मस्जिद अल्लाताला की होती है, शरीयत में मस्जिद हटा नहीं सकते कहीं से: मुसलमानों के निराश वकील

सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी के बयान से साफ़ है कि मुस्लिम पक्ष पुनर्विचार याचिका दायर करने के पक्ष में है और वो इस सम्बन्ध में क़दम बढ़ाएँगे। फिलहाल उन्होंने पूरा जजमेंट पढ़ने के बाद ही आगे का एक्शन लेने की बात कही है।

राम मंदिर मामले में सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 सदस्यीय पीठ ने बहुप्रतीक्षित फ़ैसला सुना दिया है। पूरी ज़मीन हिन्दुओं को दी गई है। मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या में ही कहीं और 5 एकड़ ज़मीन दी जाएगी। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पक्ष विवादित ज़मीन पर अपना दावा साबित नहीं कर सका। अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार एक ट्रस्ट बना कर 3 महीने के भीतर राम मंदिर निर्माण के लिए योजना तैयार करे। फ़ैसले से जहाँ पूरे देश में ख़ुशी की लहर है, मुस्लिम पक्षकारों ने निराशा जताई है।

सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने कहा है कि वो फ़ैसले का सम्मान तो करते हैं, लेकिन संतुष्ट नहीं हैं। बोर्ड के वकील ज़फ़रयाब जिलानी ने कहा कि आगे क्या क़दम उठाना है, इस सम्बन्ध में बोर्ड विचार करेगा। साथ ही उन्होंने कहीं भी फ़ैसले को लेकर किसी तरह का प्रदर्शन न करने की अपील की। उन्होंने पुनर्विचार याचिका दायर करने की बात करते हुए कहा कि समिति की बैठक के दौरान इस बारे में निर्णय लिया जाएगा। जिलानी ने कहा कि ये उनका अधिकार है और नियमानुकूल भी है। उन्होंने दावा किया कि जिन दस्तावेजों के आधार पर हिन्दुओं की आस्था और विश्वास की पुष्टि की गई, उसी दस्तावेज के आधार पर वहाँ मस्जिद होने की बात भी पता चलती है।

मुस्लिम पक्ष ने कहा कि उन्हें विवादित ज़मीन के बाहरी हिस्से को लेकर कोई शिकायत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इनर कोर्ट यार्ड में मुस्लिमों के स्वामित्व का 1857 के पहले का कोई साक्ष्य नहीं है। जिलानी ने दावा किया कि जिन भी सबूतों का जिक्र किया, वो सभी वहाँ मस्जिद की पुष्टि करती हैं। जिलानी ने कहा कि अगर वहाँ मस्जिद है तो नमाज होती ही होगी। जिलानी ने कहा कि उनकी समझ में ये इन्साफ नहीं है। उन्होंने कहा कि मस्जिद की जगह कुछ नहीं हो सकता है। 5 एकड़ दिए जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि इसमें ज़मीन के क्षेत्रफल की कोई बात ही नहीं है।

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सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी ने शरीयत क़ानून का जिक्र करते हुए कहा कि मस्जिद किसी को नहीं दिया जा सकता है। जिलानी ने दावा किया कि हिन्दू पक्ष की दलील यह थी कि विक्रमादित्य के जमाने का मंदिर तोड़ा गया, जो इसे ईसापूर्व के आसपास वाले समय में ले जाता है। जिलानी ने कहा कि मस्जिद की कोई क़ीमत नहीं होती और मस्जिद की मिलकियत अल्लाहताला के पास होती है। उन्होंने कहा कि इसे न तो बेचा जा सकता है और न ही अदला-बदली की जा सकती है, इसके लिए 5 करोड़ या 500 करोड़ रुपए ही क्यों न मिले।

ज़फ़रयाब जिलानी के बयान से साफ़ है कि मुस्लिम पक्ष पुनर्विचार याचिका दायर करने के पक्ष में है और वो इस सम्बन्ध में क़दम बढ़ाएँगे। फिलहाल उन्होंने पूरा जजमेंट पढ़ने के बाद ही आगे का एक्शन लेने की बात कही है। उनके बयान से साफ़ है कि वो फ़ैसले से निराश हैं।

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