Monday, May 16, 2022
Homeदेश-समाजनहीं कहा 'पाकिस्तान जिंदाबाद' तो कील से छेद दिया पूरा शरीर, पेड़ से टाँग...

नहीं कहा ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ तो कील से छेद दिया पूरा शरीर, पेड़ से टाँग दी लाश: रवींद्र पंडित ने बताया- इस्लामी आतंकियों ने उनके पिता को कैसे मारा

आतंकियों ने अपनी दहशत कायम रखने के लिए उस पेड़ के पास एक नोट भी छोड़ा जिसमें लिखा था कि अगर किसी ने इस शव को उतारा तो उसका वही हाल होगा जो जगन्नाथ पंडित का हुआ है। तीन दिन तक उनका शव पेड़ पर लटका रहा। बाद में पुलिस ने आकर उसे पेड़ से उतारा।

द कश्मीर फाइल्स रिलीज होने के बाद तमाम कश्मीरी पंडित सामने आकर अपने अनुभव बयां कर रहे हैं। इसी क्रम में एक रविंद्र पंडित भी हैं, जिन्होंने अपने पिता के साथ हुई बर्बरता को मीडिया से साझा किया। उन्होंने बताया कि कैसे इस्लामी आतंकियों ने उनके पिता को कील चुभा-चुभा कर मारा और बाद में उनके घर को स्थानीयों द्वारा समतल कर दिया गया।

दैनिक भास्कर को दिए साक्षात्कार में रविंद्र पंडित ने बताया कि 7 अक्टूबर 1990 को आतंकियों ने उनके पिता जगन्नाथ पंडित को भगत पोरा गाँव में तड़पा-तड़पा तर मारा था और उन्हीं के बगीचे में उनके शव को लटका दिया गया था। आतंकियों ने उनके साथ सारी बर्बरता सिर्फ इसलिए की थी क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान जिंदाबाद बोलने से इनकार कर दिया था और मरते दम तक वंदे मातरम बोल रहे थे।

रविंद्र पंडित उस समय युवावस्था में थे और घाटी में बिगड़े हालातों की वजह से अपने दादी व भाइयों के साथ जम्मू रहते थे। मगर, उनके पिता को सरकारी नौकरी के कारण कश्मीर ही रुकना पड़ा था। रविंद्र बताते हैं कि 7 अक्टूबर 1990 को उनके पापा और एक रिश्तेदार नौकरी से लौटकर घर पे खाना खा रहे थे कि तभी उनके नौकर ने जगन्नाथ से कहा कि उन्हें कोई बुला रहा है। इसके बाद वह बाहर गए जहाँ आतंकी उनका इंतेजार कर रहे थे।

कंटीली तार से लटकाया गया शव, शरीर में थे छेद ही छेद

आतंकी जगन्नाथ पंडित को घर से 500 मीटर दूर उनके ही बगीचे में ले गए। वहाँ उन्हें खूब टॉर्चर किया गया। रविंद्र कहते हैं कि आतंकी उनके पिता से पाकिस्तान जिंदाबाद कहलवाना चाहते थे लेकिन उनके पिता वंदे मातरम कहते रहे। आतंकियों ने इसके बाद उनके शरीर में कीलों से छेद करना शुरू किया। जब इस यातना के बाद भी वह चुप नहीं हुए तब आतंकी एक कंटीली तार लेकर आए और उससे उनका गला बाँधा गया। इसके बाद जगन्नाथ पंडित को उनके बगीचे में लगे पेड़ पर लटका दिया गया। ये वही पेड़ था जिससे सेब तोड़कर उनका परिवार खाया करता था।

आतंकियों ने अपनी दहशत कायम रखने के लिए उस पेड़ के पास एक नोट भी छोड़ा जिसमें लिखा था कि अगर किसी ने इस शव को उतारा तो उसका वही हाल होगा जो जगन्नाथ पंडित का हुआ है। तीन दिन तक उनका शव पेड़ पर लटका रहा। बाद में पुलिस ने आकर उसे पेड़ से उतारा। रविंद्र बताते हैं कि उस समय फोन या मोबाइल इतना नहीं चलता था इसलिए उन्हें घटना के बारे में 8 अक्टूबर को अखबार से पता चला।

