज्म का झंडा लेकर चलने वाले मेवात पर हुई इस रिपोर्टिंग को, इन पत्रकारों के अनुभवों को या हिंदूवादी संगठनों की माँग को एकतरफा करार दे दें। लेकिन उन प्रमाणों को, वीडियोज को, उन बयानों को, पूर्व जस्टिस की अध्यक्षता वाली जाँच रिपोर्ट को, अनेकों खबरों को झुठलाया नहीं जाया सकता। जो मेवात की स्थिति पर वाकई ये सवाल खड़ा करते हैं कि क्या आज का मेवात पाकिस्तान जैसा है या इसकी स्थिति वाकई सन 90 के कश्मीर से भी बुरी है, जहाँ इसी तरह कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार करके उन्हें घाटी से बाहर कर दिया गया था। आज मेवात में दलितों को आए दिन जिस तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है वो और भी गंभीर स्थितियों की तरफ स्पष्ट इशारा है।

हालाँकि, अब तसल्ली की बात बस यही है कि ये मामला लोगों के संज्ञान में आया है। कई संगठन इसपर लगातार नजर बनाए हुए हैं। मेवात के हिंदुओं को सुरक्षित करने की कोशिश की जा रही है। वहीं मंगलवार को स्वयं मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने इस मामले के मद्देनजर बकायदा बैठक करके कड़े फैसले लिए हैं। हिंदुओं को आश्वस्त किया है कि उन्हें इंसाफ मिलेगा। पानी से लेकर जमीन तक पर उन्हें उनका अधिकार दिलाया जाएगा।

आज सीएम की इन घोषणाओं को हम हिंदू समाज के प्रति जागरुक और इस मुद्दे को प्रकाश में लाने वालों की जीत के रूप में स्पष्ट तौर देख सकते हैं। साथ ही निष्पक्ष पत्रकारिता का दावे करने वाले उन मीडिया चैनलों की मंशा भी समझ सकते हैं। जिन्होंने चहुँओर मामले की चर्चा होने के बाद भी न इस मामले को प्राथमिकता दी और न इसपर कवरेज करना जरूरी समझा।

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