Thursday, August 18, 2022
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SC/ST आरक्षण लागू नहीं कर रहा जामिया, आयोग ने कुलपति नजमा अख्तर को किया तलब: दलित शिक्षक से कहा – बर्तन धो, चाय बनाओ

इस मसले पर ऑपइंडिया से बात करते हुए कुमार के वकील ने कहा कि इसी तरह के मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक और मामला लंबित है। शीर्ष अदालत और दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित दो मामलों में कानून के अनुसार आरक्षण के तहत अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति समुदाय के उम्मीदवारों की नियुक्ति और पदोन्नति पर रोक लगाने का कहीं भी आदेश नहीं है।

जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की वॉइस चांसलर नजमा अख्तर मुश्किलों में घिर गई हैं। उन्होंने 1 जुलाई 2022 को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने पूछताछ के लिए समन जारी किया है। आरोप है कि विश्वविद्यालय नियुक्तियों और प्रमोशन में कानूनन अनुसूचित जनजाति/ जाति के लोगों को मिलने वाले आरक्षण को लागू ही नहीं कर रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन को इस जानबूझकर लागू नहीं करने का आरोप है। इसी मामले में 19 जुलाई को कुलपति जनमा अख्तर को तलब किया गया है।

जातिगत अत्याचार का है मामला

दरअसल, विश्वविद्यालय में ही काम करने वाले हरेंद्र कुमार नाम के व्यक्ति आयोग में शिकायत कर नियुक्तियों में आरक्षण संबंधी नियमों का पालन नहीं करने का आरोप लगाया था। अनुसूचित जाति से आने वाले कुमार ने विश्वविद्यालय के अधिकारियों पर भेदभाव करने का आरोप लगाया है। उनकी नियुक्ति यूनिवर्सिटी द्वारा संचालित एक स्कूल में अतिथि कंप्यूटर शिक्षक के रूप में हुई थी। उनका आरोप है कि विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने उनके खिलाफ साजिश रची और बाद में उन्हें अवैध तरीके से नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। इसी मामले को लेकर पिछले साल 2021 में भी आयोग ने वीसी को तलब किया था।

जामिया की कुलपति को आयोग द्वारा भेजा गया समन

आयोग को की गई शिकायत में हरेंद्र कुमार ने आरोप लगाया कि जिस स्कूल में वो कार्यरत थे, वहाँ की प्रधानाचार्य ने एक महिला शिक्षक के साथ मिलकर उनके खिलाफ साजिश रची। कुमार के वकील सुशांत ने आरोप लगाया है कि कुमार को स्कूल के प्रिंसिपल के लिए चाय बनाने और बर्तन धोने जैसे काम करने के लिए कहा गया था। उन्होंने कहा,”शिकायत में जाति और धर्म आधारित भेदभाव गहराई से अंतर्निहित था।” हालाँकि, इसे अपना और अपने पद का अपमान बताते हुए हरेंद्र ने ऐसा करने से इनकार कर दिया तो उनके खिलाफ स्कूल की ही महिला शिक्षक को परेशान करने का झूठा आरोप जड़ा गया।

हरेंद्र की शिकायत की जाँच के लिए आयोग ने तीन सदस्यीय कमेटी का गठन कर दिया। समिति की रिपोर्ट को सौंपे जाने के बाद प्राचार्य द्वारा दायर शिकायत को वापस ले लिया गया। लेकिन इस प्रक्रिया को पूरा होने में चार साल का लंबा वक्त लगा और इस दौरान कुमार को झूठे कलंक के साथ जीना पड़ा।

खुद पर लगे आरोपों को लेकर कुमार कहते हैं, “मुझे प्रिंसिपल के कक्ष में बचे हुए बर्तन धोने और उनके और उनके मेहमानों के लिए चाय तैयार करने के लिए कहा गया था। प्रिंसिपल मुर्सलीन हर छोटी-छोटी बात पर मुझे ये कहकर नीचा दिखा रहे थे कि मैंने मुस्लिम की एक सीट पर कब्जा कर लिया है। मैं स्कूल में रहने के लायक नहीं हूँ, क्योंकि मैं एक हिंदू हूँ और वह भी एक अनुसूचित जाति। वो अक्सर कहते थे कि विश्वविद्यालय प्रशासन में उनके बड़े कनेक्शन हैं और अगर मैं उनकी बातें मानने से इनकार करता हूँ तो वो मुझे बाहर करवा देंगे।”

कुमार ने ये भी आरोप लगाया कि एक बार तो उन्हें अपने मोबाइल पर अश्लील वीडियो डाउनलोड करने के लिए मजबूर किया, जिससे उन्होंने इनकार कर दिया। कुमार ने कहा, “उन्होंने (प्रिंसिपल) ने मुझे जाति सूचक गालियाँ दी और कहा कि कमीने ‘चमार’ मैं तेरा करियर तबाह कर दूँगा। हालाँकि, बाद में स्कूल के कुछ शिक्षकों के बीच-बचाव के बाद मामला शांत हुआ।”

