Thursday, May 30, 2024
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कश्मीरी पंडितों के नरसंहार की 25 घटना: इस्लामी आतंकियों की बर्बरता, वे क्रूर किस्से जो हर हिंदू को पढ़नी चाहिए

कश्मीरी पंडितों की चुप्पी टूटी तो किसी ने बताया कि कैसे उनके पिता के 15 टुकड़े करके झेलम नदी में फेंक दिया गया तो किसी ने बताया है कि कैसे उनके पिता को कंटीली तार से बाँधकर लटका दिया गया। कुछ महिलाएँ भी सामने आईं जिन्होंने पंडित महिलाओं के साथ हुई अश्लीलता पर खुलकर बताया।

हर कश्मीरी पंडित परिवार पर हुए अत्याचारों पर अगर फिल्म बनाने चलें तो 7 लाख फिल्म बन जाएँगी… 7 लाख। हर घर की 1-1 कहानी है। ये कहानियाँ सुनाते-सुनाते उम्र निकल गई हमारी पर हमारी आवाज किसी ने नहीं सुनी।

पिछले दिनों द कश्मीर फाइल्स के रिलीज होने के बाद एक कश्मीरी पंडित महिला ने आजतक के कार्यक्रम में फिल्म निर्देशक विवेक अग्निहोत्री के सामने सिसकते-सिसकते अपनी ये बात कही थी। इस महिला की तरह लाखों कश्मीरी पंडितों ने भी फिल्म को देख अपने दुख मीडिया, सोशल मीडिया में साझा किए थे जिनके बाद ऐसी तमाम कहानियों का अंबार लग गया जो 32 साल से मौन थीं। इनमें कुछ के बारे में आपने पहले सुना होगा और कुछ पर से कश्मीरी पंडितों ने हाल में चुप्पी तोड़ी है। किसी ने बताया है कि कैसे उनके पिता के 15 टुकड़े करके झेलम नदी में फेंक दिया गया तो किसी ने बताया है कि कैसे उनके पिता को कंटीली तार से बाँधकर लटका दिया गया। कुछ महिलाएँ भी सामने आई हैं जिन्होंने पंडित महिलाओं के साथ हुई अश्लीलता पर खुलकर बताया है। आइए उन नई-पुरानी मिलाकर कुल 25 घटनाओं के बारे में एक बार फिर जाएँ

आज हम आपको उन्हीं में नृशंस कहानियों में 25 घटनाएँ संक्षेप में बताने जा रहे हैं जहाँ 75 से ज्यादा लोगों ने अपनी जान गवाई। ये कट्टरपंथी घटनाएँ 32 साल पहले घाटी में घटना शुरू हुईं थीं और 700 से ज्यादा पंडित अब तक शिकार हो चुके हैं।

पहली कहानी टीका लाल टपलू की है। टीका लाल टपलू घाटी में कश्मीरी पंडितों के सबसे चहेते नेता थे। आतंकियों ने उन्हें उस समय मौत के घाट उतारा था जब वह एक बच्ची को चुप कराने घर से निकले। 14 सितंबर 1989 को टीका लाल टपलू को आतंकियों ने घर के बाहर गोलियों से भूना था। इस हमले में उनका परिवार बच गया था क्योंकि घटना से 1 हफ्ता पहले दिल्ली आ गया था।

दूसरी कहानी नीलकंठ गंजू की है। 4 नवंबर 1989 को जस्टिस नीलकंठ गंजू को दिनदहाड़े हाईकोर्ट के सामने मारा गया था। उनका गुनाह इतना था कि उन्होंने आतंकी मकबूल भट्ट को एक हत्या के बदले सजा ए मौत दी थी। इसी का बदला लेने के लिए जस्टिस नीलकंठ को मौत के घाट उतारा गया।

गिरिजा टिकू वो अगला नाम हैं जिन्हें आतंकियों ने अपना निशाना बनाया था। वह एक स्कूल में नौकरी करती थीं और डर से जम्मू रहती थीं। एक दिन उन्हें पता चला कि स्थिति सामान्य हो गई है तो वह वापस अपनी सैलरी लेने बांदीपोरा गईं। लेकिन आतंकियों ने वहाँ उन्हें पकड़ा। उनका रेप किया और फिर उन्हें जिंदा ही उनके शरीर को आरी से दो हिस्सों में चीर दिया।

22 मार्च 1990 को अनंतनाग जिले के दुकानदार पी एन कौल के साथ ऐसी ही बर्बरता को अंजाम दिया गया। बताया जाता है कि पीएन कौल की चमड़ी जीवित अवस्था में शरीर से उतार दी गई थी और उन्हें मरने को छोड़ दिया गया था। तीन दिन जाकर उनकी लाश मिली थी।

