Wednesday, June 29, 2022
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शशि थरूर ने एक ट्वीट से करोड़ों हिन्दू श्रद्धालुओं को ‘नंगा’ और ‘पापी’ कहा, लेकिन नंगा हुआ कौन?

कॉन्ग्रेस, राहुल गाँधी के जनेऊ पहनने और डिस्कवरी ऑफ़ गोत्र करने से पहले, हिन्दुओं को 'काशी का अस्सी' की भाषा में वहाँ रखा करती थी जो लिखा नहीं जा सकता। इसलिए कभी नदियों को साफ नहीं किया गया क्योंकि न तो नदियाँ वोट देती हैं, न ही नदी में नहाने वाले इनको वोट देते हैं।

शशि थरूर एक अच्छे वक्ता, बेहतर लेखक, बढ़िया डिप्लोमैट और हमारे दौर के खूबसूरत विचारक हुआ करते थे। फिर इनको एक दिन कुत्ते ने काटा और कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए। उसके बाद से पारिवारिक उद्यम और उसके कूड़ेदानों को सँभालने में इनकी अंतड़ियाँ निकल गईं और स्थिति यह है कि पढ़ा-लिखा आदमी गंगास्नान को ‘हमाम में नंगे’ होने से तौल रहा है।

एक ट्वीट आया है। बड़े आदमी हैं तो ट्वीट कर देते हैं, और फिर नीचे जो सवाल आते हैं उसका जवाब नहीं देते। ट्वीट में इन्होंने बड़ी ही संजीदगी से लिखा है, “गंगा भी स्वच्छ रखनी है और पाप भी यहीं धोने हैं। इस संगम में सब नंगे हैं! जय गंगा मैया की!”

‘जय गंगा मैया’ तो बोलना ज़रूरी है ही क्योंकि सुनंदा पुष्कर की आत्मा की शांति के लिए शशि ब्रो हरिद्वार के गंगा तट पर ही गए थे। संतों के स्नान से तो शरीर का मैल ही शायद गंगा माँ में मिले, लेकिन आपके मन का मैल, सुनंदा पुष्कर की अस्थियों और राख के साथ जो गंगा में मिला, उससे गंगा कितनी मैली हुई, ये कभी सोचा है?

जब शशि थरूर अपनी तृतीय पत्नी सुनंदा पुष्कर की राख हरिद्वार में प्रवाहित करने गए थे

धूर्त आदमी कम शब्दों में बहुत कुछ कह देता है। शब्दों की समझ हो तो आप दो तरह की बात, कन्विन्सिंग तरीके से रख सकते हैं। यहाँ शशि थरूर ने ‘नमामि गंगे योजना’, ‘कुम्भ मेला’, ‘हिन्दुओं की नदी को लेकर आस्था’, ‘संतों समाज को पापी’ कहते हुए, सिर्फ़ एक ट्वीट में सब लपेटकर सरकार की नीतियों और हिन्दुओं के तमाम प्रतीकों पर बहुत कम शब्दों में हमला किया है।

हो न हो, कल तक इनका यह ट्वीट भी आ जाए कि ‘मेरा वो मतलब नहीं था’, क्योंकि इनके एक्सिडेंटल हिन्दू के परनाती मालिक साल भर में जनेऊ पहनने से लेकर अवतार पुरुष बनकर पोस्टरों पर अवतरित हो रहे हैं। राष्ट्रीय किसान की धर्मपत्नी और कॉन्ग्रेस की अंतिम आस, प्रियंका भी ‘गंगा की बेटी’ बनकर कुम्भ में चार फ़रवरी को आ ही रही हैं। देखना यह है कि शब्दों से लैस थरूर जी ये न ट्वीट कर दें – ‘नंगे संतों के पाप से गंदी गंगा को गंगापुत्री प्रियंका ने छूकर किया निर्मल’।

गंगा की बेटी बनकर थरूर के पार्टी की प्रियंका गाँधी कुम्भ नहाने (यानी पाप धोने) आ सकती हैं

