Saturday, September 26, 2020
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ईद का बकरों की मौत से कोई लेनादेना नहीं, हम पशु हिंसा के विरोध में: PETA से एक्सक्लूसिव बातचीत

हम किसी धर्म और मजहब के हिसाब से अपने अभियान नहीं चलाते। PETA इंडिया कोई धार्मिक संस्था नहीं है और सभी धर्मों के लोग हमारे सहयोगी एवं समर्थक हैं। हम केवल पशुओं के साथ होने वाली क्रूरता के खिलाफ हैं। इसमे अपने मनोरंजन के लिए जानवरों के साथ बदसलूकी करना भी शामिल है जैसे सर्कस, घुड़दौड़, बैल दौड़, शिकार, जल्लीकट्टू व और भी बहुत से अन्य आयोजन।

जानवरों की रक्षा व जीव-जंतुओं के हितों के लिए अभियान लिए चलाने का दावा करने वाली संस्था PETA की लखनऊ की एक होर्डिंग को लेकर खड़ा हुआ विवाद थमता नहीं दिख रहा है। इस सम्बन्ध में हमने अंतरराष्ट्रीय संस्था से संपर्क कर के विस्तृत रूप से उनका पक्ष जाना। उससे पहले ‘PETA इंडिया’ की उस होर्डिंग को लेकर खड़े हुए विवाद के बारे में जानते हैं जिसमें शाकाहारी बनने की अपील की गई थी और मुल्ला-मौलवी इससे ऑफेंड हो गए थे।

दरअसल, कई मुसलमानों का कहना था कि इस पोस्टर में बकरे की तस्वीर लगाई गई है, जो बकरीद त्यौहार से पहले एक वर्ग विशेष को निशाना बनाने के लिए किया गया है। इसके बाद PETA की इस होर्डिंग को हटा दिया गया। सोशल मीडिया पर संस्था ने सफाई दी कि इसे उसने नहीं हटाया है। ऑपइंडिया ने जब केसरबाग SHO दीनानाथ मिश्रा से संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि पुलिस ने होर्डिंग नहीं हटाई है।

केसरबाग थाना पुलिस ने कहा कि इस होर्डिंग को उन्होंने ही हटाया है, जिन्होंने इसे लगाया था। जबकि PETA का कहना है कि होर्डिंग हटाए जाने में उसकी सहमति नहीं है और वो जल्द ही दिल्ली, गुवाहाटी, हैदराबाद, कोलकाता और मुंबई की तरह लखनऊ में फिर से होर्डिंग लगाएगा। इस होर्डिंग में बकरे की फोटो लगा था और लिखा था कि मैं मटन नहीं हूँ। साथ ही जीव को बचाने की बात करते हुए शाकाहारी बनने की अपील की गई थी।

मौलवियों का कहना है कि मुसलमान ‘कुर्बानी’ को महत्वपूर्ण मानते हैं और ये पोस्टर ग़लत सन्देश दे रहा है। उन्होंने इसे आपत्तिजनक करार देते हुए दावा किया था कि मुस्लिम समुदाय इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। बकरीद 31 जुलाई को मनाया जाना है। ऑपइंडिया ने इन सभी सवालों को लेकर ‘PETA इंडिया’ से संपर्क किया, जिसके बाद संस्था ने अपने कैम्पेन्स कोऑर्डिनेटर राधिका सूर्यवंशी को हमारे सवालों का जवाब देने के लिए अधिकृत किया।

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नीचे हम PETA की अधिकारी राधिका सूर्यवंशी के साथ ही बातचीत को पेश कर रहे हैं, जिसमें हमने उनसे लखनऊ की उक्त होर्डिंग को लेकर उपजे विवाद के अलावा हिन्दुओं के प्रति भेदभाव को लेकर भी सवाल पूछे हैं। मुल्ला-मौलवियों द्वारा लगाए गए आरोपों पर भी हमने PETA की प्रतिक्रिया जानी। सारे सवालों और PETA द्वारा दिए गए जवाब को हम विस्तृत रूप में आपके समक्ष पेश कर रहे हैं।

अगर PETA ने नहीं तो फिर होर्डिंग किसने हटाई? आप यह कहना चाहते हैं कि यह स्थानीय पुलिस-प्रशासन का काम है?