7 मई 1990 को प्रोफेसर एल गंजू को पत्नी समेत आतंकियों ने मौत के घाट उतारा। मगर उससे पहले उनकी पत्नी से सामूहिक बलात्कार भी किया। 

बीके गंजू जो कि एक टेलीकॉम इंजीनियर थे और आतंकियों से बचने के लिए चावल के डिब्बे में घुसे थे। आतंकियों ने उन्हें पूरे घर में ढूँढा लेकिन वो कहीं नहीं मिले। बाद में जब आतंकी जाने लगे तभी बीच में कुछ पड़ोसियों ने चावल के डिब्बे की ओर इशारा कर दिया और आतंकियों ने उसी डिब्बे में उन्हें गोलियों से भून डाला। बाद में उनके खून से सना चावल उनकी पत्नी को खिलाया गया जिसका दृश्य कश्मीर फाइल्स में दिखाया गया है।

अगली कहानी कृष्ण राजदान की है। कृष्ण को 12 फरवरी 1990 को बस में जाते हुए गोली मारी गई थी। इसके बाद उनका शरीर बस से निकाल कर बाहर किया गया था और लोगों से कहा गया था कि उन्हें लातों से मारें। पूरे शरीर को घसीट कर दिखाया गया था कि वे हिंदुओं का क्या हाल करने वाले हैं। 

24 फरवरी को अशोक कुमार के घुटनों में गोली मारी गई। फिर उनके बाल उखाड़े गए, उन पर थूका गया और फिर पेशाब किया गया। 

नवीन सप्रू को भी घाटी में इसी तरह मारा गया और उनके तो मुख्य अंग में गोली मारकर उनके शरीर को जलाया गया था।

30 अप्रैल को कश्मीरी कवि सर्वानंद कौल को उनके बेटे वीरेंद्र कौल के साथ भी निर्ममता की हर हद पार कर दी गई। पहले विश्वास दिलाकर कट्टरपंथी उन्हें और उनके बेटे को अपने साथ ले गए। फिर दो दिन बाद जाकर उनकी लाश मिली। माथे पर की चमड़ी उधेड़ दी जा चुकी थी। सिगरेट से शरीर जला दिया गया था। हड्डियाँ टूटी हुई थी। आँखें निकाल ली गई थीं। इसके बाद उन्हें मारने के लिए गोली भी दागी गई थी।

उन्हीं की तरह अशोक सूरी के भाई को भी पहले आतंकियों ने सिगरेट जलाकर खूब टॉर्चर किया था और बाद में कहा कि वो तो अशोक सूरी को मारना चाहते हैं जब भाई ने अधमरी अवस्था में अपने भाई को कश्मीर छोड़ने को कहा तो उन्होंने बात नहीं मानी। नतीजन आधीर रात आतंकी घर आए और धारधार हथियार से उनकी गर्दन काटकर चले गए।

26 जून 1990 को बीएल राना उस समय मौत के घाट उतारे गए जब वो अपने परिवार को लेने जा रहे थे। उनसे पहले 3 जून को आतंकियों ने उनके पिता दामोदर को मार डाला था।

मुजू और दो अन्य कश्मीरी पंडितों के साथ तो ऐसी निर्ममता हुई कि उन्हें पहले खून देने के बहाने उठाया गया और फिर उनके शरीर का सारा खून निकालकर उन्हें तड़प कर मरने को छोड़ दिया गया।

सोपोर के चुन्नी लाल शल्ला का भी खून बहाकर उन्हें मारा गया था। आतंकी पहले उनकी दाढ़ी देख उन्हें पहचान न सके। लेकिन तभी इंस्पेक्टर शल्ला के एक साथी सिपाही ने ही आतंकियों को बुलाया और उनके गाल की चमड़ी उतरवा उतरवा कर उन्हें तड़प कर मरने को छोड़ दिया।

28 अप्रैल 1990 को भूषण लाल रैना मारे गए। भूषण लाल अपनी माँ के साथ घाटी छोड़ने वाले थे। देर रात दोनों सामान बांध रहे थे कि तभी आतंकी आए और उनके सिर में नुकीली चीज घुसाकर उन्हें घर से बाहर खींच लिया। बाद में उन्हें नंगा करके शरीर में कील ठोंकी और जब तक दम नहीं थोड़ा तब तक तड़पाते रहे।

इसके बाद 1998 को 23 कश्मीरी हिंदू मारे गए। वो उस प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे जो घाटी में हिंदुओं की वापसी की संभावना देखने वहाँ गए थे। इन सबकों एक आदेश पर रायफलों से मौत के घाट उतारा गया फिर इनके मंदिर तोड़े गए, घर में आग लगा दी गई।