शशि थरूर जी, आपका जो भी मतलब है, वो जनता तय कर देगी। जनता तो नेहरू की ‘कुम्भ में डुबकी’ का सच भी निकाल चुकी है, और आपके अस्थि विसर्जन की तस्वीर भी। बाक़ी का काम सुब्रह्मण्यम स्वामी कर ही रहे हैं, इसलिए पाप और पुण्य की बातें आप तो मत ही कीजिए। 

ट्वीट पर ग़ौर किया जाए तो आप देखेंगे कि एक कॉन्ग्रेसी अनजाने में ही ‘नमामि गंगे’ की सफलता को स्वीकार रहा है। लेकिन ये स्वीकार्यता ऐसे ही नहीं आई है, क्योंकि सामने का पानी निर्मल है, और वो दिख रहा है। इस निर्मल पानी के पीछे साढ़े चार साल की वो मेहनत है, जो सीधे तौर पर कभी दिखी नहीं। पानी को गंदा करने वाले स्रोतों (गंदे, बड़े नाले) को रोकने, उसके कचरे को ट्रीटमेंट प्लांट में ट्रीट करने, रीसायकल्ड और रीचार्ज्ड पानी को गंगा में बहाने तक की प्रक्रिया में काफ़ी समय लगा। 

समय लगा, पर उसका फल सीधा दिख रहा है। जब फल दिख रहा हो, तो ‘मुझे माँ गंगा ने बुलाया है’ वाले मीम बनाने से लेकर ‘राम तेरी गंगा मैली’ का रट लगानेवालों के पास इसपर अटैक करने के लिए कुछ बचा ही नहीं है। अब वो यह नहीं कह सकते कि संतों को गंदगी में नहाना पड़ा रहा है, क्योंकि वो कॉन्ग्रेस के दौर में हुआ करता था।

वो इसलिए हुआ करता था क्योंकि कॉन्ग्रेस, राहुल गाँधी के जनेऊ पहनने और डिस्कवरी ऑफ़ गोत्र करने से पहले, हिन्दुओं को ‘काशी का अस्सी’ की भाषा में वहाँ रखा करती थी जो लिखा नहीं जा सकता। इसलिए कभी नदियों को साफ नहीं किया गया क्योंकि न तो नदियाँ वोट देती हैं, न ही नदी में नहाने वाले इनको वोट देते हैं। कम से कम, गंगा की उपेक्षा से तो यही लगता है कि इन्होंने तय तरीके से यमुना की तरह गंगा को भी मृतप्राय बनाने की पूरी कोशिश की थी। 

इसलिए थरूर साहब ने नैरेटिव बदल दिया है। ये मान लिया है कि गंगा साफ़ हो रही है, और वो नहाने से गंदी हो जाएगी। थरूर ब्रो, ऐसा है कि ‘जा की रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखहिं तिन तैसी’। ये दोहा लैटिन में है, और आपको ज़रूर समझ में आएगा। इसका अंग्रेज़ी इक्वीवेलेंट लाने की कोशिश करें तो एक सकारात्मक कहावत याद आती है कि ‘ब्यूटी लाइज़ इन द आईज़ ऑफ़ बिहोल्डर’। आप तो पढ़े-लिखे आदमी है, इसका नकारात्मक भाव तो मन में समझ ही जाएँगे! 

गंगा पापनाशिनी ज़रूर है, लेकिन ऐसा भी नहीं कि संतों के उतरने से वो गंदी हो जाती है। संत पापी नहीं होते, आप और हम (मैं आप से थोड़ा कम) पापी हैं। जो पापी हैं, चाहे बाबा हों या नेता, वो भुगत रहे हैं, आप भी भुगतेंगे। दूसरी बात, गंगा पापों को हरती है, वो गंदी नहीं होती। कॉन्सेप्ट आपके थोड़े हिले हुए हैं, उसको पेंचकश से ठीक करा लीजिए। गंगा में पाप धोने से हम साफ़ होते हैं, गंगा गंदी नहीं होती।

