Wednesday, July 28, 2021
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J&K: सुप्रीम कोर्ट ने कहा मानवाधिकार जरूरी लेकिन सुरक्षा को दरकिनार नहीं कर सकते, रिव्यू का निर्देश

जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 निष्क्रिय होने के बाद सुरक्षा लिहाज से इंटरनेट पर लगाए गए प्रतिबंध समेत कई पाबंदियों के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने एक सप्ताह के भीतर सभी प्रतिबंधात्मक आदेशों की समीक्षा का निर्देश दिया।

जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 निष्क्रिय होने के बाद सुरक्षा लिहाज से इंटरनेट पर लगाए गए प्रतिबंध समेत कई पाबंदियों के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने आज यानी शुक्रवार (जनवरी,10, 2019) को अपना फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने फैसले में कहा है कि जम्मू कश्मीर सरकार एक सप्ताह के भीतर सभी प्रतिबंधात्मक आदेशों की समीक्षा करे।

कोर्ट ने प्रशासन से अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों जैसी आवश्यक सेवाएँ प्रदान करने वाली सभी संस्थाओं में इंटरनेट सेवाओं को बहाल करने के लिए कहा। न्यायालय का मानना है कि इंटरनेट का अनिश्चितकालीन निलंबन उन्हें स्वीकार्य नहीं है और धारा 144 सीआरपीसी के तहत बार-बार आदेश देने से सत्ता का दुरुपयोग होगा।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा, किसी विचार को दबाने के लिए धारा 144 सीआरपीसी (निषेधाज्ञा) का इस्तेमाल समाधान के तौर पर नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा, “कश्मीर में बहुत हिंसा हुई है। हम सुरक्षा के मुद्दे के साथ मानवाधिकारों और स्वतंत्रता को संतुलित करने की पूरी कोशिश करेंगे। इंटरनेट पर एक समय-सीमा तक ही रोक लगनी चाहिए।”

कोर्ट ने याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी हवाला दिया। अदालत ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं कि लोकतंत्र स्थापित करने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक जरूरी साधन है। इंटरनेट का इस्तेमाल फ्री स्पीच के आर्टिल 19 (1) के तहत मौलिक अधिकारों में आता है।

गौरतलब है कि न्यायमूर्ति एनवी रमण, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति बीआर गवई की 3 सदस्यीय पीठ ने इन प्रतिबंधों को चुनौती देने वाली गुलाम नबी आजाद और अन्य की याचिकाओं पर पिछले साल 27 नवंबर को सुनवाई पूरी की थी।

केंद्र सरकार ने जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान करने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान समाप्त करने के बाद वहाँ लगाए गए प्रतिबंधों को 21 नवंबर को सही ठहराया था। केंद्र ने न्यायालय में कहा था कि सरकार के एहतियाती उपायों की वजह से ही राज्य में किसी व्यक्ति की न तो जान गई और न ही एक भी गोली चलानी पड़ी।

इस दौरान केंद्र ने कश्मीर घाटी में आतंकी हिंसा का हवाला देते हुए कहा था कि कई सालों से सीमा पार से आतंकवादियों को यहाँ भेजा जाता था। स्थानीय उग्रवादी और अलगावादी संगठनों ने पूरे क्षेत्र को बंधक बना रखा था और ऐसी स्थिति में अगर सरकार नागरिकों की सुरक्षा के लिए एहतियाती कदम नहीं उठाती तो यह मूर्खता होती।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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