कश्मीरी पंडितों को मारने के क्रम में एक अमित नाम का नौजवान भी मारा गया था। उन्हें मारने का आतंकियों का प्लॉन नहीं था। उन्हें तो एक ऐसे शख्स को मारना था जो आतंकी बिट्टा कराटे को बचपन में पढ़ाई के पैसे देता। उन्हीं के धोखे में 26 साल का नौजवान बीच सड़क पर मार डाला गया था।

इसी प्रकार कश्मीरी पंडितों पर हुए जुल्म की एक कहानी कश्मीरी महिला ने हाल में ‘ह्यूमन्स ऑफ बॉम्बे’  में शेयर की थी। उन्होंने बताया था कि कैसे उनके घर के सामने भैरव मंदिर ध्वस्त कर दिया गया था और एक युवा बैंक कर्मचारी को सैंकड़ों लोगों के सामने मार दिया गया था। भीड़ ने अंतिम सांस लेने तक उस शरीर को मारा था और उस पर पेशाब भी किया था।

इसी प्रकार पीड़िता मंजू को जहाँ कट्टरपंथियों ने दीवार से सटाकर पूरे शरीर पर हाथ फेरा था। वहीं मधुसूदन कौल थीं जिनकी एक हाथ की उंगली ही आतंकियों  की गोली से चली गई थी।

एक पीड़ित ने बताया था कि कैसे उनके पिता को मारकर उनके शरीर को ईंट के साथ बाँधकर नदी में फेंक दिया गया था।

अनुराधा नाम की महिला ने अपनी पीड़ा बयां करते हुए कहा था कि कभी किसी ने अपने पिता को नंगा नहीं देखा होगा लेकिन उन्होंने देखा था। उनके पिता के शरीर में इतनी गोलियाँ दागीं गई थीं कि शरीर ढंग से पोस्टमार्टम के बाद सिला भी नहीं गया।

इसी तरह रवींद्र पंडित ने हाल में बताया कि कैसे उनके पिता सरकारी नौकरी के कारण कश्मीर रहते थे और आतंकियों ने उन्हें उनके ही बाग में लेजाकर मारा था। पाकिस्तान जिंदाबाद न कहने पर उनके शरीर में कील ठोंकी गई थीं उन्हें कंटीली तार से फंदा बनाकर लटकाया था।

द कश्मीर फाइल्स फिल्म बनने के क्रम में जो रिसर्च हुई उस बीच एक महिला ने पल्लवी जोशी बताया था कि कैसे उनके पिता को मार कर 15 टुकड़ों में काटा गया और फिर झेलम नदी में बहा दिया गया।

अगली कहानी सतीश कुमार टिकू की है। टिकू को भी कश्मीरी पंडित होने के कारण मारा गया था। बिट्टा कराटे ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वो सतीश पंडित था और आरएसएस से जुड़ा था इसलिए उसे मारा था। कराटे वही आतंकी है जिसने 20 कश्मीरी हिंदुओं को मौत के घाट उतारा था।

साल 2003 में दक्षिण कश्मीर के पुलवामा क्षेत्र के नदीमार्ग गाँव में 24 कश्मीरी पंडितों को  लाइन से मौत के घाट उतारा गया था। ये वो लोग थे जिन्होंने 90 के दशक में अपना घर छोड़ने से मना कर दिया था। मरने वालों में 70 साल की बुजुर्ग महिला और 2 साल का मासूम बच्चा भी था।

कश्मीर में अब नहीं खत्म है पूरी तरह कट्टरपंथ

गौरतलब है कि 90 के दशक से कश्मीरी पंडितों पर शुरू हुआ अत्याचार आज तक थमा नहीं है। कुछ समय पहले कश्मीर के एक स्कून में चुन चुनकर गैर मुस्लिम शिक्षक मौत के घाट उतारे गए थे। वहीं माखनलाल बिंदरू की भी गोली मार कर पिछले साल हत्या की गई थी। उससे पहले अनंतनाग में जिले के सरपंच अजय पंडिता को मौत के घाट उतारा गया था। कश्मीरी पंडित महिला ने रोते हुए सच ही कहा था कि अगर फिल्म बनाने लगे तो 7 लाख से ज्यादा फिल्म बन जाएँगी। कश्मीर में रहने वाले हर हिंदू के अपने अपने संघर्ष है। उन्होंने कितनी निर्ममता से अपनों को खोया उसकी कहानी है और कैसे घर, काम, जमीन, जायदाद छोड़ना पड़ा उसका दर्द है।

आज भले ही घाटी से अनुच्छेद 370 हटा दिया गया है लेकिन सच ये है कि अभी भी कट्टरपंथियों ने कश्मीर का दर नहीं छोड़ा है। हाल में राजौरी के मौलवी ने एक मौलवी ने खुदा कसम खाकर हिंदुओं को मिटाने की बात कही थी और बाद में जब वीडियो वायरल हुई तो बयान जारी कर दिया कि कश्मीरी पंडित भाई है उनके।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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