Tuesday, August 3, 2021
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‘दलितों को फुसला कर अपनी तरफ खींच रहे हिंदुत्ववादी’: कुलपति की रेस में ‘हिंदुत्व का मोहिनी मंत्र’ वाले प्रोफेसर, विरोध में छात्र

बद्री नारायण तिवारी ने आरोप लगाया था कि सांप्रदायिक ताकतें दलितों को हिन्दू पहचान से जोड़ने का काम कर रही हैं, जमीन पर समाज को तोड़ रही हैं। उन्होंने लिखा था कि हिंदुत्ववादी ताकतें घृणा की राजनीति कर के देश के सामाजिक ढाँचे को तहस-नहस कर रही हैं।

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में एक नगर है – झूसी। झूसी में ‘गोविंद वल्लभ (GB) पंत सोशल साइंस इंस्टिट्यूट’ है। इसी कॉलेज में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं बद्री नारायण तिवारी। वो सामाजिक इतिहास (Social History) और मनुष्य के सांस्कृतिक विकास का विज्ञान (Cultural Anthropology) पढ़ाते हैं। लेकिन, उन्हें लेकर विवाद यहाँ नहीं, प्रयागराज से 435 किलोमीटर दूर मोतिहारी में हो रहा है, जहाँ उनके कुलपति बन कर आने की संभावना से लोग नाराज़ हैं।

मोतिहारी में स्थित ‘महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय’ शुरू से विवादों में रहा है। फ़िलहाल केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इसके नए कुलपति की नियुक्ति को लेकर प्रक्रिया शुरू कर दी है। रमेश पोखरिया निशंक के इस्तीफे के बाद इस प्रक्रिया में देरी होनी तय है। इसी तरह 2018 के अंत में भी कुलपति अरविंद कुमार अग्रवाल शैक्षणिक गड़बड़ियों के आरोप में अपना इस्तीफा दे दिया था।

जो 5 नाम सेलेक्शन कमिटी को भेजे गए हैं, उनमें ‘बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU)’ के एक प्रोफेसर के अलावा प्रयागराज स्थित जीबी पंत इंस्टिट्यूट के बद्री नारायण तिवारी का नाम प्रमुख है।

मोतिहारी स्थित महात्मा गाँधी सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी के छात्रों को आशंका है कि प्रोफेसर बद्री नारायण को यहाँ का वाइस चांसलर बना कर भेजा जा सकता है, इसीलिए उन्होंने पहले ही विरोध शुरू कर दिया है। विरोध उनके पढ़ाने के रवैये या प्रशासनिक क्षमता को लेकर नहीं, बल्कि विचारधारा में यू-टर्न को लेकर है। कहा जा रहा है कि कभी ‘हिंदुत्व का मोहिनी मंत्र’ नामक पुस्तक लिख चुने बद्री नारायण अब पद की लालसा के लिए RSS (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) को खुश करने की जुगत में लगे हैं।

आइए, हम संक्षेप में बताते हैं कि उनकी इस पुस्तक में क्या था। 2014 में प्रकाशित ये पुस्तक हिन्दुओं और इसके अभिन्न अंग दलितों को बाँटती हुई नजर आती है। भाजपा की तरफ लोगों के उन्मुख होने को इस पुस्तक में खतरे की घंटी बताया गया था और इससे आगाह करने का दावा किया गया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि भाजपा कार्यकर्ता विभिन्न समुदायों/जातियों के बीच दीवार खड़ी करने का कार्य कर रहे हैं।

उनका कहना था कि दलित समाज को लोककथाओं में मुस्लिमों के प्रति शत्रुता की भावना दिखाई देती है, लेकिन फिर भी वो मुस्लिमों के साथ मिलजुल कर रहते हैं। उन्होंने आरोप लगाया था कि सांप्रदायिक ताकतें दलितों को हिन्दू पहचान से जोड़ने का काम कर रही हैं, जमीन पर समाज को तोड़ रही हैं। उन्होंने लिखा था कि हिंदुत्ववादी ताकतें घृणा की राजनीति कर के देश के सामाजिक ढाँचे को तहस-नहस कर रही हैं।

तो ऐसी हिन्दू विरोधी मानसिकता है प्रोफेसर बद्री नारायण तिवारी की! एक ऐसे पुस्तक का लेखक, जिसमें आरोप लगाया गया था कि हिन्दू झूठी कथाओं के जरिए दलितों को फुसला कर अपनी तरफ खींच रहे हैं। ‘दलित इतिहास की हिंदुत्ववादी पुनर्व्याख्या’ जैसे शब्दों का उन्होंने प्रयोग किया है। उन्होंने लिखा है कि भाजपा ने रामायण से शबरी, निषादराज, महाभारत से एकलव्य और धीरे-धीरे उनके जातीय नायकों को राम और लक्ष्मण के अवतार बता कर यह जताने का प्रयास किया कि उन्हें सवर्ण हिन्दुओं ने नहीं, तुर्क और मुगल आक्रांताओं ने सदियों प्रताड़ित किया है।

उन्होंने संघ पर राजा सुहेलदेव को सांप्रदायिक बनाने का आरोप लगाया। शबरी के गुणगान से भी उन्होंने अपनी पुस्तक में आपत्ति जताई थी और कहा था कि जॉन नेस्फील्ड के रामायण में शबरी है ही नहीं। पहली बात तो ये कि रामायण का अपने हिसाब से व्याख्या करने वाला कोई अंग्रेज कैसे भला भारतीय संस्कृति के पक्ष में बातें कर सकता है? और हाँ, किसी को रामायण पढ़नी हो तो वो वाल्मीकि को पढ़ेगा, नेस्फील्ड की क्यों?