उनके मुताबिक जब उनके पिता के शव को उतारा गया तो शरीर में छेद ही छेद थे, गले में कंटीली तार थी। वह कहते हैं कि उन्हें नहीं मालूम लोगों में उस समय आतंकियों का खौफ था या फिर कश्मीरी पंडितों से नफरत, लेकिन उनके पिता का दाह संस्कार भी स्थानीयों ने नहीं होने दिया था। बाद में कुपवाड़ा में उनका अंतिम संस्कार हुआ। वह बताते हैं कि उनके घर के आसपास मुस्लिम आबादी थी लेकिन कभी किसी ने उनसे ये नहीं कहा- ‘कश्मीर मत छोड़ो, हम साथ हैं तुम्हारे’।

‘हम हथियार उठाते तो एक और नरसंहार होता’

आज 32 साल बाद एक बार फिर अपने पिता के साथ हुई क्रूरता को याद करके रविंद्र कहते हैं कि अगर कश्मीरी पंडितों ने उस समय हथियार उठा लिए होते तो एक और नरसंहार होता। रविंद्र कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और पलायन पर बात करते हुए कहते हैं कि आँकड़ों को हटा दें तो उस समय 5 लाख लोगों ने पलायन किया था। लोग बड़ी-बड़ी कोठियाँ छोड़ छोड़कर कैंप में रहने को मजबूर हुए थे। जहाँ उन्हें पानी की दिक्कत झेलनी पड़ी। कुछ लोग कश्मीर से निकलकर 40-45 डिग्री की गर्मी नहीं झेल पाए तो कुछ को सांपों ने काट लिया। वह कैंपों में मरे कश्मीरी पंडितों की मौत के लिए भी इस्लामी आतंक को जिम्मेदार मानते हैं।

पिता के साथ हुई बर्बरता सोचकर दो साल डिप्रेशन में रहे रविंद्र पंडित

वह बताते हैं कि कुछ समय पहले वो अपने घर कश्मीर गए थे। लेकिन वहाँ उन्हें अपना घर नहीं दिखा। आसपास के लोगों ने उस जगह को समतल कर दिया है। वहीं वो बगीचा भी अब जंगल बन गया जहाँ से कभी वह सेब तोड़कर खाते थे। रविंद्र आज भी अपने पिता को याद करते हैं। तीन भाइयों में वही अपने पिता से ज्यादा अटैच थे। ऐसे में जब उन्हें अपने पिता के साथ हुई इस्लामी बर्बरता का पता चला तो वो दो साल डिप्रेशन में चले गए। आँसू न बहने के कारण डॉक्टर ने घरवालों से कहा था कि अगर वह रोए नहीं तो सदमे में जा सकते हैं। इसके बाद उनका पूरे दो वर्ष डिप्रेशन का इलाज चला। बाद में बड़े भाई ने पढ़ने महाराष्ट्र भेज दिया और रविंद्र वहाँ से इंजीनियर बनकर निकले। वर्तमान में वह गाजियाबाद में रहते हैं

  सहयोग करें  

एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

ऑपइंडिया स्टाफ़
ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

‘तहखाना नहीं मंदिर का मंडपम कहिए, भव्य है पन्ना पत्थर का शिवलिंग’: सर्वे पर भड़की महबूबा मुफ्ती, बोलीं- ‘इनको मस्जिद में ही मिलते हैं...

"आज ये मस्जिद, कल वो मस्जिद, मैं अपने मुस्लिम भाइयों से बोलती हूँ एक ही बार ये हमें मस्जिदों की लिस्ट बताएँ, जिस पर इनकी नजर है।"

नेपाल बिना तो हमारे राम भी अधूरे हैं: प्रधानमंत्री मोदी ने ‘बुद्ध की धरती’ पर समझाई भारत से दोस्ती की अहमियत, कहा- यही मानवता...

अपनी नेपाल यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किए मायादेवी मंदिर के दर्शन और भारत और नेपाल को एक दूसरे के बिना अधूरा बताया।

प्रचलित ख़बरें

- विज्ञापन -

हमसे जुड़ें

295,307FansLike
186,091FollowersFollow
416,000SubscribersSubscribe