मामले के शांत होने के बाद हरेंद्र कुमार को लगा कि मामला शांत हो गया है, लेकिन आश्चर्यजनक ढंग से एक महिला शिक्षक ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। कुमार ने कहा, “मुझसे जबरदस्ती अलग तरीके के माफीनामे पर हस्ताक्षर करवाया गया। मेरी नौकरी खत्म करने की धमकी दी गई। मैं अपने परिवार में इकलौता कमाने वाला हूँ, इस कारण से उन्होंने जहाँ भी हस्ताक्षर करने के लिए कहा। वहाँ मैंने कर दिया। इसके बाद गैर कानूनी तरीके से मुझे टर्मिनेशन लेटर थमा दिया गया।”

विश्वविद्यालय के अधिकारियों द्वारा टर्मिनेशन के बारे में कोई प्रतिक्रिया नहीं दी जा रही थी, जिसके बाद कुमार ने पुलिस में शिकायत करने का फैसला किया। हालाँकि, पहले तो वो ऐसा नहीं कर पाए, लेकिन बाद में साकेत कोर्ट के आदेश के बाद उनकी एफआईआर दर्ज की गई। इसके साथ ही उन्होंने एनसीएससी में शिकायत भी दर्ज कराई। इसके साथ ही कुमार ने आरोप लगाया है कि आरोपित प्रिंसिपल उनके गाँव भी गया था और वहाँ उसने उनके माता-पिता को धमकाया कि वो उन्हें केस को वापस लेने को कहें।

नियुक्तियों और प्रमोशन में आरक्षण खत्म करने का आरोप

जामिया मिल्लिया इस्लामिया को केंद्र सरकार फंडिंग करती है। ऐसे में अब कुमार की शिकायत के बाद नियुक्तियों और प्रमोशन में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण को लागू नहीं करने के मामले में जाँच के दायरे में है।

जामिया की कुलपति को आयोग द्वारा जारी किया गया नोटिस

दिल्ली हाई कोर्ट में अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों के राष्ट्रीय आयोग (एनसीएमईआई) के आदेश को चुनौती देने वाला एक मामला लंबित है। आयोग ने ही 2011 में विश्वविद्यालय को धार्मिक अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा दिया था। एनसीएमईआई ने कहा था, “जामिया की स्थापना मुस्लिमों ने मुस्लिमों के फायदे के लिए की थी। इसने मुस्लिम अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान के रूप में अपनी पहचान कभी नहीं खोई।” इसमें कहा गया है, “विश्वविद्यालय अनुच्छेद 30 (1) राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान अधिनियम की धारा 2 (जी) के साथ कवर किया गया है।”

हालाँकि, इस आदेश के तुरंत बाद दिल्ली हाई कोर्ट में तुरंत इसे चुनौती दी गई। लंबित मामले के बावजूद विश्वविद्यालय ने 2011 के एनसीएमईआई आदेश का हवाला देते हुए 2014 में अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के आरक्षण और धर्म-आधारित नियुक्तियों और आरक्षणों को मंजूरी दे दी।

इस मसले पर ऑपइंडिया से बात करते हुए कुमार के वकील ने कहा कि इसी तरह के मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक और मामला लंबित है। शीर्ष अदालत और दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित दो मामलों में कानून के अनुसार आरक्षण के तहत अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति समुदाय के उम्मीदवारों की नियुक्ति और पदोन्नति पर रोक लगाने का कहीं भी आदेश नहीं है। कुमार ने हालाँकि, लंबित मामलों पर कोई निर्देश नहीं माँगा, लेकिन आयोग से शिक्षण और गैर-शिक्षण दोनों पदों पर नियुक्ति और पदोन्नति में एससी/एसटी समुदाय के आरक्षण को बहाल करने की माँग की है।

संविधान के अनुच्छेद 338 के अनुसार, आयोग को संविधान के तहत और सरकार द्वारा पारित किसी भी कानून के तहत अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदाय के लोगों को प्रदान किए गए सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जाँच और निगरानी के लिए उचित कदम उठाने का अधिकार है।

जामिया को अल्पसंख्यक का दर्जा देने केंद्र ने किया था विरोध

2018 में केंद्र सरकार ने पिछली सरकार द्वारा जमा किए गए हलफनामे के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में एक एफिडेविट फाइल कर एनसीएमईआई द्वारा जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक का दर्जा दिए जाने का विरोध किया था।

जामिया में डेमोग्राफिक चेंज पर चिंता

पिछले साल 2021 स्वराज्य पत्रिका में एक रिपोर्ट पब्लिश हुई थी, जिसमें विश्वविद्यालय में डेमोग्राफिक चेंज की ओर इशारा किया गया था। इसके मुताबिक, एडमिशन में 50% सीटें मुस्लिम छात्रों के लिए आरक्षित हैं, जहाँ प्रत्येक कार्यक्रम में 30% सीटें मुस्लिम आवेदकों के लिए आरक्षित हैं, 10% मुस्लिम महिला आवेदकों के लिए और 10% ओबीसी या ओबीसी मुस्लिमों व अनुसूचित जनजाति या एसटी के लिए आरक्षित हैं।

इसके अलावा, जामिया स्कूल से कक्षा 10 और कक्षा 12 की परीक्षा उत्तीर्ण करने वालों के लिए 5% सीटें आरक्षित हैं। अन्य 5% कश्मीर के छात्रों के लिए आरक्षित हैं। इसी तरह, 10% सीटें विदेशों के छात्रों के लिए और 5% दिव्यांग छात्रों के लिए आरक्षित हैं। प्रवेश प्रक्रिया पूरी तरह से मुस्लिम छात्रों के पक्ष में है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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