अब आते हैं असली मुद्दे पर। प्रोफेसर संजीव कुमार शर्मा का बतौर कुलपति कार्यकाल ख़त्म होने के बाद मोतिहारी के ‘महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय (MGCUB)’ के छात्र और स्थानीय युवा क्यों नहीं चाहते हैं कि बद्री नारायण तिवारी इस पद पर आएँ। छात्रों का आरोप है कि प्रोफेसर बद्री नारायण ने बार-बार अपनी पुस्तक में हिन्दू धर्म और हिंदुत्व को अलग-अलग दिखा कर बदनाम करने की कोशिश की है।

राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के तिरहुत प्रमंडल के जिलाध्यक्ष राहुल केदार सिंह का कहना है कि पिछले 6 वर्षों से दो-दो कुलपतियों के विवादित कार्यकाल के कारण विश्वविद्यालय का विकास नहीं हो पाया है और अब इसे एक योग्य और अच्छे विचारधारा वाले शिक्षाविद की कुलपति के रूप में ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म के प्रति अनाप-शनाप बकने वाले बद्री नारायण अब ‘नए-नए संघी’ बने हैं, ऐसे में इस तरह के व्यक्ति के आने से छात्रों का नुकसान ही है।

बता दें कि मोतिहारी के इस विश्वविद्यालय का एक बड़ा हिस्सा अब भी अस्थायी परिसर में चल रहा है। राहुल केदार सिंह का कहना है कि ‘संघ की गोद में बैठ कर गंगा नहाने’ की सोचने वाले कुलपति का यहाँ आना सहन नहीं किया जाएगा। जब राजद के नेता हिन्दू विरोधी होने को लेकर किसी का विरोध करें, तो समझ लीजिए मामला कितना पेचीदा है। ‘चंपारण छात्र संघ’ के संयोजक विकास जी भी इस आशंका से नाराज़ हैं।

उन्होंने कहा कि बापू की कर्मभूमि पर अवसरवादियों के लिए कोई जगह नहीं है। उन्होंने बद्री नारायण को ‘मौसम वैज्ञानिक’ बताते हुए कहा कि 2014 से पहले हिंदुत्व को लेकर ज़हर उगलने वाला व्यक्ति का कुलपति बनना ठीक नहीं है। विकास जी ने कहा कि RSS में ये लोग रोहिंग्या शरणार्थी की तरह हैं जो संगठन में तबतक ही टिके होंगे जबतक इनके निजी हितों की पूर्ति होती रहे। उन्होंने कहा कि हिन्दू की परिभाषा तक न जानने वाला व्यक्ति कुलपति बन कर आया तो विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा नष्ट हो जाएगी और इस पर ताला लग जाएगा।

वहीं शिक्षक निखिल विवेक का पूछना है कि हिंदुत्व को गुंडागर्दी से जोड़ने वाले व्यक्ति से भला एक अच्छा शैक्षिक वातावरण देने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? ‘चम्पारण छात्र संघ’ के कुछ सदस्य राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिख कर बद्री नारायण के खिलाफ विरोध दर्ज कराने वाले हैं। विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों लालसाहब और मुकुंद का कहना है कि इस तरह का विवादित चेहरा यूनिवर्सिटी में नहीं आना चाहिए।

हाल ही में अपनी पुस्तक ‘रिपब्लिक और हिंदुत्व’ के वर्चुअल विमोचन के दौरान बद्री नारायण से पूछा गया था कि हिंदुत्व और हिन्दू धर्म को वो एक देखते हैं या फिर अलग-अलग? इसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि पुस्तक को लिखने के समय उनके मन में भी ये सवाल चल रहा था। उन्होंने उलटे इसका अर्थ समझने के लिए कार्यक्रम में उपस्थित RSS की नेशनल एग्जीक्यूटिव के सदस्य राम माधव से यही सवाल पूछ दिया।

‘हिंदुत्व’ नाम पर दो-दो पुस्तकें लिख चुके बद्री नारायण तिवारी को ये पता ही नहीं था कि हिन्दू धर्म की परिभाषा क्या है और हिंदुत्व क्या है। उन्होंने गोलमोल जवाब देते हुए कहा कि उनकी किताब सामाजिक पहलुओं को छूती है, उसमें फिलॉसॉफी नहीं है। बद्री नारायण से ये पूछा जा सकता है कि फिर किताब के नाम में ‘हिंदुत्व’ क्यों है? राम माधव ने जवाब देते हुए ‘हिंदुत्व’ शब्द को वीर सावरकर का क्रिएशन बताते हुए कहा कि सावरकर हिंदुत्व को ‘Hinduism’ से जोड़ कर नहीं देखना चाहते थे।

हालाँकि, ऑपइंडिया इसकी पुष्टि नहीं करता है कि बद्री नारायण का नाम पूर्वी चम्पारण के मोतिहारी स्थित ‘महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय’ के कुलपति के रूप में फाइनल हो गया है। बल्कि छात्रों और स्थानीय युवाओं को ये आशंका है कि चूँकि बद्री नारायण तिवारी का नाम विचाराधीन है और वो दावेदारों में से एक है, तो कहीं उन्हें ही न कुलपति बना कर मोतिहारी भेज दिया जाए। उनके हिन्दू विरोधी इतिहास को लेकर विरोध हो रहा है।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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