Sunday, December 6, 2020
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हमने नहीं मारा, अल्लाह की बच्ची थी, वो ले गया: CAA प्रोटेस्ट का ‘चेहरा’ नन्ही बच्ची की ‘मौत’ पर मीडिया चुप

"हमने थोड़ी मारा? वो अल्लाह की बच्ची थी, अल्लाह ने उसे बुला लिया। यहाँ तो बड़ों को गोली मारी जा रही है। वो तो बच्ची थी, क़ुर्बान हो गई।"

CAA और NRC के खिलाफ शाहीन बाग़ में पिछले 51 दिनों से विरोध प्रदर्शन जारी है। विरोध की वजह है मात्र ये डर कि CAA में मुस्लिमों का नाम नहीं है इसलिए जब कभी भी भविष्य में NRC लागू होगा तो इससे मुस्लिमों की नागरिकता छीन जाएगी, मुद्दा पूरी तरह से हिन्दू-मुस्लिम बना दिया गया है लेकिन इसे सेक्युलर ठहराने के नाम पर वामपंथी गिरोहों द्वारा कागज नहीं दिखाने से लेकर कई अन्य प्रपंच रचे और जोड़े गए। जिसकी परिणति कोलकाता से लेकर दिल्ली तक कड़ाके की ठण्ड से बीमार होकर कई मौतों के रूप में भी सामने आया जिसे कुर्बानी बताने की कोशिश की जा रही है।

इस विरोध को बाद में मोदी सरकार गिराने के एजेंडे से भी जोड़ दिया गया जिस पर हम आगे एक विस्तृत रिपोर्ट ले कर आएँगे। फिलहाल, CAA और एनआरसी के विरोध में धरने पर बैठे मुस्लिमों और वामपंथियों की मिलीभगत से हाईवे जाम कर, व्यवस्था ठप कर, कई ‘जिहादी बाग़’ बनाने के प्रयास हुए जिसकी शुरुआत शाहीन बाग़ से हुई। इन प्रदर्शनों में हिन्दुविरोधी पोस्टरों से लेकर देश के ‘टुकड़े-टुकड़े’ करने की बात करने वालों तक जमावड़ा रहा।

खासतौर से, शाहीन बाग प्रदर्शन का चेहरा बनाया गया एक छोटी बच्ची और दो बूढ़ी दादियों को, दादियाँ तो अभी भी शाहीन बाग में डटी हैं लेकिन वो छोटी बच्ची जो बाटला हाउस इलाके की थी जिसकी कड़कती ठण्ड में प्रदर्शन को इमोशनल टच देने और मीडिया अटेंशन के लिए जामिया और शाहीन बाग़ दोनों जगहों के प्रदर्शनों में इस्तेमाल हुआ वो पिछले कई दिनों से तमाम मीडिया हाउस की ग्राउंड रिपोर्ट से गायब है। क्यों? हमने पड़ताल करने की कोशिश की तो कई फेसबुक पोस्ट और वहाँ मौजूद प्रत्यक्ष-दर्शियों के बयानों से ठण्ड लगने से बीमार होने के कारण उसकी मौत की बात सामने आई।

वाजीहुल हसन आज़ाद ने इस घटना की सूचना देते हुए अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा, “दुखद, जामिया प्रोटेस्ट में एक औरत बच्चे को गोद में लेकर आती थी, सर्दी की वजह से बीमार हुई और आज (2 फरवरी 2020) इन्तिकाल हो गया। NRC, CAA और NPR ने सबसे छोटी को भी कफ़न पहना दिया है। इस बच्ची के घरवालों को अल्लाह सब्र दे और मोदी, शाह को हिदायत दे कि वह हमारे प्रदर्शन करने वाले लोगों को हलके में ना लें, बुजुर्गों के बाद बच्चे भी शहीद हो रहे हैं, इस बच्ची के घरवालों की कुर्बानी याद रहेगी, इन्किलाब आएगा। अल्लाह इस नन्ही को जन्नत नसीब करें और माँ को सब्र अता करें।”

इस पोस्ट के कमेंट में भी उसकी मौत और कुर्बानी की चर्चा करते हुए उसके लिए दुआ की गई। लेकिन, क्या यह एक आम मौत है या सिर्फ अपने झूठे एजेंडे के लिए एक नन्ही बच्ची के जान से खिलवाड़ करते हुए उसे मौत की आगोश में पहुँचाकर, उसे कुर्बानी का नाम देकर खुद को सही साबित करने की कोशिश हो रही है?