आगे आपने कुम्भ और संगम को निशाना बनाते हुए लिखा है कि ‘इस संगम में सब नंगे हैं’। क्यूट टाइप की स्माइल वाली प्रोफाइल पिक लगाकर ऊर्दू के मुहावरे में हिन्दू प्रतीक घुसा देने से आपका ज्ञान नहीं, आपकी धूर्तता सामने आती है। संगम में सब नंगे नहीं हैं, संगम साफ़ है, और वहाँ गंगा निर्बाध, अविरल रूप से बह रही है। वो हम्माम नहीं है जहाँ आप राहुल के शरीर का मैल अपने ऊपर लिए मुस्कुरा रहे हैं कि ‘राहुल जी, थोड़ा और छुड़ा कर इधर फेंकिए ना!‘ 

संगम में जाना सौभाग्य है। संगम का तो स्मरण करने भर से व्यक्ति के पाप धुल जाते हैं। लेकिन आपको वो सुविधा नहीं मिलेगी क्योंकि पाप धुलवाने की भी पात्रता होती है। काशी में आने भर से मोक्ष प्राप्त हो जाता है, लेकिन सबको नहीं, उसी को जो उस लायक है। इसलिए, आप लम्बी डींगे मार लीजिए, आपको स्वामी जी समेट लेंगे, और न्यायिक व्यवस्था समेट लेगी। अगर व्यवस्था को आपने मैनेज कर लिया, तो भी हरिद्वार की गंगा आपके पापों का बदला ज़रूर लेगी। 

जब गंगा साफ़ दिख रही है तो हिन्दुओं की आस्था पर आक्रमण किया जा रहा है। अब संत में पाप दिख रहा है। संत जिस धर्म के प्रतीक हैं, उसे ‘नंगा’ कहा जा रहा है। क्योंकि यही धर्म है जहाँ यह कहने और सुनने की गुंजाइश है। वरना मज़हब तो ऐसे भी हैं जो झंडे पर नाम लिखकर, अपनी बातों के अलग कुछ भी कहने, लिखने या बनाने पर तलवार, बम और बंदूक लेकर उतर जाते हैं।

शशि जी ख़ैर मनाइए कि आपने संगम जैसे तीर्थ और हिन्दू धर्म जैसे धर्म के संतों का अपमान किया है। यहाँ यह सब कहने की भी छूट है, ये बात अलग है कि वो हिसाब आपसे ऊपर लिया जाएगा, न कि एके सैंतालीस लेकर यहीं ले लिया जाए, जैसा कि कुछ रिलिजन में प्रैस्क्राइब्ड है! 

अपना इतिहास खँगालिए, अपनी पार्टी का इतिहास खँगालिए। अपने नेताओं के नंगे देह देखिए जब वो गंगा में उतर रहे हों। जब नेता यह सब करते हैं, तब आप पाप की बात करें तो चलता भी है क्योंकि वो आपकी प्रजाति के हैं, तो शायद आप उन्हें बेहतर जानते होंगे। 

पिता की राख प्रवाहित करने के बाद जवाहरलाल नेहरू गंगा से बाहर आते हुए

लेकिन, संतों को, और उनके नाम पर करोड़ों श्रद्धालुओं को आपने ‘नंगा’ और ‘पापी’ कहा है। शब्द की समझ तो आपको है ही, इसलिए आप जान-बूझकर, सोच-समझकर ट्वीट करते होंगे कि कम कहकर कैसे माखौल किया जाए। आपने बहुत कुछ कहने की कोशिश की है जो कि आपकी बेकार मानसिकता, टार से भरे दिमाग और कुत्सित सोच का परिचायक है। 

यही ‘नंगे’ और ‘पापी’ लोग आपकी पार्टी को, आपकी निजी ज़िंदगी को और आपको डिफ़ेंड करनेवालों को जवाब देंगे। ट्विटर पर अंग्रेज़ी लिखकर आप ज्ञान नहीं दे रहे, आप बस दूसरों को नंगा कहते हुए अपना ही नाड़ा कटवा रहे हैं। बाक़ी, ‘गंगा मैया की जय’ कहने से भी आपके पाप तो नहीं धुलनेवाले। 

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अजीत भारती
अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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