PETA ने यह होर्डिंग नहीं हटाई। बिलबोर्ड हटाने के बाद हमें एजेंसी ने बताया की उस साइट के मालिक के कहने पर किसी लोकल वेंडर ने वह होर्डिंग हटाई है। PETA होर्डिंग हटाने पर सहमत नहीं था क्योंकि शाकाहारी खाने और जानवरों के प्रति दया की बात करने में कुछ गलत नहीं है और हमने इस होर्डिंग को दुबारा लगाने के लिए भी बोला है।

Islamic Centre of India के President मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महाली ने पूछा हैं कि बकरीद के त्यौहार से पहले ऐसी होर्डिंग क्यों लगाई गई? क्या वो गलत कह रहे हैं? आप इस पर क्या कहेंगे? होर्डिंग कब लगाई गई थी?

PETA India ने अपने सभी मुस्लिम समर्थकों एवं सहयोगियों की ओर से यही संदेश लिखा और भी बहुत सी होर्डिंग्स दिल्ली, गुवाहाटी, हैदराबाद, कोलकाता और मुंबई में भी लगाई हैं। बकरे का माँस हर रोज़ खाया जाता है इसलिए इसका ईद से कोई लेना देना नहीं। हम जनता को जागरूक करना चाहते हैं कि हर रोज शाकाहारी खाना खाएँ। यह हमारे वीगन अभियान की नयी होर्डिंग है, इसी अभियान की अन्य होर्डिंग्स में मुर्गो, मछलियों व अन्य जानवरों के चित्र भी बने हैं जिनका आमतौर पर लोग ज्यादा माँस खाते हैं। यह सभी बोर्ड देश भर के कई शहरों में लगाए गए हैं।

माँस खाने के लिए भी तो बहुत से विज्ञापन दिए जाते हैं जैसे KFC कंपनी अपने माँसाहारी भोजन का विज्ञापन करती है। निर्दोष जीवों को मार कर खाने का समर्थन करने वाले यह विज्ञापन भी तो गलत हैं। तो क्या फिर उनके विज्ञापन बोर्ड नहीं हटाए जाने चाहिए ?

Director of Centre for Objective Research and Development (CORD) के अथर हुसैन कहते हैं बकरीद के त्यौहार पर मुसलमान बकरे की कुर्बानी देते हैं। PETA की होर्डिंग गलत संदेश दे रही है और इस पर हमें ऐतराज है। कौम इसका विरोध करती है। इस पर PETA की क्या प्रतिक्रिया है?

सभी धर्म दया एवं करुणा का संदेश देते हैं और वीगन खाना खाने की अनुमति भी। बकरियाँ बहुत ही संवेदनशील एवं चंचल जानवर होती हैं। वास्तव में सभी जानवर हमारी तरह दुःख एवं पीड़ा को महसूस कर सकते हैं व वह सभी भी जिंदा रहना चाहते हैं। बहुत से लोग शाकाहारी खाना बाँट कर, दान करके और गरीबों की मदद करके बकरीद का त्यौहार मानते हैं। वीगन खाना, हमारे दिल की तंदुरुस्ती के लिए बेहतर है और हमें कैंसर, हृदय रोग, डायबिटीज व और भी बहुत सी जानलेवा बीमारियों से बचने में मदद करता है।

क्या इस मामले में PETA इंडिया उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी कुछ माँग कर रहा है?

यह ध्यान रखने योग्य है कि “Prevention of Cruelty to Animals (Slaughter House) Rules, 2001” के अनुसार कि जानवर की हत्या केवल लाइसेन्स प्राप्त कत्लखानों में ही की जा सकती है। PETA इंडिया ने इससे पहले भी सभी राज्यों से अनुरोध किया था कि सरकार ईद के दौरान भी जानवरों के गैरकानूनी परिवहन एवं हत्याओं के खिलाफ सख्त कदम उठाए।

ईद के दौरान भी यह आमतौर पर देखने को मिलता है कि बहुत अधिक संख्या में जानवरों को छोटे ट्रकों में भरकर परिवहन किया जाता है, जिससे कत्लखानों तक जाते जाते दम घुटने और ठोकरे लगने से उनकी हड्डियाँ टूट जाती हैं। गाड़ियों से उतार कर कत्लखानों के अंदर ले जाने के दौरान जब डरे-सहमे जानवर धीमे चलने लगते हैं तो जबरदस्ती आगे बढ़ते रहने के लिए उनकी पूँछ को मरोड़-मरोड़ कर तोड़ दिया जाता है। कत्लखानों के अंदर खुले में अप्रशिक्षित कसाई इन जानवरों को एक-एक कर के एक-दूसरे के सामने उनका आधा गला काटकर धीर-धीरे तड़प-तड़प कर मरने के लिए छोड़ देते हैं।

क्या आपको कट्टरपंथी मुसलमानो की तरफ से धमकियाँ, मेल, फोन कॉल्स या मैसेज आ रहे हैं? अगर हाँ तो क्या आप उनका विवरण दे सकते हो? (इस मामले में या किसी अन्य मामले में भी)