इस आंदोलन का एक चेहरा सदफ जफ़र जो कुछ दिन पहले लखनऊ में विरोध-प्रदर्शन के नाम पर प्रदर्शनकारियों को भड़काने और अशांति फ़ैलाने के कारण जेल भी गई थी, ने लिखा, ये मौत किसके नाम लिखी जाएगी, एक नन्ही जान जामिया पर अपनी माँ के साथ सर्दी में आ रही थी, बीमार होकर जान गँवा बैठी। दिल पर हाथ रखकर फैसला कीजिएगा।”

एक और फेसबुक पोस्ट में नदीम खान ने लिखा, “आज मन दुखी है, जामिया प्रोटेस्ट में बाटला हाउस की एक छोटी सी बच्ची अपनी माँ के साथ प्रोटेस्ट में आती थी, ठण्ड लगने से बच्ची की तबियत ख़राब हुई और बच्ची की डेथ हो गई। पता नहीं कितना खून चाहिए वफ़ादारी साबित करने के लिए।”

कहा ये भी जा रहा है कि ये बाटला हाउस की वही बच्ची है जिसका शाहीन बाग़ प्रोटेस्ट में इस्तेमाल हुआ और अब मौत के बाद उसे जामिया का बता कर इस मौत की जिम्मेदारी से बचने की कोशिश हो रही है। कई और भी फेसबुक पोस्ट में उस बच्ची को जामिया का बताया गया और उसके मौत की पुष्टि भी की गई लेकिन कमेंट में ये बात आने के बाद कि इससे प्रोटेस्ट को नुकसान होगा कहकर कई पोस्ट डिलीट कर दिए गए लेकिन कुछ अभी भी मौजूद है। उसकी मौत को लेकर कुछ ट्वीट्स भी किए गए थे लेकिन कुछ ही देर बाद सारे ट्वीट्स गायब हो गए।

क्या किसी साज़िश के तहत शाहीन बाग़ उपद्रव व उससे जुड़े लोगों ने फ़ैसला लिया है कि इस मुद्दे को दबाना है? इस मामले में अब तक कोई मीडिया रिपोर्टिंग नहीं हुई है। इसे सोशल मीडिया पर भी छिपाया जा रहा है। एक नहीं बच्ची का इस्तेमाल अपना प्रोपेगंडा चलाने के लिए किया गया और अब जब उसकी मौत हो गई है तो इसे छिपाया जा रहा है, ख़बर को दबाया जा रहा है। बात कल की है और आज जब हमारे रिपोर्टर ने शाहीन बाग़ में गुपचुप तरीके से पड़ताल करने की कोशिश की तो वहाँ के कई प्रोटेस्टरों ने इसकी पुष्टि की लेकिन वही बात दोहराई की हाँ एक बच्ची जो जामिया प्रोटेस्ट में आती थी जो अब दो महीने की हो गई थी उसकी ठण्ड लगने से मौत हो गई।

शायद ये सूचना कुछ बड़े मीडिया संस्थानों व उनके पत्रकारों को भी हो जो प्रोटेस्ट के हर एजेंडे की बखूबी खबर रख रहे हैं और उन्हें उनके झूठ के साथ ही बढ़ावा दे रहे हैं। लेकिन कोई भी इसे चलाने की कोशिश नहीं कर रहा है जिसकी एक बड़ी वजह ये है कि ऐसे तमाम बड़े मीडिया हाउस जो प्रोटेस्ट के इस झूठे नैरेटिव को हवा दे रहे हैं। जिन्होंने अपने चैनलों के माध्यम से उस नहीं सी मासूम जान को प्रोटेस्ट का चेहरा बनाया, जिन लोगों ने उस माँ से यह बयान दिलवाया कि अगर आज मैं इस विरोध में शामिल नहीं होऊँगी तो ये 20 दिन की बच्ची बड़ी होकर मुझसे सवाल करेगी और मैं इसके भविष्य के लिए यहाँ कड़ाके की ठंडी में भी रात-रात भर मौजूद हूँ। जब वह बच्ची करीब दो महीनों की हुई और माँ की बेवकूफी और वामपंथी-मुस्लिम एजेंडे की भेंट चढ़ गई तो वही मीडिया गिरोह उस पर पर्दा डाल रहे हैं अपनी गर्दन बचाने को।


इस ख़बर की पुष्टि के लिए ऑपइंडिया के रिपोर्टर शाहीन बाग़ भी पहुँचे। वहाँ लोगों से बातचीत करने के बाद पता चला कि बच्ची की मौत की बात सत्य है। कुछ लोगों ने बताया उसके लिए शाहीन बाग़ और जामिया नगर में चल रहे प्रदर्शन स्थलों पर दुआ भी पढ़ी गई। शाहीन बाग़ के एक अन्य प्रदर्शनकारी ने मृत बच्ची के सम्बन्ध में पूछे गए सवाल के जवाब में कहा- “हमने थोड़ी मारा?वो अल्लाह की बच्ची थी, अल्लाह ने उसे बुला लिया।” कितनी आसानी से एक इंसानी ग़लती को उपरवाले के सिर मढ़ दिया गया और कोई मीडिया आउटरेज भी नहीं। उस बच्ची ने क्या अपनी सहमति दी थी कि मुझे सीएए के विरोध में प्रदर्शन करने ले चलो?

शाहीन बाग़ में उपस्थित एक और प्रदर्शनकारी अम्मा से भी जब इसकी पुष्टि करनी चाही तो उन्होंने कहा, “यहाँ तो बड़ों को गोली मारी जा रही है। वो तो बच्ची थी, क़ुर्बान हो गई।” 20 दिन की नहीं बच्ची जो इस कथित आंदोलन का सबसे नन्हा चेहरा थी जब उसकी अम्मी उसे गोद में लेकर धरने पर बैठी थी। सोचिए कि भीषण ठण्ड के दिन में इसका बच्ची के स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ा होगा, जो अपनी राय तक जाहिर नहीं कर सकती थी और न ही उसे पता है कि आखिर उसके साथ हो क्या रहा है। आज जब वह दो महीने की हो चुकी थी तो उसने इस पूरे प्रपंच को अलविदा कह दिया।

अब सवाल उठता है कि बच्ची की मौत का जिम्मेदार कौन है? क्या वो अम्मी, जिसने नहीं बच्ची का इस्तेमाल अपना प्रोपेगंडा चलाने के लिए किया? या वो सभी लोग इस मौत के जिम्मेदार हैं, जिन्होंने मीडिया अटेंशन पाने के लिए उसका इस्तेमाल किया। भाजपा व मोदी के अंध विरोध में एक नहीं सी जान का इस्तेमाल करने वालों से मीडिया सवाल नहीं पूछ रही, लिबरल गिरोह चुप है। सोचिए, ऐसे कितने ही नन्हे व छोटे बच्चों का वहाँ जमावड़ा लगा दिया गया है।

बच्चों के हितों की रक्षा करने वाली सरकारी एजेंसी एनसीपीसीआर ने भी विरोध प्रदर्शनों में बच्चों के इस्तेमाल पर चिंता जताई थी और कहा था कि इन बच्चों की काउंसलिंग की जाएगी। वहाँ बच्चों से भड़काऊ नारे लगवाए जा रहे थे और उनसे बयान दिलवाए जा रहे थे। नीचे संलग्न किए गए इस ट्वीट में शाद अब्दुल्लाह नामक व्यक्ति दावा कर रहा है कि जिस बच्ची की मौत हुई, उसे कैंडल जला कर श्रद्धांजलि दी गई है:

जेएनयू में प्रदर्शनकारियों ने दिव्यांगों को आगे कर दिया। जम्मू कश्मीर पर भारत के विरोधी पक्ष को सही साबित करने के लिए यही गिरोह गे कम्युनिटी के लोगों को आगे कर देता है। मोदी सरकार के ख़िलाफ़ अपनी बात को सही साबित करने के लिए दलितों का इस्तेमाल किया जाता है। सीएए के विरोध के लिए महिलाओं को भड़काया जाता है। झारखण्ड में चुनाव आता है तो आदिवासियों में भ्रम फैलाया जाता है। अब छोटे बच्चे-बच्चियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। ये मौत नहीं है, हत्या है। इसके जिम्मेदार वो लोग हैं, जो अपने उस बच्ची को लेकर वहाँ गए। उनमें बच्ची की अम्मी भी शामिल है। और सभी प्रदर्शनकारी मुस्लिम और वामपंथी एजेंडा बाज भी, तो क्या उन्हें सजा नहीं मिलनी चाहिए, उनसे सवाल नहीं होना चाहिए। आखिर अपने झूठ के लिए और कितनों को ये कुर्बान करेंगे?

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रवि अग्रहरि
अपने बारे में का बताएँ गुरु, बस बनारसी हूँ, इसी में महादेव की कृपा है! बाकी राजनीति, कला, इतिहास, संस्कृति, फ़िल्म, मनोविज्ञान से लेकर ज्ञान-विज्ञान की किसी भी नामचीन परम्परा का विशेषज्ञ नहीं हूँ!

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