नहीं, हमें कहीं से किसी भी प्रकार की धमकी नहीं मिली है। और हम स्थानीय निवासियों से यही अनुरोध करते हैं की जानवरों के प्रति दया की बात करना या वीगन खाने को बढ़ावा देने की बात करने में कुछ भी गलत नहीं है। अन्य सभी विज्ञापनों की तरह हमारा यह वीगन वाला बिलबोर्ड भी बस एक जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए है।

इस आरोप में कितनी सच्चाई है कि PETA India हिंदुओं के त्यौहारों पर बहुत ज़ोर-शोर से हल्ला मचाता है लेकिन मुसलमानों के त्यौहारों पर चुप्पी साध लेता है?

देखिए, हम किसी धर्म और मजहब के हिसाब से अपने अभियान नहीं चलाते। PETA इंडिया कोई धार्मिक संस्था नहीं है और सभी धर्मों के लोग हमारे सहयोगी एवं समर्थक हैं। हम केवल पशुओं के साथ होने वाली क्रूरता के खिलाफ हैं। इसमे अपने मनोरंजन के लिए जानवरों के साथ बदसलूकी करना भी शामिल है जैसे सर्कस, घुड़दौड़, बैल दौड़, शिकार, जल्लीकट्टू व और भी बहुत से अन्य आयोजन। हम हाथियों को कैद करके रखने और सर्कस, हाथीसवारी या त्यौहारों में उनको इस्तेमाल किए जाने के खिलाफ हैं। हम जानवरों की बलि और कुर्बानी दिए जाने के भी खिलाफ है चाहे वो कभी भी और कहीं क्यूँ न दी जाए।

हमें यह सोचना चाहिए कि हाथी एक सामाजिक जानवर है जो जंगलों एवं घास पर रहने के लिए बना है। इंसान अपने फ़ायदों के लिए उन्हें कैद करके, शारीरिक एवं मानसिक यातनाएँ देकर सीमेंट के बने पक्के फर्श पर जंजीरों में जकड़ कर रखते हैं। बिना पर्याप्त भोजन-पानी और चिकित्सा के उनकी स्थिति दर्दनाक हो जाती है। उनके पैरों के नाखून उखड़ जाते हैं, तलवे कट जाते है, पैर सूज जाते हैं, घाव बन जाते हैं व वह हमेशा अपनी ही टट्टी-मूत्र में सने खड़े रहते हैं। एक अनुमान के अनुसार, कैद में रहने वाले 50 प्रतिशत हाथियों की मौत इन्हीं समस्याओं के कारण होती है।

कैद, सामाजिक जीवन के अवसर ना मिलना वा आज़ाद जीवन ना जी पाने के कारण यह जानवर गंभीर मानसिक तनाव का शिकार होते है व यह आसानी देखा जा सकता है जब हाथी अपने सिर को गोल गोल या दाएँ-बाएँ घुमाकर एक जैसी हरकत करते नजर आते हैं। पैरों में बँधी जंजीरें उनकी त्वचा को छील देती हैं व वहाँ गहरे जख्म बन जाते हैं। उन्हें नियंत्रित करने के लिए लोहे व धातु के बने नुकीले अंकुश इस्तेमाल किए जाते हैं।

बेकसूर एवं प्यारे जानवर ना सिर्फ ईद बल्कि हर रोज इसी तरह बेमौत तरीकों से मौत के घाट उतार दिए जाते हैं। तेज़ धारदार चाकू से उनका आधा गला काट कर उन्हें तड़प-तड़प कर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। अंतर सिर्फ यह है कि बाकी दिनों में वह सड़कों पर नहीं बल्कि कत्लखानों में मरते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन पर होने वाली क्रूरता में कमी आ जाती है। पिछले साल बकरीद पर हमने मुंबई के देवनार बूचड़खाने के पास वाले पशु बाज़ार पर जाँच की थी।

बता दें कि पोस्टर हटाने के लिए लखनऊ के कैसरबाग थाने में दो अलग-अलग शिकायतें भी दर्ज कराई गई हैं। जिस पोस्टर पर बवाल हुआ है, उस पर लिखा है – “मैं जीव हूँ माँस नहीं, मेरे प्रति नज़रिया बदलें, वीगन बनें।” सेंटर ऑफ़ ऑब्जेक्टिव रिसर्च एंड डवलपमेंट के निदेशक अतहर हुसैन ने भी इस मामले में एक पत्र लिखा था। PETA ने इस तरह के पोस्टर पूरे देश की अलग-अलग जगहों पर लगाया है।

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एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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